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Tuesday 21 Nov 2017

संस्कार, बेडिय़ों के हवाले से दो कविताएं

तबस्सुम फातिमा
डी-304 ताज एन्क्लेव गीता कालोनी दिल्ली-110031
मो. 9958583881
संस्कार, बेडिय़ों के
हवाले से दो कविताएं
(1)
आंसुओं से जन्म लेते हैं संस्कार
प्रथायें ख़त्म होने के बावजूद
जीवित रह जाती हैं
अपनी पुरानी शक्ल में/
दरवाजे के बाहर फन काढ़े सांप रहते हैं
इन के विष से
डराया जाता रहा है
परम्पराओं के नाम पर
कभी-कभी
यह विष पिलाया भी जाता रहा है हमें/

एक चीथड़ा आकाश
एक लरजती हुई धरती
एक टूटा हुआ सपना
तोहफे में देकर
कहा जाता है हम से/
बेडिय़ों में सुरक्षित हैं हम
असल जीवन बंदिशों में ही है/
बाड़ के उस पार भेडिय़े हैं/

पर कहां नहीं हैं भेडिय़े/
एक ठिठुरी रात में
बिखरे सपनों की ओर हाथ बढ़ाना
नियति है हमारी/
खुल के
मु_ी का बंद हो जाना
भाग्य है हमारा

(2)

नन्ही उम्र में
एक छोटे-टूटे रथ पर बैठा कर

उडऩे को कहा गया हमें/
मौसम खिजां का था
और हमें कहा गया
फूल चुनने के लिए
आसमान से उतारी गई बारिश
हमें ज़ख्मी करने के लिए थी/
बेडिय़ों का तोहफा भेजा गया
हमारी ज़ात को संवारने के लिए/
हवा में लहराता एक दुपट्टा था/
इसके बाहर थी लक्ष्मण-रेखा/
कमरे की खिड़कियां बंद रखी गईं
बाहर पेड़ों की कतार थी/
परिंदों की चहचहाहट
नीला आसमान, चांद, तारे
लेकिन यह सब हमारे लिए नहीं थे/
हमारे लिए केवल हम थे
अपने दुपट्टों की दुनिया में