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Tuesday 21 Nov 2017

चीन की दीवार

माला वर्मा
हाजीनगर, 24, परगना उत्तर
पश्चिम बंगाल-743135
मो. 09874115883
जब से मनुष्य को इतिहास, भूगोल का ज्ञान हुआ, सुदूर देशों की तरफ जाने की इसकी लालसा बढ़ती गई। कहीं-कहीं ये यात्रा उस देश पर हमला करके उसे जीत लेने की थी, कहीं व्यापार के लिए, कहीं ज्ञानवद्र्धन के लिए तो कहीं धर्म प्रचार के लिए। इस तरह दुनिया के हर हिस्से की जानकारी लोगों में उत्तरोत्तर बढ़ती गई। एक से बढक़र एक चीजें देखने-सुनने को मिलती गई। मानव मन आश्चर्यचकित होने लगा। समय-समय पर अचंभित कर देने वाले इन अजूबों की सूची जारी होती रही। इन अजूबों को उनकी महानता के हिसाब से क्रमवार नाम देने में विवाद उठ जाया करते थे। मगर एक बात निर्विवाद थी कि चीन की दीवार, मानव निर्मित सबसे बड़ा आश्चर्य है।  
चीन की दीवार के बारे में बचपन से ही हम लोग पढ़ते आए हैं तथा पुस्तकों में छपी इसकी तस्वीर से भी परिचित हैं। तस्वीर देखकर आभास होता है कोई सौ-पचास मील लम्बी मोटी चाहरदिवारी होगी जैसा कि पुराने जमाने में किसी किले या शहर को सुरक्षित रखने के लिए बनाया जाता था। आश्चर्य तो तब हुआ जब मुझे बीजिंग जाकर इसे करीब से देखने का सुअवसर मिला। इसकी विशालता को देख मैं दंग थी।
इस दीवार की पूरी लम्बाई पच्चीस हजार किलोमीटर है। यह पूरब में पीत सागर के नजदीक स्थित सनहाइग्वान से पश्चिम में टियेनशान पर्वतमाला में स्थित लोपनूर तक फैला हुआ है। यह दीवार काफी ऊपर नीचे, टेढ़ी-मेढ़ी तो कहीं सीधी दिखती है। कहीं-कहीं इसमें शाखाएं भी जुड़ी हैं। इसका निर्माण काल पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक है। अर्थात् लगभग दो हजार वर्ष तक इसमें जब-तब निर्माण व मरम्मत का काम होता रहा। यह दीवार बीजिंग के उत्तरी भाग में मंगोलिया के बार्डर के पास अवस्थित है। चीन के राजाओं ने अपनी उत्तरी सीमा को सुरक्षित करने के लिए इस दीवार को बनवाया था।
आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व चीन छोटे-छोटे राज्यों में विभाजित था। उन दिनों चीन के उत्तरी इलाके में क्वी, यान तथा हाऊ नाम के राज्यों ने अपनी सीमाओं को मंगोलियों से आने वाले लुटेरों से सुरक्षित रखने के लिए ये दीवारें बनवाई थी। तलवार भाले और तीर-धनुष के जमाने में सीमा सुरक्षा के तहत इस दीवार की एक अहम् भूमिका थी। हजारों किलोमीटर लम्बी यह दीवार पहले अलग-अलग टुकड़ों में बनी हुई थी। पड़ोसी राज्यों ने एक दूसरे के आक्रमणों से अपने राज्य को बचाने के लिए भी अपने-अपने राज्यों के सीमाओं में ये दीवारें खड़ी की थी। बाद में क्वीन शी हुवांग नाम के एक पराक्रमी राजा ने (सन् 230 ईसा पूर्व) इन सारे छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर एक में  मिलाया और एक महत् चीन की स्थापना की। इस राजा ने उत्तरी सीमा को अधिक सुरक्षित करने के लिए इन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी दीवारों को मिलाते हुए एक बड़ी दीवार का निर्माण करवाया। जिसे ग्रेट वाल ऑफ चाइना या चीन की दीवार कहा जाता है।
यह दीवार सर्पाकार आकृति या यों कहिए ड्रैगन की तरह पहाड़ों की चोटियों, घाटियों और पठारों से होती हुई दूर-दूर तक फैली हुई दिखती है। दीवार की ऊंचाई पांच से आठ मीटर तक है तथा चौड़ाई चार से दस मीटर है। दीवार पर बनी सडक़ें इतनी चौड़ी है कि उस पर छह-सात घोड़े आराम से एक साथ दौड़ सके। इन रास्तों पर कहीं सीढिय़ां बनी हैं तो कहीं ये बिल्कुल समतल है, तो कहीं एकदम ऊंची चढ़ाई। दीवार की इतनी चौड़ाई कभी सेना और उनके घोड़ों के चलने के लिए बनाई गई थी। दीवार पर लगभग हर दो सौ मीटर के फासले पर छोटे-छोटे मजबूत कमरे बने हुए हैं जो कभी वॉच टावर का काम करते थे। इनकी ऊंचाई जमीन से लगभग बीस मीटर है। कहीं-कहीं ये वॉच टावर कुछ बड़े आकार के बनाए गए हैं जिनमें हथियार वगैरह रखे जाते थे और वहां ज्यादा संख्या में सैनिक भी रहा करते थे अर्थात् ये टावर न होकर बैरक थे। कहीं-कहीं काफी ऊंचाई पर सिग्नल प्वाइन्ट्स बने हुए थे जहां से धुएं के रूप में (स्मोक सिग्नल) संदेश भेजे जाते थे।
इस दीवार को बनवाने में वहां के स्थानीय पदार्थों का इस्तेमाल किया गया है। पहाड़ी स्थानों में चट्टानी टुकड़ों का उपयोग किया गया है तो समतल स्थानों पर लकड़ी तथा मिट्टी को कड़ा करके काम में लाया गया है बाद के दिनों में ईंट का भी इस्तेमाल हुआ। इस दीवार का पुराना हिस्सा टूट-फूट गया है तथा कहीं-कहीं तो बिल्कुल गायब ही हो गया है। किसी-किसी स्थान पर तो ऐसा भी हुआ है कि दीवार के आसपास रहने वाले स्थानीय लोगों ने दीवार में लगे पत्थरों को अपने निजी कामों में लगा लिया। मसलन पत्थरों से अपने घर और सडक़ बना डाली। कहीं-कहीं किसी निर्माण में अगर ये दीवार बाधा बनी तो वहां दीवार को ही तोडक़र हटा दिया गया। किसी जगह वॉच टावर की छत गायब है तो कहीं पूरा वॉच टावर ही नदारद। कुछ स्थानों पर तो दीवार की ऊंचाई दो मीटर से भी कम रह गई है। कहीं-कहीं तो तीस-पैंतीस किलोमीटर तक की दीवार आंधी, तूफान, बरसात व ठंडा-गरम के कुप्रभाव से नष्ट होकर समतल हो गई है। कई पर्यटक तो इन स्थानों को भी देखना पसंद करते हैं।
मैं जब दीवार देखने गई तो सोच रखा था इस दीवार पर बहुत दूर तक चलती जाऊंगी पर दीवार की चढ़ाई-उतराई तथा सीढिय़ों की कठिन ऊंचाई से मेरा शरीर थोड़ी देर में ही थक गया। आधा किलोमीटर यात्रा ही दुरुह बन गई। जहां-तहां सीढिय़ों पर बैठकर कई पर्यटक सुस्ता रहे थे। इस स्थान से चारों तरफ जहां तक नजर जाती पहाडिय़ों पर दूर-दूर तक दीवार ही नजर आ रही थी। मैं यह सोचकर हैरान थी ये तो पहाड़ी का सिर्फ एक ही हिस्सा है ऐसे न जाने कितने पहाड़ और घाटियां होंगी जहां ये दीवार अंकित होगी। दीवार के आसपास चारों तरफ हरियाली ही हरियाली है जिसे देखकर थका शरीर भी तुरंत ऊर्जावान हो जाए। प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में यहां पर्यटक आते हैं। इस वक्त भी सैलानियों की भीड़ कुछ कम न थी। सब एक दूसरे की हौसला अफजाई करते हुए ज्यादा से ज्यादा दूरी तय करना चाहते थे, कम से कम एक बैरक (वॉच टावर) तक पहुंचने का लक्ष्य सभी ने रखा था। मैं भी उस ऊंचाई तक पहुंची। ठोस चट्टानों से बनी एक छोटी कोठरी जिसमें कई खुले झरोखे थे, इन झरोखों के पास खड़े होकर ठंडी हवा का मजा ले्।
चीन की दीवार के आसपास अनाज के गोदाम भी पाए गए हैं। जहां अनाज जमा किए जाते थे। ये अनाज दीवार बनाने वाले मजदूरों के काम आते थे। उनमें कई मजदूर अपने परिवार के साथ दुरुह कार्य में शामिल हो जाते ताकि ज्यादा से ज्यादा रुपए पैसे और अनाज की आमदनी हो सके। वहीं कई मजदूर अपने परिवार से दूर रहने पर मजबूर थे। इन सभी मजदूरों का जीवन बहुत ही कष्टमय था। इतिहासकारों का कहना है दीवार के निर्माण के दौरान अमूमन हर एक मीटर पर एक मजदूर की जान गई है। कल्पना कीजिए 25 हजार किलोमीटर की लम्बाई में कितनी जानें गई होंगी। दीवार बनने के बाद सैनिक दीवार की तह पर तीर चलाकर देखते थे कि दीवार मजबूत बनी है कि नहीं। एक भी तीर दीवार में अटक जाती तो वहां कार्यरत मजदूरों की खैर नहीं रहती। दीवार उसी वक्त मजबूत घोषित की जाती थी जब प्रत्येक तीर उससे टकराकर नीच गिर जाए। हर क्षेत्र में इसी तरह दीवार पर तीर चलाए जाते और मजबूती का जायजा लिया जाता।
वहां काम करने वाला मजदूर हताश और दुखदायी जीवन बिताता था। परिवार के साथ रहकर उन्हें चैन नहीं था। हर रात राजा के सैनिक जलती मशाल लिए हुए छावनी या टेंट में पहुंच जाते- ये देखने के लिए कहीं कोई मजदूर गायब तो नहीं। उनके आराम और खाने-पीने की समुचित व्यवस्था भी नहीं रहती थी। जो मजदूर अपने परिवार से दूर रहते थे उनका जीवन और भी दुखदायी था वे चाहकर भी अपने परिवार से मिल नहीं पाते थे और उनमें कितने तो कार्य के दौरान अपनी जान भी गंवा बैठते थे। दीवार के आसपास खुदाई में कई ऐसी पट्टियां मिली है जिन पर मजदूरों ने अपनी दुखभरी गाथाएं लिखी थीं। राजा के सिपाही हमेशा मजदूरों के करीब मंडराते रहते थे। काम में ढिलाई देख वे हंटर भी बरसाते थे। प्रचंड जाड़ा, बर्फबारी व तेज गर्मी में भी काम रुकता न था। किसी मजदूर की तबियत खराब रहे या अन्य कोई मानसिक तकलीफ इससे सैनिकों को कुछ लेना-देना नहीं था।
उत्तर दिशा से होने वाले बर्बर हूण तथा मंगोलों के आक्रमणों को इस दीवार ने वर्षों बखूबी रोके रखा। उधर से हमले बंद होने के बाद चीनी राजाओं ने इसकी देखरेख में ढिलाई की और दीवार टूटने-फूटने लगी। सोलहवीं सदी में मिंग राज्यवंश के लोगों का शासन आया। राजाओं ने इसकी उपयोगिता को फिर से समझा और दीवार का पुनरुद्धार किया। आज यह दीवार जहां अच्छी हालत में नजर आती है समझिए वहां मिंग वंश के राजाओं ने हाथ लगाया था।
इस दीवार को सन् 1234 में चंगेज खान ने पार कर चीन पर मंगोल वंश की स्थापना की थी। लगभग डेढ़ सौ वर्ष के शासन के बाद इस मंगोल वंश का खात्मा मिंग राजाओं ने किया। इसके अलावा सन् 1644 में इस दीवार को पार करने में मांन चू जाति लोगों को सफलता मिली जो एक साजिश के तहत हुआ था। उन्होंने सेना के कुछ पदाधिकारियों को अपनी तरफ मिला लिया था जिसके चलते मांन चू सेना दीवार को पार कर सकी। बाद में क्वी वंश का शासन आया और इसने चीन की सीमा को इस दीवार से भी आगे बढ़ा मंगोलिया को जीत लिया। इस तरह से मंगोल लोगों का हमला हमेशा के लिए खत्म हो गया और साथ ही खत्म हो गई इस दीवार की सामरिक उपयोगिता। इसके बाद उन पहाड़ी जगहों पर आने-जाने के लिए इस दीवार पर बने रास्ते का इस्तेमाल आम जनता करने लगी। चूंकि इसका सामरिक महत्व घट चुका था इसलिए इसके रखरखाव में भी अनदेखी हुई। दीवार का रखरखाव ठीक था मगर दूरदराज के इलाके धीरे-धीरे उपेक्षित होने लगे।
आज चीन की दीवार बाहरी लोगों के लिए आकर्षण का सर्वोच्च केन्द्र है। किसी भी देश का प्रधान अगर बीजिंग जाता है, वो ‘ग्रेट वाल’ देखने जरूर जाएगा। बीजिंग के पास स्थित बडालिंग नामक स्थान में यह दीवार काफी अच्छी अवस्था में है और अधिकांश पर्यटक वहीं जाते हैं। बीजिंग से लगभग 60-70 किलोमीटर दूर बडालिंग को एक बहुत ही चौड़े और सुंदर हाईवे से जोड़ दिया गया है। दूरदराज के इलाकों में कई जगहें और भी है जहां दीवार की हालत ठीक है और वहां भी पर्यटक जाते हैं। एक जगह तो ऐसी भी है जहां ये दीवार एक पहाड़ के तुंग पर चढ़ती नजर आती है- वहां सीढिय़ों की ऊंची चढ़ाई देखते ही बनती है। सोचकर आश्चर्य होता है इस दीवार पर जो सैनिक दौड़-भाग व आना-जाना करते होंगे, वे कितने बलशाली रहे होंगे और इन दीवारों को बनाने में कितनी मेहनत झोंकी गई होगी। ऐसे ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों की चोटियों पर ईंट-पत्थरों की ढुलाई कैसे हुई होगी? लगभग तीन से पांच लाख मजदूरों ने वर्षों कड़ी मेहनत के बाद इस महान दीवार का निर्माण किया था। उस युग में राजाओं ने बड़ी सख्ती से काम करवाया था। महाप्रतापी राजाओं के सैनिक आसपास के गांवों और बस्तियों से नौजवान लोगों को पकडक़र लाने और राजाज्ञा के तहत बेगार में भी काम करवाते। उत्तरी चीन में भयंकर ठंड पड़ती है। दिन-रात के खटने में कितने लोगों की मौत हुई इसका सही लेखा-जोखा नहीं मिलता। इन मजदूरों में एक बड़ी संख्या उनकी भी थी जो राजनैतिक बंदी थे। जेल में रखने से तो अच्छा है उनसे काम लिया जाए। उन लोगों के घर वापस न लौटने पर परिवार के लोगों ने उनकी काफी खोजबीन भी की और इस प्रयास में वे स्वयं अकालमृत्यु को प्राप्त हुए।
दीवार के ऊपरी हिस्से में किनारे की तरफ पूरी लम्बाई में, थोड़े-थोड़े अंतराल पर खाली जगहें छोड़ी गई हैं जहां से सैनिक नीचे मौजूद अपने दुश्मनों पर ईंट-पत्थर, गर्म-पानी, तीर-धनुष आदि से हमले किया करते थे। ठीक उसी तरह जिस तरह हमारे यहां के किलों में दिखता है।
अठारहवीं शताब्दी में पहली बार किसी यूरोपियन व्यक्ति ने चीन की दीवार देखी। पहले तो उसे समझ में नहीं आया कि कोई दीवार इस तरह बियाबान सुनसान में किस प्रयोग के तहत बनाई गई है। उत्सुक मन और भी जानने को बेकल हो उठा। उसने अपने सहयोगियों के साथ चर्चा की और इसके बाद महीनों की खोजबीन के बाद कहीं ठीक हालत में तो कहीं जीर्ण-शीर्ष हालात में दीवार दिखती गई। उस यूरोपियन को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि वहां के स्थानीय लोग इस अद्भुत दीवार के प्रति एकदम से उदासीन है। उसने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया और आगे छानबीन की। उसकी तत्परता और खोज के बाद चीन की दीवार जनसाधारण के बीच लोकप्रिय हुई और धीरे-धीरे पूरी दुनिया के सामने आया चीन की दीवार का अस्तित्व। उसके बाद से तो तहलका ही मच गया। कई खोजी लोगों ने वहां डेरा डाले और उसके बाद से आरंभ हुई दीवार के बारे में ज्यादा से ज्यादा ऐतिहासिक तथ्य को सामने लाने की होड़। कई दिशाओं में फैली ये पच्चीस हजार किलोमीटर की दीवार अपने आपमें एक अजूबा ही थी। कई जगह तो स्थानीय लोगों ने दीवार को तोडक़र इस पार से उस पार आने-जाने का मार्ग बना लिया था। उन्हें तो खैर इस दीवार के पुरातात्विक महत्व की जरा भी जानकारी नहीं थी। कहीं दीवार को तोडक़र मार्ग बनाया तो कहीं अपना घर तैयार किया। खैर उनका भी क्या दोष, सैकड़ों किलोमीटर की दीवार तो वैसे भी वक्त के थपेड़े से खराब होकर गिर चुकी थी।
सुनने में आया था चीन की दीवार चांद से भी दिखती है मगर यह बाता गलत है। खुद नील आर्मस्ट्रांग (चांद की सतह पर पैर रखने वाला प्रथम व्यक्ति) ने कहा था- चांद से चीन की दीवार नहीं दिखती। अन्य कई अंतरिक्ष यात्रियों ने भी इस बात की पुष्टि अपने तरीके से की है। इतना जरूर है अंतरिक्ष में जाने पर काफी ऊंचाई से दूरबीन के जरिए इस दीवार को देखा जा सकता।
विश्व के प्राचीन इतिहास पर गौर करें तो दिखता है कि अधिकांश जगहों पर कुछ जनजातियां ऐसी भी थी जो बगैर स्थायी निवास तथा खेती-बाड़ी के घूम-घूमकर खानाबदोश जैसा जीवन यापन करती थी। ये जनजातियां बड़ी तेजतर्रार तथा खूंखार प्रवृत्ति की होती थी। अपनी जरूरत के लिए ये स्थायी नगरवासियों पर हमला करते, लूटपाट मचाते और फिर किसी नये स्थान की ओर चल देते। ऐसे बर्बर लोगों ने इंग्लैंड से लेकर चीन देश तक धावा बोला। कभी इंग्लैंड वाइकिंग लुटेरों से परेशान था तो कहीं इन बर्बर लुटेरों ने इटली के लोगों को समुद्र में बने छोटे-छोटे टापुओं पर शरण लेने को मजबूर किया जो बाद में वेनिस शहर बना। हूण जाति ने हमारे भारत के पश्चिमोत्तर इलाकों को भी कम परेशान नहीं किया था। ऐसी ही परेशानी चीन को मंगोल और हूण जातियों से झेलनी पड़ी। इस समस्या से निबटने का एक नायाब नुस्खा चीन के दीवार के रूप में सामने आया, इसके साथ ही आया शहरों को या राजमहलों को दुश्मनों से बचाने के लिए एक ऊंची दीवार से पूरा का पूरा घेर देने का चलन।
आज चीन की दीवार एक विश्व धरोहर (वल्र्ड हेरिटेज) है और चीन ने अपनी सीमाएं सारी दुनिया के लिए खोल दी है। अब तो शायद ऐसा ही कोई अंतरराष्ट्रीय सैलानी होगा जिसके मन में इस दीवार पर चढऩे की बात न आती हो। माओ-त्से-तुंग ने कभी कहा था ‘‘वो पुरुष, पुरुष नहीं जो कभी ग्रेटवाल पर नहीं चढ़ा।’’ उनका इशारा तो अपने देशवासियों की तरफ ही था मगर इस खुलेपन के जमाने में यह संदेश पूरी दुनिया को जाता है। चीन की दीवार को करीब से देखने का मौका हो सकता है सबको न मिले मगर इसकी विस्तृत जानकारी लेकर भी मन को एक सुखद अनुभूति दी जा सकती है।
चीन के लोग चाय, गन पाउडर, प्रिंटिंग प्रेस तथा सिल्क के आविष्कारक के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपनी तकनीक को सदियों तक छिपाए रखा। चीन की इस विकसित सभ्यता पर आस-पड़ोस के बर्बर जातियों से हमेशा खतरा बना रहता था। इस दीवार के बनने से उन्होंने जरूर चैन की सांस ली तथा अपनी सभ्यता को और आगे बढ़ाया। चीन के लोग शुरू से ही अपनी सभ्यता संस्कृति के प्रति इतने सचेतन थे कि बाहर के कलुषित आचार-विचारों से अपने देश को बचाए रखना चाहते थे (सच पूछिए तो आज से लगभग पच्चीस वर्ष पूर्व तक यही हाल था) चीन के राजाओं ने इस दीवार के माध्यम से अपनी जमीनी सुरक्षा बढ़ाकर लोगों के निश्चिंत मन को अच्छी-अच्छी कारीगरी की तरफ प्रेरित किया। जैसे पोर्सलीन, एनामेल, धातु, लकड़ी तथा रेशम का काम चीन की कारीगरी की आज विश्वभर में चर्चा होती है। ऐसा लगता है अगर ये दीवार न होती तो चीन कुछ और ही होता। मेरा ये वर्णन काफी संक्षिप्त है मगर इस दीवार की विशालता का कुछ आभास आपको जरूर मिला होगा।