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Sunday 19 Nov 2017

निराला का वसंत-संसार

डॉ.संध्या प्रेम
प्राध्यापक, हिंदी विभाग के.बी. महिला महाविद्यालय,
हजारीबाग (झारखण्ड)
मो. 9431978232
निराला का वसंत-संसार
वंसंत का नाम सुनते ही युवाओं  में जोश भर जाता है। फिजां में सतरंगी छटा बिखर जाती है। दिलों में उमंगें छा जाती हैं। जब वसंत इतना खूबसूरत हो, तो कवि को क्यूँ न प्रिय हो? समस्त भारतीय साहित्य में शायद ही कोई कवि ऐसा हो जिसने वसंत की चर्चा न की हो। पर, निराला की बात ही कुछ और है, निराला वसंत के कवि हैं। उनका जन्म भी वसंत पंचमी के दिन हुआ था। वसंत उन्हें बहुत प्रिय है। उन्होंने वसंत पर कई कविताएँ लिखी हैं। निराला का स्वभाव भी वसंत से काफी मिलता-जुलता है। शायद इसीलिए वसंत उन्हें इतना प्रिय है, और क्यूँ न हो ? वे कहते हैं-
सखि! वसंत आया।
भरा हर्ष वन के मन,
नवोत्कर्ष छाया।
किसलय-वसना नव वय लतिका
मिली मधुर प्रियउर तरू पतिका,
मधुप-वृन्द बंदी -
पिक-स्वर नभ सरसाया।
लता-मुकुल-हार गंध-मार भर,
वही पवन बन्द मन्द मन्दतर,
जागी नयनों में नव -
यौवन की माया।
आवृत सरसी-उर-सरसिज उठे,
केशर के केश कली के छूटे,
स्वर्ण शस्य अंचल
पृथ्वी पर लहराया
सखि! वसंत आया।
वसंत के आगमन का इतना सुंदर, जीवंत और सार्थक वर्णन अन्यत्र दुर्लभ है। यह निराला जैसा महाप्राण ही कर सकता है। उनकी तूलिका शब्दों में सामंजस्य से अद्भुत रंगों की छटा बिखेरती है। शब्दों का संयोजन कुछ इस प्रकार का, कि उससे जो ध्वनि प्रस्फुटित होती है वह हर दृश्य को मूत्र्तिमय स्वरूप प्रदान करती है।
निराला वसंत के कवि हैं। निराला नएपन के कवि हैं। निराला नए होते जाने के कवि हैं। उनकी रचना में वसंत एक ऋतु मात्र नहीं, वरन् एक प्रतीक के रूप में आया है। जिस तरह महादेवी की कविता में दीपक एक प्रमुख प्रतीक है- प्रकाश का, त्याग का, बलिदान का उसी भांति निराला की कविता में वसंत प्रतीक है, मस्ती का, त्याग का, बलिदान का, नित नए होने का, निरंतरता का, कुछ नया कर गुजरने का। जो कुछ पुराना है उसे छोड़ देने का, वसंत नाम है क्रांति का।
उन्होंने अपनी एक कविता में कहा है-
‘मैं ही वसंत का अग्रदूत,
ब्राह्मण समाज में ज्यों अछूत।’
निराला स्वयं को वसंत का अग्रदूत मानते हैं यानि क्रांति का अग्रदूत। हमारे समाज की एक खासियत है कि जब भी हम कोई नई चीज अपनाते हैं तो उसकी बड़ी आलोचना होती है, उसे हम अच्छा नहीं समझते, परम्पराओं एवं मूल्यों के टूटने का डर हमें होता है, हमें अपनी पुरानी मान्यताएँ ध्वस्त होती दिखाई देने लगती हैं, और उस पर हाय-तौबा मचने लगती है, लेकिन हम भूल जानते कि वहीं से नई परम्पराएँ जन्म लेती हैं, नए मूल्य स्थापित किए जाते हैं। समयानुकूल जो पुराने हैं उनका ध्वस्त हो जाना नए अंकुर का प्रस्फुटन है। निराला नए अंकुर के कवि हैं। यह नयापन उनके समस्त रचना-संसार में हमें दिखलायी देता है। वे बंधना नहीं जानते कथ्य के स्तर पर और न ही विषय के स्तर पर। यही कारण है कि उनके अंदर जितनी विविधता है उतनी शायद ही किसी कवि में हो। एक तरफ  ‘राम की शक्तिपूजा’ जैसी उदात्त कविता है तो दूसरी तरफ  ‘रानी और कानी’ या ‘गर्म पकौड़ी’ अथवा ‘खजोहरा’। कहीं आपस में कोई सामन्जस्य नहीं और नहीं कोई तालमेल। शायद यही विविधता उन्हें अन्य छायावादी कवियों से भिन्न बनाती है और इतना ही नहीं बाद के कवियों के लिए एक ठोस जमीन तैयार करती है।
उनकी ‘भिक्षुक’ कविता को लें तो सोच सकते हैं कि शायद ही कोई कवि इस विषय को लेकर इतनी सार्थक कविता लिख सकता है। एक-एक शब्द गहन अर्थ का बोध कराते हैं-
‘वह आता -
दो टूक कलेजे को करता पछताता
पथ पर आता।
पेट-पीठ दोनों मिलकर है एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मु_ी भर दाने को- भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता-
दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता।
साथ दो बच्चे भी हैं सदा हाथ फैलाये,
बायें से वे मलते हुए पेट को चलते,
और दाहिना दया-दृष्टि पाने की ओर बढ़ायें।
भूख से सूख होंठ जब जाते
दाता भाग्य-विधाता से क्या पाते ?
घूँट आँसुओं का पीकर रह जाते।
चाट रहे जूठी पत्तल वे सभी सडक़ पर खड़े हुए,
और झपट लेने को उनसे कुत्ते भी हैं अड़े हुए।
हमारी सामाजिक व्यवस्था एवं वर्ग वैषम्य को चित्रित करती ‘भिक्षुक’ कविता न केवल भिक्षुक का जीवंत चित्र प्रस्तुत करती है वरन् हमारी सामाजिक व्यवस्था पर गहरी चोट पहुँचाती है। यहाँ पर ‘जूठी पत्तल’ शब्द लाकर निराला यह दिखाना चाहते हैं कि एक तरफ समाज के कुछ उच्च वर्ग शोषण की कमाई से अकूत धन कमा रहे हैं और उस शोषण के फलस्वरूप देश की अधिसंख्य जनता को पेट भरने के लिए अन्न भी उपलब्ध नहीं हैं। उनका जीवन कुत्ते से भी बदतर है। इतना ही नहीं उनके दो बच्चे आने वाले भविष्य की ओर संकेत करते हैं। अगर यही स्थिति रही तो उन्हें भी दूसरे के सामने हाथ फैलाने के सिवा, उनकी दया के सहारे जीवित रहने के सिवा कोई चारा नहीं। निराला दूरदर्शी हैं। अपने समय से बहुत आगे के कवि हैं। यह कविता 1923 के परिमल में प्रकाशित हुई थी, लेकिन आज भी उतनी ही नई एवं प्रासंगिक। एक-एक शब्द गहरा अर्थ लिए हुए। कोई कविता तभी कालजयी होती है जब वह हर पाठ में नई हो। इसी तरह उन्होंने अपनी ‘विधवा’ कविता में भारतीय विधवा का जो चित्र उपस्थित किया है वह किसी मंदिर की देवी से कम पवित्र नहीं।            
‘वह इष्टदेव के मंदिर की पूजा-सी
वह दीप-शिखा सी शांत, भाव में लीन,
वह क्रूर काल-ताण्डव की स्मृति-रेखा सी
वह टूटे तरू की छूती लता सी दीन -
दलित भारत की ही विधवा है।
स्त्री के चरित्र एवं रूप का उसकी स्थिति का क्या इतना मार्मिक चित्र भारतीय क्या विश्व साहित्य में दुर्लभ है। स्त्रियों की दीन-हीन दशा एवं उसकी सामाजिक स्थिति का इतना उदात्त स्वरूप हमें सोचने को मजबूर करता है कि कोई पुरुष स्त्री के लिए इतना करूण इतना भावुक हो सकता है? यह निराला ने संभव कर दिखाया है, अपनी छोटी सी कविता में पूरे स्त्री चरित्र का महाकाव्य लिख डाला है। निराला अद्भुत हैं। स्त्रियों के लिए उनके हृदय में जो स्थान था उसे उन्होंने अपनी इस छोटी किन्तु महाकाव्यात्मक कविता में जीवंत कर दिया है। मैं तो इस कविता को स्त्री जीवन का महाख्यान कहने से कोई गुरेज नहीं करूँगी। इस कविता के आगे स्त्री जीवन पर आधारित बड़े-बड़े उपन्यास भी छोटे पड़ जायेंगे। वह -
व्यथा की भूली हुई कथा है,
उसका एक स्वप्न अथवा है।
कौन उसको धीरज दे सके ?
दु:ख का भार कौन ले सकें ?
यह दुख वह जिसका नहीं कुछ छोर है,
दैव अत्याचार कैसा छोर और कठोर है।
क्या कभी पोंछे किसी ने अश्रु-जल ?
ओस-कण-सा पल्लवों से झर गया
जो अश्रु, भारत का उसी से सर गया।
(भारत की विधवा, 1923)
निराला महासागर है। उनका विषय क्षेत्र इतना व्यापक है कि कुछ शब्दों में व्यक्त करना असंभव जान पड़ता है। उनके रचना-संसार में गोता लगाए बिना मोती ढंूढ पाना सबके वश की बात नहीं। निराला स्वयं में एक ऋतु हैं जिनका बार-बार साहित्य में लौट आना अवश्यंभावी है। निरंतरता का नाम ‘निराला’ है। शाश्वतता का नाम ‘निराला’ है।
चंद शब्दों में उन्हें समेटना उनके स्वभाव के प्रतिकूल होगा। हिन्दी कविता जगत को उन्होंने जो कुछ नया दिया वह आज भी कवि को वरेन्य है। उन्होंने ‘राम की शक्तिपूजा’ में एक बीज वाक्य दिया था- होगी जय! होगी जय! हे पुरुषोत्तम नवीन। वह ‘पुरुषोत्तम नवीन’ आज का हर वो व्यक्ति है जो सच्चाई के रास्ते पर चलकर दूसरों का मार्ग प्रशस्त करता है। निराला सदैव दूसरों की चिन्ता किया करते थे वरना असमय अपनी पुत्री सरोज का इस दुनिया से चले जाने का दंश नहीं झेलते। क्या ‘सरोज-स्मृति’ जैसी कविता आज तक लिखी गई? इस तरह निराला की कविता में वसंत एक नए संदर्भ के साथ आता है-
आई वसंत की वेला
खिले फूल खिल गई धरा
छाया हर्ष का मेला।
आई वसंत की वेला।
कोयल कूकी, चिडिय़ा चहकी,
वन पाखी का मन डोला
आई वसंत की वेला।
रोज-रोज मधु पिये मधुप-गण
बौराये, मति भूला
आई वसंत की बेला।
निराला एक विशेष प्रकृति का नाम है।
नाचो हे, रूद्र ताल,
आँचो जग, ऋतु अराल।
झरे जीव जीर्ण-शीर्ण
उद्भव हो नव-प्रकीर्ण,
करने को पुन: तीर्ण
हो गहरे अन्तराल।