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Friday 24 Nov 2017

धुंध के पार कहीं रौशनी उछलती है

डॉ. ओम  प्रभाकर
141, राजाराम नगर
देवास-4550001
मो. 9977116433
धुंध के पार कहीं रौशनी उछलती है
गोश:ए-गुम में कोई जिन्दगी उछलती है।

मैं देखता हूं कि दरिया जहां पे गिरता है
उसी ढलान से मछली कोई उछलती है।

सभी हैं घर में बमामूल अपनी-अपनी जगह
कि सिसकता है कोई बेकली उछलती है।

हवा की छेड़ से बलखाते हुए दरया में
चांद को साथ लिए चांदनी उछलती है।

ये सिर्फ जानता है नग़्मागर कि नग़्मे में
कहां पे चीख, कहां खामुशी उछलती।

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थोड़ा तेरा, थोड़ा मेरा हिस्सा निकले
इसी खराबे से कुछ अच्छा-अच्छा निकले,

आनी है हर साल खिंजाँ तो हो सकता है
अब के पतझड़ से कोई गुल-चेहरा निकले

दिल ही दिल में ढूंढ रहा हूं कोई रस्ता
दिल ही दिल में शायद कोई रस्ता निकले।

तोड़ रहा हूं मैं दुख के पत्थर पर पत्थर
शायद कोई पत्थर तेरे जैसा निकले।

रखकर तेरी याद कहीं मैं भूल गया हूं
अब उठकर ढूंढूं तो जाने क्या-क्या निकले?

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कब तलक दीवार से सर टेककर बैठे रहें
चंद लफ्ज़ों को उधेड़ें और घर बैठे रहें।

कब तलक कुछ लोग उठते जाएं सूरज की तरह
और कब तक कुछ किए नीची नजर बैठे रहें।

अब तो दरवाजा तिरे मक़्तल का खुलना चाहिए
कब तलक हम लेके हाथों में ये सर बैठे रहें।

गुजरे वक्तों के वो लम्हे फिर जनम लेकर मिले
इन परीजादों को घेरे रात भर बैठे रहें।

तू भी मेरे साथ हो इस फिक्र में घुलती हुई
किस तरह बेफिक्र होकर उम्र भर बैठे रहें।
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मैं गहरी नींद में था जबकि ये भेजी गई दुनिया,
अब इस्तेमाल करनी है मुझे दे दी गई दुनिया।

बवक़्ते सुबह लगता था कि कुछ-कुछ दस्तरस में है।
जो आई शाम, हाथों से मिरे ले ली गई दुनिया।

पड़ी है जा बा जा, टूटे हुए शीशे के टुकड़ों-सी
किसी अनजान खिड़की से कभी फेंकी गई दुनिया

मेरे दर पर नए दिन को महकते फूल की सूरत
सहर जो रख गई थी, शाम को लेती गई दुनिया।

ये अपना देश है, आ जाएंगे वापस यहीं, फिर भी
चलों, ढूंढे उसे जो ख्वाब में देखी गई दुनिया।