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Monday 20 Nov 2017

सूरज चांद सितारे, फिर भी...

जीतेन्द्र धीर
क्यू.283, मुदियाली रोड, गार्डेनरीच,
कोलकाता-700024
मो. 9903491670
मौसम
अकसर
ऐसा होता है
हम तलाशते होते हैं धूप
मन ऊबा देने वाली
बरसातों में
लेकिन ठहर-सा जाता है बादल
न टलने वाली
हमारी मुफलिसी
और फटेहाली सा,
जगह-जगह से टपकता पानी
बारिश की तेज बौछारों में
मुश्किल हो उठता है
कुछ भी बचा पाना,
धुंआती आंखें मलती
मां के चेहरे को
टटोलती कुछ जोड़ी आंखें
कोने में बैठी
थकी हारी उम्र
हमारे लिए जीवन
एक उदास मौसम है।

देखो, कभी गौर से...
कभी गौर से देखो
उस आदमी को
जो धूल अटे बालों
मैले-कुचैले
जगह-जगह
फटे कपड़ों में लिपटा
करीब-करीब नंगा
जिसे देख
अपने आदमी होने पर
शर्म आती है
सड़क किनारे चलते
कुछ ढूंढती निगाहों से
तलाशता है
रोटी जैसी कोई चीज,
उठाता है
फेंका पड़ा
किसी का अधखाया आम
चबाता है उसे,
और तुम! जो
आमों से भरा थैला लटकाए
शाम को घर लौटते हुए
अचानक आ गई
बारिश से अपने आप को बचाते
दुकान की सहन में खड़े
रह-रह उसे देख रहे हो
क्या, कुछ महसूस कर रहे हो?

सूरज चांद सितारे, फिर भी...
तुम्हारी दुनिया में
किसी बाहरी व्यक्ति
अजनबी सा
भटका रहा हूं मैं
सोचते होगे तुम
मुझे पागल या सनकी
जो तलाश रहा है
रेत के दरिया में
पानी के सोते,
पांवों के नीचे
बर्फ से कंकड़ तक
ऐसा कुछ भी नहीं
जो न आया हो,
खड़ा हूं ऐसी जगह
जिसे जंगल नहीं
तो बस्ती भी नहीं कह सकते
प्लास्टिक के फूल
नागफनी गमलों की दुनिया में
रहते हों लोग जहां
वहां
हो तो सकते हैं मकान
लेकिन घर नहीं,
घर
एक अनुभव है
धूप में चलते मुसाफिर को
गझिन शीतल छांव सा
पथरीले रास्तों से गुजरते
हरी नर्म घास पर
कुछ देर बैठ
आंखों में आकाश भर लेने का
सूरज चांद सितारे फिर भी
धरती लगे अकेली
दुख की बनी सहेली।