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Tuesday 21 Nov 2017

डोनाल्ड ट्रंप बनाम जॉर्ज सोरोस। एक कैसिनो मालिक, दूसरा कैसिनो कैपिटल का शातिर खिलाड़ी।

ललित सुरजन
डोनाल्ड ट्रंप बनाम जॉर्ज सोरोस। एक कैसिनो मालिक, दूसरा कैसिनो कैपिटल का शातिर खिलाड़ी। एक ने बहुमंजिली भड़कीली साज-सज्जा वाली इमारतों में जुआँघर खोल रखे हैं, दूसरा अपने कार्पोरेट ऑफिस में बैठकर पूंजी बाजार का सट्टा खेलते रहता है। एक के जुआँघरों में अमेरिका ही नहीं दुनिया के तमाम देशों से आए सैलानी अपनी किस्मत आजमाने पहुंचते हैं: हॉलीवुड की कई फिल्मों ने इनके ग्लैमर को लोकप्रिय बनाने का काम किया है; दूसरा दुनिया की हर बड़ी मुद्रा में उतार-चढ़ाव लाने का खेल खेलता रहता है: वह पूंजीवादी जनतंत्र वाले किसी भी देश में सरकार बनाने-बिगाडऩे की ताकत रखता है। एक का रीयल एस्टेट का कारोबार भले ही अनेक देशों में हो लेकिन वह अमेरिका के राष्ट्रीय पूंजीवाद का समर्थक और उसके द्वारा प्रायोजित है; दूसरा विश्व पूंजीवाद का प्रबल समर्थक है और अपने देश में उस नीति के अनुसार सरकार बनाने का दांव खेलता है।
डोनाल्ड ट्रंप बनाम जार्ज सोरोस के इस द्वंद्व को समझे बिना अमेरिका के राजनीति में आए भूचाल को नहीं समझा जा सकता। हमें इसके लिए अमेरिकी इतिहास में ही कुछ बरस पहले लौटना होगा। मैं उन लोगों में से हूं जो मानते हैं कि इतिहास कभी अपने आपको दोहराता नहीं है। लेकिन क्या इतिहास में कोई यू टर्न जैसी भी चीज होती है? अमेरिका में जो हुआ है वह मुझे एक यू टर्न ही मालूम होता है। इसे शायद अपना दांव अपने ही गले पड़ जाने की उपमा भी दी जा सकती है। याद कीजिए, 1968 में रिचर्ड निक्सन रिपब्लिकन पार्टी से अमेरिका के राष्ट्रपति चुने गए थे। 1968 से 1972 तक तो उनका कार्यकाल न सिर्फ ठीक चला बल्कि इस अर्थ में ऐतिहासिक रहा कि अमेरिका के चीन के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित हुए। यहां हम निक्सन शासन में वियतनाम और बंगलादेश युद्ध में अमेरिका के रोल की चर्चा नहीं कर रहे हैं क्योंकि मेरा मंतव्य अभी कुछ और है और चर्चा को दूसरी दिशा में ले जाना उचित नहीं होगा। 1972 में  निक्सन दुबारा राष्ट्रपति चुने गए। लेकिन कुछ सप्ताह बीतते न बीतते वे विवादों के घेरे में आ गए। वाटरगेट कांड का खुलासा होना शुरू हुआ। निक्सन ने इस दलदल से बाहर निकलने की जितनी कोशिश की वे उतने ही भीतर धंसते गए। अमेरिकी सीनेट में राष्ट्रपति पर महाभियोग लाया जाता इसके पहले उन्होंने त्यागपत्र देकर अपनी जान बचाई। स्पिरो एग्न्यू बचे समय के लिए राष्ट्रपति बन गए। 1976 में जब आम चुनाव हुए तो जॉर्जिया के गवर्नर जिमी कार्टर ने डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने में सफलता पाई। उन दिनों डेमोक्रेट्स में राष्ट्रीय ही नहीं वैश्विक क्षितिज पर प्रसिद्धि प्राप्त अनेक राजनेता थे, सीनेटर और गवर्नर आदि, जिनके मुकाबले कार्टर लगभग नामालूम व्यक्ति थे। उन्हें जॉर्जिया प्रांत के बाहर कोई नहीं जानता था। वे मूंगफली की खेती करने वाले सम्पन्न किसान थे। इस तथ्य को लेकर उन्हें देहाती किसान वगैरह भी कहा गया, लेकिन वे राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए। यह उस समय की एक आश्चर्यजनक घटना थी।
यह कैसे हुआ? विश्व राजनीति में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों को शायद पता हो कि कार्टर के चुनाव मैदान में उतरने से कुछ वर्ष पहले अमेरिका में ट्राइलेटरल कमीशन नामक एक संस्था स्थापित हुई थी। जैसा कि नाम से स्पष्ट है अपने आपको आयोग कहने वाला यह एक त्रिपक्षीय प्रतिष्ठान था। इसमें अमेरिका, उत्तरी यूरोप और जापान ये तीन पक्ष थे याने इन देशों के बहुराष्ट्रीय निगम। कमीशन की स्थापना 1973 में अमेरिका के बड़े इजारेदार जॉन डी. रॉकफेलर ने की थी और हम समझ सकते हैं कि इसका मकसद अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद को बढ़ावा देना था। दुनिया के मजदूरों एक हो का नारा तो कमजोर होने लगा था उसका स्थान एक नया नारा ले रहा था- दुनिया के पूंजीपतियों एक हो। गो कि पूंजीपति मजदूरों की तरह सड़कों पर आकर नारे नहीं लगाते। उनका नारा बोर्ड रूम की कार्रवाईयों में अनुगूंजित होता है। जिमी कार्टर इस ट्राइलेटरल कमीशन के द्वारा मैदान में उतारे गए थे। यह बात कुछ-कुछ तब स्पष्ट हुई जब हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जिबीग्न्यू ब्र•ो•िान्स्की प्रोफेसरी छोड़कर पहले तो कमीशन के मुख्य कार्यपालक अधिकारी बने और कार्टर के राष्ट्रपति बनते साथ उनके राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) जैसे महत्वपूर्ण पद पर नियुक्त कर दिए गए।
जिमी कार्टर के कार्यकाल में इस विषय पर बहुत लेख छपे। हमारे यहां तो टीवी था नहीं, लेकिन जहां था वहां भी इस पर चर्चाएं होती होंगी। भारत से अमेरिका जाकर बस गए प्रखर प्रगतिशील लेखक प्रोफेसर इंदुकांत शुक्ल इत्यादि के इस विषय पर कई लेख तब मैंने पढ़े थे। दरअसल, राष्ट्रपति निक्सन वैश्विक पूंजीवाद के प्रणेता रॉकफेलर इत्यादि इन कार्पोरेट प्रभुओं के सामने झुकने के लिए तैयार नहीं थे। आखिरकार निक्सन ने राष्ट्रपति आइजनहॉवर के साथ आठ साल उपराष्ट्रपति के तौर पर काम किया था। वे एक स्थापित व वरिष्ठ राजनेता थे। जाहिर है कि अपने एजेंडे पर काम करने के लिए ट्राइलेटरल कमीशन को व्हाइट हाउस में एक कठपुतली की आवश्यकता थी।
इतिहास की संक्षिप्त यात्रा के बाद हम वर्तमान में लौटते हैं। मैंने इतिहास के यू टर्न की बात क्यों की, वह यहां स्पष्ट हो जाएगी। आज से आठ साल पहले जब बराक ओबामा डेमोक्रेटिक पार्टी की टिकट पर राष्ट्रपति चुने गए तब उनके बारे में बहुत सी अच्छी-अच्छी बातें कही गईं। जिनमें से एक तो बिल्कुल सही है। समयानुकूल और जनतांत्रिक राजनीति की दृष्टि से रेखांकित करना सर्वथा उचित था कि बराक ओबामा अश्वेत अमेरिकन थे। यह कहना भी ठीक था कि वे अमेरिकी राजनीति के एक उभरते हुए सितारे थे। लेकिन यहां अन्य एक पक्ष पर गौर करना होगा कि ओबामा पहली बार सीनेटर बने थे और उनका छह साल का पहला कार्यकाल पूरा भी नहीं हुआ था। इस दृष्टि से वे जनता के बीच लगभग उतने ही अपरिचित थे जैसे कि अपने समय में कार्टर। ओबामा के बारे में दूसरी बात यह कही गई कि वे जनता से चंदा मांगकर चुनाव लड़ रहे हैं। खूब प्रचार किया गया कि पूरे देश के लोग उनको इंटरनेट और मनीआर्डर से पांच-पांच, दस-दस डॉलर की छोटी-छोटी रकमें चुनाव फंड के लिए भेज रहे हैं।
यह दूसरी बात कपोल-कल्पित थी। प्रसंगवश ध्यान आता है कि मध्यप्रदेश में भाजपा के एक मंत्री ने अपने पुत्र के विवाह में भारी-भरकम राशि एकत्र की। बतलाया यह गया कि उनके क्षेत्र के लोगों ने दस-दस, बीस-बीस रुपए के मनीआर्डर भेजकर नेतापुत्र को अपने आशीर्वाद भेजे हैं। यही ओबामा के साथ हुआ। बताया जाता है कि ओबामा के चुनाव का बड़ा खर्च उन्हीं जार्ज सोरोस ने उठाया था जिनका उल्लेख हम एकदम शुरू में कर आए हैं। यहां याद रखना उचित होगा कि बराक ओबामा से पहले रेवेरेंड जेसी जैक्सन भी कभी डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बनना चाहते थे, लेकिन उनके जैसा समादृत राजनेता भी वैसा आर्थिक समर्थन नहीं जुटा सका था जो ओबामा को मिला। हमारा संदेह और गहरा हो जाता है जब पाते हैं कि राष्ट्रपति बनने के एक साल के भीतर ही ओबामा को शांति के लिए नोबल पुरस्कार भी मिल जाता है। उन्होंने उस एक साल में ऐसा क्या किया था जिसके लिए उन्हें इस पुरस्कार से नवाजा जाता?
वैश्विक पूंजीवादी शक्तियों का रोल ओबामा के साथ समाप्त नहीं हुआ। उन्होंने हिलेरी क्लिंटन के रूप में एक नया प्रत्याशी चुना। हिलेरी के पक्ष में सबसे वजनदार दलील यह थी कि एक अश्वेत राष्ट्रपति के बाद वे पहली महिला राष्ट्रपति बनकर एक नया इतिहास रच सकती हैं। उन्हें इस बिना पर यथेष्ट समर्थन मिला और लोकप्रिय वोटों की गणना में वे डोनाल्ड ट्रंप से दो लाख से अधिक मतों से विजयी रहीं। यह अमेरिकी चुनाव प्रणाली की अपनी जटिल प्रक्रिया है जिसके लिए तकनीकी रूप से आवश्यक मतदाता मंडल में वे बहुमत नहीं जुटा सकीं। इस पर उन्होंने तीन राज्यों में पुनर्मतगणना की मांग की किन्तु परिणाम में कोई अंतर नहीं पड़ा। यह उल्लेखनीय है कि अमेरिकी मीडिया के एक बड़े वर्ग ने हिलेरी क्लिंटन को अपना खुला समर्थन दिया था। इसके बावजूद लोकप्रिय वोटों में वे इतनी बड़ी बढ़त नहीं बना सकीं जिससे कि मतदाता मंडल में भी उन्हें बहुमत मिल जाता। उनकी पराजय के पीछे एक कारण यह भी बताया जाता है कि डेमोक्रेटिक पार्टी से मनोनयन न मिलने के बाद वाम झुकाव के सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने निर्दलीय चुनाव लड़ा और हिलेरी क्लिंटन के वोट काट लिए।
एक प्रश्न पूछा जा रहा है कि यदि बर्नी सैंडर्स को डेमोक्रेटिक पार्टी ने उम्मीदवार बनाया होता तो क्या वे जीत सकते थे? मुझे लगता है कि ऐसा नहीं हो पाता। अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में भारी चुनावी फंड की आवश्यकता होती है जो शायद सैंडर्स अपनी वामपंथी झुकाव के कारण कभी न जुटा पाते। ट्राइलेटरल कमीशन और जार्ज सोरोस जैसे लोग ऐसे व्यक्ति पर दांव लगाते भी क्यों, जिसकी घोषित आर्थिक नीतियां उन्हें कबूल नहीं थीं। वैसे अमेरिका कहने को भले ही विश्व का सबसे प्रमुख जनतंत्र हो, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में बहुत से घात-प्रतिघात चलते हैं जिनकी वजह से हर तरह से योग्य व बेहतर प्रत्याशी को भी या पीछे हटना पड़ता है या हार माननी पड़ती है। 1972 में सीनेटर जार्ज मैक्गवर्न की राष्ट्रपति पद की चुनाव में हार इसका प्रबल उदाहरण है। सीनेटर एडमंड मस्की और सीनेटर यूजीन मैकार्थी तो पार्टी के भीतर ही उम्मीदवारी का चुनाव नहीं जीत सके।
बहरहाल डोनाल्ड ट्रंप की विजय के बाद अमेरिका के राष्ट्रीय जीवन में भारी उथल-पुथल मची हुई है जिसका असर शेष दुनिया पर भी पड़ रहा है। अमेरिकी मीडिया सामान्य शिष्टाचार के नाते हर नए राष्ट्रपति को तीन माह का समय देता है जिसे हन्ड्रेड डे हनीमून कहा जाता है। इस दौरान राष्ट्रपति के कार्यकलापों पर निगरानी रखी जाती है, लेकिन उसकी खुलकर आलोचना नहीं होती। डोनाल्ड ट्रंप को यह सुख प्राप्त नहीं हो सका है। इसका एक कारण तो मीडिया के प्रति उनका अपना व्यवहार है, लेकिन दूसरा कारण यह बताया गया है कि ट्रंप-विरोधी जो भी आंदोलन हो रहे हैं उनके पीछे जार्ज सोरोस का हाथ है। कहते हैं कि 20 जनवरी को शपथग्रहण के दो दिन बाद वाशिंगटन में निकले महिलाओं के अभूतपूर्व प्रदर्शन को सोरोस ने ही प्रायोजित किया था। क्या इसलिए कि जैसे निक्सन की नीतियां उस समय विश्व पूंजीवाद को नागवार गुजरी थीं वैसी ही स्थितियां आज फिर उपस्थित हो गई हैं?
यूं रिचर्ड निक्सन और डोनाल्ड ट्रंप में कोई समानता नहीं है। निक्सन एक परिपक्व राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने भारी गलतियां कीं जबकि ट्रंप अनाड़ी राजनेता हैं जो पहले दिन से गलती पर गलती किए जा रहे हैं। सुपरिचित राजनीतिवेत्ता फ्रांसीस फुकुयामा ने ट्रंप विजय की व्याख्या कुछ इस तरह से की- ''राष्ट्रवाद के अनेक रूप हो सकते हैं, लेकिन जब उसमें अतीतराग का छौंक लग जाए तो वह बेहद प्रभावी हो जाता है।ÓÓ फुकुयामा एक अनुदारवादी चिंतक होने के साथ-साथ रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक हैं। वे ट्रंप के जीतने से हैरान और असहज हो गए हैं। वे कहते हैं कि ट्रंप ने लोक-लुभावन राष्ट्रवाद का सहारा लिया, मीडिया विशेषकर सोशल मीडिया पर बार-बार झूठ बोला तथा मतदाताओं को भरमाने के लिए बराक ओबामा व हिलेरी क्लिंटन पर बदनीयत के साथ टिप्पणियां कीं।
फुकुयामा दूसरी ओर डेमोक्रेटिक पार्टी व अमेरिका की उदारवादी राजनीति की यह कहकर आलोचना करते हैं कि उन्होंने अमेरिकी जनमानस को समझने में गलती की; उसने इस ओर दुर्लक्ष्य किया कि 2008 के वित्तीय संकट और उसके भी काफी पहले से अमेरिकी समाज में गैरबराबरी लगातार बढ़ रही थी जिसका दुष्प्रभाव कामगार वर्ग पर सबसे अधिक पड़ा। अश्वेत तो पहले से ही वंचित और कष्टों से घिरे हुए थे, लेकिन श्वेत समुदाय के सामने भी नए संकट उत्पन्न हो रहे थे। इसकी वजह यह भी है कि डेमोक्रेटिक पार्टी कहने को भले ही वंचितों व मेहनतकशों की पार्टी रही हो, उसने हाल के वर्षों में बड़ी पूंजी के साथ अपने न्यस्त स्वार्थ विकसित कर लिए थे। ऐसे में उसका पारंपरिक जनाधार सिकुडऩे लगा था जिसे ओबामा ने किसी कदर अपने दूसरे चुनाव तक बचा रखा, लेकिन हिलेरी अपने ही पारंपरिक मतदाता का विश्वास नहीं जीत पाईं।
पॉल क्रुगमेन उदारवादी अर्थशास्त्री माने जाते हैं। वे ट्रंप की जीत से क्षुब्ध होकर कहते हैं कि अगर अमेरिका में संसदीय जनतंत्र होता तो ट्रंप के खिलाफ संसद में अब तक अविश्वास प्रस्ताव पेश हो जाता, परन्तु अब उन्हें अगले चार साल तक बर्दाश्त करना सबकी मजबूरी है। यह बात सही है। डोनाल्ड ट्रंप ने एक माह के भीतर ही स्थापित परंपराओं का ताना-बाना छिन्न-भिन्न कर दिया है। वे आने वाले दिनों में और क्या करेंगे, विश्वासपूर्वक कुछ भी कहना कठिन है। पर एक बात तय है कि फुकुयामा ने जिस लोक-लुभावन राष्ट्रवाद की बात की है वह इस वक्त उफान पर है। ट्रंप के एक अत्यंत विश्वस्त सलाहकार और सहयोगी स्टीफन बैनन का मानना है कि 2014 में भारत में नरेन्द्र मोदी की विजय के साथ आम जनता के द्वारा पूंजीवाद के खिलाफ विश्वव्यापी विद्रोह की शुरू हो गई है। स्टीफन बैनन के इस बयान में जो विरोधाभास है उसे हम देख सकते हैं पर यह सच है कि इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी आदि देशों में उग्र राष्ट्रवाद का उभार हो रहा है। बे्रक्जिट का उदाहरण सामने है। फ्रांस और जर्मनी के आसन्न चुनाव क्या नतीजे लाएंगे इसे लेकर राजनीतिक पर्यवेक्षक चिंताकुल हैं। मैं दोहराना चाहता हूं कि यह समय है जब उदारवादी, प्रगतिशील, मध्यमार्गीय, बुद्धिजीवियों, राजनीतिज्ञों, अर्थशास्त्रियों को नए सिरे से अपनी अब तक चली आ रही नीतियों पर विचार करना होगा। उदारवादी तबके के वामपंथ के साथ बारीक मतभेद हो सकते है, लेकिन इसका विकल्प प्रतिगामी शक्तियों के साथ जाकर मिल जाने में नहीं है। वैश्विक पूंजी से पोषित विचारों पर उदारवाद का मुलम्मा चाहे जितना चढ़ा हो उसकी कलई देर-अबेर खुलकर रहेगी। लेकिन तब उन लोगों के पास पछताने के अलावा कुछ न शेष रहेगा। जर्मनी में कथित समाजवादी-उदारवादी ताकतों ने हिटलर का समर्थन व वामपंथ के उभार का विरोध किया था। नतीजा सामने है। वह गलती दुबारा नहीं होना चाहिए।