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Thursday 23 Nov 2017

भले मदहोश है सारी ये दुनिया तेरे जादू में

आशीष दशोत्तर
12/2,कोमल नगर,बरबड़ रोड़
रतलाम (म.प्र.)
09827084966
भले मदहोश है सारी ये दुनिया तेरे जादू में
मगऱ घर के नहीं तुझसे हुए हालात काबू में।
किसी को आसमां भी एक टुकड़े सा दिखाई दे
हज़ारों ग़म समेटे हैं किसी ने एक पहलू में।
हमें कांटों में खुशबू ढूंढने का शौक है, लेकिन
यहां पर ढूंढने वालों ने ढूंढे ऐब खुशबू में।
जहां नफरत के पलड़ों में हसद के बाट रक्खे हों
हमारे प्यार को तौलो न तुम ऐसी तराज़ू में।
लहर आएगी जब कोई बहाकर ले ही जाएगी
भले ही पैर कितने भी जमा लें आप बालू में।
मिली जब रोशनी तो हो गए अनजान हम यारों
कभी आशीष हमको खोजते थे लोग जुगनू में।
111
चाहे दुनिया में फेरी लगाया करो
कुछ घड़ी अपने घर में बिताया करो।
डूबने से किसी को बचाया करो
फजऱ् ऐसे भी अपना निभाया करो।
सेज़ फूलों की तुमको मिलेगी सदा
फूल राहों में सबके बिछाया करो।
जो घड़ी अपने मिलने-मिलाने की है
तुम न दीवार उस पल उठाया करो।
आंच रिश्तों पे अपने ही आने लगे
आग ऐसी कभी मत लगाया करो।
हार कर जिसमें आशीष आए मज़ा
शर्त ऐसी भी कोई लगाया करो।
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हर कहीं प्यार ही प्यार हो
खुशनुमा ऐसा संसार हो।
नाखु़दा का भरोसा नहीं
हाथ में अपने पतवार हो।
ऐसा पल तो न आए कभी
आपसे कोई तकऱार हो।
फूल से तितलियां जब मिले
बीच में ना ही दीवार हो।
पैर ही न ज़मीं पर पड़े
तेज़ ऐसी न रफ्तार हो।
उंगलियां फिर उठेंगी नहीं
साफ-सुथरा जो किऱदार हो।
झूठ हारे हमेशा यहां
कोशिशें उसकी बेकार हो।
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दिल में नफऱत हाथ में हथियार आखिर किसलिए
अपनों के ही बीच में तकऱार आखिर किसलिए।
आईनों के बीच रहने का अगर है शौक तो
आपको है पत्थरों से प्यार आखिर किसलिए।
पाक दामन हो,अगर कोई नहीं है ऐब तो
उंगलियां तुम पर उठी हर बार आखिर किसलिए।
ये हवा तो सरहदों को पार करती जाएगी
तुम खड़ी करते रहे दीवार आखिर किसलिए।
दोनों हाथों से इस दिल खोलकर हम बांट दें
है हमारे पास इतना प्यार आखिर किसलिए।
कोई भी रिश्ता नहीं है झूठ से तेरा तो,फिर
चुभ रहे हैं सच के पैरोकार आखिर किसलिए।
तू बदलना चाहता है वक़्त को ,लेकिन यहां
कटघरे में है तेरी सरकार आखिर किसलिए।
लोग कहते हैं कि मैं आशीष फूलों सा नहीं
फिर महकता है मेरा किऱदार आखिर किसलिए।
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कड़े इम्तेहां हैं मुहब्बत से पहले
जऱा सोच लेना इबादत से पहले।
लगा है जो घर में उसी आईने को
कभी देख भी लो शिकायत से पहले।
यहां मुफलिसी से गुजऱ कर ही जाना
कय़ामत कई हैं कय़ामत से पहले।
जऱा सा दिया शान से जल रहा है
अन्धेरों की ऊंची इमारत से पहले।
कभी से हमें यूं ही बहला रहे हैं
हज़ारों फसाने हक़ीकत से पहले।
उसे ठोकरों से कुचलना पड़ेगा
अगर झूठ आए सदाक़त से पहले।
अभी तुमसे आशीष मिलकर ये जाना
कभी थी मुहब्बत अदावत से पहले।
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लगता है तेरा प्यार नहीं संग हमारे
लौटे हैं तभी ख़त कई बैरंग हमारे।
समझे न कभी उसके लिए कुछ भी नहीं हम
देखो तो कई रूप, कई रंग हमारे।
हालात कभी भी न यहां ठीक रहेंगे

चलती ही रही बीच अगर जंग हमारे।
हाथों में अगर हाथ लिए हम जो चलेंगे
ठहरेगा नहीं कोई भी पासंग हमारे।
दुनिया की हदों को न कभी तोड़ सकेंगे
होंगे जो अगर दायरे ही तंग हमारे।
हम खुद भी यहां आपकी राहों पे चले हैं
आशीष तभी आपका है संग हमारे।
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वो सांसें, धड़कनें, खुशबू ,वफ़ाएं जि़न्दगी देगा
हमारा हौसला ही तो हमें हर इक खुशी देगा।
भले मुफ़लिस है लेकिन कुछ उसूलों पे तो क़ायम है
अगर देगा कभी वो मशविरा तो भी सही देगा।
ये छोटे ताल,पोखर ही किसी दिन काम आएंगे
समुन्दर तो सदा तश्नालबों को तश्नगी देगा।
मुसीबत में न अपने और न रिश्ते काम आएंगे
वहां पर तो सहारा आदमी को आदमी देगा।
भला ज़ालिम ज़माने की खुशी कब देख पाएगा
वो हंसती,खेलती बस्ती को हरदम बेकसी देगा।
उजाला दूर तक अच्छाइयों का कैसे जाएगा
ज़माना नौनिहालों को अगर बस तीरग़ी देगा।
यकीं है एक दिन आशीष वो भी आ ही जाएगा
मेरे हाथों में अपना हाथ आखिर तू कभी देगा।