Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

मजबूती का नाम महात्मा गांधी


सर्वमित्रा सुरजन
भारतीय स्वभाव से अपेक्षाकृत भावुक होते हैं, विशेषकर अपनी संस्कृति, परंपरा, विरासत आदि को लेकर। हमें दुखी करने का सबसे आसान तरीका है, भावनाओं पर सीधे चोट करना। पाश्चात्य संस्कृति को पहले गलत ढंग से ही लिया जाता था, क्योंकि यह माना जाता था कि वह हमारी भावनाओं के अनुकूल नहींहै। लेकिन जब यही पश्चिमी संस्कृति बाजार के अनुकूल हुई तो भारतीय संस्कृति का मेल इसमें सहजता से होने लगा। बात मुनाफे की हो तो भावनाओं को कैसे आड़े आने दिया जाए। बाजार और भावना का यही खेल और यही मेल इस बार गांधी और खादी के साथ हो रहा है।
देश का बड़ा तबका दुखी है कि खादी ग्रामोद्योग आयोग के कैलेंडर से गांधीजी की चरखा कातने वाली तस्वीर की जगह मोदीजी की चरखा कातते तस्वीर लगी है। बापू महज एक धोती में, साधारण से चरखे के साथ होते थे, मोदीजी डिजाइनर कपड़ों में आधुनिक चरखे के साथ हैं। बाजार में हर चीज ब्रांड के कारण ही बिकती है और चकाचौंध वाले ब्रांड जल्दी आकृष्ट करते हैं। अब गांधीजी का तो दर्शन ही सादा जीवन और उच्च विचार वाला था, उन्होंने खादी को भी वस्त्र नहींविचार माना था। कपड़ा बुनियादी जरूरत है, यह तो सब जानते थे, लेकिन अंग्रेजों की सामरिक, आर्थिक, कूटनीतिक शक्ति के मुकाबले इसे हथियार की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है, यह ज्ञान तो बापू ने ही दिया था। उनका खादी का विचार भारतीयों को आत्मसम्मान की याद दिलाने, आत्मनिर्भर बनाने से जुड़ा था, जिसे बाद में नेहरूजी ने बाकायदा संस्था के रूप में ढाला। तब भी उद्देश्य यही था कि इसके जरिए भारतीय ग्रामोद्योग को बढ़ावा मिले, औद्योगिकरण के बीच भी छोटे उद्योगों से जुड़ी आजीविकाएं भी चलती रहें। लेकिन ईमानदारी से आत्मावलोकन करें तो हम यही पाएंगे कि ये उद्देश्य तो कब के काफूर हो गए। खादी और गांधी भावनाओं के साथ तो जुड़े रहे, पर हकीकत में कुटीर और ग्रामोद्योगों की हालत खस्ता होती रही। मोदीजी जिस बनारस के अब हो गए हैं, वहां के कारीगरों की दुर्दशा किससे छिपी है। देश के तमाम बुनकर सहकारी संघों, हथकरघा उद्योगों, हस्तशिल्प से जुड़े कारीगरों की स्थिति दयनीय होती गई, लेकिन भारतीयों की भावनाएं आहत नहींहुईं। किसान आत्महत्या करते रहे, पर उनका उपजाया अनाज खाने वाले भारतीय दुखी नहींहुए। इनमें से किसी के लिए मोदीजी ने विज्ञापन नहींकिया, जबकि सरकारी योजनाओं, कैलेंडरो, डायरियों हर छोटे-बड़े आयोजनों में मोदीजी या तो तस्वीरों के जरिए या साक्षात उपस्थित रहे। जियो और पेटीएम ने भी उनकी तस्वीरों का उपयोग अपने विज्ञापनों में किया। इससे साबित हुआ कि नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री तो बन गए, अब वे देश के सबसे बड़े ब्रांड बनने के इच्छुक हैं। उनकी इस इच्छा को भांपते हुए खादी ग्रामोद्योग ने वार्षिक कैलेंडर में उनकी तस्वीर दे दी। यूं तो देश के कितने ही लोग खादी ग्रामोद्योग से सामान खरीदते हैं और कितनों को उसके कैलेंडर के बारे में पता होता है। पर भला हो मीडिया का कि अब सबको इस बारे में पता चल गया है। खादी ग्रामोद्योग, उसके कैलेंडर और मोदीजी को बैठे-बिठाए मुफ्त का प्रचार मिल गया। विरोध के स्वर तो उठने ही थे, क्योंकि मामला भावनाओं से जुड़ा था। गांधीजी ने कभी नहींचाहा होगा कि उनकी मूर्तियां हर शहर में हों, उनके नाम की सडक़ेें हों, राजघाट में समाधि के नाम पर लाखों खर्च कर रख-रखाव किया जाए। वे तो एक आलपिन बर्बाद करने के पक्ष में नहींथे, मितव्ययी इतने कि लिफाफे के दूसरी ओर के सादे कागज का इस्तेमाल भी कर लेते थे। उनके इस दर्शन के आधार पर यही माना जा सकता है कि गांधीजी होते तो यही कहते कि खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर पर उनकी तस्वीर हो न हो, किसान, मजदूर, बुनकरों का जीवन कष्टों से मुक्त हो। देश आर्थिक गुलामी में फिर न फंसे। शिक्षा रोजगारपरक हो। और जीवन में सत्य, अहिंसा जैसे मूल्यों की स्थापना हो। लेकिन अब गांधीजी नहींहैं, उनका जीवन-दर्शन भी पुराने कैलेंडर की तरह भारतीय दीवारों से उतर चुका है। आज के बाजार और राजनीति के लिए बापू हानिकारक हैं, जबकि मोदीजी लाभदायक नजर आ रहे हैं। हम दुखी होते रहें कि बापू का अपमान हुआ, उनकी तस्वीर हट गई, मोदीजी उनकी जगह विराजमान हो गए। इस दुख के नाम पर कुछ दिनों तक राजनीति भी हो जाएगी। लेकिन क्या इससे स्थितियां बदलेंगी? हमें दुखी होना चाहिए कि एक समाज के रूप में हम किस दिशा में बढ़ रहे हैं? हमने क्यों गांधीजी के सिद्धांतों को अपने जीवन से गायब होने दिया? क्यों उनके नाम पर राजनीति करने की छूट दी? उन्होंने साधारण इंसान की असाधारण शक्तियों का परिचय हमसे कराया था, उसे हम क्यों भूल गए? मजबूरी का नाम महात्मा गांधी जैसे जुमले जब हमारी भाषा में प्रवेश कर रहे थे, तभी हम सचेत क्यों नहींहुए? गांधीजी मजबूरी नहीं, मजबूती का नाम थे। क्या गांधी को मानने वाले उसी मजबूती का अहसास फिर से उस समाज को कराएंगे, जो कट्टर, धर्मांध, हिंसक, लालची और स्वार्थपरक शक्तियों के हाथों बंधक बन चुका है? गांधी की तस्वीर हटने का दुख सचमुच हुआ है, तो उसका प्रतिकार इन शक्तियों को गांधीवादी तरीके से जवाब देकर ही किया जा सकता है।