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Tuesday 21 Nov 2017

गीत का संघर्ष एवं समकालीन चेतना


अनुपम कुमारी चौधरी
ए-2 दिलीप अपार्टमेंट, 2 बी रजनी बनर्जी रोड, बरीशा, कोलकाता-700008, मो.9007899148
कविता का आदि रूप गीत है। वह वाहे लोकगीत हो, चाहे सामवेद तथा ऋग्वेद की स्तुति हो, सब में गीतात्मकता विद्यमान है। यद्यपि गीत और गीति पर्यायवाची हैं तथापि गीत को संगीतपरक और गीति को आत्मानुभूतिपरक मानकर विवेचना की जाती है। पहले श्रव्य की परम्परा थी, बाद में पाठ्य प्रतिष्ठित हुआ। धरती के कण-कण में नदियों की बहती धारा सागरों की लहरों और हवा के चंचल झोंकों में गीत-संगीत का मधुर उल्लास है। डॉ. जगदीश गुप्त लिखते हैं - ‘‘गीत कविता की आदिम जमीन है। इस जमीन ने अपना फलक और भी विस्तृत किया है। ठेठ गद्य के शब्द भी गीत की लय में बंध रहे हैं। विद्या की साम्प्रदायिकता भी धीरे-धीरे कम हो रही है। ‘वाद’ के अवश्य अपने सम्प्रदाय बन गए हैं। वादग्रस्तता संकीर्णता का बोध कराती है, पर खुली आँखों की प्रतिबद्धता हमें गुमराह नहीं होने देती।’’ अन्य कला-रूपों में यही तो मानवीय संवेदना को गाने-गुनगुनाने में सक्षम है कि गीत सनातन संस्कृति का संवाहक और धरती के पृष्ठ पर लिखित सर्जना का आराधक है। गीत सहज शब्द और अर्थ को लय से संपृक्त लोकजीवन से जोड़ता है। वह करूणा के कण से शब्द को रूपाकार देता हुआ विरोध की भूमि को कम करता है। वैयक्तिकता को अक्षुण्ण रखते हुए भी वह परिवेश से परिचित और दुनिया को देखने का आग्रही है। गीत की आकांक्षा है कि वह यथार्थ की विकृति से दूर कर जन-मन को संकीर्णताओं से बचाए और हृदय में परदुखकातरता के प्रति संवेदना जागृत करे।
छायावाद के पश्चात् यदि एक ओर प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की धारा बढ़ी तो दूसरी ओर गीत पाश्र्व की ओर कर दिया गया। गीत मंच पर जाकर यदि लोकप्रिय हुआ तो उसकी साहित्यिकता शिथिल होने लगी। एक ओर यह गीत ‘बना’ तो दूसरी ओर काव्य-संस्कारी पाठकों को जोड़े रखने का उपक्रम। छायावादी गीतों ने राष्ट्रीय काव्यधारा से सरोकर रखकर एक ओर जहां युग की मांग को पूर्ण किया, वहीं दूसरी ओर जन-मन के मन में देश-प्रेम को उद्वेलित किया। गीत के लिए यह संक्रमण का काल था, जिसे आगे नवगीत या समकालीन गीत के रूप में विस्तार मिला। छायावाद में गीत जहाँ उत्कर्ष पर पहुँच गया था, वहीं उसकी आत्मानुभूति की तीव्रता कल्पना-विलासिता, गेयता, छंदबद्धता, तुकाग्रह ने उसे जड़ और रूढ़ बना दिया था। यदि एक ओर गीत ने मंच की गरिमा के अनुरूप श्रोता दिए, तो ओर व्यवसाय से प्रतिबद्ध तुकबंदी। लिजलिजी श्रृंगारिक भावनाएँ, गलेबाजी और उत्तेजक विचार वाले गीतकार दिए। छायावादोत्तर काव्य-आंदोलन ने गीत को इसी आधार पर खारिज करने की घोषणा की। गीत की इस प्रकार से आलोचना की गई कि गीत को अस्पृश्य करार दिया गया। अनेक गीतकार या तो कुंठित हो गए या फिर वे साधना या प्रयोग के रूप में इस धारा को विकसित किया। कुछ गीतकार प्रगतिवाद, प्रयोगवाद के सांचे में ढल गए तो कुछ गीत को बेचने में संलग्न हो गए।
निराला और पंत ने प्रगतिवादी खेमे में जाना हितकर समझा और प्रयोगवाद के प्राय: समग्र प्रतिनिधि गीतकारों ने अपने को बाद में गीत से काट लिया। इन साहित्यकारों और समीक्षकों ने यह फतवा दिया कि आधुनिक भाव-बोध को अभिव्यक्त करने में गीत अक्षम है। ये व्यष्टिपरक है अत: समष्टि का समाहार इसमें संभव नहीं है। साथ ही यह भी प्रचारित किया गया कि छंदबद्धता स्वच्छंद भावों और विचारों को संप्रेषित नहीं कर सकती। गीत की संपत्ति संवेदना थी और समकालीन काव्य की विरासत विचारधारा थी। कविता में संवेदना की सरिता सूखने लगी और विचारों व वादों की धूल उडऩे लगी। छंद के बंधन शिथिल हुए किन्तु एक नया छंद-विधान प्रारंभ हुआ। गीत में बाह्य लय न रहने के बाद भी आंतरिक क्षमता अक्षुण्ण रही। इसके विपरीत समकालीन काव्य बुद्धि प्रधान हो गया तथा संशिलष्टता और जटिलता के आधार पर सामान्य जन से असंपृक्त भी हो गया। इसमें ‘वाद’ परोसे जाने लगे तथा नित नए आंदोलनों व प्रयोगों ने सामान्य जन से कविता को दूर ही रखा। युग के स्पंदन को छायावादी कवियों ने नहीं सुना फलत: छायावाद अधिक देर तक नहीं रहा, क्योंकि उसके पास भविष्य के लिए उपयोगी नवीन आदर्शों का प्रकाशन, नवीन भावना का सौंदर्य-बोध और नवीन-नवीन विचारों का रस न था। वह काव्य न रहकर अलंकृत संगीत बन गया था। (आधुनिक कवि, भूमिकांतर्गत, पृष्ठ-11) समकालीन गीत-कवियों ने एक ओर जहाँ छायावादी गीत-विधा के युगानुरूप विकसित किया, वहीं अपनी परंपरा को संजोये रखा। छायावादोत्तर काल में छायावादी शैली को विकसित करने वाले कवियों में प्रमुख रूप से जानकी वल्लभ शास्त्री, विद्यावती कोकिल, सुमित्रा कुमारी सिन्हा, गोपाल सिंह नेपाली, मुसमत्ता सिंह भवन, उदयशंकर भट्ट आदि हैं। इस धारा के कवियों को छायावादोत्तर काल में छायावादी काव्य-परंपरा से प्रभावित नव्य गीतकार कहा जा सकता है।
सन् 1936 तक आते-आते हिन्दी कविता में छायावादी प्रभाव शिथिल पडऩे लगा था और प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना के बाद हिन्दी क्षेत्र में माक्र्सवादी प्रभाव के कारण प्रगति चेतना की लहर हिन्दी रचनाकारों के मानस में घर करने लगी थी। ऐसे में, यद्यपि महादेवी वर्मा अपनी ‘दीपशिखा’ लेकर आई थी और अपनी एक लम्बी भूमिका के माध्यम से उन्होंने यह विचार प्रकट किया था कि ‘‘कविता एक आन्तरिक राग है और मेरा दीप मन अविचल लौ लेकर इसकी साधना करता रहेगा, भले ही मेरी पीढ़ी के लोग अपना रास्ता क्यों न छोड़ जाए।’’ इसके बावजूद महादेवी वर्मा माक्र्सवादी चिन्तन की बौद्धिकता को हिन्दी जगत में प्रविष्ट होने से नहीं रोक पायीं और इसका तात्कालिक प्रभाव यह हुआ कि गीत, जो मूलत: आन्तरिक अनुभूतियों को प्रकट करने का एकमात्र माध्यम था, अपनी लय तोड़ बैठा, उसकी गति मंथर हो गयी, स्वयं महादेवी जैसी अथक साधिका भी चुप्पी मार गई और एक प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया कि इन परिस्थितियों में गीत कैसे, किस प्रकार रचा जाए।
सन् 1950 तक आते-आते स्वाधीन भारत में गणतंत्रीय चेतना छा गया था, और माक्र्सवाद का उथला प्रभाव जो आंदोलन बनकर आकाश में छा गया था, धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा था और कवि पहले की अपेक्षा कुछ अधिक जनमानस के बीच खड़ा हो गया था। चूंकि गणतंत्रीय व्यवस्था ने उसे व्यक्ति-स्वातंत्र्य का अधिकार दे दिया था। इसलिए वह धरती के अधिक नजदीक आ गया था और नए लहजे से उसकी हर धडक़न एवं समस्या को साबित करने लगा था। जाहिर है ऐसे में गीत का पारंपरिक विधान टूटना अनिवार्य था। ऐसी व्यवस्था में गीत व्यक्तिगत रागात्मक क्षणों का उच्छवास नहीं रह गया, बल्कि जन-जीवन से जुडक़र उसमें यत्किंचित् बौद्धिकता आई। लोक धुनों का प्रवेश हुआ, लोकजीवन की धडक़न में घुल-मिलकर सांसें लेने लगी और इस तरह उसका विषय अपनी सीमित परिधि को लांघ कर बंधे-बंधाए चौखटों को तोड़ विस्तृत भाव-भूमि पर प्रतिष्ठित हो गया। यद्यपि इस की अभिव्यक्ति सर्वप्रथम छायावादी कवि निराला के गीतों में हुई थी। उन्होंने पहले-पहल गीत के छंद, राग और लय में बहुत कुछ जोड़ा तथा तोड़ा था, लेकिन बौद्धिक दुरूहता के कोहरे में यह धारा नैरन्तर्य नहीं पा सकी और सन् 1950 तक आते-आते इस चेतना को मुखरता मिल पायी। कहना न होगा कि यह नवीन गीतात्मक चेतना अपने वस्तु शिल्प एवं दर्शन की दृष्टि से अपनी परंपरा से काफी भिन्न थी।
प्राय: सभी ने यही घोषित किया कि इसे ‘गीत’ नहीं कहना चाहिए, क्योंकि कहीं न कहीं ‘गीत’ शब्द पारंपरिक चौखटे की गंध देता है और इस प्रकार से इसमें नवीनता का बोध नहीं हो पाएगा। अत: इस नव्यता के बोध के लिए गीत को नयी संज्ञा से अभिहित किया गया।
राजेन्द्रप्रसाद सिंह द्वारा इस गीत विधा को एक नया शीर्षक मिला- ‘‘नवगीत’’। उन्होंने लिखा है- गीतांगिनी के सहयोगियों ने आधुनिक गीत, बिम्ब गीत, तात्विक गीत आदि कुछ नामों का सुझाव दिया था किन्तु मैंने गीतों की सम्भावना को काल, प्रवृति और शिल्प की एकांतिक सीमा में बांधना चाहा था। तभी नवगीत की संज्ञा दी। नयी कविता के कवियों द्वारा प्रस्तुत गीत, पिछली पीढिय़ों के परवर्ती और ईषत् भिन्न गीत और छायावादोत्तर विवेक कल्प गीतकारों के नवयोजित गीत कोई श्रेणिक नाम नहीं पा सके थे... अन्तत: नवगीत संज्ञा ही सर्वाधिक उचित प्रतीत हुई।’’ (नवगीत , अंक: गीतांगिनी पत्रिका, जुलाई 1969, पृष्ठ 53) सन् 1950 के बाद लिखे जाने वाले गीतों को समकालीन, छायावादोत्तर, नवगीत, साठोत्तरी गीत आदि अनेक नामों से अभिहित किया गया।
छायावाद के बाद युगीन परिस्थितियों ने काव्य की विभिन्न प्रवृत्तियों को जन्म दिया- वैयक्तिक, प्रगतिवादी, राष्ट्रीय-सांस्कृतिक तथा प्रयोगवादी। प्रयोगवाद का ही विकसित रूप ‘नयी कविता’ है।  नयी कविता के अन्तर्गत एवं समानान्तर कुछ ऐसे गीतों की रचना हुई जो प्राचीन-परम्परा के प्रति रूढ़ न होकर उससे वैभिन्न्य लिए हुए थे। इन गीतों की विशिष्टता थी- इनकी रचना- प्रक्रिया, इनका युग-बोध और उनका सहज, सरल भाषा में अभिव्यक्तिकरण। पहले-पहल महाप्राण निराला ने परम्परागत गीतों के वस्तु कथ्य एवं शिल्प में गीति-विधा के विकास की असमर्थता तथा अशक्तता का अनुभव कर गीतों के शिल्प विधान का पुन: संस्कार कर गीतों की खोई हुई प्रतिष्ठा की पुर्नस्थापना की थी। निराला के पद-चिन्हों का अनुसरण करते हुए आनेवाले गीतकारों की आत्मा भी गीतों को नई चेतना से अनुप्राणित करने के लिए सततशील थी। छायावाद के उपरान्त जिस प्रगतिवादी चिन्तनधारा का उदय हुआ, उसमें यद्यपि बौद्धिकता का समावेश अधिक था, लेकिन इय तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि इसके बावजूद प्रगतिवादी कवियों में भी गीत को नया साज और आवाज देने की छटपटाहट पूरी तरह विद्यमान थी। प्रगतिवादियों से यथार्थ की नयी जमीन लेकर, प्रयोगवाद में गीत अपने नए बिम्ब लेकर भाषा की नयी ताजगी लेकर, जन-जीवन के निकट आए थे। धर्मवीर भारती, केदारनाथ सिंह, गिरजाकुमार माथुर आदि प्रयोगशील कवियों ने गीत-जगत को श्रेष्ठ एवं अभिनव गीत प्रदान किए।
बौद्धिक युग में गीतकार को ‘काल्पिनिक वायवीय और अतीन्द्रीय’ के रथ से उतर कर ‘भैंसागाड़ी’ में सवार होना पड़ा। ‘किसान की नई बहू की आँखों में’ अपनी विषय-वस्तु खोजने लगी। आधुनिक मानव समाज जिस समाज का ‘व्यक्ति है उसमें विघटन, विसंगति और आत्म-  प्रवंचना के प्राबल्य के कारण गीतों में दु:ख और विषाद भाव भरा जाने लगा, लेकिन इससे गीत की स्थिति त्रिशंकु जैसी हो गई, क्योंकि गीत न तो समाज के स्पन्दन का उर्दू पोषक रहा और न ही व्यक्ति के मानसी आलोडऩ का साक्ष्य ही। परिणामत: महिमामय गीत केवल उर्दू के मुशायरे का अनुकरण मात्र रह जाने से अपनी गरिमा और साहित्य मूल्य से वंचित हो गया, किन्तु बच्चन के कुछ समकालीन गीतकारों के प्रयत्नों से गीत की स्थिति ‘मुशायरे’ से उभरकर ‘मुजरे’ तक पहुंच गई। प्रयोगवाद के प्रवर्तक अज्ञेय द्वारा गीत को ‘गतानुगतिक रचना’ कह देने से गीतकारों ने गीत लिखना लगभग छोड़ दिया था। उन्हें ऐसा आभास हुआ कि कवि का कर्म केवल कविता करना है। ऐसी स्थिति में ‘गीत’ की स्थिति बहुत ही विकट और शोचनीय हो गई थी। यहां कवियों ने गीतों के प्रकाशन पर ‘पूर्ण विराम’ लगा दिया। ऐसी स्थिति में ‘गीत’ को अत्यधिक सामथ्र्य और सशक्तता की आवश्यकता थी। प्रयोगवाद में गिरजा कुमार माथुर, केदारनाथ सिंह जैसे सशक्त गीतकारों के सतत प्रयत्नों से निर्जीव, निष्प्राण और मृतप्राय ‘गीतधारा’ में जान आई। उन्होंने गीतों को कविता का कठिनतम माध्यम कहकर गीत का जन्म उस भाषातीत गूंज से माना जो कविता करने के उपरांत बच जाती है।
सन् 1951-52 में काशी में हुए साहित्यिक संघ के अधिवेशन में हिन्दी के नए गीतों पर चर्चा हुई थी। चांदनी रात में गंगा की धार पर हुई नौका-गोष्ठी में उस दिन धर्मवीर भारती, नरेश मेहता, जगदीश गुप्त, रामदरश मिश्र, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, शंभूनाथ सिंह, नामवर सिंह तथा अन्य कितने ही नए कवि उपस्थित हुए। लगभग सभी कवियों ने अपने नए से नए गीत सुनाए थे। काल की तरंग में यह पूरी रात बहकर किसी अनजाने घाट में लग गई। (ठाकुर प्रसाद सिंह : हिन्दी गीत कविता : स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य विशेषांक-9, आलोचना जून 1965) सन 1051-52 में नए गीतों पर हुई चर्चा संभवत: एक घटना थी, कार्यक्रम नहीं। 1957 में इलाहाबाद के साहित्यकार सम्मेलन की कविता गोष्ठी में वीरेन्द्र मिश्र ने ‘नई कविता नया गीत : मूल्यांकन की समस्याएं’ नामक अपना निबंध लेख पढ़ा। उन्होंने घोषणा की ‘हिन्दी में नए गीत का जन्म हुआ है। यह नया गीत फार्म और कण्टेण्ट दोनों ही  पक्षों में समृद्ध हुआ है। यह विचारणीय है कि आज की विज्ञप्त साहित्यिक काव्य-शैलियों की चकाचौंध में हम गीत की दशा में सम्पन्न हो रहे प्रयोगों तथा जागरूक विचारशक्ति को भुलाए नहीं दे रहे हैं। (वीरेन्द्र मिश्र : वासन्ती, दिसम्बर 1962) इस सम्मेलन के उपरांत 5 फरवरी 1958 में राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने गीतांगिनी के सम्पादकीय में कहा- ‘‘समकालीन हिन्दी कविता की महत्वपूर्ण और महत्वहीन रचनाओं के विस्तृत आंदोलन ने ‘गीत  परम्परा’ नवगीत के निकाय में परिणति पाने को सचेष्ट है। नवगीत नई अनुभूतियों की प्रक्रिया में संचयित मार्मिकता, समग्रता का आत्मीयतापूर्ण स्वीकार होगा, जिससे अभिव्यक्ति के आधुनिक निकायों का उपयोग और नवीन प्रविधियों का संतुलन होगा। इस स्थापना का आभास उन पांच तत्वों (जीवन-दर्शन, आत्मनिष्ठा, व्यक्तित्व बोध, प्रीतित्व और परिसंचय) के समकालीन साक्षात्कार से हो सकता है, जो नवगीत की स्वरूप रचना में सचेष्ट है।’’ गीतांगिनी के प्रकाशन से समकालीन गीत की सृजन-प्रक्रिया ही आरंभ नहीं हुई, बल्कि समकालीन गीत उपयुक्त अभिधान के साथ ही हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठित होने लगा था। लेकिन पुराने के उखडऩे और नए के जमने के बीच का संघर्ष जारी था।