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Thursday 23 Nov 2017

पूँजी (2)

मेरी अरज-गरज  घुर्र घुर्र... घर्र घर्र तीव्र टंकार।...

मैं उद्घारक, मैं ही प्रजा पालक...
मैं काल-गति-गत्वर चालक,
मैं डूंगर बीहड़ पहाड़ कस्बे गांव चौतरे चबूतरे चौपाल
हर ठोर ठांव... सहेजे श्रम!... दिये... घाव, लगाऊं मरहम...!!
करूं प्रगति पल प्रति पल, छांव-छांव...!
$खेलूं खेल... मदमत्त दांव-दांव...!!
पद-पद मर्दित, चतुरंग चढ़े चाव चाव...!!
मैं प्रजा अभिभावक, मैं धूर अध्यात्म... धावक, वैतरणी नावक,
मैं अत्याधुनिक नग्न विकृत भोग विलासिता अपराधक...
संस्कार संवाहक!! मैं पतित-पतन की भावक!!...


मैं देख-दिखावे पूंजी सृज विनीत विनम्र अति उदार...
मैं काल गति चक्र सुधार!! करूं अवसर मौ$के, तीव्र प्रहार!!

मैं ही कुदरत... मैं ही उदरत...
मैं यंत्र-मंत्र गति द्रुत गत्वर, मैं समय सार तृप्ति तत्पर...
मैं स्वत्व सार, रार $खार धूर धोखे मति भ्रम भटकाव आरपार...
मैं पुन: पुन: वित्तीय पूंजी अकूत सम्पदा, बढ़ाये कष्ट नित नित विपदा...
मैं कर्ज -मर्ज  भार भार, मैं अंधड़ आंधी झार झार, मैं धार धार...।

मैं कूट कपट! तर्क-वितर्क विकट।
मैं बुद्घि बहस, मैं मृदुल भाव प्रकट सहज सरस...
मैं कला कल्पना... हरस दरस! हर आशा उम्मीद अरस-परस!
मैं उत्पीड़क, मेरे तीखे दांत ना$खून, सब कुछ करें तहस नहस!!
मैं मीठी मधुरम चांद रात, बजाऊं सरगम अरम परम...
दर-दम दर दम... झमाक झम झम..! झमाक झम झम!!

मैं $खार मार घट विघट, कलह क्लेश हुर्र हुर्र हर्र हर्र हाहाकार!
मैं पात पात, डार डार, मैं झार झार, मैं धार धार!!
मैं बोध-सुबोध, मैं द्वंद्व दुर्बोध,
मेरे उपज घने पने, पैने तीख़े अन्तर्विरोध। अन्तर्विरोध!!
मेरे शोध! मेरे प्रतिरोध! मेरे प्रतिरोध!!
मैं खुद ही घातक, खुद ही संघातक,
मैं क्रूर शोषण उत्पीडऩ, जातक पातक घोर विभाषक
मैं ही अंधकारा... मैं अग्नि दग्ध विपुल अंगारा।।
मैं दु:ख दुर्दम, दग्ध धारा धारा...!

मेरे जनगण... अन्तत: करेंगे पट-परिवर्तन।
संघर्ष-समर काल दुष्काल, कलि कलि कल कल लहर ताल...
जीवन बेहतर... करेंगे, नाद नर्तन!! समर सार... सरतन सरतन...।
जन जागरण, संगठन बल संधारण
मेरे उद्वारक... क्रांति ध्येय धारत... साधेंगे युद्घ उपकरण।
बढ़े-गढ़े अभियान चरण, रण $खण बजाये दुंदुंभियां
जीवन सकल सुख समृद्घ हो बेहतर!
लगाये झाड़ू... खुद सेवक, खु़द हो मेहतर!!
तब ही ''वर्गविहीन शोषण विहीन... सिद्घांत व्यवहार...
सामाजिक समरसता-सृज सुखी कहलाये संसार।।...