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Saturday 18 Nov 2017

आसमां कैसे-कैसे

पुनीत कुमार
शिवशक्ति नगर, टी. व्ही टावर रोड
शिवपुरी, जिला शिवपुरी (म. प्र.)
मो. 94254 29428
साहित्य मानवीय भावनाओं मात्र का बहीखाता नहीं होता है, अपितु जीवन की चुनौतियों को समझना और उनसे जूझने का हौसला पैदा करना भी साहित्य का दायित्व होता है। इसी दायित्व बोध के गर्भ से साहित्य का वह तेवर जन्म लेता है, जिसे मुंशी प्रेमचंद के शब्दों में ‘समाज और राजनीति के आगे चलने वाली मशाल’ की संज्ञा बेहिचक दी जा सकती है। जब किसी राष्ट्र का निर्माण हो रहा हो, उस दौर का साहित्य राष्ट्र निर्माण के लिए प्रेरक का काम करता है। भारतीय साहित्य के इतिहास का प्रारंभ आदि कवि के दर्दनाक उच्छवास से स्वीकारे जा सकने में वाद-विवाद की संभावना अवश्य है, परंतु यह स्वाीकारोक्ति अर्थहीन कदापि नहीं है कि साहित्य के इतिहास में सबसे सशक्त अध्याय प्रगतिशील लेखन से जुड़े साहित्य को स्वीकारने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। साक्ष्य स्वरूप उद्भावना प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ का अध्ययन पर्याप्त है। यह पुस्तक पत्रकार, लेखक जाहिद खान द्वारा लिखी गई है।
लेखक ने पुस्तक को तीन अंशों में बांटा है। पहले अंश का शीर्षक-‘उर्दू अदब से’ है। इस भाग में सज्जाद जहीर, कृश्न चंदर, बेदी, ख्वाजा अहमद अब्बास, मंटो, इस्मत चुगताई, फैज, मख्दूम और कैफी आजमी के जीवन और साहित्य को शब्दों की पोशाक पहनाई गई है। दूसरे भाग का शीर्षक-‘हिंदी अदब से’ है। इस भाग में प्रेमचंद, जैनेन्द्र, राही, भीष्म साहनी, कमला प्रसाद, शानी और मनोहर श्याम जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व को प्रस्तुत किया गया है। इसी खंड में राजेन्द्र यादव का लेखक द्वारा लिया गया साक्षात्कार और कमलेश्वर के ऊपर एक समीक्षात्मक आलेख है। यह दोनों अध्याय लेखक की प्रतिभा से बहुत मजबूती से परिचय कराते हैं। लेखक जाहिद खान की प्रासंगिक वैचारिक शैली का परिचय इस प्रश्न से सहज हो जाता है, जब वह मनीषी साहित्यकार राजेन्द्र यादव से पूछते हैं कि ‘स्त्री विमर्श के नाम पर सिर्फ  देह ही देह और दलित विमर्श के नाम पर गाली? यह प्रश्न मठाधीशों का आसन हिलाने में आज भी सक्षम है। राजेन्द्र यादव का प्रत्युत्तर प्रश्न के अनुरूप ही तथाकथित सामाजिक पंडों को विचलित करने वाला होना स्वाभाविक है, जब वह कहते हैं कि ‘‘साहित्य, समाज, संस्कृति और सभ्यता सभी में स्त्री व दलितों को ही निशाने पर रखा गया है और वह भी एक वर्ग विशेष मात्र की वर्चस्ववादी सत्ता के संरक्षण के लिए।’’ (पृष्ठ-122) इसी प्रकार पुस्तक के पृष्ठ 116-119 में नई कहानी की प्रगति और स्थापना में कमलेश्वर के योगदान का भी लेखक ने तथ्यात्मक परिचय प्रस्तुत किया है।
पुस्तक के तीसरे खंड का शीर्षक-‘रंगमंच और फिल्म से’ है। इस अंश में आगा हश्र कश्मीरी, हबीब तनवीर, नेमिचंद जैन, ए. के. हंगल, विजय तेंदुलकर और नाग बोडस इत्यादि नाटककारों के व्यक्तित्व व कृतित्व का मूल्यांकन है। इस अध्याय में एक प्रभावशाली व सामयिक फिल्म ‘गर्म हवा’ की समीक्षा है, तो अमृता प्रीतम के प्रसिद्ध उपन्यास ‘पिंजर’ की समीक्षा भी है। इस पुस्तक में इन कद्दावर व्यक्तियों के विषय में पढ़तेे-पढ़ते यह विश्वास निश्चय ही सशक्त होता जाता है कि आधुनिक भारतीय साहित्य का स्वर्णिम युग प्रगतिशील साहित्य की बुनियाद पर ही टिका है। इस तरक्कीपसंद अदब का कैनवास इतना बड़ा और प्रभावशाली है कि वह भारतवर्ष की दो सबसे महत्वपूर्ण भाषाओं हिंदी व उर्दू में तो समाया ही है, बल्कि रंगमंच और चलचित्र जैसी विधाएं भी स्वयं को तरक्कीपसंद साबित करने से नहीं चूकी हैं। वस्तुत: तरक्कीपसंद अर्थात प्रगतिशील साहित्य का साध्य है मानव और मानवीयता। यह वह साध्य है जिसे भाषा और विधा सीमित नहीं कर सकती है, अपितु इस साध्य को अपनाकर व कालजयी होने की आकांक्षा के अवश्य वशीभूत हो जाती है। पुस्तक के एक अध्याय में कथाकार कमलेश्वर का कथन है, ‘‘कहानी (अर्थात साहित्य) जनतांत्रिक मूल्यों की ऐसी साझी विरासत है, जो मानव समाज को आपस में बांधकर रखने में मददगार सिद्ध हो सकती है। क्योंकि सारी पुरातन सभ्यताओं की लोक चेतना लगभग समान या सहअस्तित्ववादी है।’’ (पृष्ठ-119) इसे पढऩे के बाद साहित्य के साध्य को लेकर किस बिंदु पर विवाद की गुंजाइश बचती है। यही कालजयी चिंतन प्रगतिशील लेखन का मेरुदंड है, लेखक ने जिसका संतुलित व सामयिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
प्रगतिशील साहित्य का सशक्त परिचय कराने वाली लेखक जाहिद खान की इस पुस्तक का अध्ययन करते समय इन कद्दावर व्यक्तियों के प्रसंग में बरबस एक शेर की अंतिम पंक्ति कुछ बदलाव के साथ याद रहती है कि, ‘‘यही बात तो है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।’’ आज के दौर में जब व्हाट्सएप, फेसबुक और ट्विटर जैसी नूतन प्रवृतियों ने लेखन और उससे अधिक अध्ययन को सांसत में डाल रखा है, अवश्य ही ऐसे लेखन का स्वागत होना चाहिए। पुस्तक के अध्ययन के समय बरबस यह संदेह उत्पन्न होता है कि आज की युवा होती पीढ़ी साहित्य का अर्थ कहीं व्हाट्सएप, फेसबुक व ट्विटर को ही स्वीकार कर लेने की त्रुटि तो नहीं करने जा रही है। इसी बिंदु पर एक कटु यथार्थ यह भी स्मरित होता है कि आज साहित्य का जो रूप प्रचारित हो रहा है, उस में राजिंदर सिंह बेदी, कृश्न चंदर, ख्वाजा अहमद अब्बास, इस्मत चुगताई, शानी, आगा हश्र कश्मीरी, नेमिचंद जैन और नाग बोडस जैसे साहित्य के दिग्गजों से वर्तमान युवा पीढ़ी निश्चित ही अपरिचित होने की सीमा तक दूर है। यह इन व्यक्तित्वों का नहीं, समावेशी भारतीय संस्कृति का दुर्भाग्य है। इस दुर्भाग्य को द्रवित करने का कार्य जाहिद खान की यह प्रस्तुति बहुत मजबूती से करती है।
‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ अंतिम पृष्ठ तक अपनी रोचकता बनाए रखती है। इस पुस्तक की यह विशेषता भी प्रशंसनीय है कि प्रत्येक अध्याय अनावश्यक विस्तार से अछूता है। प्रू्फ संबंधी त्रुटियां अवश्य असहज बनाती हैं। परंतु शब्दों का चयन विषयवस्तु के अनुरूप है। एक नजर में ऐसा लगता है कि उर्दू भाषा के शब्द अधिक हैं, परंतु विषयवस्तु की पृष्ठभूमि में उनका प्रयोग उचित ही है। कदाचित इसलिए पूरी पुस्तक की प्रस्तुति में एक मंथर प्रवाह है। उदाहरणार्थ-‘‘समय की रेत पर वह सब कुछ साफ-साफ  देख रहे थे। उन्होंने अपने खतों से पाकिस्तानी हुक्मरानों को हर मुमकिन आगाह भी किया। ....आज पाकिस्तान का जो हश्र है, मंटो उसे बहुत पहले जान चुके थे।’’ (पृष्ठ-47) लेखक जाहिद खान ने अपनी इस प्रस्तुति के माध्यम से युवा पीढ़ी को आमंत्रित किया है कि वे पुस्तक के माध्यम से भारतवर्ष की समावेशी संस्कृति और अशोक-अकबर की गंगा-जमुनी सभ्यता को कंठस्थ कर सकते हैं। पुस्तक का प्रत्येक भीमकाय व्यक्तित्व स्वयं भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि है और मानवता का पहरूआ है। पुस्तक के अध्ययन के दौरान पृष्ठ-दर-पृष्ठ यह गौरवपूर्ण अनुभूति बनी रहती है कि हम उस राष्ट्र के वासी हैं, जहां साहित्य की वह गंगा-जमुनी धारा प्रवाहित होती रही है, जिसने मानवीयता से प्रत्येक पल अपनी आत्मीयता को सशक्त किया है। पुस्तक की अंतिम पंक्तियां पढऩे के पश्चात् एक दु:खद अनुभूति इन शब्दों में निकलती है-‘‘हुए नामवर बे निशां कैसे-कैसे, ये जमीं खा गई आसमां कैसे-कैसे।’’