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Saturday 18 Nov 2017

तस्मै श्री गुरवे नम:


गोविन्द उपाध्याय
एफ टी 211, अरमापुर इस्टेट, कानपुर 208 009   
मो. 09651670106
दिनकर बाबू आज बहुत खुश थे। आखिरकार उन्होंने ज्योति का दाखिला अपने पसंदीदा विद्यालय में करा ही दिया। कई दिन से ज्योति के चेहरे पर भी चिंता की रेखाएं उगने लगी थी, मेरी सभी सहेलियों का दाखिला हो चुका है। आप पता नहीं किस चक्कर में पड़े हैं? आपका जमाना दूसरा था। अब पद्मावती देवी उच्चतर माध्यमिक की  मेरिट बहुत हाई जाती है। उसके भरोसे रहना बेकार है। और भी तो विद्यालय हैं, शहर में। अभी आसानी से हो जायेगा। बाद में सीट फुल हो जायेगी। आप पद्मावती देवी के सेकेंड लिस्ट के इंतजार में समय बर्बाद कर रहे हैं।
 लेकिन दिनकर बाबू चाहते थे, उनकी इकलौती बिटिया पद्मावती देवी में ही पड़े। उन्हें इस स्कूल से बहुत लगाव था। उन्होंने स्वयं बारहवीं इसी विद्यालय से उतीर्ण किया था। तब इतना हाई मेरिट नहीं जाता था। स्वर्गीय आदित्य शुक्ला प्रधानाचार्य हुआ करते थे। सफेद झब्बेदार मूंछे, बुलंद आवाज और छ: फुट का सुगठित शरीर, हाथ में ढाई फुट का काला डंडा (रूल)। बहुत अनुशासित विद्यालय था। सहशिक्षा थी। मजाल था कोई विद्यार्थी नियम के विरुद्ध कोई कार्य करे। प्रधानाचार्य का डंडा, याद नहीं कभी किसी विद्यार्थी को दंडित किया हो। उनकी बुलंद आवाज ही विद्यार्थियों के लिए काफी होती थी। दूसरी लिस्ट में ज्योति का नाम आ गया था। उसने गणित लिया था। दसवीं में जिस विद्यालय में पढ़ती थी, वह घर के बिलकुल पास था। उसे बारहवीं की मान्यता नहीं मिली थी। इसलिए भी उन्हें नये विद्यालय में दाखिला कराना ही था। ज्योति का नया विद्यालय घर से दो किलोमीटर की दूरी पर था। दिनकर बाबू ने पहले सोचा कि रिक्शा कर दिया जाए। लेकिन फिर उन्होंने उसके लिए साइकिल खरीद दिया था। घर के पास ही एक कोचिंग सेंटर था। नई उम्र के तीन-चार लड़के मिलकर चलाते थे। लड़के सरकारी नौकरी के इंतजार में ओवरएज हो गए थे। अब उन्होंने यह कोचिंग सेंटर खोल लिया था। दसवीं और बारहवीं में इनका परीक्षा फल बहुत अच्छा जाता था। इसलिए कोचिंग सेंटर चल निकला था।
दसवीं तक तो दिनकर बाबू स्वयं पढ़ा लेते थे। लेकिन अब उन्हें बिटिया को पढ़ाने में दिक्कत आ रही थी। उन्हें लगा कि यह कोचिंग सेंटर घर के पास है। कुछ लोगों से, जिनके बच्चे वहां पढ़ रहे थे या पढ़ चुके थे, बातचीत की। सबने कोचिंग के युवाओं के परिश्रम की सराहना की। और दिनकर बाबू ने भी ज्योति को वहां भेजना शुरू कर दिया। कोचिंग सेंटर के लड़के सचमुच मेहनत कर रहे थे। ज्योति भी मन लगाकर पढ़ाई कर रही थी।
विद्यालय में मासिक परीक्षा (यूनिट टेस्ट) होती थी। अद्र्धवार्षिक परीक्षा के पूर्व दो बार और वार्षिक परीक्षा के पूर्व भी दो बार। प्रत्येक विषय की मासिक परीक्षा दस नंबर की होती थी। जिसके नंबर भी परीक्षा परिणाम में जोड़े जाते थे। अद्र्धवार्षिक और वार्षिक परीक्षा में प्रत्येक विषय के अस्सी अंक होते थे। अर्थात प्रत्येक विषय के सम्पूर्ण परीक्षाओं का योग दो सौ था और वार्षिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए सभी विषयों में तैंतीस प्रतिशत अंक अनिवार्य था। यानि प्रत्येक विषय में न्यूनतम छासठ अंक।
ज्योति की पहली मासिक परीक्षा हुई थी। वह अपनी तरफ  से पूर्ण संतुष्ट थी। उसका टेस्ट अच्छा हुआ था। परिणाम आया तो उसने सभी विषयों में अच्छे अंक प्राप्त किए थे। किंतु गणित में शून्य मिला था। दिनकर बाबू को अजीब सा लगा। उनकी बिटिया तो हमेशा अव्वल आती थी। फिर अचानक गणित में इतनी कमजोर कैसी हो गई। उन्होंने बेटी को सांत्वना दी, कोई बात नहीं बेटा। हो जाता है। परिश्रम करो। घबराने की कोई जरूरत नहीं है।
ज्योति ने प्रतिवाद किया, नहीं पापा। मेरे सभी जवाब सही थे। फिर भी पांडेय सर ने काट दिए हैं । मैंने उनसे पूछा भी, उन्होंने घुड़क दिया और बोलने लगे कि जैसा उन्होंने बताया था, वैसा मैंने नहीं किया है।
तो जैसा उन्होंने बताया था। वैसा करना था। दिनकर बाबू ने बेटी को समझाने का प्रयास किया।
लेकिन उन्होंने कुछ समझाया ही कहां था। क्लास रूम तो वो इधर-उधर करके अपना समय काट लेते हैं। ज्योति रूआंसी हो गई थी। दिनकर बाबू ने बात को वहीं खत्म कर दिया। ज्योति अब गणित पर अधिकतम समय देने लगी थी। उसे उम्मीद थी कि अबकी बार उसे अच्छा नंबर मिलेगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। उसे सिर्फ  दस में से दो नंबर मिले थे। ज्योति ने खुद ही दिनकर बाबू को समझाया, पापा पांडेय सर मुझे गणित में फेल करके मानेंगे। वो ऐसे ही नंबर देते हैं। गणित में वही पास होता है, जो उनसे ट्यूशन पढ़ता है। आप इस बात को समझिए। नहीं तो मैं ग्यारहवीं में ही लटक जाऊंगी।
दिनकर बाबू हंस दिए, बेटा मैं भी उसी विद्यालय का छात्र रहा हूं। मैं भी गणित पढ़ता था। श्री शंभू नाथ गुप्त थे हमारे जमाने में। दसवीं के बाद गणित थोड़ा कठिन हो जाता है। वो स्कूल बंद होने के बाद कमजोर विद्यार्थियों को रोक लेते थे और उन्हें अतिरिक्त समय देते थे। उनका परीक्षाफल शतप्रतिशत जाता था।
अरे पापा, तब दूसरा जमाना था। पाण्डेय सर तो पूरे कसाई हैं। किसी को भी जिबह कर देते हैं। मैंने आपको सारी परिस्थितियों से अवगत करा दिया। आप मेरी बात की पुष्टि कर सकते हैं। इसीलिए हमारे कोचिंग में ग्यारहवीं के बच्चे बहुत कम पढ़ते हैं। जो पढ़ते भी हैं, वह गणित पढऩे पाण्डेय सर के यहां भी जाते हैं। अगर फिर भी आपको लगता है कि मैं गणित में कमजोर हूं, तो मेरे कोचिंग वाले सर से बात कर लीजिए। वह खुद आपको मेरे बारे में बता देंगे। पाण्डेय सर को पकड़े बिना ग्यारहवीं नहीं पार होगा। ज्योति बहुत गुस्से में थी। दिनकर बाबू ने आश्वासन दिया कि वह जल्द ही इस समस्या का हल निकाल लेंगे। पाण्डेय सर से मिलने के पहले दिनकर बाबू ने उनके बारे में जानकारी हासिल करने का प्रयास किया।
पाण्डेय सर का पूरा नाम था मुरलीधर पाण्डेय। इसी शहर के पास लगे गांव के रहने वाले थे। पिताजी पुरोहिती का कार्य करते थे। खेती बाड़ी कोई खास नहीं थी। बचपन बहुत अभाव में बीता था। पढऩे-लिखने में ठीक थे। गणित से प्रथम श्रेणी में मास्टर डिग्री थी उनके पास। उसके बाद नेट क्वालिफाई किया। पीएचडी भी कर लिया। यूजीसी में जुगाड़ नहीं लग पाया तो उच्चत्तर माध्यमिक के लिए प्रयास किया और सफल हो गए। पद्मावती देवी में लेक्चरर की नौकरी मिल गई। नौकरी के प्रारंभिक दिनों में बहुत ज्यादा कुंठित रहते थे, मैं यहां ज्यादा दिन नहीं रुकने वाला। आज-नहीं तो कल मेरा असिस्टेंट प्रोफेसर वाला नियुक्ति पत्र मिल ही जायेगा। तब तक समय तो काटना ही है।
लेकिन कई साल बीत गए और नियुक्ति पत्र नहीं आया। फिर वह इसी नौकरी में ही रम गए और असिस्टेंट प्रोफेसर से कई गुना ज्यादा वह ट्यूशन से पैदा करने लगे। चूंकि बारहवीं की परीक्षा बोर्ड से होती थी और पाण्डेय सर का उसमें कोई वश नहीं था। ऐसे में उनका पूरा ध्यान ग्यारहवीं के विद्यार्थियों पर रहता। ट्यूशन का भी उनका सीधा हिसाब था। सत्र अप्रैल से मार्च तक चलता था। बारह महीने का हिसाब था। हालांकि उसमें गर्मियों की  छुटियां भी शामिल थीं। पांच सौ के हिसाब से छ: हजार रुपए बनते थे। अब आप दो महीने बाद गए तो छ: सौ प्रति माह के हिसाब से देने पड़ेंगे। महीने जितने कम होते जाते, पाण्डेय सर की ट्यूशन फीस उसी हिसाब से बढ़ती जाती। उनका सीधा सा हिसाब था, प्रत्येक छात्र से छ: हजार ही लेना है।
दिनकर बाबू, जब तक पाण्डेय सर से बात करते, अर्धवार्षिक परीक्षा शुरू हो गई। गणित को लेकर ज्योति का आत्मविश्वास कमजोर पडऩे लगा था । उसने पहले से ही मान लिया था कि वह गणित में सफल नहीं हो पायेगी। जब परिणाम आया तो ज्योति की गणित में प्रगति निराशाजनक ही रही। सभी विषयों में उसके अच्छे अंक थे, लेकिन क्या फायदा? गणित में अस्सी में मात्र अठ्ठारह अंक ही मिले थे। प्रथम प्रश्नपत्र में दस और दूसरे में मात्र आठ। अब तक का पूरा जोड़ सौ में बीस ही बन रहा था।
अपनी बेटी को इस तरह हताश देखकर दिनकर बाबू का खून खौल गया था। कभी भूल से भी किसी से ऊंचा न बोलने वाले दिनकर बाबू ने मन ही मन पाण्डेय सर को हजारों गालियां दे डालीं। उन्हें लगा कि अब टाला नहीं जा सकता। इस पाण्डेय सर से मिलना ही होगा।
तभी कोचिंग में गणित पढ़ाने वाला लड़का घर आ गया। अंकल, आप ज्योति को  पाण्डेय सर के पास भेजें। अब कोई चारा नहीं बचा है। होशियार बच्ची है। मैथ की वजह से डिप्रेशन में जा रही है। हमने बहुत कोशिश की। फस्र्ट ईयर में पद्मावती देवी के बच्चे हमारे पास नहीं आते। सैकेंड ईयर में मैक्सिमम बच्चे पद्मावती देवी के हमारे पास ही आते हैं। क्या किया जाए, उस टुच्चे अध्यापक के खिलाफ  बहुत लिखा पढ़ी हुई। लेकिन कोई उसका बालबांका नहीं कर सका। वैसे ही सांड की तरह मस्त है और छात्रों के जीवन से बेखौफ खिलवाड़ कर रहा है।
आखिरकार दिनकर बाबू, बेटी को लेकर पाण्डेय सर के घर पहुंचे। घर में प्रवेश करते ही एक छोटा सा ड्राईंग रूम था। ड्राईंग रूम में महापुरुषों के कई चित्र लगे थे। पाण्डेय सर की भी कुछ तस्वीरें थी। जिनमें वह पुरस्कृत होते दिखाई दे रहे थे। कमरे में लकड़ी की नक्काशीदार कुर्सियां थी, जिनमें हाल ही में पालिश कराया गया था। एक किताबों से भरी अलमारी थी। उसके बाद बड़ा सा हाल। हाल में स्कूल के ढेर सारे विद्यार्थी अस्त-व्यस्त मुद्रा में बैठे थे। एक सांवला सा ठिगना गठे शरीर का आदमी कुछ बता रहा था। बेटी ने धीरे से कहा, यही पाण्डेय सर हैं। पाण्डेय सर ने दिनकर बाबू को देख लिया था। वह फुर्ती से उठे और अगले क्षण उनके सामने थे, उन्होंने हाल का दरवाजा बंद कर दिया, आइए बैठिए। बताइए कैसे आना हुआ?
दिनकर बाबू बिना किसी औपचारिकता के बोल गए, सर जी यह मेरी इकलौती बेटी है ज्योति। ग्यारहवीं में पढ़ती है। आपकी कक्षा की छात्रा है।
दिनकर बाबू की बात पाण्डेय सर ने बीच में ही काट दी, हां ! मैं इसे जानता हूं। बहुत प्यारी बच्ची है। गणित थोड़ा टफ है । वैसे मेरा प्रयास तो यही रहता है कि बच्चों को ट्यूशन न पढऩा पड़े। स्कूल में मैं बहुत समय देता हूं। यदि किसी को कुछ पूछना है तो कभी भी आकर पूछ सकता है। अब आप मेरे पास आ गए हैं, तो मैं कुछ न कुछ करूंगा ही। आप परेशान न हों। आपकी बिटिया गणित अच्छे अंकों से पास करेगी। कल से इसे शाम को छ: बजे भेज दिया करें। इसे थोड़ा एक्स्ट्रा समय देना पड़ेगा।
दरवाजे के पीछे शोर बढ़ता जा रहा था। पाण्डेय सर ने उनकी तरफ  देखा और हंसते हुए बोले, बच्चे शरारती होते हैं। देख रहे हैं, दो मिनट में ही हंगामा करने लगे।
दिनकर बाबू हाथ जोड़ते हुए बोले, सर आप बच्चों को देखिए। मैं कल से बच्ची को भेजता हूं। इस पर अपनी कृपा दृष्टि रखियेगा। उसका साल न खराब होने पावे।
पाण्डेय सर ने हाथों के इशारे से आश्वासन दिया और दिनकर बाबू ज्योति को लेकर बाहर निकल आये। उन्हें  अंदर ही अंदर ग्लानि हो रही थी। एक गलत आदमी के सामने समर्पण करके आए थे । लेकिन क्या किया जाय वक्त बदल चुका है। अब आदित्य शुक्ला और शंभू नाथ गुप्ता का जमाना चला गया था। मुरलीधर पाण्डेय जैसे लोग आ गए थे। जिनके लिए शिक्षा एक धंधा था। उन्हें उससे पैसा कमाना था।
पैंतालिस मिनट की पढ़ाई। आने जाने का डेढ़ घंटा। ढाई घंटे का समय पाण्डेय सर के नाम चढ़ गया था। दो हफ्ते बाद ही पाण्डेय सर ने ज्योति को बता दिया था कि उसे एक हजार रुपये मासिक देना है और वह भी एडवांस।
दिनकर बाबू को पहले से ही मालूम था कि उन्हें सालाना छ: हजार लेना ही है। मजबूरी थी। उन्होंने पैसे भिजवा दिए। लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ, जब अगले यूनिट टेस्ट में भी ज्योति को गणित में तीन नंबर मिले। ज्योति इस बार इतनी घबराई हुई नहीं थी। पर दिनकर बाबू जरूर मायूस थे। दो हजार दे चुके थे। दुर्भाग्य ने अभी पीछा नहीं छोड़ा था। अगला टेस्ट ज्योति दे ही नहीं पायी। उसकी तबियत अचानक खराब हो गई थी। उसकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह विद्यालय जा सके। ज्योति के तीन विषयों का टेस्ट छूट गया था। उनमें से एक गणित भी था।
अब सिर्फ  वार्षिक परीक्षा ही शेष बची थी। दिनकर बाबू पाण्डेय सर के पास गए और हाथ जोड़कर रूआंसे होकर बोले, पाण्डेय साहब मुझे नहीं लगता कि इस वर्ष बिटिया पास हो पायेगी। ज्योति से ढेर सारी आशाएं पाल रखा हूं। पढऩे में भी ठीक-ठाक ही थी। लेकिन पता नहीं क्यों, वह आपके विषय को ठीक से पकड़ नहीं पायी। लाख प्रयास के बाद भी वह पिछड़ती चली गयी।
न चाहते हुए भी दिनकर बाबू की आंखें गीली हो गई थी। पाण्डेय सर ने उन्हें आश्वासन दिया, आप बेकार इतना परेशान हो रहे हैं। ज्योति सचमुच होशियार और मेहनती बच्ची है। वह फाइनल में निकाल ले जायेगी। बस आप उसके स्वास्थ का ख्याल रखिए। बहुत दुबली हो गई है।
ज्योति ने कोचिंग जाना बंद कर दिया था। अब वह सिर्फ  पाण्डेय सर के यहां जाती। डेढ़ महीने शेष थे। दिनकर बाबू आफिस से आने के बाद बिटिया को लेकर पाण्डेय सर के घर पहुंच जाते। फिर आस-पास घूमते हुए टाईम पास करते। आधे घंटे बाद अगले बैच के बच्चे आ चुके होते, जो बाहर खड़े होकर हंसी ठिठोली करते समय बिताते हुए पिछले बैच के बच्चों के छूटने का इंतजार करते। दिनकर बाबू का प्रयास यही था कि बेटी के दिमाग पर किसी तरह का कोई तनाव न रहे। वह उसे समझाते, बेटा  पढ़ाई करना तुम्हारा काम है। वह तुम कर रही हो। घबराने की बिलकुल जरूरत नहीं है। बहुत लंबा जीवन है। पाण्डेय सर जैसे लोग हर जगह बैठे हैं। उनको बायपास करके निकलना बहुत मुश्किल है। अपना उद्देश्य बड़ा बनाओ। अपने आप छोटी-छोटी बाधाओं को नजरंदाज करना सीख जाओगी।
दिनकर बाबू एक पिता थे। वह अपनी बेटी को उदास कैसे देख सकते थे। पाण्डेय जैसे अजगरों को शिक्षा जगत में पालने के दोषी, उनके जैसे लोग हैं। सब डरते हैं, अपने बच्चों के भविष्य खराब होने के भय से और उसी का फायदा उठाते हैं मुरलीधर पाण्डेय जैसे लोग।
दिनकर बाबू ने सोच लिया था कि अभी भले ही आज के हालात से समझौता करना पड़ रहा है, लेकिन ज्योति के विद्यालय छोड़ते ही वह पाण्डेय के खिलाफ  लिखा-पढ़त शुरू कर देंगे ।
परीक्षा के एक हफ्ते पहले से पाण्डेय सर ने तीस सवाल सभी बच्चों को लिखवाया और कहा कि इन्हें जरूर तैयार कर लेना। समझदार को इशारा काफी होता है। अधिकांश बच्चों ने यह अनुमान लगा लिया कि आने वाली परीक्षा में यही प्रश्न आयेंगे। और हुआ भी यही। अधिकांश प्रश्न दिए गए सवालों से मिलते-जुलते ही थे। ज्योति का पेपर सही हुआ था।
वार्षिक परीक्षा भी हो गई थी। अब परिणाम का इंतजार था। पाण्डेय सर के यहां जाना बंद हो चुका था। ज्योति पूरी तरह आश्वस्त थी, पापा परेशान होने की जरूरत नहीं है। जो होगा देखा जायेगा। वैसे पाण्डेय सर पास कर देंगे। आखिर पैसे किस बात के लिए हैं।
ज्योति की बात सत्य साबित हुई। उसे गणित के अस्सी अंकों  में से छासठ अंक मिल गए थे। वह ग्यारहवीं पास कर चुकी थी। दिनकर बाबू शाम को पाण्डेय सर के यहां धन्यवाद देने पहुंचे। देखा तो उत्सव का माहौल था। आस-पास  बच्चे इकठ्ठा थे और उनके बीच पाण्डेय सर के ठहाके थे।