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Thursday 23 Nov 2017

देवता मौन हैं


शशिकांत सिंह शशि
जवाहर नवोदय विद्यालय शंकरनगर नांदेड़
महाराष्ट्र-431736
मो. 7387311701
एक समय था जब देवता पत्थरों के नहीं हुआ करते थे। हाड़-मांस के पुतलों की तरह गप्प-शप्प मारते, ज्ञान बघारते, अज्ञानियों को लताड़ते, अपनी प्रशंसा सुनने को सदैव तत्पर और उतारू हुआ करते थे। भक्त आते, दुआ-सलाम करते, दुश्मन देवताओं की ऐसी-तैसी करते, मनवांछित वरदान प्राप्त करके चले जाते। दरबार से भी बुलावा आता तो देवता राजा के अनुकूल दोहे-कविता लिखवाकर ले जाते, राजा को सुनाते और इनाम पाते। यानी शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम था। देवता होने का अर्थ था मौन रहकर मुस्कराते रहना। हथेली को खोलकर छाती के पास उठाये रखना ताकि भक्तों को यह भ्रम हो कि कभी न कभी तो वरदान प्राप्त होगा ही। किसी भी हाल में यह पता न चले कि देवता किसके पक्ष में हैं और किसके विपक्ष में। देवता जानते थे कि मुंह खोलते ही देवत्व संकट में आ जायेगा। कम से कम पब्लिक में तो मौन ही बेहतर है। इमेज बची रहेगी तो देवत्व दरबार में काम आयेगा।
इधर कुछ दिनों से, देवताओं के मौनव्रत पर संकट बार-बार आ रहा था। भक्त चाहते थे कि देवता बयान दें। अपना पक्ष स्पष्ट करें। वरदान के भ्रम में चुप रहने वाले लोग नहीं थे। राजा ने निर्णय लिया था कि सारे किसान अपना अनाज राजा के भंडार में जमा करेंगे। उसके बाद हर किसान को उसकी जरूरत के मुताबिक अनाज दिया जायेगा। किसानों में खलबली मच गई। भाई लगान के नाम पर तो हम राजा को कर दे ही रहे हैं। अब राजा ने सारा अनाज ही जमा करने का आदेश दे दिया। यह तो अन्याय है। हल्ला मचा था कि राजा राज्य के विकास के लिए प्रयत्न कर रहा है। वह किसी को बख्शने नहीं जा रहा। किसानों ने रो-गा के अनाज जमा कराने शुरू कर दिये। राजा के कर्मचारी बड़े किसानों के अनाज केवल कागज पर लिखकर उनको वापस कर दे रहे थे। बदले में बड़े किसान उनको घी का डिब्बा दिया करते थे। जमींदार तो राज कर्मचारियों को बाकायदा गाय ही भेंट स्वरूप देने लगे। किसानों की समझ में सब आ ही रहा था लेकिन  उन्हें चुप रहने की आदत होती है। चुप थे। लाईन में लग के अपनी कमाई राजा के अन्न भंडार में जमा कर रहे थे। दूसरी ओर, लाईन में लग के दो-दो किलो चावल और गेहूं ले लिया करते थे मानो भीख ले रहे हों। युवकों में खासा उत्साह था उन्हें लग रहा था कि राज बदल रहा है। अब राम राज्य आ जायेगा। राजा अनाज जमा करवायेगा उसके बाद उन्हें बराबर-बराबर जनता में बंटवा देगा। गरीबों का चूल्हा भी जलेगा। राजा के निर्णय का विरोध करने वाले भी थे जिन्हें राजा राजद्रोही कहता था। राजा का ही अर्थ राज्य था। ऐसे में जनता बंट गई-राजभक्त और राजद्रोही। अपना अनाज राजा के अन्न भंडार में जमा कराके दाने-दाने के लिए लाईन में लगे वे राजभक्त और विराध करने वाले राजद्रोही। ऐसे में एक ही रास्ता था कि लोग देवता के पाास जायें। किसान तो कुलदेवता से लेकर ग्राम देवता तक की पूजा किया करते थे। पहले वे ग्राम देवता के पास गये। उन्होंने प्रार्थना की-
- हे देव ! अनाज हमारे और अधिकार राजा के?
- राजा ही राज्य का विकास करता है। उसे अनाज का अंश तो चाहिए ही न। वह खेती तो नहीं करेगा?
देवता लगातार मुस्करा रहे थे और हाथ वरदान की मुद्रा में उठाये हुये थे। किसान उनके सामने तर्क दे रहा था-
- हम लगान तो दे ही रहे थे। जो नहीं दे रहे थे उनकी तो आज भी चांदी है। एक भी जमींदार लाईन में नहीं लगा। बड़े किसानों ने आधा जमा किया और आधा राज कर्मचारियों से मिलकर छुपा लिया। हमारे तो सारे अनाज ही जमा हो गये । हम कहां जायेंगे ? आपकी शरण में आये हैं।
-आपको शांति से राजा का साथ देना चाहिए। निर्माण के समय धैर्य बहुत जरूरी है। राजा यदि अन्याय करेगा तो स्वयं पाप लगेगा। उसकी आत्मा उसे धिक्कारेगी।
-तब तक प्रभु ? हमारे बच्चे भूखों मर जायेंगे।
- हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश विधि हाथ।। राजहित में प्रतीक्षा करनी होगी। प्रतीक्षा का घट जब भर जायेगा तब परिवत्र्तन होगा।
      किसान निराश होकर चले गये। जमींदार आये।
- प्रभु ! यह कैसा अंधेर है। आपको हमने सोने का मुकुट चढ़ाया था फिर भी हमारा अनाज राजा छीन रहा है। आप मौन हैं।
- आपका साठ प्रतिशत अनाज तो वापस आ ही गये न। चालीस प्रतिशत उस गरीब कर्मचारी के भाग्य के थे जिसकी बीबी ने निर्जला एकादशी का व्रत किया था। आज उसके पास भी अपने अनाज का बखार है। उसकी दरिद्रता दूर हो गई। उसकी मां ने भी बड़े व्रत किये थे। आपका भी साठ प्रतिशत बच गया।
       जमींदार चुप हो गया। उसे संदेह हुआ कि कहीं देवता ने राजा को तो नहीं बता दिया कि चालीस प्रतिशत पर अनाज की कालाबाजारी हो रही है। उसे देवता की नीयत पर संदेह हुआ लेकिन चुप ही रहा। चुपचाप चला गया। देवता भी जमींदार के मन की बात समझ रहे थे। भक्तों के जाने के बाद देवता ने अपना हाथ नीचे किया। एक जोर की अंगड़ाई ली और नहाने चले गये। नहा के आये तो भोग लगाया और मुकुट को करीने से माथे पर रखकर आईना देखने लगे। तभी राजा का सिपाही आता दिखा-प्रभु ! राजा ने बुलाया है। देवता का माथा ठनका। ना-नुकुर भी नहीं कर सकते थे। पिछले महीने ही इस राजा ने उन्हें देवता की उपाधि से नवाजा था। इसके पूर्व उन्होंने देवत्व के लिए अप्लाय किया था लेकिन निजाम अलग था तो उन्हें देवता नहीं माना गया। देवत्व प्राप्ति के लिए भी राजा की अनुमति चाहिए होती है। देवता राजा के दरबार में आये लेकिन राजा उन्हें लेकर बंद कक्ष में चले गये। उसने पूजा की, पूजन के उपरांत भोगादि लगाकर राजा ने पूछा-
- आपके देवता रहते हमारा विरोध कैसे हो रहा है? प्रजा का एक वर्ग हमारा उपहास कर रहा है। हमारे विरोध में चुटकले गढ़े जा रहे हैं। आप भक्तों को सपने में जाकर क्यों नहीं बताते कि ऐसा राजा न तो कभी हुआ था न होगा।
- जी मेरा प्रयत्न यही है। मेरी पूजा के लिए जो किसान आते हैं। उन्हें तो मैं यही बता रहा हूं लेकिन आप तो जानते हैं कि मेरी भी अपनी सीमा है। मैं खुलकर आपके पक्ष में बोल नहीं सकता। मुस्कराना और वरदान देना यह दो काम खुलकर  करता हूं।
- यदि हमारा तख्ता पलट हुआ तो आपका मुकुट खुलकर नीचे आ जायेगा।
- जी आप क्रोधित न हों मैं प्रयाास कर रहा हू। करता ही रहूंगा। मेरे देवता रहते आपका अहित हो ही नहीं सकता।
    चरणामृत लेकर राजा ने सभा विसर्जित की, देवता अंदर से रो रहे थे लेकिन मुस्कराते हुए बाहर आ गये। वरदान की मुद्रा में उठा हुआ हाथ सीने से लगाये। बाहर पत्रकार खड़े थे। बचते-बचाते मंदिर में घुसे पर वहां भी दो लोग झोला टांगे खड़े मिले। देवता से पत्रकार ने पूछा-
-आप हमेशा मुस्कराते कैसे रहते हैं ? संसार में इतनी पीड़ा है पर आपको हंसी आती रहती है?
- हंसना हमारा पेशा है वत्स। यदि हमने मौन तोड़ा तो देवत्व खतरे में पड़ सकता है। हम मुस्कराते ही अच्छे लगते हैं। मुंह खोलने का अर्थ है पक्ष स्पष्ट करना। पक्ष यदि स्पष्ट हो गया तो विपक्ष भी हो जायेगा। मौन उत्त्म युक्ति।
-आप किसी के पक्ष में तो होंगे ? आखिर आपका भी कोई मत होता होगा?
- हम निष्पक्ष रहते हैं। हमें तो मंदिर में ही चढ़ावा मिल जाया करता है। मंदिर के बाहर जितनी मर्जी गर्मी या सर्दी हो हमारे गर्भगृह में तापमान सामान्य ही रहता है। हम निष्पक्ष्ता से संसार को देखते और मुस्कराते रहते हैं। वी आई पी भक्त सोना-चांदी चढ़ाते हैं। हम मौन स्वीकृति उन्हें भी प्रदान करते हैं। वे आते हैं मुर्गे-बकरे काटते हैं। हम बकरों की चीख को सुनकर भी मुस्कराते हैं क्योंकि हम निष्पक्ष हैं। देवता मौन होकर मुस्कराने लगे। पत्रकारों ने कूच करने में ही भलाई समझी। पत्रकार गये तो आ गये राजा के विरोधी। आते ही चिल्लाये-
-आप यहां देवता बने बैठे हैं और उधर राजा अपनी मनमानी कर रहा है। उसने किसानों से उनके अनाज छीन लिये हैं। आप मुस्कराते ही रहेंगे या कुछ बोलेंगे भी। अब आपका यह ढोंग नहीं चलेगा। जुबान खोलनी पड़ेगी। आपको यह साफ  करना होगा कि आप किसके साथ खड़े हैं। मुकुट पहनकर मुस्कराना बंद कीजिये।
 देवता तिलमिलाये लेकिन मुस्कराते रहे। उन्होंने जब देखा कि युवकों का विरोध बढ़ता ही जा रहा है तो बोले -शंात वत्स, शांत। क्रोध विवेक को खा जाता है। राजा ईश्वर का अवतार होता है। वह राज के विकास हेतु कदम उठा रहा है।
- यानी कि आप को चढ़ावा चढ़ा दिया गया है। आप सत्य के साथ खड़े नहीं हैं तो आपका पूजन व्यर्थ है। हम आपकी पूजा का विरोध करेंगे।
युवक चले गये। देवता मुस्कराते रहे। वरदान की मुद्रा में उठा हाथ जरूर ढीला हो गया था। थोड़ी ही देर में किसान भी आ गये।
- देव ! हमारे बच्चे भूख से मर रहे हैं। हमें रोज दो किलो अनाज दिया जा रहा है। आपका ही सहारा है। नहीं तो हम आपके मंदिर में ही प्राण त्याग देंगे।
देवता ने रात में नगर भर के देवताओं की मीटिंग की। राजा के एहसान के भार से दबे देवता किसानों का सामना कर नहीं सकते थे। दिन में मुस्कराते रहते थे तो रोने के लिए रात का समय उचित था। नगरदेवता ने बात रखी-
- हे देवगण, राज अत्यंत धार्मिक है। वह सत्य का अवतार है। हमारे रहते उसका अहित हो यह कदापि उचित नहीं है।
सभी देवता हंसने लगे। सबको मालूम था कि नगरदेवता राजा के साढ़ू हैं। उन्हें इसी बल पर नगरदेवता की उपधि मिली है। यदि आज राजा का विरोध करें तो कल ही नगरदेवता का पद बलराम महराज को चला जायेगा जो कब से इस पद पर दांत गड़ाये बैठे हैं। बलराम महराज भी राजा के दूर के रिश्तेदार थे। हंसने का कारण जानते हुए भी नगर देवता ने पूछा-
- हंसने का कारण?
कल्याणी चौराहे के देवता ने देखा कि नगरदेवता की पूंछ सहलाने का सुअवसर प्राप्त हुआ है तो बोले-
- हम तो देव आपकी भाषण कला से खुश हो रहे हैं। राजा तो सत्य के अवतार हैं ही बल्कि स्वयं सत्य स्वरूप हैं।’’
तभी ग्राम देवता खड़े हुए और बोले-
- आप सब सुविधाभोगी देवता हैं। आप राजा के जूते चमकाइये हम तो किसानों के साथ हैं। हम किसानों की पीड़ा नहीं देख सकते। उनके ही अनाज लेकर राजा उन्हें ही भिखारियों की तरह लौटा रहा है। उनसे समय मांग रहा है और अपने अमीर दोस्तों की करतूतों पर जानबूझकर खामोश है। वह खूब जानता है कि कहां और किसके गोदाम में कितना बंद है लेकिन वह नाटक करके जनता को दिखाना चाहता है।
तुरंत देवताओ के भी दो गू्रप हो गये। ग्रामदेवता और नगरदेवता में तू तू मैं मैं होने लगी। आखिरकार बरगद के देवता खड़े हुए और उन्होंने सुलह करायी-
- मूल प्रश्न यह नहीं है कि राजा का पक्ष लें या किसान का। हम तो निष्पक्ष हैं। मूल प्रश्न है कि कैसे हमारी सुविधायें भी बनीं रहें और देवत्व भी सुरक्षित रहे। हमें देवता की उपाधि जो राजा ने दी है उसकी रक्षा तो करनी ही होगी। जनता हमें देवता मानती रहे इसके लिए क्या स्वांग किया जाये। मेरी एक सलाह है कि क्यों न हम घोषणा कर दें कि देवताओं ने मौनव्रत ले लिया है। धर्म की अपार हानि होने पर ही मौनव्रत तोड़ेंगे। इसका फायदा यह होगा कि लोग हमारे पास आते रहेंगे। उन्हें यह भी लगता रहेगा कि धर्म की अपार हानि अभी नहीं हुई है क्योंकि हम बोलेंगे ही नहीं।
साधु-साधु का नाद हुआ। सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित हो गया। नगर में मुनादी करवा दी गई कि सारे देवता मौनव्रत पर हैं। समय बदलता गया। राजा का आजवीन आभारी रहने वाले देवता मौन ही रहे।