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Saturday 25 Nov 2017

इलाहाबाद अब सूना लगता है

यश मालवीय
ए -111 मेंहदौरी कॉलोनी इलाहबाद 211004
मो. 09839792402
बच्चन और भारती का इलाहबाद इन दिनों बहुत सूना और उदास लगने लगा है। एक सांस्कृतिक सुगंध जैसे यहां से खोती जा रही है। गंगा उदास लग रही है, यमुना अनमनी है। संगम की साँसों में जैसे कोई फाँस चुभ रही है। यहाँ नदियों का ही नहीं संस्कृतियों का भी संगम होता रहा है। आज इस संगम पर भी ग्रहण सा लग गया है। पंत, निराला, महादेवी के शहर में पेड़ कट रहे हैं और इमारतें उग रही हैं। आज प्रकृति का सुकुमार कवि होता तो क्या करता? इलाहबाद को माइनस कर दें तो हिंदी साहित्य का इतिहास पचास प्रतिशत अलिखा रह जायेगा। देश को चार-चार, पांच -पांच प्रधानमंत्री और ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता साहित्यकार देने वाला यह शहर आज पर्यटन के मानचित्र पर भी कहीं नहीं है। साहित्य की मंडी दिल्ली शिफ्ट हो गई है। एक कसी मुट्ठी जैसे छन्द की मुट्ठी ही जैसे खुल गई है। आज मुट्ठी गंज तो है पर अन्याय के प्रतिकार के लिये अब मुट्ठीयाँ नहीं कसतीं। सिविल लाइंस में भरी दुपहरी छायाएँ बड़ी हो जाती हैं। कॉफी हाउस में कॉफी के प्यालों में अब वैसा तूफान नहीं उठता। मैंने कॉफी हाउस में फिराक गोरखपुरी और फादर कामिल बुल्के की जुगल बंदी भी देखी है। बाबा बुल्के तो इलाहबाद को अपना मायका भी कहते थे। यह भी कहते थे कि जब जीवन की ऊर्जा और ऊष्मा कम होने लगती है तो मैं अपने मायके चला आता हूँ। मायके आकर बेटी को जो उल्लास और उत्साह मिलता है, उसी जीवनधर्मी तत्व के दर्शन मुझे यहाँ होते हैं। लेकिन आज यह साहित्यिक मायका एक अजीब सी उदासी में घिरा हुआ सा लगता है। ए जी ऑफिस के बाहर का साहित्यिक अड्डा भी उजड़ चुका है, जहाँ कभी लक्ष्मीकांत वर्मा, दूधनाथ सिंह, रवीन्द्र कालिया, कैलाश गौतम जैसे रचनाकार बैठकी जमाते थे। कैलाश गौतम लिखा करते थे - याद तुम्हारी मेरे संग वैसे ही रहती है, जैसे कोई नदी किले से सट कर बहती है।
नया ज्ञानोदय के सम्पादक और भारतीय ज्ञानपीठ के निदेशक होने के बाद भी जब रवीन्द्र कालिया को अपने बाल कटवाने होते थे तो प्रयागराज एक्सप्रेस से रिजर्वेशन करा कर सुबह -सुबह सिविल लाइन स्थित अपने प्रिय सैलून में आ धमकते थे। साहित्य की एक पूरी नक्षत्र शाला यहाँ पर थी। इस गैलेक्सी में रामस्वरूप चतुर्वेदी, रघुवंश, विजयदेव नारायण साही, केशव चंद्र वर्मा, शांति मेहरोत्रा, मारकण्डेय, भैरव प्रसाद गुप्त,  अमृतराय, गंगाप्रसाद पाण्डेय, गोपी कृष्ण गोपेश, उमाकांत मालवीय, सत्य प्रकाश मिश्र, गरज यह कि कौन नहीं था? संस्कृति के रस में डूबी रहती थीं इलाहबाद की सुबह, दुपहर, शामें, रातें। यह शहर का जगमगाता अतीत है, इसे अव्यय अतीत भी कह सकते हैं। भारती जी कहते थे, इलाहबाद, दूर रहो तो हॉन्ट करता है, पास जाओ तो नाक में दम करता है।  प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. लाल बहादुर वर्मा कहते हैं, इलाहबाद ऐसा शहर है जहाँ से जाया ही नहीं जा सकता। इलाहबाद में सिगरेट और अगरबत्ती के धुएँ समान रूप से उठते रहे हैं। परम्परा और आधुनिकता दोनों गलबंहिया डालकर साथ चलते रहे हैं। यह एक साथ हसियां हथौड़े, चाँदनी रात और फिरोजी होंठ का शहर रहा है। परिमल और प्रगतिशील लेखक संघ की टकराहटें इसे जीवन्त बनाती रही हैं। यह इत्मीनान का शहर रहा है। कर्म योगी हनुमान भी यहाँ आकर गंगा किनारे लेट गए हैं। पर आज भरी भीड़ में एक हाँफती हुई दिल्ली यहाँ भी देखी जा सकती है। कह सकते हैं कि इलाहबाद भी आज दिल्ली हो रहा है। आये दिन भीषण जाम से जूझता यह शहर अपने अन्जाम से गाफिल हो रहा है। राजनीति की बिसातें यहाँ भी बेशर्मी से बिछने लगी हैं। राजनीति के आगे चलने वाली मशाल का तेल चुक रहा है। हमारे इलाहबाद को जाने किसकी नजर लग गई है। यद्यपि साहित्य की नई पीढ़ी संस्कृति का दिया जलाने में पीछे नहीं है, वही एक आस बची है शहर को बचाने की अन्यथा तो अब सचमुच बहुत सूना सा लगने लगा है इलाहबाद।