Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

अब पत्थर लिख रहा हूँ इन दिनों

 

मोहन कुमार नागर
बेतवा अस्पताल,
डॉ जगदीश मार्किट
गंज बसोदा जिला- विदिशा
मो. 9893686175
अब पत्थर लिख रहा हूँ इन दिनों  
फूल लिखा
मुरझा गया !
कांटा लिखा
चुभ गया !
अब पत्थर लिख रहा हूं इन दिनों
थमाया जा सके जो
किसी मजलूम के हाथ
जा, तराश ले इसे
बना ले हथियार
कभी तो गुजरेगा हुक्मरां
तेरी बस्ती से ।

हम .. महज एक भीड़

हमारे पास
रिरियाने को मुंह
झुकाने को कमर
फैलाने को हाथ
पिचका पेट
ढलके कांधे  
धंसी  छातियां
सिर
जो गिनती में शामिल
पैर
जो चल पड़ते अग्रज की दिशा
कान
जो सुनते हैं बस हांका
हम
महज एक भीड़
भीड़ के पास दिमाग नहीं होता ।

प्रश्न  

गोदी से उतरते ही बड़े
चार किताबें पढ़ते ही सयाने
और अब प्रभातफेरी की जगह
कांधों पर तेल पिलाये ल_ लिए
वक्त को धमकाती कदमताल
ये किस सदी के बच्चे हैं
जो अपने ही बचपन का मर्सिया गा रहे हैं

मैं लिखता हूँ
मैं लिखता हूँ
कि इन दिनों अब
खुलकर बोलने से भय लगता है  
और चुप रहूँ
तो हुक्कामों कि जय लगता है !
मैं लिखता हूँ
कि ये लिखा  
उन तलक पहुंचे
जो मेरी ही तरह भयग्रस्त हैं
थक चले हैं, त्रस्त हैं
मैं लिखता हूँ
कि वे इस लिखे को पढ़ें
और ये जानकर भयमुक्त हो जाएँ
की वे अकेले नहीं !

आप मरे

आपने सुना
और डरे
आपने देखा
और डरे
आपने कहा
और और डरे
आप चुप रहे
और मरे !