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Thursday 23 Nov 2017

व्यंग्य में औदात्य का प्रतिमान : यह व्यंग्य कौ पंथ

डॉ. चितंरजन कर
पूर्व प्रोफेसर, साहित्य एवं
भाषा-अध्ययनशाला
पं. रविशंकर शुक्ल
 विश्वविद्यालय, रायपुर
यहां ‘व्यंग्य में औदात्य’ से तात्पर्य है- शिल्पगत आभिजात्य, भाषागत सारल्य एवं शैलीगत सौष्ठव। शिल्पगत आभिजात्य में शिष्टता (अग्राम्यत्व), भाषागत सारल्य में सहजता और शैलीगत सौष्ठव में रोचकता आदि विशेषताएं स्वभावत: समाविष्ट हैं। विषयवस्तु की भव्यता का समावेश यहां जानबूझकर नहीं किया गया है, क्योंकि व्यंग्य में जीवन के सच की ही अभिव्यक्ति होती है। खगेन्द्र ठाकुर जब कहते हैं कि सच सबसे बड़ा व्यंग्य है, तब उनका अभिप्राय संभवत: व्यंग्य की विषयवस्तु से है। दरअसल सच ‘व्यंग्य’ बाद में बनता है; पहले वह मूलत: ‘व्यंग’ (वि+अंग = विद्रूप, असंगत) होता है, जो कड़वा होता है। साहित्य की एक विधा होने के कारण व्यंग्य सच की इसी विद्रूपता, विसंगति के विरोध में खड़ा  होता है, तभी लालित्य की सृष्टि होती है। जीवन के सच को ज्यों-का-त्यों रख देना अनेक खतरों को आमंत्रित करना है, जिसे सूर्यबाला भली-भांति जानती हैं : ‘‘व्यंग्य के बेकाबू होने के $खतरे बहुत होते हैं। अन्य विधाओं का शिल्प ज्यादा से ज्यादा आरोपित, सायास, या सपाट लग सकता है; जबकि व्यंग्य •ारा-सी असावधानी से फूहड़ और अशिष्ट तक हो सकता है, जो मेरी प्रकृति के विरुद्ध है।’’ (दस)
‘व्यंग्य’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘व्यंजना’ शब्द-शक्ति से मानी जाती है। भारतीय काव्य शास्त्रीय चिंतन व्यंजना-गर्भित काव्य को श्रेष्ठ मानता रहा है, जो काव्य की किसी भी विधा उपन्यास/निबंध/नाटक/आत्मकथा/जीवनी/संस्मरण/डायरी, आदि) में संभव है, जहां व्यंजना यत्र-तत्र आकर काव्य को गरिमामंडित करती है, परंतु विधा के रूप में व्यंग्य में आद्यंत अभिधा, लक्षणा, और व्यंजना ही नहीं, तात्पर्य-शक्ति (अभिनव गुप्त द्वारा प्रतिपादित) भी साथ-साथ चलती है। ‘व्यंग्य’ में ‘ध्वनि’ के साथ-साथ ‘प्रतिध्वनि’ (विपरीत ध्वनि) भी होती है। (जिसे सूर्यबाला ने यत्र-तत्र कोष्ठकों में व्यक्त किया है)। ‘आत्मकथ्य’ में वे लिखती हैं : ‘‘व्यंग्य में तो हर शब्द को नट की तरह तनी हुई रस्सी पर कलामंडियां खानी होती है, करतब दिखाने होते हैं। शब्द को अपना पूरा कायाकल्प कर एक ध्वनि, एक इमेज, एक मसला और एक मुकम्मल प्रतिरोध में बदलना होता है। सीधे-सीधे ‘अभिधा’ की रस्म-अदायगी यहां चलती ही नहीं। जो कुछ कहना है, उसके लिए शब्द-शक्तियों को ही सिर्फ़ शब्दवेधी बाण अर्थात ‘व्यंजना’ के ही उपयोग की छूट। व्यंजना की यही तराश शब्दों को उलट-पुलट कर रचना और विचार के अनुकूल बनाती है, क्योंकि उद्रेक करुणा का हो या अवसाद का, तीक्ष्णता विसंगति की हो या विद्रूप की; पेश उसे चटपटा, जायकेदार, और स्वास्थ्यवर्धक बनाकर ही करना है।’’ (आठ-नौ)
व्यंग्यकार कबीर की तरह नीर-क्षीर-विवेक से काम लेता है और वक्त पड़े, तो ‘मुझ-सा बुरा न कोय’ तक कहने की हिम्मत रखता है। अपनी पुस्तक यह व्यंग्य कौ पंथ को सूर्यबाला ने अपने पति को समर्पित करते हुए लिखा है :
‘पति को ...
जिन्हें देने के लिए
व्यंग्य रचनाओं से बेहतर
और क्या हो सकता है?’
साहित्य यदि समाज का दर्पण है, तो साहित्यकार समाज की वाणी। यह कथन व्यंग्य पर सबसे खरा उतरता है, क्योंकि वह समाज, जीवन के सच को ही अपना आधार बनाता है। जिसे खुलकर कहा न जा सके, उसे कलात्मकता के साथ कहने की चेष्टा अनेक रचना-सोपानों को पार करती है और मुक्तिबोध के ‘तीसरे क्षण’ को याद दिलाती है। समाज, साहित्य, शिक्षा, राजनीति, प्रशासन, धर्म, आदि पर पहले भी अनेक शीर्षस्थ व्यंग्यकारों ने अपनी-अपनी कलम चलाई है। सूर्यबाला ने अपनी पुस्तक में जिन व्यंग्य-रचनाओं को संगृहीत किया है, उनमें आद्यंत औदात्य का निर्वहण करके अपनी स्वयं की राह बनाई है- न कहीं पुनरावृत्ति, न कहीं अनुकृति। ज्ञान चतुर्वेदी ने ठीक ही लिखा है :
‘‘सूर्यबाला व्यंग्य के किसी स्थापित पैटर्न को दुहरातीं नहीं। स्थापित पैटर्न से हमारा तात्पर्य यहां परसाई, शरद जोशी, त्यागी तथा श्रीलाल शुक्ल जी की तरह का लिखना या लिखने की कोशिश करना है। सूर्यबाला का व्यंग्य उनका अपना है और इस कदर अपना है कि उस पर इन महान पूर्वजों की शैली या कहन की छाया भी नहीं है। वे अपना कद तथा अपनी छाया स्वयं बनाती है, जो उनके व्यंग्य को अपने पाठक से सीधे जोड़ देता है।’’
व्यंग्य कौ पंथ में कुल 37 व्यंग्य रचनाएँ हैं, जिन्हें विषय-वस्तु की दृष्टि से उत्तराधार-क्रम में इस प्रकार रखा जा सकता है- साहित्य (हिन्दी)-15, राजनीति- 09, आम आदमी- 05, फिल्म - 03, हिन्दी भाषा और धर्म दर्शन- 02,02 तथा शिक्षा 01, जिनमें प्रसंगानुसार साहित्य और राजनीति की छवि अवसर पाकर झलकती देखी जा सकती है। ठीक भी है; साहित्य और राजनीति कहां नहीं है! दो विपरीत ध्रुवों की तरह! साहित्य जोड़ता है, तो राजनीति तोड़ती है। इस भेद को सूर्यबाला ने अनेकश: रेखांकित किया है। ‘ सिफर हो गई राजनीति और सूत उवाच’ में राजनेताओं पर व्यंग्य द्रष्टव्य है:
‘‘ये आत्माएँ महाप्रतापी, महाबलशाली, इंद्रजाली और भयंकर उथल-पुथल मचाने वाली हैं। ये नाना दल, पार्टी, पक्ष, पंथ, कमीशन, कमेटी के रूप मेंं नाना देंगे, फसाद, नाना बंद, नाना हड़ताल, नाना हड़ताल, नाना उठा-पटक करती निद्र्वंद्व विचरण करती हैं। झुग्गी-झोंपड़ी से लेकर मंदिर-मस्जिद, गिरजे-गुरुद्वारे तक सब जगह इन्हीं आत्माओं का डंका बज रहा है। इन्हीं का प्रसाद-भोग, इन्हीं का घंटा-घडिय़ाल।’’ (41)
राजनेताओं के पाखंड का पर्दाफाश करती हुई सूर्यबाला लिखती हैं:  ‘‘खुदकुशी और आत्मदाह जनता-टाइप गऱीब-गुरबों में से कोई करता है। उसके लिए रेलगाड़ी की पटरी, नकली दवाओं के लाइसेंस, डिग्रियों का घुन खाता पुलिंदा और पापी पेट आदि स्थितियाँ तथा सुविधाएँ हर कहीं उपलब्ध होती हैं। लेकिन देश पर बड़े-बड़े लोग मर-मिटा करते हैं। ...मैनिफेस्टो बनाने होते हैं, उसमें मर-मिटने की प्रक्रिया दर्ज करनी होती है।’’ (131)
धर्म-कर्म में भी राजनीति की जबरदस्त घुसपैठ भला व्यंग्यकार की पैनी नजऱ से कैसे बच सकती है! देखिए:
‘‘... इन्होंने पहले धर्म को झंडे में परिवर्तित किया, फिर उस झंडे को डंडे में।... कालांतर में इसी डंडे ने गोली, दुनाली बंदूक, स्टेनगन और कट्टे, कृपाणादि नाना रूप धारण किए तथा अपने प्रताप से बग़ैर अपने पराए का भेदभाव किए नाना रामभक्तों को सही मायने में राम के पास तथा, खुदा के बंदों को खुदा का प्यारा बना दिया।’’(41)
राजनीति में कुर्सी-दौड़ किस कदर होती है, किसी से छिपी नहीं है। व्यंग्यकार के अंदाज़ में:
‘‘मुख्यमंत्री की कुरसी न हुई, मधुमक्खियों का छत्ता हो गई। फर्क़ है तो सिफऱ् इतना कि मधुमक्खियाँ शहद बनाती हैं, भरती हैं छत्ते में और ये प्रत्याशी मात्र निचोड़ते हैं।’’
राजधर्म किसी समय सबसे बड़ा धर्म माना जाता था, पर आज वह जोड़-तोड़ करने वाला मात्र रह गया है:
‘‘न जोडऩे वाले, न तोडऩे वाले; हमें तो जोड़-तोड़ बिठाने वाले अध्यक्ष की आवश्यकता होगी। ही-ही-ही।’’ (117)
हर बड़ा साहित्यकार आम आदमी के पक्ष में होता है। भारत में आम आदमी की स्थिति कैसी है, व्यंग्यकार की दृष्टि में ‘धोबी के कुत्ते’ से बेहतर नहीं है:
‘‘धोबी के कुत्ते की विशेषता यह होती है कि वह न घर का होता है, न घाट का। स्थिति काफी कुछ आज के औसत आदमी से मिलती-जुलती है।’’ (60)
इसके विपरीत, आधुनिक समाज में सभ्यता, संस्कृति, और संपन्नता का मापदंड बिलकुल अलग है:
‘‘जिस कॉलोनी में जितने ज़्यादा सभ्य, सुसंस्कृत, और संपन्न लोग रहते हैं, उसमें कुत्तों की संख्या भी उतनी ही ज्यादा होगी:
आदमी जब तक आदमी रहता है, तब तक वह अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ होता है; अन्यथा उसकी क्या-क्या कोटियाँ और स्थितियाँ हो  सकती हैं, कहने में  संकोच होता है। अवसरवादिता बहुत ख़तरनाक होती है। व्यंग्य देखिए:
‘‘यूँ आदमी की देखादेखी इधर जूतों में भी अवसरवादिता बढ़ी है। मंदिरों तथा अन्य धार्मिक, सामाजिक स्थलों के बाहर इक_े जूते टोह ले रहे हैं...’’(141) ‘‘अरे साँप तो बस साँप होते हैं, लेकिन आदमी आस्तीन का साँप है (जो साँप से ज़्यादा भयावह होता है)।’’ (31)
वैसे युगीन परिस्थितियाँ भी आदमी की कम परीक्षा नहीं लेतीं! ‘‘...आज आदमी  से ज़्यादा जूता, संवेदना से ज़्यादा सनसनी बिकती है, सूचना-क्रांति के बाज़ार में इसलिए जूतागीरी का कारोबार दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की पर है।’’(141)
प्रेम से ही श्रद्धा और श्रद्धा से ही भक्ति संभव है, जो भावनात्मक होने के कारण सूक्ष्म हैं, परंतु आजकल स्थिति बदल गई है:
‘‘मंदिरों में आपसी प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ गई है कि जिन लोगों में थोड़ी-बहुत श्रद्धा-भक्ति बची भी है, वे उन्हीं मंदिरों में जाना पसंद करते हैं, जिनकी पब्लिसिटी बढ़-चढक़र कराई जाती है। ज़्यादा प्रचारित मंदिरों में चढ़ावा और नकदी भी, ज़ाहिर है, ज़्यादा पहुंचता है- और जहां नक़दी चढ़ावा ज़्यादा अर्पण किए जाएँगे, माहात्म्य-महिमा भी वहीं की गाई जाएगी न।’’ (137)
‘साहित्य’ शब्द की व्युत्पत्ति दो प्रकार से की जाती है- आम तौर पर ‘हित से युक्त होने का भाव’ साहित्य है और खास तौर पर ‘शब्द-अर्थ में सांमजस्य’ ही साहित्य है, जिसकी परिधि बहुत व्यापक है, अत: उसमें समूचा ब्रह्मांड आ जाता है तथा जिसमें वाद-विवाद, पुरुष-स्त्री, सजीव-निर्जीव सारे भेद तिरोहित हो जाते हैं। सच पूछा जाए, तो साहित्य ने ही मनुष्य को मनुष्य बनाया है, परंतु आज साहित्य की क्या स्थिति है, व्यंग्य उसे उजागर करने से नहीं चूकता। मसलन,
‘‘ पुस्तकें पढऩे के लिए नहीं, बल्कि लोकार्पित करवाने के लिए लिखी जा रही हैं।’’ (34) सेमिनार-संगोष्ठियों में ‘‘ हमारी दिलचस्पी वादों, विवादों, चर्चाओं और रचनात्मक धकापेलों में ज़्यादा होती है।’’(47) स्त्री-विमर्श अथवा दलित-विमर्श के रुप में मानो एक फैशन-सा चल पड़ा है विमर्शों का! ‘‘लाइब्रेरियों में हो जाता है स्त्री-विमर्श, व्याख्यान-वक्तव्यों में भी।’’ (113)
हम जिस युग में जी रहे हैं, वह उत्तर-आधुनिक युग कहलाता है और उसका साहित्य आधुनिक साहित्य आज जहाँ भी है, वहाँ उसे पहुंचाने का श्रेय उन साहित्य प्रेमियों, सेवियों, जिज्ञासुओं, और आराधकों को जाता है, जिनके पास कारें और ड्राइवर हैं। जिस शहर में जितनी ज़्यादा नई मॉडल की कारें होती हैं, वहाँ उतनी अधिक मात्रा में उत्तर-आधुनिक साहित्य पहुँचेगा।... इसीलिए आजकल साहित्य में नाम कमाने की कामना वाले उदीयमान पहले कार खरीदते हैं, बाद में कलम।... जो बड़ा साहित्यकार होता है, वह बड़ा अफसर हो न हो, लेकिन जो बड़ा अफ़सर होता है, वह या उसकी पत्नी दोनों ही उच्च कोटि के साहित्यकार होते ही हैं।’’ (49)
साहित्य अनवरत साधना है, परंतु आजकल हिन्दी साहित्य में पचास और साठ की उम्र वाले लेखकों की स्थिति अत्यंत दयनीय है।
एक ओर साहित्यकार ‘‘पचास का होकर भी हिन्दी साहित्य में पचास का नहीं हो पाता’’ (27), तो दूसरी ओर ‘‘साठ का हुआ रचनाकार अचानक विनम्र हो जाता है। बोलना-चालना भी काफ़ी कम कर देता है।... जिस तरह विदेहराज जनक देह होने पर भी ‘देहभाव’ छोड़ चुके थे, उसी प्रकार साठ का हुआ लेखक, लेखक होते हुए भी लिखना-पढऩा लगभग छोड़ चुका होता है। उसे पढऩे-लिखने की ज़रुरत भी नहीं होती। कारण, वह किसी भी विषय अथवा पुस्तक पर कुछ भी बोल सकता है, बिना जाने कि विषय क्या है और बिना पढ़े कि पुस्तक कौन-सी है। साप्ताहिक भविष्यफल की तरह उसके द्वारा कहीं गई हर बात हर विषय, हर पुस्तक, और हर अवसर पर सटीक बैठती है।’’ (33-34)
अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों में भाग लेना हमारे देश के तथाकथित हिंदी-साहित्य-प्रेमियों के लिए मानो बहुत बड़ी उपलब्धि है। सूर्यबाला इस पर अपनी शैली में व्यंग्य करते हुए लिखती हैं:
‘‘वैसे भी हिंदी-लेखक आजकल साहित्य में बाद में पैदा होते हैं, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों पहले हो आते हैं। पिछले दिनों कई लेखकों के नामकरण-संस्कार अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में ही सम्पन्न हुए।... ये विदेश हिंदी-लेखकों के लिए काबा-कैलाश हैं, मक्का-मदीना हैं, चारों धाम हैं।’’ (145)
हिन्दी लेखकों की महत्वाकांक्षा अपनी किसी पुस्तक का पॉकेट-संस्करण (22) अथवा अपनी किसी कृति के पात्रों को चलचित्र के माध्यम से जीवंत रूप में देखने (75) की भी होती है, भले ही किसी उपन्यास का प्लॉट बेच लेने पर एक औसत दरजे का रहने लायक प्लॉट भी खरीदा न जा सके (76) अथवा भले ही उसका दृश्यांकन हास्यास्पद (78) हो जाए! और रही बात चोटी पर पहुँचने की, तो’’ सही-सही वजह पूछिए तो पहाड़ों पर अब शरीफों के जाने लायक जगह बची ही कहाँ है? वहाँ या तो हनीमूनी जोड़े जाते हैं, या फिर ऊँट!’’ (91)
जो हाल हिंदी साहित्य का है, लगभग वही हाल हिंदी भाषा का भी है। व्यंग्यकार ने हिंदी भाषा की मौजूदा स्थिति की पड़ताल करते हुए लिखा है:
‘‘चूँकि यह भाषा समूचे हिंदुस्तान की गरिमा की प्रतीक थी, इसलिए इसे वातानुकूलित ऑफिसों की एयरटाइट फ़ाइलों में बंद करके रखा जाता था।... हिंदीतर भाषी कम अँग्रेजी बोलते थे, जो हिंदीभाषी (पैदाइशी) थे, वे ज़्यादा।’’ (81) ‘‘ विश्व हिंदी सम्मेलनों के मार्फत हिंदी हिंदुस्तान को छोडक़र कहाँ-कहाँ नहीं तलाशी जाती!’’ (99)  ‘‘लेखक, कलाकार, नेता, अभिनेता में से कोई टेलीविजऩ पर हुआ, तो अपने साक्षात्कारों के दौरान सिर्फ अपनी रुट्स और ट्रेडिशंस की बातें करेगा, इंडियन वैल्यूज़ की बोली लगाएगा। ज़्यादा अँग्रेज़ी और बहुत कम हिंदी बोलेगा।’’ (101)
यह व्यंग्य कौ पंथ में संग्रहीत रचनाओं का कलेवर निबंध का है, जिसमें आवश्यकतानुसार कथात्मकता, संवादात्मकता, संस्मरणात्मकता, आदि विशेषताएँ रोचकता लाती हैं और बोलचाल की प्रवाहमयी भाषा के कारण पाठक सीधे रचना से जुड़ जाता है। प्राय: छोटे आकार की व्यंग्य रचनाएँ हैं, जिन्हें एक ही मूड में आसानी से पढ़ा जा सकता है। संदर्भानुसार नरपति नाल्ह, कबीर, मलूकदास, सूरदास, तुलसीदास, रहीम, ग़ालिब, मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, हरिवंशराय बच्चन, रवीन्द्रनाथ त्यागी, शरद जोशी, ज्ञान चतुर्वेदी, विष्णु नागर, यशवंत व्यास, गिरीश पंकज, आदि की कृतियों/पंक्तियों का स्मरण करना रचनाकार की शिष्टता तो है ही, कृतज्ञता भी है, जो साहित्य में अंतरपाठीयता की शैली की पुष्टि है। इसी प्रकार, गीतोपदेश तथा फिल्मी गीतों की पंक्तियों / पैरोडियों के समावेश से व्यंग्य मेें हास्य की सृष्टि का उपक्रम प्रतीत होता है। वैसे यत्र-तत्र हास्य व्यंजित हुआ है, जो अनायास ही गुदगुदा जाता है। एक दृष्टांत:
‘‘सचमुच पुरस्कार मेले के आयोजन के लिए आयोजकों को कुछ करना ही नहीं पड़ा। न कोई औपचारिक घोषणा, न प्रचार या विज्ञप्ति ही।... बस, जगजीत सिंह और चित्रा सिंह की गाई गज़ल की तरह बात निकली और बात की बात में दू....र तलक जाती गई। आनन-फानन में नगरों-महानगरों से लेकर दूर-दूराज के गाँवों-कस्बों तक से जत्थे-के-जत्थे लेखक पधारने लगे। देखते-देखते आयोजन-स्थल विभिन्न कोटि, वर्ण-वर्ग और विधा के लेखकों से खचाखच भर गया। हर्ष-विह्वल उत्साह में पगे ये लेखक एक के बाद एक स्टॉलों पर जाते और पुरस्कारों के बारे में आवश्यक जानकारी हासिल करते प्रशस्ति-पत्रों की क्वालिटी, श्रीफ़लों की साइज और स्मृति-चिह्नों की डिज़ाइन जाँचते-परखते, शॉल की गरमाहट महसूस करते। कुछ लेखक तो इतने भावुक हो जाते कि स्मृति-चिह्नों को छूते ही रोमांचित हो रो पड़ते। हर्षातिरेक से अपना-आपा बिसर गए ये लेखक स्टॉक पर मोलभाव तक करना भूल जाते और मुँहमाँगा कमीशन देने के लिए राजी हो जाते। कोई-कोई उदारमना तो ख़ाली लिफाफे पर ही तैयार हो जाता; बस, लिफाफे पर सम्मानजनक राशि के अंक लिख देना उसके लिए काफी होतां। हाँ, कुछ एक आने-जाने का रिक्शा-भाड़ा अवश्य पुरस्कार-राशि से माफ़  करवाते देखे गए।’’ (20)
बात व्यंग्य की चले और हमारे भारत के शिक्षक और शिक्षा छूट जाएँ, यह कैसे संभव है? मलूकदास जी की दूरदर्शिता की दाद देती सूर्यबाला बताती हैं कि किस प्रकार ‘‘अजगर करै न चाकरी...’’ वाला दोहा दशकों से बिना गूढ़ार्थ समझे-समझाए बदस्तूर पढ़ाया और जांचा जा रहा है। हिंदी-फिल्मों में वृद्ध पिता की भूमिका कितनी गौण हो गई है, इसे व्यंग्यकार ने आत्मकथा-शैली में प्रकारांतर से आज यथार्थ जीवन में पिताओं की स्थिति का मार्मिक संकेत दिया है- विलेन की स्थिति की तो बात ही जाने दीजिए!
समग्रत: यह व्यंग्य कौ पंथ सूर्यबाला के व्यंग्यकार की सशक्त छवि ही नहीं, हिंदी-व्यंग्य साहित्य में औदात्य की सम्यक् प्रतिष्ठा भी है। वैसे किसी भी रचनाकार की सारी रचनाएँ उच्चस्तरीय या समस्तरीय कदाचित् ही होती हों- कितनी भी ‘एडिटिंग’ क्यों न कर ली जाए! हिमालय की सभी चोटियाँ भी ‘एवरेस्ट’ कहाँ हुआ करती हैं!