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Tuesday 21 Nov 2017

अविश्वास की भीड़ बहुत है

डॉ. ओमप्रकाश सिंह
 259, शांति निकेतन, साकेत नगर, लालगंज रायबरेली-229001 (उ.प्र.)
मो. 09984412970
अविश्वास की
भीड़ बहुत है

अविश्वास की
भीड़ बहुत है
क्या होगा विश्वासों का।

मर्यादाएं
टूट रही हैं
सपनों के तहखानों में
अघटित
घटित हो रहा युग के
अपने ही पैमानों में
फिर यथार्थ के
पांव चुभे हैं
क्या होगा संत्रासों का।

अब संवेदन शून्य
हवाएं तोड़ रहीं
हरियल शाखें
फिसल रहे
संबंधों के पल
पथराई फिरतीं आंखें
स्नेह
कांच के गुलदस्ते में
क्या होगा अवसादों का।

झूठे पहरेदार
खड़े हैं
सच की बौनी चौखट पर
प्यास
निगोड़ी होंठ चबाये
इन आंखों के पनघट पर
बारूदी
मुस्कान भरे हैं
क्या होगा इतिहासों का।
परिचय के दरवाजे

आज अपरिचय का
कब्जा है
परिचय के दरवाजे

असली पर
नकली भारी है
आंगन और दुलारे
भ्रष्टाचार
घुसा घर भीतर
ठेल रहा अंगारे
सिंहासन ने
गजरे पहने
मुकुट नये साजे।

सरपंचों से
मुखिया तक की
बोली एक हुई
मुट्ठी में है
न्याय-व्यवस्था
जनता छुई-मुई
मौन अंधेरे
इस बस्ती में
बजा रहे हैं बाजे।

अंधा सच
अब धर्मराज के
कंधे पर बोले
झूठ निरापद
बाजारों में
सम्मानित डोले
भिखमंगे मन
हाथ पसारें
घर रहे महराजे।
बाजार सिर चढक़र बोले

बाजार-
अब अर्थ-व्यवस्था के सिर
चढक़र बोलें।
कहीं बिक रहे
लोटा-थाली
सोना-चांदी, हीरे
कहीं मोटरें
फ्रिज, फिल्टर तो
बिकते ढोल मंजीरे
जीने के
आकर्षक साधन
मन कहता है, छू लें।

बिकते रहते
मछली, चिडिय़ां
फूल, पत्तियां, पौधे
बिकें जानवर
और आदमी
मुर्गे, बकरी, अंडे
रिश्ते-नाते
और आचरण बिके
सत्य को खोलें।

देश भक्ति
ईमान बिक रहा
बिकीं संस्कृतियां
देश-द्रोह
करने की ठानें
ये पैसे की दुनिया
बिके हुए सिंहासन
घर-घर
अधरों पर विष घोलें।
वैश्विक-नीति
न्याय, दलबंदी
बिकी हुई सत्ताएं
यह बाजारवाद
विष बोये
तोड़ रहा सीमाएं
मानवता
घायल होती हैं
धरती, अम्बर डोलें।