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Tuesday 21 Nov 2017

अ से अमित, अ से असलम और अ से अपना

सुनील बागवान
फ्लैट न. 312, 2बीएचके, महालक्ष्मी एन्क्लेव, धमतरी, छत्तीसगढ़ 493773
रक्षाबंधन के अवसर पर तीन दिनों के लिए अपने घर जाना हुआ था, इन तीन दिनों के दौरान इस बार वक्त का सही इस्तेमाल ना कर पाने का मलाल था, चूंकि दो दिन बीत चुके थे और मैं घर से बाहर ही नहीं निकल पाया था अब तक। आज रविवार का दिन था, मैं अपने गाँव से वापस लौटने की तैयारी कर चुका था। सोच रहा था कि अपनी-जगह गतिविधि केंद्र और पुस्तकालय जाकर कुछ देर वक्त बिताऊँ। वहाँ पर आने वाले बच्चों की गतिविधियों को थोड़ा सा देखूं, उनसे बात करूँ और फिर वापस काम की जगह। अपनी-जगह गतिविधि केंद्र एवं पुस्तकालय की की मेरे घर से दूरी बमुश्किल 1 किलोमीटर होगी। मैं बजरंग मोहल्ले मैं रहता हूँ और वहाँ से 10-12 घर बाद से मेवाती बाखल (मोहल्ले) की शुरुवात होती है। मेवाती बाखल से गुजरते हुए 250-300 मीटर की दूरी पर बेंड़ाबाबा चौक है ओर इससे आगे बढऩे पर गुर्जर यादव बाखल की सीमा आरंभ होती है।  मेवाती बाखल और यादव बाखल को जोड़ता है बेंड़ाबाबा चौक और इस चौक पर स्थित एक किराए के भवन में संचालित होता है अपनी-जगह पुस्तकालय एवं गतिविधि केंद्र।  
मेरे घर से कुछ दूरी पर स्थित है आरिफ का घर, और आरिफ के घर से कुछ दूरी पर है अपनी-जगह। अपनी-जगह जाने के लिए मैं आरिफ के साथ चल रहा था, मैंने रास्ते में चलते-चलते अपनी-जगह से जुड़े कुछ  सदस्यों जैसे शादाब, नौशाद और अमित के बारे में पूछा तो आरिफ ने बताया कि शादाब और नौशाद तो आते हैं लेकिन कुछ दिनों तक अमित कभी कभार ही आता रहा फिर अभी कुछ दिनों से उसने लगभग आना बंद ही कर दिया हैं। आरिफ ने बताया कि उसे कुछ बच्चों से पता चला हैं कि अमित के पापा ने उसे यहां आने से मना कर दिया है क्योंकि अपनी-जगह पर तो बहुत सारे मुसलमान ही आते हैं और यहाँ आने से अमित बिगड़ जाएगा। ये बातें करते हुए आज आरिफ और मैं दोपहर 12 बजे ही अपनी-जगह पर पहुंच गए थे। रास्ते में हमें आसिफ, नौशाद भी मिले। कुछ देर के बाद वे भी अपनी-जगह पर आ गए थे।
हम सब वहां रखी किताबें देखने लगे। मैंने देखा कि नीचे की दो अलमारियों में एकलव्य, एनबीटी, सीबीटी, रूम टू रीड और अन्य प्रकाशनों की किताबें थीं, ऊपर की अलमारियों में सामाजिक विचारकों और शिक्षणशास्त्र से संबन्धित किताबें थी। मुझे केआर नारायणन की किताब की हिन्दी अनुवादित किताब दिखाई दी। यह किताब सफर के दौरान पढऩे के लिए पुस्तकालय रजिस्टर में एंट्री कराने के दौरान राजू और संदीप भी वहां आ गए। अब आरिफ ने वहां उपस्थित हम सभी सदस्यों का आपसी परिचय कराने के उद्देश्य से बातचीत शुरू की।
आरिफ, नौशाद, शादाब और संदीप तो पहले से ही परिचित थे। आपसी परिचय से मालूम हुआ कि राजू कक्षा 9 में पढ़ता है और उसका घर अपनी-जगह से आधा किलोमीटर की दूरी पर है। उसने मुस्कुराते हुए कहा कि सुनील भैया, मैं आपको जानता हूँ, आप बजरंग मोहल्ले में रहते हो और मेरे बड़े पापा के लड़के (भगवान यादव) के साथ पढ़ते थे। भगवान भैया डॉक्टर बन गए है और अब दूसरे गाँव में रहते हैं। वो जब भी सतवास आते हैं तो मुझे यहां आने के लिए कहते हैं। लेकिन ये लोग (शादाब, नौशाद की ओर इशारा करते हुए) रोज नहीं आते है और यहां ताला लगा रहता हैं।
मैं कुछ सोच ही रहा था कि शादाब ने तपाक से राजू से पूछा- पहले ये बताओ कि ताला कब लगा हुआ था?
राजू बोला - कल शाम को चार बजे मैं, जितेंद्र और उमेश हम लोग जब निकल कर जा रहे थे तो यहां ताला लगा था।
शादाब बोला - आसिफ  और आरिफ भी यहीं बैठे है, एक बार पूछ लो इन से भी..कल हम सब आए थे।
राजू- शाम को 6 बजे जब मैं वापस जा रहा था, तब भी यहां ताला लगा था। मेरी ओर देखते हुए राजू ने आगे कहा- सुनील भैया, सच बात तो ये है कि ये लोग बस अपने-अपने वालों के साथ आते-जाते हैं और हम लोगों को तो मालूम भी नहीं पड़ता कि आज अपनी-जगह का ताला खुलेगा भी या नहीं? जब ताला नहीं खुलेगा तो चित्रकला, खिलौने बनाना या कुछ भी गतिविधि हो, हम लोग तो कर ही नहीं पाते हैं।
शादाब ने कहा कि राजू तो दिन भर स्कूल के मैदान में खेलता रहता है और अपनी-जगह पर नहीं आता है।
अब आसिफ ने हस्तक्षेप करते हुए कहा- देख राजू कल तो हम सब आए थे, शायद तू ही स्कूल में खेलने चार बजे से पहले चला गया होगा और बाद में 6 बजे के बाद वापस गया होगा।
राजू ने अब शादाब की नजरों में नजरें डाल कर, अपनी गर्दन मटकाते हुए कहा. अच्छा, चलो ठीक है, कल अपनी-जगह का ताला खुला था लेकिन परसों?
शादाब ने भी राजू की आँखों में आंखे डालकर आत्मविश्वास से जवाब दिया- हाँ, परसों की बात बिलकुल सही है, परसों मेरा आना नहीं हुआ था और मैंने किसी को बोला भी नहीं था। लेकिन फालतू में कल का मत बोल।
राजू ने सहज भाव से सहमति जताते हुए कहा- तो मैं भी तो ये ही कह रहा हूँ कि अपनी-जगह का ताला रोज नहीं खुलता है।
मामला कुछ यूं है कि अपनी-जगह केंद्र की चाबी आरिफ और शादाब के पास रहती है। और यह निर्णय बनाने में कि अपनी-जगह की चाबी किसके पास रहे, वहाँ आने वाले सदस्यों की साझी चर्चा के माध्यम से तय किया जाता है। लेकिन जिनके पास चाबी अभी रहती है वे नियमित नहीं आ पा रहे थे और राजू इसके लिए अपना सवाल दर्ज करवा रहा था। राजू ने जब यह बात कही थी कि ये लोग बस अपने-अपने वालों को आने देते हैं। हम लोग नहीं आ पाते। तो मैं चिंतित हो उठा था कि राजू जो कह रहा है, उसमें अपने-अपने वालों व हम लोग के मायने क्या है? दूसरी ओर यह बात भी दिमाग में घूम रही थी कि पिछले कुछ पुराने सदस्यों का आजकल यहाँ ना आने के पीछे का एक कारण मुस्लिम बच्चों की उपस्थिति और उनका नेतृत्व है? इन्हीं कुछ सवालों में झूलते हुए मैंने उनसे पूछा-यदि रोज ताला नहीं खुल पा रहा है, तो हमें क्या करना चाहिए? अभी अपनी-जगह की चाबी किसके पास रहती है और कुल कितनी चाबियाँ हैं?
शादाब ने कहा कि एक चाबी मेरे पास रहती है, और दूसरी आरिफ भैया के पास। मीटिंग करके तय कर लेंगे कि जब हम नहीं आए तो चाबी कोई और रख लें। आरिफ ने कहा कि हां ठीक है, मीटिंग करके दिन और गतिविधि के हिसाब से चाबी रखने और ताला खोलने की जिम्मेदारी बाँट लेंगे। राजू ने उमेश, जितेंद्र की ओर इशारा करते हुए कहा कि भाई रोज ताला खुले तो हम सब भी आएंगे।
अब यह तय हुआ कि सब अपने-अपने दोस्तों को बोल देंगे कि कल शाम को मीटिंग है और उसमें अपनी-जगह के नियमित खोलने और आने के बारे में चर्चा करेंगे।
मेरे दिमाग में अपने और हम की सीमाओं को समझने का आग्रह और तीव्र हो उठा था। मैं सोच रहा था कि जिस तरह से अभी कुछ देर पहले शादाब और राजू में बहस हुई है, इसके पीछे इन दोनों की गुट आधारित नाराजगी तो नहीं है? दोनों के पृथक-पृथक गुट तो नहीं बने हुए हैं? दिमाग में यह भी चल रहा था कि कौन किसका दोस्त है और कौन किसको मीटिंग में आने को कहेगा और जिनसे ये लोग आने को कहेंगे क्या वो भी अपने-अपने वालों में विभाजित हैं?
ऐसे अनेक सवालों का जवाब मुझे नहीं मिल पा रहा था। इन सवालों को जानने-समझने के लिए और मीटिंग के प्रबंधन में सहयोग के लिए मैंने एक सुझाव रखा। सभी को कागज की एक-एक पर्ची देते हुए सुझाव दिया कि यहां मौजूद सभी सदस्य अपने-अपने 7-7 दोस्तों को कल मीटिंग में आने को कहेंगे, उनका नाम एक पर्ची पर लिख लें। अगले ही पल विभिन्न उपस्थित सदस्यों ने पर्ची पर अपने-अपने दोस्तों के नाम  इस प्रकार लिखे थे-

पर्ची.1    पर्ची.2    पर्ची.3    पर्ची.4    पर्ची.5    पर्ची.6
आरिफ    शादाब    राजू     संदीप    असलम     नौशाद
राम    अमित     जितेंद्र     तौफीक    अबरार    इमरान
मोनिका    विजय    असलम    जितेंद्र     मोनिका    हरिओम
ज्योति    जितेंद्र    तैयब    भावना    सईदा    मोनिका
हरिओम     मोहसीन    अमित     राम     राम     मोहसीन
अमित    असलम    विजय     फिरोज    मुस्तफा    अमित
मुस्तफा    अजय    रेशमा    अकबर    अमित     टीना

इस सूची का अवलोकन करें तो निम्नलिखित सूचनाएँ प्राप्त होती हैं-
1. कुल 6 पर्चियों पर 7-7 दोस्तों के नाम लिखे गए थे पर कुल 28 ही नाम ही आए।  
2. हरेक ने अपने-अपने दोस्तों के नाम लिखे थे, जिसमें विभिन्न जाति, धर्म और लिंग के बच्चे शामिल हैं।
3.वहां उपस्थित सदस्यों की पर्चियों में कुछ दोस्त कामन थे। जैसे, राम, मोनिका, हरिओम, अमित, जितेंद्र आदि।
4. आरिफ, शादाब, राजू और नौशाद ने अपने दोस्तों की सूची में अमित को शामिल किया था। वे चारों चाहते थे कि अमित आए।
5. वहां उपस्थित सभी सदस्य लड़के थे, लेकिन पर्चियों में कुछ लड़कियों के नाम भी शामिल किए गए थे। जैसे आरिफ, राजू, असलम, संदीप और नौशाद ने अपने दोस्तों की सूची में मोनिका, रेशमा, भावना और टीना का नाम शामिल किया था। वे चाहते थे कि ये लड़कियां भी आएं और विभिन्न गतिविधियों में भागीदारी करें।
6. बच्चों के द्वारा छ: अलग-अलग पर्चियों पर लिखे गए नामों में कुल 28 नामों में ही नहीं बल्कि उनकी अपनी पर्ची में भी अलग-अलग जाति, धर्म और लिंग के बच्चे शामिल थे।
इसके आधार पर मुझे यह समझ आया कि हम वयस्क अपने वालों का अर्थ कितने सीमित संदर्भ में समझते हैं। समाज में घर, परिवार, मंदिर, मस्जिद, बाजार विभिन्न कार्यालय, सामाजिक संगठन, बैंक, दुकान और तरह-तरह के स्कूल हैं। इन सब जगहों के बारे में जरा सोचिए कि इंसान के लिए ऐसी कौन सी जगह है जो जाति, धर्म, लिंग, भाषा, अमीरी-गरीबी शहरी-ग्रामीण आदि के बारे में प्रचलित पूर्वाग्रहों से मुक्त है? समाज में इंसान और उसके बच्चों के लिए जो जगहें मौजूद हैं वे जाति, धर्म, लिंग, भाषा, अमीरी-गरीबी, शहरी-ग्रामीण आदि पर आधारित भेदभावों के प्रति कितनी संवेदनशील हैं? इस बार अपनी-जगह पर हुए इस अनुभव से ये तमाम प्रश्न मेरे मन में जीवंत हो उठे थे। हम वयस्कों की दुनिया में अपनों और अपने वालों को कितने सीमित अर्थ में समझते हैं। बने-बनाए मानकों पर सवाल करने और एक दूसरे की तार्किक दलीलों को सुनने, जानने, समझने, बराबरी से जवाब देने व संवाद करने की गुंजाइश सिमटती जा रही है। वर्तमान समाज के हम प्रौढज़नों में किसी के विचार से असहमति होने पर परस्पर सम्मान और संवाद सीमित होने लगता है। ऐसे में अपनी-जगह केंद्र के इस अनुभव के आधार पर हम वयस्कों को बच्चों से अपने होने के मायने सीखना चाहिए।  ठ्ठ