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Tuesday 21 Nov 2017

समकालीन दोहा-काव्य में राजनीति: एक अध्ययन


डॉ. मनीषा शंखधार
टंडन लेन, सिविल लाइन,
बदायूँ- 243601
मो. 09219706749
भारतीय साहित्य में प्राचीन काल से ही राजनीति का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। समकालीन कवियों की काव्य धारा में भी राजनीतिक चेतना मानवीय स्थितियों के साथ जुडक़र गहरी और संवेदित हुई है। आज राजनीति मानव जीवन को भीषण चक्रवात की तरह घेरे हुई है। जीवन का प्रत्येक पहलू राजनीति से प्रभावित है। समकालीन रचनाधर्मिता के लिए राजनीति को अनिवार्य माना गया है। समकालीन कवियों ने अभिव्यक्ति के खतरे उठाते हुए व्यवस्था विरोध में काव्य सृजन किया। उनके सामने राजनीति से जुड़े अनेकानेक प्रश्न हैं, जिनका समाधान करने को वे तत्पर हैं। ‘‘वस्तुत: समकालीन कविता प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता, व्यवस्था, राजनीतिक बिखराव, प्रदर्शन के संकेत उल्लेख से युगबोध की पहचान कराती है। राजनीतिक मूल्य विघटन से कवि नये मूल्यों के संचार के लिए विकल है- यही विकलता उसके कवि कर्म को गहन धरातल प्रदान करती है।’’1
आज कवि राजनीति को कविता के लिए अनिवार्य समझते हैं क्योंकि कवि भी सामाजिक बुद्धिजीवी प्राणी है वर्तमान राजनीति में जो घटित हो रहा है उसे वह परख कर ही अपनी कविता में विभिन्न भावों तथा शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त कर रहा है। आज जब राजनीति समाज पर पूरी तरह हावी हो गई है तो उसका प्रभाव साहित्य की प्रत्येक विधा पर भी पड़ रहा है। समकालीन दोहा-काव्य में भी राजनीतिक विचार व्यापक रूप से विद्यमान हैं। ‘‘वास्तव में, राजनीति सम्पूर्ण जीवन पर हावी हो गई और उसका दबाव इतना आक्रामक और तीव्र होता गया कि उससे बच निकलना वयस्क कविता के लिए मुमकिन नहीं रह गया।’’2
‘‘आज इस कथन से कोई इन्कार नहीं करेगा कि मानव-नियति अपने को राजनीति की शब्दावली में प्रकट करती है।’’3
समकालीन राजनीति का जीवन्त साक्षात्कार आज के दोहा-काव्य में होता है। शासन तन्त्र एवं राजनीतिज्ञों की वास्तविकता को उजागर करने में समकालीन दोहाकार बहुत सक्रिय हैं। इन दोहाकारों की राजनीति को किसी दलीय पक्षधरता से संबद्ध नहीं किया जा सकता है। दोहाकारों ने अपने दोहों को राजनीतिक हथियार बनाने के स्थान पर उसेे प्रासंगिक बनाने का प्रयास किया है। यह कहना बहुत उचित है कि समकालीन दोहाकारों की राजनीतिक समझ सजग सद्नागरिक की भाँति अपना मन्तव्य दे रही है।
आज दोहाकारों के सम्मुख राजनीति से जुड़े अनेक प्रश्न हैं। राजनीति में व्याप्त विसंगतियों के प्रति वे चिन्तित हैं। इन राजनीतिक विसंगतियों के लिए उत्तरदायी कौन है? व्यवस्था इसके लिए जनता को उत्तरदायी मानती है और जनता इसके लिए व्यवस्था एवं राजनीतिज्ञों को दोषी मानती है।  दोहाकार तटस्थता से संपूर्ण स्थिति का आकलन करता है। वह राजनीतिज्ञों की स्वार्थपरक नीतियों, भ्रष्टाचार, अवसरवादिता, अन्याय और अत्याचारपूर्ण हिंसक कृत्यों को निर्भीकता से उजागर करता है और उन पर तीक्ष्ण कटाक्ष करता है। दोहा-काव्य में व्यवस्था की अमानवीय  नीतियों का विरोध एवं उनके प्रति क्षोभ है। मूलत: दोहा-काव्य राजनीतिक विसंगतियों को अनावृत्त करता है एवं आम आदमी को इस स्थिति के प्रति सजग बनाने का प्रयास करता है।
सत्ताधारियों ने राजनीति की नैतिकता पर कालिख पोतकर रख दी है। समकालीन दोहाकारों ने भारतीय राजनीतिज्ञों की कुत्सित, स्वार्थपूर्ण मानसिकता को देश की जनता के समक्ष बड़े ही सशक्त रूप में प्रस्तुत किया है कि नेतागण अपनी स्वार्थसिद्धि में इतने अधिक अन्धे हो गये हैं कि उन्हें देश व जनता से कोई सरोकार नहीं है चाहे वे रसातल में चले जाएं। उन्हें देशभक्ति तथा मानवता से कोई मतलब नहीं रह गया है केवल स्वार्थसिद्धि ही उनका उददेश्य है यथा-
शिव कुमार ‘पराग’-
‘‘नेता निर्वाचित  हुए जनता के सेवार्थ।
लेकिन आड़े आ गये, उनके ओछे स्वार्थ।।’’ 4
निरंकुुशता समकालीन राजनीति का एक प्रकार से शस्त्र बन गई है। आज नेता सत्ता की आड़ में अनेकानेक षडय़न्त्र करते रहते हैं। वे  यह जानते हैं कि उन्हें रोकने वाला कोई नहीं है। इसी कारण उनकी निरंकुश चालें विस्तृत होती जा रही हैं। वे हिंसक हो गये हैं और ऐसा प्रतीत होने लगा है कि देश में गुण्डाराज चल रहा है। समकालीन दोहाकार राजनीति की इस विसंगति के सन्दर्भ में अपनी पीड़ा उजागर करते हैं यथा-गोपाल दास ‘नीरज’-‘‘राजनीति खुलकर करे,नित ऐसे षडय़ंत्र।
लोकतंत्र है बन गया, एक माफिया तन्त्र।।’’ 5
समकालीन परिवेश में यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि अब राजनीति में अनुशासन नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। संसद और राज्यों की विधान सभाओं में भी अनुशासन के दर्शन नहीं होते हैं। एक-दूसरे को अपशब्दों की बौछार, जूतम-पैजार, शोर-शराबा ही समय-समय पर होता रहता है। देश की संसद की कार्यवाही समस्त देश दूरदर्शन पर देखता है और सांसदों की अनुशासनहीनता देखकर देश की जनता लज्जित होती है किन्तु राजनीतिज्ञों को तनिक भी लज्जा नहीं होती है। समकालीन दोहाकारों ने इस विसंगति पर व्यंग्यात्मक कटाक्ष किये हैं, एक दोहा द्रष्टव्य है-
सुभाष वर्मा-    ‘‘संसद के भीतर चले,जूते घूंसे लात।
आखिर दिखला ही गये, वो अपनी औकात।।’’ 6
राजनीतिज्ञों ने अपने विभिन्न स्वार्थों की पूर्ति हेतु अहिंसा की भावना को तिलांजलि दे दी है और उन्होंने देश की जनता में वैमनस्य को जन्म दिया। जब से राज्यों की विधानसभाओं और संसद में अपराधी नेता चुन कर आये हैं तब से देश के शहरों, कस्बों, गाँवों तथा गली-मोहल्लों में प्राय: प्रतिदिन हिंसा, लूट, और हत्याओं के समाचार सुनने को मिलते रहते हैं और इसका मुख्य कारण देश के स्वार्थी, अपराधी, अनुशासनहीन, दम्भी, लालची नेताओं की ओछी मानसिकता और हिंसात्मक राजनीति ही है। दोहाकारों ने राजनीति की इस विसंगति पर अपने दोहों के माध्यम से गहरी चोट की है तथा अपनी पीड़ा को जनता के सम्मुख सशक्त रूप में रखा है एवं नेताओं का असली रूप देशवासियों के सम्मुख रखा है यथा-डॉ. उर्मिलेश-
‘‘दंगे, कफ्र्यू, लाठियाँ, दहशत, तंगी, लूट।
वही सफल सरकार है, दे जो उनकी छूट।।’’ 7
दोहाकारों ने दोहों में अपनी पीड़ा स्पष्टता से व्यक्त की है कि राजनेता देश के कोने-कोने में दंगा-फसाद, बलवे और एक दूसरे में फूट डालकर घृणित राजनीति कर रहे हैं एवं देश को नफरत की आग में धकेल रहे हैं, यथा-डॉ. महेश ‘दिवाकर’-
‘‘भभक रही है देश में राजनीति की आग।
नित प्रतिदिन जलते जा रहे, सत्य अहिंसा, राग।।’’ 8
दिनेश शुक्ल-  ‘‘यहाँ सियासत के रहे, न्यारे अपने खेल।
हर मन में बोती रही, इक नफरत की बेल।।’’ 9
दोहाकारों ने राजनीति में बढ़ती हुई अदूरदर्शिता, भ्रष्टाचार, दुराचार, जातिवाद, क्षेत्रवाद और सम्प्रदायवाद पर भी अपनी प्रखर लेखनी चलायी है। राजनीतिज्ञ धर्म, संस्कृति, भाषा, राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता से किस प्रकार खिलवाड़ कर रहे हैं दोहाकारों ने निर्भीकता से उजागर किया है। वे इस बात से भी चिन्तित हैं कि भारतीय राजनीति आज मानवीय मूल्यों से कोसों दूर होती जा रही है। दोहाकारों ने उक्त राजनीतिक विसंगतियों पर जब अपने विचार दोहों में प्रस्तुत किये तो वे दोहे देखते ही बनते हैं, यथा- राजेन्द्र सिंह बहादुर ‘राजन’-
‘‘उलट गई है देश की सफल सनातन रीति।
‘राजन’जब से चल बसी, राजनीति की नीति।।’’ 10
विश्वप्रकाश दीक्षित ‘बटुक’-
 ‘‘कैसे संभव एकता, क्यों हो देश अखण्ड।’’
नेता पाखण्डी हुए, राजनीति पाखण्ड।।’’ 11
राजनीति पूर्णरूप से दूषित एवं मानवीय मूल्यों से हीन हो चुकी है। दोहा-काव्य आज की राजनीति का जीवन्त दस्तावेज है। दोहाकारों में राजनीतिक समझ पर्याप्त है। राजनीतिक विसंगतियों पर दोहा-काव्य में निर्भीकता से चिन्ता, प्रतिक्रिया एवं आक्रोश व्यक्त किया गया है। दोहाकारों के विचार से पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार एवं शोषण में लिप्त है। नेताओं की वास्तविकता उजागर करने के लिए दोहाकारों ने तीक्ष्ण कटाक्षों की प्रभावशाली बौछार की है। अत: कहा जा सकता है कि समकालीन परिवेश में दोहाकार अपने दोहा-काव्य के माध्यम से आम जनता को जागरूक रहने का संदेश देते हैं-
अब्दुल बिस्मिल्लाह-
‘‘खत्म हो गये सब रजवाड़े सामंती दरबार ।
पर इनके ही हाड़-माँस से बनी नयी सरकार।।’’ 12
सन्दर्भ ग्रन्थ-सूची
1.समकालीन कविता में मानव-मूल्य-डॉ. हुकुम चन्द राजपाल-पृ.94
2.नई कविता: कथ्य एवं विमर्श- डॉ. अरूण कुमार - पृ.144
3.फिलहाल-अशोक बाजपेयी-पृ.-120
4.देश बड़ा बेहाल-शिव कुमार ‘पराग’-पृ.11
5.रंगारंग दोहे- प्रेम किशोर पटाखा व अशोक ‘अंजुम’-पृ. 45
6.दोहा दशक 3-अशोक ‘अंजुम’-पृ. 13
7.गधो की जगीर- डॉ. उर्मिलेश-पृ. 35
8.युवकों! सोचो! - डॉ. महेश दिवाकर-पृ. 43
9.जागे शब्द गरीब-दिनेश शुक्ल-पृ. 22
10.दोहे समकालीन- अशोक अंजुम व शंकर प्रसाद करगेती-पृ. 94
11.बटुक की कटुक सतसई- विश्व प्रकाश दीक्षित ‘बटुक’-पृ. 21
12.किसके हाथ गुलेल- अब्दुल बिस्मिल्लाह-पृ.11