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Tuesday 21 Nov 2017

‘डूब, शीर्षक जो बहुत कुछ कह देता है’! अक्षर पर्व सितंबर अंक में ‘डूब’ शब्द जो लिखने पर मजबूर कर जाता है।

 

रमेश चंद मीणा, 2-ए-16, जवाहर नगर, बून्दी, राज.

‘डूब, शीर्षक जो बहुत कुछ कह देता है’! अक्षर पर्व सितंबर अंक में ‘डूब’ शब्द जो लिखने पर मजबूर कर जाता है। इससे पहले हंस के नवंबर अंक में एक कहानी ‘वे दस मिनट’ ने रचनाकार से बात करने पर मजबूर कर दिया था। कुछ महीने पहले शानी का यात्रावृत्तांत ‘शालवनों के द्वीप’ पढ़ चुका हूं। इन रचनाओं में आदिवासी जनजीवन का जीवंत चित्र उखेरा गया है। डा. सतीश पांडेय ने एकांत श्रीवास्तव की लंबी कविता ‘डूब’ पर लिखते हुए आदिवासी की विडंबनाओं की तरफ जो इशारा किया है वह यूं ही छोडऩे के लिए नहीं, गंभीरता से विचारणीय है कि जमीन और गांव से जो लगाव ग्रामवासियों और आदिवासियों का होता है, वह हमारे लिए नजरअंदाज करने के लिए नहीं है। इस वैश्वीकरण में हर छोटी चीज नजरअंदाज की जा रही है, बड़े लोग और छोटे लोगों में भेदभाव इस मुकाम पर आ चुका है कि किसान और आदिवासी हाशिये पर चले जा रहे हैं। किसान लगातार आत्महत्या कर रहे हैं और आदिवासी कल ‘डूबते’ हों तो आज ‘डूबे’ उनकी बला से उन्हें कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। उन्हें चाहिए खास आदमी का चहुंमुखी विकास जिसके लिए बड़ी-बड़ी परियोजनाओं को अंजाम दिया जा रहा है। उन्हें विकास के लिए बड़े-बड़े बांध चाहिए- टिहरी, गढ़वाल, हरसूद और मणिबेली में रहने वाले ग्रामीणों और आदिवासियों के विस्थापन से उन्हें किसी तरह का लेना देना नहीं है। ‘डूब’ शीर्षक पर लंबी कविता और वीरेन्द्र जैन द्वारा रचित उपन्यास, ये दोनों डूब में चले गए लोगों की भावना, लगाव और जुड़ाव को बयंा करता है। इस अर्थ में दोनों रचना एक बड़ी बहस की मंाग करती है। ‘डूब’ पर जितनी रचनाएं हैं या ये दोनों ही एक सेमिनार की पूरी गुंजाइश लिए हुए है। कई सवाल हैं जो जवाब मांगते हैं। इस तबके की लगातार की जा रही नजरअंदाजी ही नहीं दोगलापन भी जाहिर होता हैै। आदिम अवस्था से रह रहे आदिवासियों को एक ही झटके में अपनी मूल जमीन से बेदखल कर देना कितना पीड़ादायी है? इसका अनुमान तब तक नहीं लगाया जा सकता जब तक आदिवासी की मूलभावना नहीं समझी जा सकती है। ये रचनाएं पाठक को उनके बीच ले जाकर खड़ा कर देती है।
असभ्य कौन है? वक्त को समझने का दावा करने वाले कितने मूर्ख है कि जो प्रकृति के रक्षक है उन्हें नष्ट कर रहे हैं। जो प्रकृति को वास्तव में नष्ट कर रहे हैं उन्हें स्वयं संरक्षित व पोषित कर रहे हैं। जो कथित बड़े हैं वे सोच में बड़े नहीं है, जिन्हें छोटा समझकर हम भूल कर रहे हैं वे प्रकृति की जरूरत है। यदि वे हैं तो प्रकृति है, जंगल है, पहाड़ है। कवि विनोद कुमार शुक्ल जब लिखते हैं-‘जंगल उनका है जो जंगल के सबसे अधिक नजदीक है।’ यह साबित हो चुका है कि जंगल के रक्षक वही हैं, वही हो सकते हैं। उन्हें नजरअंदाज करना भूल है, ये रचनाएं इस तरफ  भरपूर इशारा कर रही है। इन्हें ठहरकर समझने की जरूरत है। आदिवासी की जिजीविषा ही है कि लाख विपरीत परिस्तिथियों के बावजूद वे जिंदा है। इसी भावना को पकड़ा है-‘वे छोटे पांव हैं/ जो लंबी यात्रा पर निकल पड़ते हैं/ छोटे पंख सारा आकाश नाप लेते हैं।’ छोटे और कमजोर समझकर जिन्हें नकार दिया गया है जबकि वे संविधान द्वारा संरक्षित है फिर भी वे सुरक्षित नहीं है। आदिवासी जो कम से कम में गुजारा कर रहा है उससे उसके पहाड़, जंगल और जमीन छीनने की क्या जरूरत है?
आदिवासी सबसे अधिक पर्यावरण प्रेमी है। वे स्वभावत: संतोषी, संयमी और दूसरों का कम से कम नुकसान करने वाला जमीन पर दुर्लभ प्राणी है जिसकी रक्षा करने में सरकार असफल हो चली है। यह असफलता ही है वरना क्या कारण है कि संविधान में जिनकों संरक्षित किया हुआ है फिर भी वे गरीबी मेें जीने पर विवश हैं। शिक्षा के प्रकाश से सबसे अधिक दूर यही वर्ग ठहरता है। जब कभी विकास की बात आती है तो आदिवासी से उसका घर, जमीन और जंगल बेखौफ  छीन लिया जाता है। दूसरों के हित के लिए बनने वाले बांध में अगर कोई डूबता है तो वह आदिवासी और इस देश का गरीब मूक किसान ही है।
‘डूब’ आदिवासी अर्थ में विचारणीय, चिंतनीय और करुणीय शब्द है। जिस पर कविता और साहित्य रचा जा रहा है, जिसकी गूंज राजनीतिक गलियारों में अनसुनी की जा रही है, नीति नियंताओं के कानों तक शायद नहीं पहुंच पा रही है।