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Monday 20 Nov 2017

सत्यनारायण पटेल की कहानी ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ : भूमिपुत्र की अपराजेय किसानी आस्था

नीरज खरे
  असिस्टेंट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी - 221005
मो. 09450252498

प्रेमचंद ने कहानी को रोमांटिक भाव-संवेदन और कतिपय आभिजात्य संस्कारों के समानांतर सामयिक चिंताओं और वृहत्तर जीवन संदर्भों से जोडक़र गतिशील किया था। तभी सामाजिक सोद्देश्य और यथार्थवादी भूमिका पर कहानी के संभावनावान रास्ते फूटे। नई कहानी तक आते नागर और ग्राम्य कथाबोध का द्वंद्व चल पड़ा। मध्यवर्गीय अनुभवजन्य बहुलता के बीच कहानी का प्रेमचंदीय प्रस्थान अपेक्षाकृत हाशिए पर रहा। कुल मिलाकर हिंदी कहानी का अतीत इन दोनों (परपंरा कहें या प्रवृत्ति) धाराओं के स्वभावत: विरोधाभासों, कहानी कला की चुनौतियों और संघर्ष का रहा है। कमोबेश वही स्थितियाँ प्रकारांतर से चलती रहीं। प्राय: कहा जाता है कि उपर्युक्त दोनों धाराओं का परस्पर कोई विरोध नहीं है। रचना प्रवृत्तियों के तौर पर उन्हें चुनने का विकल्प कहानीकार का अपना है। यही कहानीकार का रचनात्मक लोकतंत्र है। कहानी में आज का परिदृश्य कहानीकारों के नगरीय और मध्यवर्गीय संस्कारों से बहुल है। इसके चलते अपने मध्यवर्गीय-नगरीय अनुभव की कहानियाँ लिखना, उनके लिए सुगम रास्ता है। यह ठीक भी है। अपने अपरिचित अनुभव-क्षेत्र पर वे क्यों लिखें और लिखें भी तो प्रामाणिक तौर पर कैसे? पर जब एक पूरे वर्ग और उनके भूगोल की अस्मिता दांव पर लगी हो! यानी परिस्थितियाँ अत्याधिक भयावह हो उठी हों! तब कथालेखन के मध्यवर्गीय-नगरीय विकल्पों की ओर आकर्षण पर चिंताएं होना लाजिमी है।
कहानी आलोचना में मंथन होता रहा है कि आज की कहानी तक पहुँचते-पहुँचते प्रेमचंदीय परंपरा का मुकाम क्या है? ‘हंस’ ने इसी चिंता पर वर्ष 2006 में एक विशेषांक निकाल कर विशाल मेहनतकश तबके (जिनमें किसान, दस्तकार, शिल्पकार और अन्य श्रमिक आते हैं) के प्रति विशेषत: कहानीकारों और आलोचकों की संवेदनाएँ सिकुडऩे पर गहरी चिंता जतायी थी। पत्रिकाओं में इस पर बहस चलती रही है। दरअसल इस संदर्भ की कहानियाँ कम लिखी गईं, पर जो लिखी गईं उन्हें पर्याप्त नोटिस भी नहीं किया गया। कहानी आलोचना ने भी अपना बना-बनाया ढर्रा नहीं बदला। वह आज भी केवल मध्यवर्गीय युवाओं के सपनों, महत्त्वाकांक्षाओं, कैरियर, मोबाइल-इंटरनेट, प्रेम और संबंधों की बनती-बिगड़ती परिभाषाओं में नये मूल्यों को टटोल रही है। कहानीकारों की लेखन के प्रति अपनी-अपनी जवाबदेही है। आलोचना का दायित्व लिखे गए का मूल्यांकन करना तो है पर किसी की उपेक्षा करके नहीं। जरूरी या गैरजरूरी का मानक तो उसे बनाना ही होता है। हर लिखे को उपलब्धि मानकर ढोते रहने का काम भी आलोचना का नहीं है।
उपर्युक्त प्रसंग इसलिए कि हिंदी कहानी में यदि मध्यवर्ग-निम्नवर्ग या शहर और गाँव का परस्पर विरोध और द्वंद्व बेमानी मान लिया जाए! इन्हें खांचों में बाँट न देख कर, कहानी को वृहत्तर मानवीय सरोकारों के समर्थन में देखें! कहानी में ऐसे विभाजन वस्तुगत चुनौतियों के सामने मिट भी सकते हैं। एकमेक भी हो सकते हैं। यह देखने की एक सुविधामूलक राह है। प्रेमचंद और प्रसाद के समय से चली आयी है। कहानी-यात्रा के महत्त्वपूर्ण प्रस्थानक दौर नई कहानी आंदोलन में भी रहे। अगर इस प्रचलन से परे देखा जाए तो एक का दूसरे में बराबर हस्तक्षेप रहा। इस मायने में ये दो भिन्न विरोधी प्रवृत्तियाँ भी नहीं है। सहवर्ती हैं या एक-दूसरे की पूरक। पर अभी तक हिंदी आलोचना ने इन्हें इस सिलसिले से देखने का उपक्रम कम ही किया है। समकालीन (पिछले 20-25 साल की) या आज की कहानी में जिस परंपरा के संकुचन पर चिंता होती रही है- दरअसल वह सहवर्ती और कहानी में अनुपस्थित हो रहे वृहत्तर यथार्थ को पहचानने, उसके सवालों को गहनता से जगह देने की कोशिशें हैं। कम हैं या कम हो रही हैं, पर वे कोशिशें हैं- कला के चमत्कार के बिना या कतिपय इससे युक्त भी।
हिंदी कहानी में महेश कटारे, अरुण प्रकाश, शिवमूर्ति, कैलाश बनवासी आदि के बाद सक्रिय कथा पीढ़ी में सत्यनारायण पटेल इन कोशिशों को अंजाम देने वाले प्रतिनिधि कहानीकार हैं। वे खुद ‘हमारी राहें जुदा हों....पर मंजिल एक हों’ मानते हुए कहते हैं कि -मुझे कला का हर रूप पसंद है, जिसमें हर तरह की जड़ता, रूढिय़ाँ, अवैज्ञानिकता और मानवीयता को रौंधते विकास के क्रूर पहिये के खिलाफ प्रतिरोध की चिंगारियाँ चमकती हों, जिसमें अपनी भाषा, बोली, लोकगीत, लोककथा, खान-पान, रहन-सहन यानी संपूर्ण लोकसंस्कृति को सम्मान मिलता हो। आज पूंजीवाद हमारे जीवन में न सिर्फ आर्थिक असमानता की खाई को चौड़ी कर रहा है, बल्कि वह सुनियोजित ढंग से हमारी लोकसंस्कृति को भी धीरे धीरे हाशिए पर धकेल रहा है। ...मैंने अपनी कहानियों में शोषित, दमित, ठगाए हुए आदमी और उसकी लोकसंस्कृति, लोकसंघर्ष के स्वर को बुलंद करने की कोशिश की है। (26 जनवरी, 2012 को बाँदा में ‘प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान’ के अवसर पर कहानीकार के वक्तव्य से)
कहानी की रचनात्मकता के इस मोर्चे पर सक्रिय कहानीकार सत्यनारायण पटेल के तीन कहानी संग्रह आ चुके हैं। दूसरे में कहानी ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ संकलित है। इसी से संग्रह का नाम भी है। पहले पहल यह कहानी ‘बया’ (जनवरी-मार्च, 2010) में प्रकाशित हुई थी, पर तब उसका शीर्षक ‘लूगड़ी का सपना’ था। बहरहाल, पत्रिका और संग्रह में कहानी वही है। विशेषण जुड़ जाने से उसके कथ्य की गहनता और सघन हुई है। कथा में लूगड़ी का सपना ‘गोदान’ में होरी के गाय पालने की अभिलाषा या सपने, ‘कफ़न’ के घीसू-माधव के ‘स्वादिष्ट भोजन’, ‘पूस की रात’ के हल्कू का ‘कंबल’ पाने के सपने से भिन्न नहीं है! यह आज की कहानी में प्रेमचंद की परंपरा का अगला मुकाम है या उनकी परंपरा की प्रासंगिक वापसी भी कही जा सकती है। कहानी का किसान डूँगा अपनी पारिवारिक-आर्थिक स्थिति में संघर्ष के चलते प्रतिरोध की जिस ज़मीन पर खड़ा है, वह ज़मीनी चेतना ही इस कहानी को आज की जरूरी चिंता और चेतना से जोड़ती हैं। यहाँ उदारीकरण के पश्चात भारत में अंगीकृत नई ग्लोबल-आर्थिक नीतियों और उनसे जनित नए यथार्थ की चुनौतियों से सामना है। कहानी में गाँवों का रूपांतरण और कृषि-आश्रित किसानों (विशेषत: छोटे किसानों) के ऊपर आई विपदा, अपनी संपूर्ण सच्चाइयों के साथ बयां है। यही नहीं खांटी किसान के रूप में डूंगा, होरी-हल्कू की संघर्षशील जिजीविषा और सूरदास की अडिगता लिए आया है। किसानों की ज़मीनें छीनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले की जा रही हैं। उनके प्रतिरोध तीव्र होने की स्थितियाँ बनी। पर हकबकाए भोले-भाले किसान ठीक से इन्हें समझ कहाँ पा रहे हैं।
भूमिपुत्र किसान जो किसानी को स्वाभिमान मानता है, वह किसी कीमत पर, किसी प्रलोभन, किसी प्रकार के भय से भी डिगे बगैर अपनी ज़मीन देने को तैयार नहीं हैं। पारिवारिक षड्यंत्र से उसके दो खेत पहले ही हड़प लिए गए थे। अपने पिता (दाय जी) को भी खोया था। विकट स्थितियों को झेलते हुए भी डूँगा अपनी ज़मीन बेचने को राजी नहीं होता। अब गाँवों में खेती-किसानी कम, ज़मीनें खरीदने-बेचने का बाज़ार ज्यादा गर्म है। कम-से-कम नगरों के पास लगे गाँव की खेतिहर जमीनें तो पूंजीवादी विकास के निशाने पर अधिक हैं। किसानों से सौदे पटाने और उन्हें सब्ज़बाग दिखाने के लिए दलाल और टुल्लर घूम रहे हैं। इस ग्लोबल समय में आर्थिक बदलावों के चलते खेती से विस्थापित हुए ऋणग्रस्त किसानों द्वारा आत्महत्याएं एक दुखद सच्चाई है। और पूंजीवादी विकास और बाजार के कुचक्र में किसान का भूमिहीन होना दूसरी। प्रेमचंद के ज़माने से आज के किसान का संकट कई गुना भयावह है। होरी तो गाय पालने का सपना पूरा नहीं कर पाया था, आज के किसान के सामने उससे भी छोटा सपना बड़ी भारी महत्त्वाकांक्षा जैसा असाध्य बना है- माँ, घरवाली या बेटी के लिए लूगड़ी (साड़ी या परिधान) खरीदने का सपना! जैसे पूरी कहानी पर इसी सपने की छींट के रंग बिखरे हैं। इसी सपने को पूरा करने के लिए डँूगा संघर्ष कर रहा है। कहानी में इस सपने को गहरे विडंबना-बोध के साथ पढ़ा जा सकता है- डूँगा की आँखों में झिलमिलाते, केवल आसमान के तारे नहीं थे-एक सपना था। सपना भी क्या! एक लूगड़ी का सपना! छींटदार। लाल छींट वाली सितारे टंकी लूगड़ी का सपना। यह एक ऐसा सपना था, जिसे देखने के लिए अद्र्धनिद्रा में जाने की जरूरत नहीं थी। यह तो कुछ ऐसा था कि जब भी डूँगा खाट पर लेटता। सिर तकिए पर धरता। नजऱें तारों को छूतीं। क्षण भर में ही आसमान छींटदार लूगड़ी में बदल जाता। उस लूगड़ी को देखते-देखते ही वह नींद में चला जाता था। सुबह उठकर लूगड़ी को पाने के लिए वह दिनभर खेत में हाड़तोड़ मेहनत करता।’’(लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना, अंतिका प्रकाशन, प्र.सं. 2011,पृ. 102)
कहानी के केंद्र में एक ऐसा गाँव और वहाँ का किसान, उन पूरे भारतीय गाँवों और किसानों के प्रतिनिधि तौर पर देखा जा सकता है- जो नवसाम्राज्यवादी और नवउदारवादी ग्लोबल व्यवस्था के प्रहार झेल रहे हैं। कथित रूप से विकसित शहर उन गाँवों को अपनी ज़द में समेटकर उनकी अस्मिता छीन लेना चाहते हैं-‘‘डूँगा का गाँव भी ए बी रोड के किनारे बसे अनेक गाँवों में से एक था। गाँव की एक बाजू में प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी के नाम से विख्यात शहर और दूसरी बाजू में एक औद्योगिक शहर। दोनों शहर गाँव के विकास और उद्धार का डंका बजाते। अपनी मस्ती में मस्त साँड़ की तरह डुकारते। गाँव की ओर बढ़ते। गाँव के संस्कार, त्योहार मनाने का ढंग, बोली, पहनावा, खानपान, शादी-ब्याह के तौर-तरीके, सभी को गोलगप्पों की तरह निगल रहे थे। शहर के हस्तक्षेप से गाँवों के हुलिए जिस गति से बदल रहे थे, उस तेजी से डँूगा सरीखे देख-समझ भी नहीं पा रहे थे।’’(वही, पृ. 115) कहानी गाँवों के रूपांतरण और उनकी अस्मिता पर हो रहे हमले को भी परखती  है। यथार्थबोध के गहराने कहानीकार बहुत से तथ्यों को व्यापक करता है। इसीलिए ऐसी कहानियाँ अधिक वाचाल और कलेवर में प्राय: लंबी ही होती हैं। अत: आज की कहानियाँ प्राय: लघुता के विन्यास को लांघ कर लिखी गई हैं। ऐसी कहानियों में कथ्य की तीव्र अभिव्यक्ति के लिए कहानीकार को खुद कई बार हस्तक्षेप करने नॅरेटर के रूप में आना होता है। ‘लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना’ कहानी में भी यह हुआ है। पर यहाँ नॅरेटर (कहानीकार) का कभी-कभी पाठक से भरोसा टूटने लगता है। वह स्वयं पाठ की व्याख्या समझाने कई बार उपस्थित है। इस तरह कि कहानी के ही पाठ से उसे समझने के अवसर सहज ही मिल जाते हैं। हालांकि, इससे पाठक की राह आसान जरूर हो जाती है।
डूँगा, किसानी में गहरी निष्ठा रखने वाला किसान है। गाँव के कितने किसान, टुल्लरों और दलालों के फेर में पड़ कर अपने खेतों को बंबई की कंपनी को भेंट चढ़ा चुके हैं। बाज़ारवाद ने उनको भी चमकीली दुनिया के सपने दिखाए हैं और वे अपनी मुरादें खेत बेचकर पूरी कर लेना चाहते हैं। खेत बेचकर ही वे पूरी हो सकती हैं, यही पाठ दलाल और टुल्लर उन्हें पढ़ा रहे हैं। डूँगा का खेत ऐसी जगह है कि उसे उसका मुँह मांगा दाम मिलता। पिछले पाँच साल से दलाल डँूगा के पीछे पड़े हैं कि वह अपना खेत बेच दे। विषम परिस्थितियों में भी डूँगा की खेती और जमीन के प्रति आस्था जरा भी नहीं डगमगाती। डूँगा का प्रतिरोध किसान के स्वाभिमान का गौरवगान है। उसका अपना जातीय किसानी-बोध उसे पूंजीवादी ताकतों का एजेंट बनने से रोक लेता है। घर की जरूरतों और लूगड़ी के अलावा एक पिता का सपना अपनी बेटी को अच्छे घर और वर से ब्याहना भी है। डूँगा अपने साले मदन (जो कि किसानी छोड़ भू-माफियों के ध्ंाधे में शामिल है) की सलाह से भी प्रभावित नहीं होता। वह अपने पिता की तरह कर्मठ किसान है। घर की जरूरतें मुँह बाये खड़ी हैं। उन्हें हल करने में ही उसकी कमायी भेंट चढ़ती रही। वरना ‘‘लूगड़ी तो वह एक नहीं, सौ-सौ कभी का; और कई-कई बार खऱीद चुका होता।’’(वही,पृ.106) उसे टुल्लर द्वारा नियोजित दहशत बनाने वाली हरकतों से मानसिक रूप से आघात भी पहुँचता है, पर वह किसी दबाव में नहीं आता। विश्व अर्थव्यवस्था में आर्थिक मंदी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ा। कंपनियों, दलालों और टुल्लरों के इरादे फिलहाल डूब गए थे। डँूगा पर खेत बेचने का संकट भी टल गया। किसान लोग डूब का मतलब नहीं समझ पा रहे हैं। लेकिन ख़बरों के बाज़ार से डँूगा इतना जरूर समझ गया था कि ‘‘जब तक खेत बचा है। खेती करने की इच्छा बची है। अपनी मेहनत की फसल के दम पर लाल छींटदार लूगड़ी लाने का सपना भी बचा है। जब तक सपना बचा है, बहुत कुछ बचा है।’’(वही, पृ.135)
कहानी के आरंभ में डँूगा मंदिर में खंजड़ी बजाने में तल्लीन है। पर वह देवता की भक्ति में नहीं अपने खेतों की चिंता से क्षणिक मुक्ति के लिए लीन, खंजड़ी बजाना बंद ही नहीं करता। जब उससे खंजड़ी छीनी जाती है तो वह चीख पड़ता है-‘‘म्हारे नी बेचनो है म्हारो खेत’’(वही, पृ.100) यह वाक्य कहानी की धुरी है और लेखकीय प्रतिबद्धता का उद्घोष भी। अंत में फिर वह ख्ंाजड़ी बजाकर अपनी खुशी का इज़हार कर रहा है। इसे डँूगा जैसे किसानों के पूरे वर्ग में किसानों की अधिक व्यापक एकजुटता और प्रतिरोध की संभावित भावी आवाज के रूप में भी सुना जा सकता है। अभी तो डँूगा अकेला खड़ा है या ज्यादा से ज्यादा किशोर और रामा बा उसके पीछे हैं। पर खंजड़ी की आवाज़ और किसानों के कानों तक पहुँचेगी और वे उसके साथ होंगे। झांझ, करताल, ढपली और खंजड़ी लोक के वाद्ययंत्र हैं- और लोकजागरण के सारथी भी। डँूगा की भक्ति कुछ-कुछ कबीराना हैं। वैसे वह भगवान को भी नहीं मानता। मंदिर भक्तिभाव से आरती गाने नहीं, लोकवाद्यों की कला साधना में अपने गम भुलाने के लिए जाता है। वह कम-से-कम कर्मकांडी भक्त नहीं है। प्रेमचंद भी ‘हल्कू’ और ‘घीसू’ को वर्गीय से वैयक्तिक पात्र बनाते हैं। पर यहाँ डँूगा को विशिष्ट बना कर लेखक ने समस्या की भयावहता के सामने एक अबोध-सा प्रतिपक्ष रचा है! लेखक उसकी फौरी मुक्ति यानी कहानी के आशावाद से संतोष भले कर ले, पर उनसे निपटना इतना आसान नहीं है। आर्थिक मंदी का दौर कब तक विश्व बाजार की ताकत को रोके रखता! वह किसानों को अन्न देने वाली जमीनों पर ‘पूँजीवादी विकास’ की फसल बौने के मंसूबे पाले, उन्हें हड़पने बेधडक़ चला आ रहा है। अब सरकार के नोटबंदी के फैसले के बाद सारे कारोबार: रियल स्टेट और जमीनों के खरीद-फरोख्त का बाजार फिर ठंडा पड़ा है। आर्थिक नीतियों का पहले से ही अभिशाप झेल रहे और अपनी मौरूसी जमीनों को जीवन-मरण का प्रश्न समझते डूँगा जैसे किसान, फिलहाल दलालों के कुचक्र से बचे होंगे! लेकिन कब तक? बहरहाल, यह कहानी कथित विकास की असंगति के विरुद्ध, अंतत: किसान की निष्ठा और किसानी के प्रति अपराजेय मूल्य को स्थापित करती है। फिर तो लूगड़ी एक छोटा-सा सपना नहीं! प्रतीक बन जाता है संपूर्ण किसानी के सपने का। तब यह कहानी सपने के टूटने की नहीं, उसे बचाने के जद्दोजहद की कहानी बन जाती है। कहानी में पात्र का ही नहीं, उसके पीछे लेखक का भी एक सपना होता है। वह लेखक, जो आमजन को कथा में लाकर, उनके संघर्षों और उनपर बरपे जाने वाली नाइंसाफी के खिलाफ प्रतिबद्ध है। जिसे उनके हक की दरकार है- जो पूरा सूरज नहीं, बस अपने हिस्से की धूप चाहते हैं।
सत्यनारायण पटेल की कहानियों में अपने समकालीन समय की वे चुनौतियाँ हैं-जो किसानी, श्रम और ग्रामीण अस्मिता पर कहर बन रही हैं। कभी-कभी मध्यवर्ग या निम्नवर्ग पर भी उनके प्रभाव देखे जा सकते हैं। पर उनकी कहानियों में इस यथार्थ की अभिव्यक्ति कुछ इस प्रकार होती है कि कहानी में विचारों (कहानीकार की सामयिक स्थितियों पर प्रतिक्रिया) की एक श्रंृखला विद्यमान मिलती है। यह उनकी कहानियों में कथा संवेदना के साथ कितनी घुलनशील हैं-इस पर विचार होना चाहिए। प्राय: कहानियाँ सकारात्मक अंत तक पहुँचने के लिए ‘सपने के ठूंठ पर कोंपल’ (इसी नाम से उनकी एक कहानी है) उगा देती हैं। इस प्रकार उनकी कहानियाँ अपने कथ्य को सहजता से कहने के रास्ते चलती हैं-रचाव की घुमावदार मोहक वादियों से होकर जाने का लगभग कोई जोखिम नहीं उठातीं। उन्हें कहानी में वस्तुगत तनाव और उसकी सार्थक परिणति अधिक महत्त्वपूर्ण लगती है। गोकि वे कथारस की संभावना के लिए कोशिशें भी लगातार करते हैं। मसलन, डँूगा किसान की कहानी कहते हुए उसके जीवन-संघर्ष में आए प्रेम और राग के हर अवसर पर ठहरते हैं। पर विडंबना बोध (जो कथ्य का हिस्सा है) को छोड़ते नहीं हैं। डँूगा का ब्याह हुआ, बेटी पवित्रा का जन्म हुआ। वह बीस वर्ष की हो गई, उसे पता ही नहीं चला। पर यहीं डँूगा के लिए यह भी दर्ज होता है कि ‘‘उसने बीस बरस में बीस बार ढंग से आईना भी नहीं देखा।’’(वही, पृ. 110)
कहानीकार अपनी कथाभाषा में स्थानीयता के पूरे रंग भी समेटता है। लोकभाषा के सारे भदेस कहे जाने वाले शब्दों की कहानी में भरमार है। वे व्यंजकता और विश्वसनीयता का प्रसार करते हैं। इनकी बहुलता के साथ कहानीकार जिस देश-गाँव की व्यथा कह रहा है, वह अपनी स्थानीयता या आँचलिकता में सीमित नहीं है। कथ्य की गहनता ही उसे समकालीन भारत के वृहत्तर गाँवों की व्यथा से जोड़ देती है। प्रेमचंदीय विरासत की छाया में प्रसाद के भावुक आदर्श का स्पर्श और रेणु का परंपरा बोध आ मिलने से यह कहानी सार्थक बनी है। आज जब कहानी से किसान और किसानी गायब होने पर चिंताएं हो रही हैं, तब इस कहानी को पढऩा पुन: प्रासंगिक और किसी भरोसे से कम नहीं है। ऐसी ही कहानियाँ नयी पीढ़ी के लिए कहानी आलोचना के किसी प्रायोजित विभ्रम को भी तोड़ती हैं। ठ्ठ