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Saturday 18 Nov 2017

गुलर का फूल

 

 विद्या गुप्ता
 श्री सदन आर्य  नगर दुर्ग (छ.ग.)-491002
मो.-9617001222
सचमुच उनके आंगन में सुबह चुपचाप ही उतरा करती थी, बिलकुल दबे पांव .....क्योंकि डर था, थोड़ी सी आहट.....कहीं पूरी आवाजों की मांग ना करने लगे। सुबह की पहली किरण बे आवाज दबे पांव आकर आंगन में पसर जाती। चिडिय़ा गौरया भी बुलाने से ही आती ...घर की खामोश दीवारें वहां होने वाली छोटी-मोटी आवाजों को तो यूँ ही सोख लिया करती थी. ....या यूँ कहे कि, दीवारों को भर पेट आवाजें न मिल पाने के कारण वे अक्सर सन्नाटे उगल दिया करती थीं। इधर से उधर, अंदर से बाहर, आंगन से सहन तक आवाजें तलाशती हवा यूँ ही ऐंठ कर खाली हाथ चली जाती। ...शब्द मिलते  तो गीत बनता, ...कोई धुन मिले तो उसे गुनगुनाये ....सुबह से रात तक कुछ गिनी चुनी आवाजें ही तो उस घर की धड़कन थी जैसे-
सुबह छ: बजे .....
दिनकर जी उठिए .....चाय बन गई
फिर चाय की चुस्कियां और चुप्पी ....
नाश्ते पर  .....सुबह का अख़बार दो हाथों में बंट जाता ....पन्नों की सरसराहट के साथ कभी कभी ओह ! वाह ! अरे ! जैसे विस्मय बोधक शब्दों में समाचारों की सांकेतिक प्रतिक्रिया होती
नौ बज गये ....नहा लीजिए ....
दस बज गए........अच्छा चलता हूँ शारदा ....बाहर से कुछ मंगाना तो नहीं है ?
हाँ या नहीं, के साथ नियमित शब्दों में बिदाई सम्पन्न हो जाती। कुण्डी चढ़ती और अंदर की दुनिया एक अलग घेरे में बंट जाती। फिर शारदा कुछ मन्त्रों भजनों के नियमित गाये जाने वाले पदों से आवाजों को बनाये रखती ...जिसमें खाना बनाते वक्त की पतीली करछुल की आवाजें, आरती की टुन टुनाती घंटी की आवाज भी शामिल रहती। बीच-बीच में घड़ी का हस्तक्षेप भी शामिल रहता।
बारह बज गये ......किचन और पूजा की ध्वनियाँ समाप्त हो गईं। छोटी सी टेबल पर, छोटे छोटे बर्तनों में खाना ढका है, जो दिनकर जी के आने , कुण्डी बजने और हाथ पैर धोने की आवाज के साथ ...प्लेटों में सरकना शुरू हो जायेगा। दोनों की ओर से आवाजों को खोज कर लाने के प्रयास में थोड़ी सी कृत्रिम ध्वनियाँ सरसराएंगी। बीच के दो घंटे का मध्यावकाश कुछ आवाजों से भर उठेगा ......
 शारदा !!.....कुण्डी की खट खटाहट  
.....द्वार खुलने बंद होने की चर मर के साथ अंदर आते आते दिनकर ने सप्रयास शब्द सूत्रों को जोड़ा- कैसी हो शारदा !! कुछ थकी थकी लग रही हो
नहीं, काहे में थकूंगी, रोज जितना ही तो काम किया
और कोई आया तो नहीं
नहीं , कौन आयेगा !!
क्या बनाया खाने में? दिनकर खोज खोज कर प्रश्नों से चुप्पी उलीचते रहें ..
बैंगन, टमाटर और दाल चपाती चावल .....और क्या बनाती !....
बैंगन भरता ! वाह वाह .....शब्द फिर चुकने लगे।
आफिस  में साइमन साहब आ गये क्या? इस बार शारदा ने कुछ शब्द खोजे
नहीं कल आएंगे।
फिर विराम ......
उपर वाली मिश्रा की बहू की तबियत कैसी है?
अच्छी है अब।
विराम
धोबी को कपड़े दे दिए?
.....नहीं मैंने ही धो डाले?
अरे , धोबी से ही धुलवा लिया करो।
नहीं ...मंै भी सारा दिन फालतू बैठी क्या करूं ......सन्नाटे ने फिर पैर पसारे।
दो बज गए, दिनकर उठे, हाथ मुंह धोये ......तब तक चाय तैयार .....चाय पीकर ..शारदा को आराम की हिदायत दे कर आफिस चले गये. ...अब शाम को पांच बजे तक कोई आवाज नहीं। दोपहर मुंह फाड़े उबासियां लेती रही ...चहलकदमी करते दिन ने आगे का दायित्व उतरती हुई शाम को सौंपा और कैलेंडर से खिसक गया।
बस ऐसे ही गुजरते रहे दिन...महीने साल.......!!  बसंत, पतझर, तुषार ..... थमते, रुकते, ठिठकते तीस साल गुजर गये। तीस साल पहले दो नितांत अकेलों ने मिलकर इस सफर की शुरुआत की थी। एक दुर्घटना में माता पिता को खो चुके दिनकर अपनी विधवा बुआ  की गोद में पल कर बढ़े हुए. ...तो शारदा का भी एक बहन के आलावा इस दुनिया में और कोई नहीं था। दोनों के हिस्से में नीरव  खालीपन. ... उसी खालीपन को भरती सम वेदना दोनों को करीब ले आई .....एक नई दुनिया बसी ....नये सपने सजे ....मन प्राण से एक होकर दोनों एक दूसरे को भर देना चाहते थे। आकाश के सितारे, या सागर के मोती से उपहार भी उनकी उस ख़ुशी के सामने कुछ नहीं थे ....वे बस किलकारियों से भरा एक आंगन .....एक हंसता खिलखिलाता खिलौना चाहते थे, जो उनके जीवन में घुले एकाकीपन को पूरी तरह सोख ले ...विगत से आगत तक सब खुशियों से सराबोर हो उठे . ....
दोनों आतुरता से उस नव आगुन्तक का इंतजार करते अक्सर चर्चा में खो जाते- 'शारदा, जीवन के सारे उतार चढ़ाव पर एकाकी चलता हर पल मैं तुम्हें ही खोजता रहा हूँ। सिर्फ तुम ही मुझे वह सब लौटा सकती हो, जो भाग्य ने मुझसे छीन लिया था।Ó बचपन का आंगन,...बच्चों की किलकारियां.. धमाचौकड़ी ....शोर .....!! सच, अकेले चलते मैं थकने सा लगा था। अब मुझे उस खिलखिलाहट का ही इंतजार है। शारदा की मन-मुग्ध पलकें उपर उठती, दिनकर की आँखों में उतरते हुए ,कंधे पर सर टिका देती ....मुझे भी ,ऐसा ही सब चाहिये।
वे आसानी से एक मुद्दे पर सहमत हो जाते - शारदा, चुलबुल के आने की गवाही मिलते ही तुम काम छोड़ दोगी...बस घर में ही आराम करना, उसकी सुंदर सुंदर तस्वीरे ंगढऩा....फुलकारियाँ, मोजे-स्वेटर जो तुम्हारी मर्जी में हो,घर काम के लिए दो नौकर रखना, मगर बच्चे को तुम्हीं देखना।
हाँ हाँ, बिलकुल ठीक, मैं भी अपने बच्चे को नौकरों के हाथ नहीं छोड़ सकता....वो तो हमारी धड़कन होगा, हमारा सुख चैन, हमारा भाग्य, हमारा सब कुछ....शारदा की आंखें आकाश पाताल में कुछ खोजती कहीं गुम हो जाती।
मगर भाग्य का पात्र खाली ही रहा .....उधर प्यास बढ़ती जा रही थी ...इधर  कुँए और बावली में पानी की सम्भावना नहीं के बराबर थी। किसी ने कहा -शुक्राणु कमजोर है, तो किसी ने कहा -नसों में कहीं रुकावट है .....ज्योतिषियों ने राहू-केतु का राग अलापा, तो किसी ने मन्नत मनौती के भरम भरे ....प्यास बढ़ती गई। पितृ दोष, काळ सर्प कुछ नहीं छूटा....
 और जाने कब निराशा ने आकर उनके आंगन में स्थाई डेरा डाल दिया ...खनकती आवाजों का आचमन सूख गया ....सपनों के गुलाबों में हकीकत के काँटें चुभने लगे। शारदा चुप हो गई .....
दिनकर शारदा की टूटन से ज्यादा आहत थे। अपने दर्द को परे रख, उनकी हर कोशिश शारदा को भुलाये रखने में होती थी। मगर, शारदा पूरी तरह चुक गई, न वह स्वयं को सम्हाल पाई न दिनकर के दु:ख को बाँट पाई। इसी निराशा में नौकरी छोड़ दी - अब क्या करना है ज्यादा कमा कर। जिन्दगी का मकसद बस वक्त काटना ही रह गया।
अक्सर शारदा खिड़की में खड़ी हो उन नन्हीं गौरयों का दौडऩा फुदकना देखा करती जो अपने नन्हें चूजों को दाना चुगाने की व्यस्तता में, कभी शारदा की ओर नहीं देख पाईं। उनके पास इतना समय ही कहाँ ? समय तो शारदा के पास था जिसे सारा दिन काटती तो भी नहीं कटता।
......घर के ठीक सामने कोचर सेठ  का मकान था, भरा पूरा परिवार ..हर साल शादी ब्याह , सोहर जचकी ...आज आई बहू साल जाते न जाते सोहर गवा देती... . उफ ! बांझ होने का एहसास फिर हथौड़े की सी चोट दे जाता। पीछे से आकर सब आगे बढ़ जाती ....वह वहीं की वहीं, कील सी जड़ी. ....एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाई। पूरी दोपहर काँटों पर करवट बदलती शारदा को धूल में लथपथ गोधुली-बेला ने, रम्म्भाती गाय सा थपथपाया –उठ, शाम उतर आई। शारदा की आँखों में एक दैन्य सा  छलक आया .... खिड़की के बाहर के दृश्यों में, अंतर की व्यथा को पढ़ती शारदा ने आँखों से बहती वीरानी को पोंछा कुछ ताजा शब्द चुने।
 
शारदा.....!! दरवाजा खोलो भाई !  सहसा कुण्डी की आवाज सुनकर वह फिर शब्दमयी हो गई। आँखों में सहज होने की कोशिश, होंठों पर हंसी और प्रतीक्षा को सजाकर उसने द्वार खोला-एक आदत की तरह हाथ आगे बढ़ा कर दिनकर के हाथों से सामान या फाइल्स थामने की कोशिश में सहसा शारदा ठिठक गई।    
 - अरे यह कौन ? दरवाजा खोलते ही शारदा दिनकर की गोद में सोये नन्हे शिशु को देख चौंक पड़ी। दिनकर का स्वर और चेहरा अवसाद से भरा था। आँखों में गहरी पीड़ा तैर रही थी।
 हमारे आफिस में एक बड़ा हादसा हो गया शारदा !!
क्या हुआ? शारदा की आवाज में अनहोनी थरथरा रही थी।
 कल आफिस का चौकीदार मगन आफिस की ही जीप से, अपने पूरे परिवार को गांव किसी त्यौहार मनाने ले जा रहा था। मुझसे ही बड़ी चिरौरी करता रहा। सर मैं जीप से चला जाऊँ- सुबह आफिस से पहले लौट आऊंगा। फरीदपुर से कुछ कागजात भी मंगवाने थे। समय से लौटने की हिदायत दे मैंने उसे जाने दिया            दिनकर का स्वर व्यथित था। एक बार उन्हें अपनी ही पीड़ा फिर नहला गई   उफ ! सामने से अचानक आ गई ट्रक से बचाने में जीप गहरी खाई में गिर गई ....पूरा परिवार चपेट में आ गया। बस इस नन्ही जान को ड्रायवर सुलेमान किसी तरह बचा कर ला सका। वह खुद भी बहुत जख्मी है हास्पिटल में एडमिट है। अंतर-पीड़ा से आहत दिनकर उसे सीने से लगाये घर ले आये।
ओह!, अब इस नन्ही जान का क्या होगा। शारदा की अपनी पीड़ा कातर हो बह निकली।
फोन पर उसके परिवार वालों से बात हुई थी। फिलहाल तो एक दो दिन इसे देखना पड़ेगा, मगन के दाह संस्कार के बाद उसका भाई छगनलाल आकर बच्चे को ले जायेगा।
 तभी  बच्चा कुनमुनाया- ,अरे यह भूखा होगा शारदा !!
शारदा बच्चे को सम्हालने लगी थी। हादसे और परिणाम से अनजान बच्चा दूध पीकर सो गया। मगर दहशत और उदासी के गहरे कोहरे ने दोनों को लपेट लिया खाना खाने की इच्छा खत्म हो गई। दिनकर शारदा को ध्यान से देख रहे थे शारदा जाने कहाँ खोई हुई थी। माहौल को कुछ सामान्य करने के लिये, खाना दिनकर ने ही प्लेटों में डाल कर शारदा  को आवाज लगाई—आ जाओ शारदा,  बच्चा सो गया क्या !!  
 शी ...शी, होंठों पर ऊँगली रखते शारदा फुसफुसाई, अभी सो रहा है उसके स्वर में जिम्मेदारी थी।
दीवारों ने करवट बदल कर नई आवाजों को गौर से सुना,  बदले क्रम में - प्लेटों में खाना लगा देख कर शारदा की उदासी किंचित मुस्कुराई-अरे, आपने खाना परोस लिया।
हां शारदा, भूख तो जैसे उड़ गई, मगर आओ थोड़ा-थोड़ा खा ले।
खाना खाते खाते, बीच में, अचानक  बच्चा हाथ पैर फेंक कर रोने लगा, -शारदा ने हाथ का कौर वहीं छोड़ा, ....दौड़ कर बच्चे को थपकने लगी। क्रम को व्यतिक्रम ने ढांक लिया, पता ही नहीं चला कब शाम रात में समा गई।
दस बज गये, दिनकर सो गये ।बच्चा सो कर जाग गया। वह पेट भरे होने के बावजूद रोने लगा। अब उसे भूख नहीं कुछ और चाहिए था। नन्हीं मुठ्ठियों से वह आसपास सब खंगाल रहा था ...होंठ लगातार किसी चुम्बक को खेंच रहे थे ...बार-बार वह शारदा की छाती को टहोक रहा था ...शारदा की धड़कन बच्चे की मांग पर अधिक गति से धड़कने लगी ....पिछले तीस वर्षों से सख्त हुई, बंजर जमीन में दरारें पडऩे लगीं.....रेत ही रेत...पानी कहाँ? मगर  .....रेगिस्तान की रेतीली लहरों से, सागर का कोई तो रिश्ता था ...शायद इसीलिए रेत की सूखी धारियों में लहरों की आवाज सुनाई पडऩे लगी ......उफ ! यह कैसी ऐंठी    हुई सरसराहट थी। बच्चे की मांग और तलाश  ने शारदा के तीस बरस के सहेजे स्वीकृत बाँझत्व को झकझोर दिया .....बच्चे की उँगलियों का स्पर्श उसे अनुभूतियों से नहला रहा था .....फ्रायड का मनोविज्ञान कितना सच है, कभी अनुभव करने की स्थिति बनी ही नहीं थी ....उत्तेजना की  अदृश्य बाढ़ में डूबती अंतत: वह नियन्त्रण खो बैठी ...कांपते हाथों से स्वयं वक्ष को अनावृत कर बच्चे के होंठों को सौंप देती है.....उफ ! यह कैसी झंकार ....रोम रोम सिहर गया ...सिर से पैर तक कुछ बिखर गया .....भीगों गया . ...कड़े स्तनों को बड़े प्रयास से पकडऩे की पीड़ा ....जैसे और बढऩे की मांग करने लगी ....शारदा उन्माद की गहरी घाटियों में डूबती उतरती रहीं ......बच्चे के लिए नित्य मांग और पूर्ति में कुछ बदलाव था, लेकिन शारदा की मांग व पूर्ति में  तो तीस साल के बीहड़ को पल में पार कर लेने का अद्भुत सुख तैर रहा था। कहते हैं गुलर के फूल को किसी ने खिलते नहीं देखा, उसे लगा अभी अभी कोई रहस्यमय खिलन उसके समूचे अस्तित्व में उसी गुलर के फूल सी खिल गई, जिसे किसी ने नहीं देखा ....उसे लगा उसकी कोख में कोई अंकुर कुलबुला रहा है ....छू रहा है ..उसे बांध रहा है, अपनी नन्हीं बांहों से....
बच्चा बहल कर सो गया। शारदा पीड़ा के नवीन संस्करण को छाती में संजोये मुस्कुरा रही थी। एक सुखद तृप्ति व संतुष्ठि की गहरी छाया उसके चेहरे पर नाच रही थी...उसने बच्चे को भरपूर प्यार से सहलाया, सीने से लगाया  और ईश्वर से मनाने लगी--काश ' काश छगनलाल कभी न आये।