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Sunday 25 Feb 2018

तुरइयां

विनोद शाही
ए 563 पालम विहार
गुरुग्राम-122017
मो.09814658098   
तुरइयां
पोखर में दलदल
दलदल में झाड़ी
झाड़ी पर चढ़ी बेल से लटकती बड़ी बड़ी तुरइयां
पल रहीं बेरोकटोक आसपास तैरते सांपों से रक्षित
ललचा गया मन किनारे खड़ी मज़दूरिन का उन पर
मिल जाएं तुरइयां तो सांझ होने पर हाट तक की बाट से बचूं
जल्दी से घर पहुंच शाकभाजी संग रोटी थाप बच्चों को परोसूं
उतरता देख उसे दलदल में दुविधा में पड़ गया सांप
न काटूं तो होगा नियम विरुद्ध
काटा तो हो जाएगा कहर
सोच विचार कर निकाली उसने तरकीब
निकाल कर फन सतह के ऊपर
फुंफकार कर यों तैरता हुआ चला गया वापिस
सतह के ऊपर ही ऊपर
सफाई से, करीने से, कौशल से सत्वर
कि एक लहर से दूसरी लहर को भी
कानों कान तक न हुई खबर
देख कर पहले तो डरी वह औरत
फिर जैसे आ गई हो उस की समझ में
जीवन की सारी कथा, नश्वर, पर अमर
ईंट गारे के तसले सिर पर उठा चढ़ गई थी आज ही वह
दसवें माले तक
गोया आकाश के घर तक
लचकती सीढ़ी पर साध कर सांस
एक एक कदम उठाती ऊपर की तरफ
जैसे पार कर मत्र्यलोक का सफर
पहुंची हो ब्रह्मरंध्र से हो क्षीरसागर पर तैरते वैकुंठयान पर ही
यों अब कहां मृत्यु का भय
लेकिन फिर भी जो भी हो खेल उसे
उस के ढब से खेल मिला करती है फुर्सत घर जाने की
और नहीं तो गोरखधंधे सा खेल
बना जी का जंजाल
न मरने देता न जीने ही देता
भेद रहस्य यों सारे जीवन के
उतर गई गहरे दलदल में
लेकिन उस के पैरों से नहीं एक भी लहर उठी
ज्यों का त्यों रह गया धरा सब इंद्रजाल
गुह्य, गर्भ पोखर नाभि की सर्पनाल में बंधने को
इच्छा शिशु के आन का था यही समय
लेकिन उस को उस औरत ने अपने सिर पर धरे हुए
जाने किस अदृश्य पात्र में यों रखा था प्राण रुद्र कर
कुछ भी उस से उछल उचक कर बाहर नहीं फिसल पाता था
दृष्टि लक्ष्य पर, देह मध्य के सम पर कायम थी
पग लय की धुन में, बांहें पृथ्वी के गुरुत्व-समांतर ठहरी थीं
कब पहुंची वह निकट बेल के किस ने जाना
नमस्कार कर सर्पगुरु को
जैसे ही उस ने हाथ बढ़ाया
दसों उंगलियां दस सांपों सी
झाड़ी के भीतर उतर गईं
झाड़ी के तीखे शूल
रुधिर की प्यास बुझाने तक से चूक
ताकते खड़े रह गए
हाथ लगीं यों दस तुरइया रस से चूतीं
इसी लोक की हो कर भी लोकोत्तर से बेहतर
ब्रह्मलीन भी उस की मस्ती को देख हुए जाते कातर