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Saturday 18 Nov 2017

पृथ्वी का प्रथम स्नाान: जि़द भरी उम्मीद की कविताएं


विजय गुप्त
संपादक: साम्य, ब्रह्म रोड, अम्बिकापुर, जिला: सरगुजा (छत्तीसगढ़), पिन 497 001
मो. 098261-25253
श्याम सुन्दर दुबे के काव्य-व्यक्तित्व में दार्शनिक, सर्जक और आलोचक एक साथ सक्रिय दिखाई पड़ते हैं। सर्जक चाहे जितनी उड़ानें भर ले, आकाश-पाताल एक कर ले किन्तु दार्शनिक, ज्ञान-परंपरा से विच्छिन्न नहीं होने देता और आलोचक तो उसे पृथ्वी पर उतार ही लाता है। शब्द और अर्थ के बीच के नाजुक संतुलन को बनाए रखता है। बुद्धि और कल्पना के सम्यक मेल से बनी कविता को नई अर्थदीप्ति देता है। सच को सच कहने का साहस और मनुष्य और पृथ्वी विरोधी शक्तियों से लडऩे की ताकत प्रदान करता है। कवि के ध्यान में यह बात हमेशा रहती है कि दु:ख और यातना के केन्द्र में पृथ्वी ही है। एक क्षण के लिए भी पृथ्वी कवि की दृष्टि से ओझल नहीं होती। वह पृथ्वी के लिए ही मनुष्यता के गीत गाता है और अपने पुरखों के स्वर से स्वर मिलाकर कहता है, ‘‘मात: पृथिव्याम् पुत्रोऽहं!’’।
    भारतीय दर्शन में माता का स्थान सर्वोच्च है। लोक जीवन में तो माता देवीस्वरूपा है और माता का अनन्य रूप धरती ही है। कवि धरती को ‘सृष्टि का महाकाव्य’ मानता है। सृजनरत, एकाकी और लगातार आग और पानी से प्रेम करती और लड़ती हुई एक असमाप्त कविता। कवि उसे ‘गुस्सैल स्त्री’ का बेहद सक्रिय, मर्मस्पर्शी और इन्द्रियग्राह्य बिम्ब देता है:
‘‘एक गुस्सैल स्त्री
नहाती रही
लावा की नदियों में वर्षों तक
आग आग होती रही
....
आकाश ने उसके पपड़ाए होंठों
को छुआ और एकाएक
ऐसा कुछ हुआ कि महाकरुणा में
भीगने लगी वह लगातार
रचने लगी सृष्टि का महाकाव्य
धरती पाने लगी आग और बादल में
सनी हुई शाश्वत कविता        (गुस्सैल स्त्री, पृ. 10)
और कविता भी कैसी? देखो, उस विराट विश्वात्मा की कविता, जो न कभी पुरानी पड़ती है और न मृत होती है। कवि हज़ारों-हज़ार साल से अंतरिक्ष में घूम रही ध्वनि-तरंगों से जुड़ जाता है और दोहराता है,
पश्य देवस्य काव्यम
न जीर्णयति न ममारयति!    (वही, पृ. 10)
    पुराना पडऩा और मृत हो जाना जीवन का लक्षण है। बस पृथ्वी और कविता ही मृत्यु और समय के आर-पार जा पाते हैं। कवि शेष हो जाता है, कविता नहीं। जीवमण्डल मृत होता है, पृथ्वी नहीं। पृथ्वी की उजास को, जिजीविषा को, जीवन की ऊर्जा और नित-नूतनता को कवि अपने भीतर महसूस करता है और अभिव्यक्त भी,
धरती उजेला है
धरती एक मेला है
धरती ने अपने ऊपर
क्या-क्या नहीं झेला है
फिर भी तो धरती ये
आज भी नवेली है
समय के आर-पार
वही तो अकेली है!      (धरती की सुख-नींद, पृ. 14)
पृथ्वी का अकेलापन कोई साधारण अकेलापन नहीं है। वह रचनात्मक अकेलापन है। पानी में डूबता हुआ और आग में जलता हुआ। रचना की पीड़ा, आनन्द और सौन्दर्य से भरा हुआ। सांवले अंधेरे और घुप्प सन्नाटे में छंद रचता हुआ; इच्छाओं को पूरा करता और सपनों को रंग और रूपाकार देता बिल्कुल लता मंगेशकर की तरह। पृथ्वी को लता मंगेशकर के सांगीतिक बिम्ब में बांधना अद्भुत और नायाब कल्पना है।
सृजन की सुदीर्घ दीर्घा में
उसने रचे हैं अनेक दृश्य
आकाश और अपने बीच
ऋतुओं के छंदों को गाया है
उसने अनेक रूपों में
बिल्कुल लता मंगेशकर की तरह    ( लता मंगेशकर की तरह, पृ. 11)
लता मंगेशकर पर ढेरों कविताएं लिखी गई हैं लेकिन पृथ्वी से जोडक़र उन्हें संभवत: पहली बार देखा गया है। पृथ्वी मनुष्य के बाहर भी है और भीतर भी। पृथ्वी के बिना मनुष्य की कल्पना नहीं की जा सकती। उसका शरीर जिन पांच तत्वों से बना हुआ है, उसमें पृथ्वी का महत्वपूर्ण भाग है। पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश और वायु के सम्मिलन से ही शरीर का निर्माण हुआ है। प्रकृति और जीवन की लीलाएं इन्हीं पांच जादूगरों का कमाल है। इस जादू को, सृष्टि के कमाल को श्याम सुन्दर दुबे ने कविता में रूपायित किया है। यह रूपायन कोई हंसी-ठ_ा नहीं है बल्कि स्वयं को होम करके प्रेम करने और प्रेमगीत रचने जैसा है। टूट कर इश्क़ करने जैसा है; आग के दरिया में डूबने जैसा है। महाकवि ग़ालिब की कालजयी पंक्तियों के सहारे कवि अनुभव के उर्वर प्रदेश में प्रवेश करता है और कविता के रहस्य को आत्मसात करता है:
यह इश्क़ नहीं आसां
इक आग का दरिया है
में डूबता है समूचा ब्रह्माण्ड
तब पृथ्वी भरपूर हो उठती है
अपनी उर्वरता में
कांपते-कांपते गाने लगती है - प्रेमगीत। (आग: प्रेमगीत है, पृ. 29)
यह प्रेम द्विपक्षीय है। एकपक्षीय प्रेम तो अनुर्वर होता है। यहां तो भरपूर उर्वरता है। पृथ्वी अंतर्मन में समाती है और अंतर्मन पृथ्वी में विलीन होता है। दोनों का तादात्म्य ही सच्ची कविता है। मुक्तिबोध ने इसे ही बाह्य का आभ्यान्तरीकरण और आभ्यान्तर का बाह्यीकरण कहा है। जो पानी नदी में है, कुंभ में है, वह रक्त में भी है, कविता में भी है, लोकगीत में भी है और हमारी भूख और प्यास में भी। इसलिए कवि दृढ़ स्वरों में कहता है:
पानी लोक गीतों की
प्यास और भूख में सम्मिलित है
लय बनकर, गीत बनकर
लोक गीत सूखने न पाएं
इसलिए पानी की लय को
सृष्टि के तानपूरे पर
पूरी तरह थिरकने दो
बिना टूटे!     
(पानी में थी प्यास, पृ. 24)
अटूट और अछोर सृष्टि को ‘तानपूरे’ के अनोखे, चाक्षुष और गतिशील बिम्ब में विघटित कर कवि ने लय की सर्वोत्तम सत्ता स्थापित कर दी है। मायकोवस्की ने भी लय को कविता की मूल शक्ति तथा मूल ऊर्जा माना है। इसी शक्ति और ऊर्जा की साधना कवि श्याम सुन्दर दुबे ने अपने काव्य संग्रह ‘पृथ्वी का प्रथम स्नान’ में  की है। ‘पृथ्वी का प्रथम स्नान’ दो खण्डों में विभाजित है। खण्ड एक का शीर्षक है, ‘सृष्टि-संभव’। खण्ड दो को नाम दिया गया है, ‘दृश्य-परिदृश्य’। ‘सृष्टि-संभव’ में पांचतात्विक चिन्तन और जीवन का दर्शन-दिग्दर्शन है। पृथ्वी, जल, आग, हवा और आकाश का वैज्ञानिक और काव्यात्मक विवेचन है। इन पांच तत्वों के रहस्य और जादू को खोलता हुआ कवि आदमी की देह और मन के तिलिस्म से भी परदा उठाता है। चेतन और अवचेतन के द्वंद्वात्मक संघर्ष एवं ब्रह्माण्ड और मनुष्य के राग-विराग-संबंध को भी वह चरम तक ले जाता है। प्रकृति और मनुष्य को लेकर कवि के मन में कोई दुविधा नहीं है। वह पूरी सृष्टि को एक इकाई के रूप में ग्रहण करता है। इसीलिए प्रथम खण्ड, ‘सृजन-संभव’, में पांच मूल तत्वों के साथ ‘देह’ और ‘प्रेम’ का भी अनुशीलन है। देह और प्रेम की सार्थकता भौतिक जगत में ही है। शून्य में प्रेम संभव नहीं। देह और जीवन का सत्य विज्ञान और काव्य दोनों के लिए है। दोनों के मार्ग और माध्यम अलग-अलग हैं लेकिन सत्य निश्चय ही एक है। वैज्ञानिक सत्य और काव्य सत्य में कोई बुनियादी अन्तर नहीं है। दोनों एक हैं। पांच तत्वों से देह बनी है और प्रेम इन्हीं पांच तत्वों की अंत:क्रियाओं का परिणाम है। दर्शन के स्तर पर देखें तो दोनों, यानी, विज्ञान और काव्य, प्रेम का ही विशद विस्तार हैं और एक बिन्दु पर वे एकलय होते हैं। दोनों का लक्ष्य अंतत: सुंदर संसार का निर्माण और मानवता का उच्चतम विकास है। कवि वैज्ञानिक की तरह जीवन को हर अशुभ और अमंगल से बचाने के लिए संघर्ष करता है। भाषा उसका माध्यम है और कविता भाषा की ओजोन परत है। जीवनदायी ओजोन परत को सही-सलामत रखने के लिए कवि कविता रचता है, युद्ध का निषेध और प्रतिकार करता है, असमाप्त लड़ाई लड़ता है,
किन्तु युद्ध के तुमुल निनाद से
सदैव चिथड़ा-चिथड़ा होती रही
ममता की ओजोन परत
और कविता सदा से
सुई थामे सिलती रही है
इस फटती परत को
अपनी अंगुली में छिपाए
सुई की चुभन को
दांतों में दबाए
अपनी जीभ को।        (दो होठों के बीच कविता, पृ. 83)
मनुष्य और धरती अपने अस्तित्व की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। बाज़ार के लाभ-लोभ और टेक्नालॉजी के वर्चस्व ने आदमी को क्रूर और बेख़बर बना दिया है। उसे सूचनाओं से इस तरह घेर दिया गया है कि वह स्वयं भी सूचना में बदल गया है। कवि संकट से सावधान करता है कि,
इस सूचना भरे समय में
वह केवल सूचना मात्र नहीं है
जबकि समूचा संसार लगा है
उसे सूचना में तब्दील करने     (इस सूचना भरो समय में, पृ. 75)
लगभग सूचना में तब्दील हो चुका आदमी वास्तविक संसार से आभासी संसार में शिफ़्ट किया जा चुका है। वह अत्याधुनिक कम्प्यूटराइज़्ड मशीनों की जानलेवा गिरफ़्त और उनके ‘कमांड’ में है। ‘डाउनलोड’ और ‘अपलोड’, ‘कण्ट्रोल’ और ‘डिलीट’ उसकी जि़ंदगी का अभिन्न हिस्सा हो चुके हैं। ‘मशीनों के व्याकरण’ में वह जीवन का व्याकरण भूल चुका है। कवि उसकी बदहवासी और बेख़बरी पर व्यंग्य करता है,
और तुम बेख़बर हो
धरती की अनंत पीड़ाओं से
धरती की अनंत अंगड़ाइयों से
और धरती की आयु के अपक्षय से
तुम किस बात के लिए चौकन्ने हो
इतिहास तो कबका
तुम्हें सूंघता हुआ दबे पांव निकल गया! (तुम लिख नहीं पाते हो प्रेमगीत,पृ. 105)
संग्रह के खण्ड दो, ‘दृश्य-परिदृश्य’, में इसी स्मृतिहीन और हांफते हुए आदमी की यातना-कथा है। कवि वर्तमान पूंजीवादी बाज़ार-युग की शिराओं-धमनियों में उतरता है। ‘शंकर की तीसरी आंख’ से जलती और डूबती हुई धरती की चीत्कारें सुनता है। विषाक्त होती हुई हवा, मुर्दा जल और धुंआते आसमान का मौन सुनता है। कोयला बनते मज़दूर का आखिऱी बयान नोट करता है। बीजों की नींद में मिट्टी का उजेला और पानी का मीठा संगीत भरते किसानों को टुकड़ा-टुकड़ा होकर बिखरते और मरते देखता है। उसके ट्रेक्टर को शहर में साहूकार के दरवाज़े पर, कलपता-बिसुरता पाता है।
ट्रेक्टर भीग रहा है
भरी बरसात में
खड़ा निपट अकेला
साहूकार के दरवज्जे पे शहर में    (शहर में ट्रेक्टर, पृ. 117)
इतना ही नहीं, वह यह भी देखता है कि पवित्र गंगा और क्वांरी नर्मदा अपनी पवित्रता खोकर बोतलों और फ्रिज़़ में बंद हो चुकी हैं। हिमालय एक गिलास में उतर आया है। पवित्र पानी विज्ञापनों में उछल रहा है। घड़े, कुओं और प्याऊ की लोक संस्कृति जाने कहां और किस रेत में बिला गई है। कवि खोई हुई स्मृति और संस्कृति को ढूंढता है। पंचतत्वों का घनत्व मापता है। ब्रह्माण्ड के भौतिक और रासायनिक परिवर्तनों का सूक्ष्म और काव्यात्मक अवलोकन करता है। सृष्टि के रहस्य में जीवन-सत्य ढूंढता हुआ वह विगत और वर्तमान के बीच टूटी हुई मनुष्यता और करुणा के तार जोड़ता है। अपनी अन्वेषण यात्रा में कविता की सुदीर्घ परंपरा और पुरखे कवियों और कलावंतों से जुड़ता चला जाता है। वेदव्यास, जयदेव, कबीर, ग़ालिब, इक़बाल उसकी मन:यात्रा में सहयात्री हो जाते हैं। अपने वरिष्ठ काव्य सहचरों की उर्जस्वित काव्य पंक्तियों के साथ वह रज़ा के चौकोर पेंटिंग में खिलते हुए एक बिन्दु को देखता है। बिन्दु से निकले और बिन्दु में ही समाए जीवन और उसके रूपाकारों को देखता है।
बिन्दु ही देता है इन्हें
शब्द, ध्वनि रंगों का
स्वादों, स्पर्शों का
नित नूतन अनुभव बिम्ब    (अग्निसंभवा, पृ. 59)
इन अनुभव बिम्बों के आलोक में वह बिस्मिल्लाह ख़ां की टेर भी सुनता है; लता मंगेशकर को गुनगुनाता है और आकाश और पृथ्वी के बीच स्वामीनाथन की चिडिय़ा को तीर के मानिंद उड़ती हुई पाता है।
अनुभवों के न जाने कितने तीरों से कवि का हृदय और मस्तिष्क बिंधा हुआ है। दर्द से छटपटाता हुआ वह बार-बार अतीत की भावभूमि में जाता है और शक्तिसंपन्न होकर लौटता है। धनुष की प्रत्यंचा की तरह पीछे की ओर खिंचता है और तीर की तरह वर्तमान को भेदता है,
आकाशमुखी पक्षी की
अनंत गतिमयता में    
(झीनी झीनी बीनी चदरिया, पृ. 67)
कवि एक पल के लिए भी गति को, लय को, सांगीतिक अनुगूंजों को, जो जीवन का लक्षण है, नहीं छोड़ता। वह जीवन को पस्त करने वाली, बेसुरा और बेताला बनानेवाली ताक़तों की पोल जनता की अदालत में खोलता है। बाज़ार के राक्षस पर उसकी तल्ख़ टिप्पणी है,
वह वृक्ष की हरियाली पर नजऱ डालता है
और देखते देखते चिडिय़ों का
चहचहाना रुक जाता है    (उनका क्या हुआ, पृ. 111)
वह चिडिय़ों का, मछलियों का, ज़मीनों का, किसानों का और दाढ़ में फंसी जि़ंदा लाशों का सवाल उठाता है। राजनीति, अर्थनीति और कला के स्वर्णजडि़त सिंहासनों पर आरूढ़ शहंशाहों और सिपहसलारों से पूछता है कि,
उन मरी मछलियों का क्या हुआ
उन शब्दहीन चिडिय़ों का क्या हुआ
और क्या हुआ दाढ़ में फंसी जि़न्दा लाशों का! (उपर्युक्त, पृ. 112)
कवि की प्रश्न पूछती निगाहें बार-बार मुवक्किल को सावधान करती हैं कि वह अपनी आंख, नाक और कान खुला रखे। वरना, वकीलों की जिरह के बीच भरी अदालत में उसकी ज़मीन दूसरों के खाते में चढ़ जायेगी। खेत से उसकी फसल कम्प्यूटर के की-बोर्ड से होती हुई व्यापारी के गोदामों में चली जायेगी। बाज़ार, बैंक और पूंजी की तिकड़ी अंगद का पांव बनकर उसके खेतों में गड़ जायेगी जिसे हटाना तो दूर, हिलाना भी मुश्किल हो जाएगा।
वह जो टांग
अड़ी थी बीच खेत में
कब से दुबका
बैठा था बाज़ार
उसके घुटनों के
कब्ज़ों की चापी में
वहीं से वह
फसलों को सीधे
बैंक के इण्टरनेट में
डाल देता था
और कम्प्यूटर से
उगल देता था
पीला-पीला किसान कार्ड    (खेत के बीच अड़ी टांग, पृ. 113)
आज भारतीय किसान कार्ड, बैंक, मुआवज़े और अदालत की चकरघिन्नी में ही तो घूम रहा है और अपना सब कुछ गंवाकर फांसी पर चढ़ रहा है। कवि दुहाई देता है कि,
मुवक्किल
पहले पत्थर
फिर कोयला
फिर राख बना
चिलम सुलगाने वाली
खींसा की आग
आंखों में उतरी
तो कैसे-कैसे-
शातिर लोगों के काम आई
    दुहाई है - दुहाई है।    
(आग, पृ. 124)
श्याम सुन्दर दुबे की कविताएं पृथ्वी, पानी, आग, हवा और आकाश बचाने के साथ मनुष्यता को भी बचाये रखने की, एक जि़द भरी उम्मीद की, कविताएं हैं।