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Thursday 23 Nov 2017

स्मृतियों के झरोखे से झांकती पचमढ़ी


जयप्रकाश श्रीवास्तव

आई सी 5 सैनिक सोसाइटी शक्तिनगर जबलपुर 482001
मो. 7869193927

स्मृतियों के झरोखे से झांकती पचमढ़ी
पचमढ़ी से मेरा पहला साक्षात्कार 1969 में तब हुआ जब मैं अपने मित्र के साथ अचानक से बड़े भाई के पास जा पहुंचा। पिपरिया रेलवे स्टेशन पर उतर सामने ही पचमढ़ी बस स्टेण्ड जहां से राज्य परिवहन की बस पचमढ़ी के लिये मिलती थी, युवा मन की उत्सुकता को अपनेआप में समेटे हम लोग बस में सवार हुए।  निर्धारित समय पर बस ने पचमढ़ी के लिए प्रस्थान किया, मटकुली तक आते आते उत्साह कुछ ठंडा सा प्रतीत होने लगा, कहां तो पहाड़ों की रानी के दर्शनों की लालसा और कहां अब तक सपाट रास्ता, मित्र से पूछा मित्र कहीं हम गलत बस में तो नहीं बैठ गए? मित्र ने सुनकर केवल मुस्कुरा भर दिया। मटकुली से देनवा नदी को पार कर जैसे ही बस सिंगानामा से आगे बढ़ी कि लगा अब दुर्गम रास्ते का सफऱ प्रारम्भ हो गया है, धीरे धीरे रुं रुं करती बस सुनसान को चीरती मंथर गति से आगे बढ़ी जा रही थी और मेरी चंचलता से भरी आंखें कभी दाएं कभी बाएं पहाडिय़ों को घूरती हुई उस सौंदर्य को  आत्मसात कर रहीं थीं,और मन था कि बावला न जाने किन किन खयालातों में विचरण करने लगा था, तभी  सामने बांयी ओर एक बोर्ड दिखा जिस पर लिखा था देनवा दर्शन। मित्र जो पहले भी दो चार बार पचमढ़ी आ चुका  था ने बताया कि नीचे खाई में देनवा नदी एक मोटी लकीर की तरह दिखाई देती है, बस में सवार अधिकांश लोग खड़े होकर उस लंबी गहरी खाई में देखने लगे मानो वे सब  नदी की तलाश में ही निकले हों। कंडक्टर सबको बैठने के लिये कह रहा था और ड्राइवर निर्लिप्त भाव से बस चला रहा था। कुछ समतल कुछ घुमावदार सडक़ से गुजरते हुए लगभग डेढ़ घंटे बाद बस एक स्थान पर रुकी, मित्र ने बताया यह पगारा गांव है कुछ गांव के लोग वहां उतरे बस फिर अपने गंतव्य की ओर बढ़ी। बस की रफ़्तार इतनी धीमी थी कि लगता ही नहीं था कि बस चल रही है। कभी बांये तो कभी दांये ऊँची ऊँची पहाडिय़ों और उनसे निरंतर रिसता पानी पूरी सडक़ को गीला कर रहा था, सडक़ स्याह काली नजऱ आ रही थी। अब तो वे सब प्राकृतिक स्रोत सूख चुके हैं, एक झीलनुमा तालाब के किनारे से गुजरते समय मित्र ने बताया इस जगह को बारीआम कहते हैं असंख्य आमों के बृक्षों से घिरे लिपे पुते में बच्चे फुदक रहे थे। वहां से आगे का रास्ता और अधिक घने वृक्षों, पहाडिय़ों से घिरा लग रहा था, आगे बढऩे  पर खुले से मैदान के बांयी ओर एक मंदिर और एक महलनुमा खंडहर दिखाई दिया ,यह अम्बे माई का स्थान है और पीछे रानी का महल ऐसा मित्र ने बताया। आज अम्बे माई का मंदिर तो भव्यता के साथ खड़ा है पर महल  के अवशेष ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे। यहां से चढ़ाई समाप्त हो चुकी थी, बस ढलान पर तेजी से बढ़ रही थी, नाके  पर बस रुकी तो बांयी ओर हॉलिडे होम्स के बँगले नजर आये। बस स्टेण्ड पर उतर हम धुंधलके में अपने अपने ठिकानों पर पहुंचे। उस समय तक बड़े भाई सिंगल थे सो नजदीक ही गुप्ता भोजनालय में भोजन कर बढ़ती ठंड  और गहराती रात में जल्दी ही सो गया। सुबह भाई तो चले गये अपनी ड्यूटी पर और मैं जा पहुंचा अपने मित्र की  बहिन के घर। ज्यादातर कबेलू से छाए घरों और छोटे से बाजार वाली उस बस्ती में मुझे कोई विशेष आकर्षण नजर  नहीं आया, पर अपनेपन से भरी जरूर लगी, आज घर चार मंजिल में बदल गये हैं पर वह खुलापन और अपनापन कहीं नजर नहीं आता न घरों में और न दिलों में। उस दिन ऐसे ही घूमते हुए हम सबसे नजदीक जटाशंकर स्थल  देखने निकले, दोनों ओर पहाडिय़ों के बीच से गहरे उतरते हुए नीचे पहुंचे तो मन श्रद्धा भक्ति से भर गया प्रकृति के अदभुत सौंदर्य से अभिभूत होकर उसी दिन दोपहर की बस से हम लोग वापस नरसिंहपुर लौट आये।  दूसरी बार 1975 में टीचर्स ट्रेनिंग के दौरान पचमढ़ी को और नजदीक से जानने  का अवसर प्राप्त हुआ। सुदूर बस्ती से अलग थलग प्राकृतिक सुषमा से आच्छादित वातावरण में पचमढ़ी की एक  मात्र हवाईपट्टी के समीप बुनियादी प्रशिक्षण संस्थान में जब पहुंचा तब एक नई पचमढ़ी के दर्शन हुए। सिर के ऊपर  उड़ते कभी साथ चलते बादल, कभी पीछे कभी आगे होती वारिश की फुहारों से भीगते बी फाल, रीछगढ़ तो कभी धूपगढ़ की तलहटी में विचरण करते मन अनायास ही गुनगुनाने लगता, शब्द होंठों पर थिरकते और कविता की एक लहर सी संपूर्ण तन मन में तैरने लगती। पत्थरों पर अनेक जगह उकेरी गई रॉक पेंटिग्स को देखकर पहले बड़ा अचरज हुआ पर आज सोचता हूँ तो लगता है कि भीमबैठका और पचमढ़ी में जरूर कोई संबंध रहा होगा।  इमरजेंसी काल से पचमढ़ी अछूती ही रही, कॉलेज आदि के छात्र-छात्राएं दूर दूर से आते, हरबेरियम के लिए जंगलों  में भटकते अक्सर उनसे मुलाकात पचमढ़ी की वनसंपदा की एक नई जानकारी दे जाती थी । कुछ दुर्लभ पौधे या  तो दक्षिण अफ्रीका या पचमढ़ी में ही पाये जाते हैं ऐसा उन शोधार्थियों का कहना था।  पचमढ़ी का अप्रतिम सौंदर्य मुझे सदैव अपनी ओर खींचता रहा है और इसी के आकर्षण से बंधा 1983 में केंद्रीय विद्यालय में स्थानांतरित होकर फिर जा पहुंचा सतपुड़ा की रानी की गोद में। इस बार अकेला नहीं पूरा परिवार साथ था, पुरानी स्मृतियों को संजोए एवं उनमें कुछ नया जोडऩे। विद्यालय से सटी पीछे  की पहाडिय़ों पर अठखेलियां करते और कभी कक्षाओं में घुस आते बादल एक नए रोमांच से भर देते लगता कि  कालीदास का मेघदूत रास्ता भटक गया है। छुट्टियों में क्वार्टर के पास से ही लिटिल फाल के किनारे किनारे यायावर की भांति कभी जटाशंकर तो कभी अप्सरा विहार की ओर निकल जाना तो कहीं पत्थरों पर बैठ झरने के संगीत में अपना स्वर मिलाते हुए गुनगुनाना, मन को असीम तृप्ति से भर देता था। अप्सरा विहार से आगे दुर्गम रास्ते पर चलते हुए सिल्वर प्रपात के दर्शन होते हैं, नीरव वन में एक चांदी की छड़ के मानिंद दिखता प्रपात और सन्नाटों को  चीरता उसका संगीत एक नई ऊर्जा को जन्म देता। पचमढ़ी के नागपंचमी एवं महाशिवरात्रि पर्व पर भरने वाले मेले और उनमें विदर्भ  तथा मराठवाड़ा से आने वाले लाखों श्रद्धालु , उन दिनों में संपूर्ण पचमढ़ी धर्ममय हो जाती है। नागपंचमी पर बरसते पानी में संकरे रास्तों पर 14 किमी नागद्वारी की दुर्दम पदयात्रा और शिवरात्रि पर भारी भरकम त्रिशूलों के साथ  श्रद्धालुओं का चौरागढ़ के शिखर पर चढऩा, श्रद्धा और आस्था के ऐसे रूप देखकर मन भक्तिभाव से भर जाता है। बड़ा महादेव, चौरागढ़, धूपगढ़, हांडीखोह, पांडव गुफाएं  (बौद्ध मठ ) नजदीक ही कंपनी गार्डन, पोलो गार्डन एवं ग्राउंड, स्काउट गाइड का नेशनल सेंटर, आर्मी का एशिया भर में मशहूर बैंड, ये सब पचमढ़ी के आकर्षण केंद्र तो हैं ही परन्तु इन सब से भी अलग अनेक दर्शनीय स्थल और हैं जो पचमढ़ी को प्राकृतिक सुषमा से समृद्धशाली  बनाते हैं। टेमीपूल से आगे छोटे महादेव, जम्बू द्वीप और बारीआम के पास से सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश  करने पर वटवृक्षों की लंबी पंक्ति वाला गांव वतकछार, नीमघान जहां वायसन के साथ साथ सफ़ेद पैर वाले  गौर के  झुंड विचरण करते सहज ही नजर आ जाते हैं, आगे चलने पर पत्थरों और पहाडिय़ों पर उछल कूद करती पहाड़ी नदी नागद्वारी मिलती है जिसके निर्मल जल में थकान दूर कर देने की अदभुत क्षमता है, बीच में जँगल के राजा शेर से भी मुलाकात की प्रबल संभावनाएं रहती हैं। थोड़ी थोड़ी दूरी पर आठ दस घरों वाले आदिवासी गांव  मिलते हैं जिन्हे देख बरबस ही मन्नाजी (भवानी प्रसाद मिश्र )की सतपुड़ा के जंगल कविता की याद आ जाती है।  आगे चलकर नागद्वारी की उन विशाल गुफाओं के दर्शन होते हैं जहां नागपंचमी में श्रद्धालु आकर रात्रि विश्राम  करते हैं, आगे बोरी के विशाल सागौन के सघन जंगल और उनसे गुजरते हुए धूपगढ़ की तलहटी के किनारे किनारे  चलते हुए सतपुड़ा उद्यान से बाहर निकलते हैं लगभग दो ढाई सौ किमी की इस यात्रा का अपना एक अलग ही  आनंद है। उन दिनों पचमढ़ी में साहित्यिक वातावरण सुखद एवं समृद्ध था, गोविन्द मिश्र ,निर्मल वर्मा, कांतिलाल  जैन सदैव अपने लेखन के सिलसिले में अक्सर पचमढ़ी आते रहते थे, इसके अतिरिक्त कई कविगण भी बीच बीच में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहते थे जिससे काव्य और विचार गोष्ठियों का क्रम सतत चलता रहता था। नगर के प्रबुद्ध जन के साथ ही व्यापारी वर्ग भी इन गोष्ठियों में सक्रिय भागीदारी करता था। कविता को जानने समझने की सोच मुझे यहीं से प्राप्त हुई। आज पचमढ़ी से दूर भले ही हो गया हूं पर पचमढ़ी मेरी स्मृतियों में आज भी अपनी  संपूर्ण आभा के साथ जीवित है ,रहेगी। ठ्ठ