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Tuesday 21 Nov 2017

जेल- एक दिग्दर्शन

बलदेव कृष्ण कपूर
491, कृष्णापुरी,
मुजफ्फरनगर (यूपी)
मो. 08126425570
हमारे स्कूल के सातवीं और आठवीं क्लास के किशोर-किशोरियों को, भीतर ले जाकर जेल दिखाने का हमारा मंतव्य यह था कि आज के सामाजिक परिवेश में पल-बढ़ रहे बच्चों की नकारात्मक सोच, उच्छृंखला, उदण्डता, जोर-जबरदस्ती वाले आचरण का अंजाम अपनी आंखों से देख सकें।
प्रदेश के गृह विभाग ने हमारी प्रार्थना को इस प्रतिबंध के साथ स्वीकार किया था कि खूंखार और शातिर अपराधियों की बैरकों में बच्चों को नहीं जाने दिया जाएगा।
रेलवे क्रासिंग को पार करते ही, दूर से ही दिखाई दे जाता है जिला कारागार का विशालकाय भवन। बाहरी द्वार, लोहे के गार्टर का बना हुआ है। अंदर घुसते ही खूब चौड़ा रास्ता है जिसके दोनों ओर शांत, लावारिस, कुछ सूखे कुछ हरे पौधे हैं। पच्चीस-तीस मीटर चलने के बाद मिलता है मुख्य द्वार। द्वार के ऊपर, पुलिस विभाग की पहचान कराती लाल और गहरे नीले रंग की पृष्ठभूमि पर बहुत बड़े-बड़े स$फेद अक्षरों में लिखा है- ‘‘जिला कारागार मुजफ्फरनगर’’। गेट पर दोनों ओर सिपाही तैनात हैं। हमारे वहां पहुंचने की सूचना तुरंत जेल अधिकारियों को दी गई। जेल अधीक्षक और जेलर ने आकर सद्भावनापूर्वक हमारी टीम का स्वागत किया। जेल के भीतर कुछ सूचनाएं भेजी गई अैर तब, कुछ मिनट बाद कहा गया- ‘‘अब बच्चों को अंदर ले आइए।’’
जहां हम खड़े थे, वह एक बहुत बड़ा लौह द्वार है, जो प्राय: बंद रहता है। अंदर घुसने के लिए उस लौह द्वार में ही खिडक़ीनुमा एक छोटा द्वार है। उसी में से हमने और बच्चों ने जेल के अंदर प्रवेश किया। घुसते ही यों लगा जैसे शाम हो गई हो। बाहर का उजाला और बाहर की खुली हवा बाहर ही छूट गई। जेल के भीतर की दुनिया का यहां से आगमन होता है। यह एक बरामदा है। ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं पूरी तरह से बंद। फौलादी दीवारें, न कोई रोशनदान, न कोई जंगल। घुसने के लिए छोटी सी खिडक़ी है जो ‘‘खुल-जा और बंद-हो-जा सिमसिम’’ की तर्ज पर पूरी तरह बंद हो चुकी थी। इस सुरंगनुमा बरामदे में ही दायीं ओर जेल अधिकारी का ऑफिस है। बिजली की रोशनी में ऑफिस निर्लिप्त भाव से मुस्करा रहा था। उस लम्बे बरामदे को पार कर, सीमाओं से घिरे, चमकीले आकाश को देखकर हमें कुछ राहत मिली। यह एक अच्छा चौड़ा आंगन है, जिसके इधर-उधर कई इमारतें हैं। आंगन के एक ओर थोड़ा उठा हुआ एक चबूतरा है, जिस पर चालीस-पचास लोग खड़े हो सकते हैं। इस चबूतरे से सटी दीवार के पीछे उन कैदियों की बैरक है जो अभी वयस्क नहीं है। बरामदे और चबूतरे के बीच कोई सात-आठ फुट चौड़ा एक रास्ता है। हमें उस रास्ते की ओर बढऩे का संकेत किया गया। थोड़ा चलते ही, गलीनुमा यह रास्ता बायीं ओर मुड़ जाता  है। उसी मार्ग पर हमारी टीम को ले जाया गया। ताजमहल को दिखाते गाइड जैसे ही सिपाही हमारी टीम के आगे चल रहे थे। उनके पीछे मैं और प्रिंसिपल। बीच में बच्चे, बगुले जैसी स$फेद यूनीफार्म, ब्राउन कोट और काले शूज पहने हुए। उनके पीछे हमारी टीम के दो सदस्य और टीचर। सबसे पीछे फिर दो-तीन सिपाही चल रहे थे। पीली धूप नीचे उतरने का प्रयास कर रही थी। उस तंग गली में कुछ ही कदम चलने पर हमें लगा किसी पिछड़े देहात में ले आए हैं हमें। हमें बताया गया कि यह दाहिनी ओर की इमारत महिला कैदियों की बैरक है। लगभग साढ़े पांच फुट ऊंची, पुरानी लकड़ी की चौखट वाला दरवाजा। अंदर घुसते ही मिली मिट्टी की सोंधी गंध के साथ गोबर की अजनबी गंध। यह एक छोटा-सा आंगन है। पहले कैसा रहा होगा, पता नहीं। आज इस पर सुघढ़ता से गोबर की लिपाई कर उसे दो-तीन छोटी-छोटी सफेद कली-चूने से बनी अल्पना से सजाया गया है। आंगन बहुत छोटा है। दाहिनी कोने में वार्डन की छोटी-सी कोठरी है। लिपे हुए आंगन से आगे लगभग दो हाथ चौड़ा और कोई आठ-दस हाथ लम्बा एक चबूतरा है, जिसके पीछे है लोहे की सलाखों वाला बंदीगृह। स्कूल के बच्चे सुविधापूर्वक महिला कैदियों से मिल सकें, उनसे बातें कर सकें, इस उद्देश्य से सभी महिला कैदियों को चबूतरे पर पंक्ति में खड़ा कर दिया गया है।
यूनीफार्म में सजे-धजे ये पैंसठ बच्चे उस छोटे से आंगन में भला कैसे समाते। फिर भी वे सटकर खड़े अवाक देख रहे थे। उनकी आंखों में कौतूहल तैर रहा था। गोबर की लिपाई अभी सूखी नहीं थी। काले बूट उसमें धंसे तो पलभर के लिए उनका ध्यान नीचे फर्श पर गया। तुरंत उस ओर से बेखबर वे चुपचाप ताक रहे थे उन कैदी औरतों को। दृश्य अद्भुत था। कैदी महिलाएं अचम्भ से अपलक इन सजे-धजे ऊंचे परिवारों के बच्चों को निहार रही थीं। न कोई आवाज, न कोई शब्द। न ऊपर पक्षी, न हवा का झोंका। अपराध मिली कसैली हवा में दोनों ओर कौतुहल था। कुछ क्षण ऐसे ही बीते। उसके बाद हमारे साथ आए सिपाहियों में से एक ने हमारी ओर देखकर कहा आप चाहें तो इनसे बातें कर सकते हैं।
हमने देखा वयोवृद्ध औरतें दूर कोने में खड़ी अपने दुपट्टे से आधा मुंह ढंके आंखें चुराती-सी हमें निहार रही थी। बीच में खड़ी, अधेड़ उम्र की औरतें थी और हमारे निकट खड़ी कुछ युवा लड़कियां थीं। हमारी टीम के बच्चे नहीं समझ पा रहे थे कि उन कैदी महिलाओं से क्या बात की जाए या शायद वे सकुचा रहे थे। दो चार पल यों ही एक दूसरे को देखते रहने के बाद एक छात्रा ने आगे बढक़र उस वयोवृद्ध कैदी महिला से पूछा जो आगे खड़ी औरत की ओट में छुपने का प्रयास कर रही थी : ‘‘आंटी, क्या आपने सचमुच कोई अपराध किया था?’’ औरत ने धीरे से सहमति में सिर हिलाया। छात्रा ने फिर पूछा- ‘‘क्या आप हमें बताएंगी किस अपराध की सजा में आप यहां बंद हैं?’’
औरत ने कोई उत्तर नहीं दिया। पास खड़ी जेल वार्डन ने प्रोत्साहित करते हुए उस महिला कैदी से कहा- ‘‘हां, हां। बता दो इन्हें। बच्चे हैं। जानना चाहते हैं तो बताओ इन्हें।’’ तब उस पचास-साठ साल की औरत ने अपने मुंह पर रखे दुपट्टे को हटाकर बताया- ‘‘मैं मेरठ के प्रसिद्ध सेठ... की पत्नी हूं। दहेज के लिए अपनी बहू की हत्या की थी मैंने।’’ छात्रा ने फिर प्रश्न किया- ‘‘आंटी! क्या आपको अपने किए का पछतावा है?’’ औरत की आंखें डबडबा आई। धीमे स्वर में उसने कहा- ‘‘हां! सारा घर तबाह हो गया है!!’’
किनारे खड़े एक छात्र ने बीच में खड़ी एक औरत से पूछा- ‘‘आंटी! आपने क्या किया था?’’ उत्तर मिला- ‘‘अपहरण किया था एक बच्चे का।’’ उसके बाद तो कई छात्र-छात्राओं ने कैदियों से उनके अपराध के बारे में पूछा। किसी ने मारपीट की तो किसी ने चोरी करना स्वीकार किया। कैदियों की पंक्ति में आगे खड़ी दो युवतियों ने जेब काटना स्वीकार किया। जब बच्चों ने उन कैदियों से अपने किए पर पछतावे के बारे में पूछा तो बहुत कम ने कहा कि उन्हें अपने किए पर पछतावा है। अधिकतर ने इस प्रश्न को टाल दिया और कईयों ने खुलकर कहा- ‘‘नहीं, हमें कोई पछतावा नहीं।’’
उन महिला कैदियों में से दो के साथ सटकर खड़े दो बच्चेे दिखाई पड़े। हमने वार्डन से पूछा- ‘‘ये कौन हैं?’’ उत्तर मिला- ‘‘ये उन दो महिला कैदियों के बच्चे हैं। स्कूल भी जाते हैं। स्कूल आने-जाने का, कापी किताब का खर्च जेल विभाग देता  है।’’
इतनी देर की बातचीत के बाद कैदियों और दर्शकों के बीच का संकोच बहुत हद तक मिट चुका था। कुछ कैदी औरतों ने प्रशंसा भरी आंखों से हमारी टीम के बच्चों को देखते हुए कहा- ‘‘काश! हमारे बच्चे भी इन जैसे होते!!’’ इतने में स्कूल के चपरासियों द्वारा लाए गए फल आंगन में रखे जा चुके थे। जब छात्र-छात्राएं अपने हाथ से कैदियों को फल दे रहे थे, तो कैदियों का संकोच के साथ उन फलों को पकडऩा, क्षण भर हाथ में पकडक़र उन फलों को निहारना, विचित्र दृश्य था। कैदी महिलाओं के साथ खड़े दो बच्चों के हाथ में जब फल दिए गए तो उनके चेहरों पर एकाएक उभरी चमक और गालों से छलककर गिर रही खुशी देखने लायक थी।
हमारे गाइड सिपाहियों ने हमें दूसरी बैरक में जाने के लिए इशारा किया। गाइड के पीछे-पीछे हम सब उसी तंग गली से होकर वापस बड़े आंगन में आ गए। आंगन के एक कोने में बना हुआ लम्बा-चौड़ा चबूतरा जो उस समय खाली पड़ा था, अब भर चुका था। चबूतरे के प्रारंभिक भाग पर कुछ कुर्सियां रखी थीं। कुर्सियों के दाहिनी ओर एक मेज और दो कुर्सियां जेल अधीक्षक और जेलर के लिए रखी थीं। कुर्सियों के सामने लगभग चालीस-पचास किशोर कैदी कुछ बैठे, कुछ खड़े थे। गाइड द्वारा बताया गया कि इस चबूतरे के पीछे नाबालिग कैदियों की बैरक है। हमसे मिलने के लिए इन सबको इस चबूतरे पर लाकर बैठाया गया। जेल अधीक्षक ने परस्पर परिचय कराया। हमें बताया कि ये सामने बैठे सब लडक़े बच्चा जेल के कैदी हैं जो विभिन्न अपराधों में यहां जेल की सजा भोग रहे हैं। हमें बताया गया कि नाबालिग कैदियों के लिए सुधार गृह अलग भवन में बनाया जाएगा।
जेल अधीक्षक ने सब कैदी-लडक़ों को, जो खड़े हुए थे, कुर्सियों के सामने बैठ जाने के लिए कहा और हमारा परिचय बताया। तब भी कम लोग हमारे निकट आकर कुर्सियों के सामने बैठे, शेष सब दूर खड़े हमें निराहते रहे। अधीक्षक ने हमारे बच्चों की ओर तथा हमारी ओर देखते हुए कहा- आप इनसे बातचीत कर सकते हैं।
प्रिंसिपल ने सामने बैठे एक कैदी लडक़े से पूछा- तुम्हारी उम्र कितनी है?
‘‘सत्रह साल’’
‘‘कब से यहां हो?’’
‘‘पिछले तीन महीने से।’’
‘‘किस वजह से सजा हुई थी?’’
‘‘एक लडक़े का अपहरण किया था।’’
‘‘अकेले या मिलकर?’’
‘‘अकेला नहीं। एक साथी और था।’’
‘‘कोई अ$फसोस या दुख है तुम्हें अपने किए पर?’’
लडक़ा मुस्कराया और खड़ा हो गया। बोला- ‘‘नहीं, बिल्कुल नहीं।’’ दूर खड़े कई अपराधी लडक़े पास आ गए। जेल अधीक्षक ने फिर उन्हें बैठने का इशारा किया। उनमें से एक से मैंने पूछा- ‘‘तुम्हारा नाम?’’
‘‘रऊफ’’
‘‘कहां तक पढ़े हो?’’
‘‘छटी कीलास तक’’
‘‘यहां क्यों आना पड़ा?’’
‘‘चोरी करी थी’’
मैं देख रहा था कोई बच्चा कैदी पांच-साढ़े पांच फुट से कम लम्बा नहीं था उनमें से किसी के चेहरे पर मुझे कोमलता का भाव दिखाई नहीं पड़ा। हमारे पास खड़े कुछ छात्रों ने भी किशोर कैदियों से अपराधों के बारे में पूछा। किसी ने बताया चोरी की थी, किसी ने अपहरण, किसी ने जेब काटी थी और किसी ने दुराचार किया था। जब यह पूछा गया कि जेल से छूटने के बाद फिर तो ऐसा काम नहीं करोगे, अधिकतर ने शरारतभरी मुस्कराहट के साथ कहा ‘‘पता नहीं।’’ तभी हमारी टीम के बच्चों द्वारा सामने खड़े किशोर कैदियों को सद्भावना के प्रतीक के रूप में फल भेंट करने का कार्यक्रम शुरू हो गया। उसके बाद, गृह विभाग द्वारा स्वीकृत कार्यक्रम के अनुसार हमें जेल में स्थित अस्पताल के मरीजों से मिलने और उन्हें फल भेंट करने के लिए दूसरी इमारत में ले जाया गया। यह एक छोटा-सा अस्पताल है। लगभग दस या बारह बिस्तर की क्षमता वाला। इस इमारत में प्रवेश करने से पहले हमें एक छोटी-सी डिस्पेंसरी मिली, जिसमें उस समय कोई डॉक्टर या नर्स मौजूद नहीं था। डिस्पेंसरी और अस्पताल की बिल्डिंग में पक्की सीमेंटिड फर्श थी। अस्पताल में भर्ती रोगियों के कमरे में हमारी टीम ने जब प्रवेश किया तो कमरे में बिल्कुल सन्नाटा था।
दो पंक्तियों में पलंग बिछे थे। कमरे में घुसते ही पहले पलंग पर एक वृद्ध कैदी अधलेटा था। दुबला शरीर, चेहरे पर निराशा और ऊब। अगला कैदी अधेड़ आयु का था जो लेटा हुआ था। हमें देखकर उसने उठने की कोशिश की। शेष लेटे हुए थे। छात्र-छात्राओं ने उनका हाल-चाल पूछा। रोगियों ने शब्दों में नहीं, आंखों से उत्तर दिया- अहो भाग्य! आज इस कमरे में बच्चों की आवाज सुनने को मिली। दूसरी ओर, बच्चों की आंखों से टपकती संवेदना पूरे कमरे में फैल गई थी। शब्द बहुत कम और भाव-तरंगें ही एक-दूसरे को संदेश भेजने का काम कर रही थी। अधलेटे वृद्ध के पास जाकर एक छात्रा ने पूछा- ‘‘बाबा जी, आपके बच्चे थे?’’
‘‘हां।’’
‘‘कहां पर थे?’’
‘‘तितावी गांव में।’’
‘‘आप बीमार कब से हैं?’’
वृद्ध ने कोई उत्तर नहीं दिया। एक मुरझाई हुई मुस्कान के साथ उसने छात्रा की ओर देखा। बस यही उसका उत्तर था।
बच्चों ने पलंग पर लेटे प्रत्येक रोगी के पास जाकर अपने हाथों से उन्हें केले और सेव भेंट किए। अपनी-अपनी शैय्या पर पड़े बीमार कैदियों के मायूस चेहरों पर अंधेरे में जुगनू की चमक जैसी खुशी उभरी।
इसके बाद गाइड सिपाहियों ने हमसे कहा- आइये आपको रसोई दिखाएं सब कैदियों के लिए जहां पर खाना तैयार हो रहा है। इस समय सब कैदियों को दोपहर का भोजन देने का समय हो चुका था। जेल के अस्पताल से जेल की रसोई कुछ दूर थी। रास्ते में कई बार इधर-उधर मुडऩा पड़ा। एक स्थान पर मैं रुक गया। नितांत अनापेक्षित दृश्य! खुले आंगन को पार करते हुए एक ओर मुड़ते ही पीपल का विशाल वृक्ष। उसका तना किसी संन्यासी की जटाओं की तरह मुक्त भाव से फैला हुआ। मोटे तने की जड़ में रखा एक शिवलिंग और शिवलिंग के निकट आंखें मूंदे साधनारत बैठा हुआ एक अधेड़ उम्र का कैदी। वाह! जहां चाह हो, वहां राह निकल ही आती है। जेल की चतुर्दिक घुटन के बीच छोटी-सी दिए की लौ ने मुझे कुछ पल वहां पर रोक लिया। इतने में हमारी टीम के अन्य सब लोग गाइड सिपाहियों के साथ तेजी से आगे जा चुके थे। मैं अकेला इधर-उधर देखता हुआ धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। कुछ दूर जाने पर खुले आकाश के नीचे बायीं ओर मुझे सीखचों वाला एक दरवाजा दिखाई पड़ा। उस पार भी खुला हुआ विस्तृत आंगन था। मैं झांककर देखा, कोई आकृति दिखाई नहीं पड़ी। पूरी हवा में हिंसा की डरावनी गंधी और दूर बैरकों से ललकार-भरी चीख सुनाई पड़ी। रोंगटे खड़े हो गए। मुझे खोजते हुए एक सिपाही ने तत्काल मेरे पास आकर कहा- उधर जाना मना है। उन बैरकों में बहुत खूंखार, भयानक और शातिर कैदी बंद है। आइए सब लोग आपका वहां इंतजार कर रहे हैं। सिपाही की बात मानकर मैं आगे बढ़ा। पांच-छ: कदम चलने के बाद मुझे फिर उसी दीवार में एक और सींखचों वाला दरवाजा दिखाई पड़ा। झांक कर देखा तो एक लम्बा-सा कमरा दिखाई पड़ा। चलती हुई रेलवे-बोगी जैसा। नीचे ईंटों का फर्श। उस पर थोड़ी-थोड़ी जगह छोडक़र बिछे हुए कम्बल। हर कम्बल के पास रखा हुआ छोटा-मोटा सामान जैसे थैला। एक कम्बल पर पलोथी मारे गोलाकार में बैठे छ: कैदी बे$िफक्री से ताश खेलते न•ार आए, हालांकि ताश का कोई पत्ता सामने दिखाई नहीं दे रहा था। इनमें से दो सिख युवक केसरिया सा$फा लपेटे आपस में जोर-जोर से ठहाके लगा रहे थे।
मुझे शीघ्र अपने साथ आगे ले जाने को तत्पर सिपाही ने मेरी ओर देखा। मैं फुर्ती से आगे बढ़ा। सिपाही के साथ हम सब जेल की रसोई देखने पहुंचे। रसोई की इमारत में ही एक छोटे कमरे में आटा पीसने की चक्की लगी हुई थी। आधुनिक तकनीक की चक्की बड़ी तेजी के साथ आटा पीस रही थी। आटा पीसने वाली मशीन कमरे के अंदर चल रही थी और पिसा हुआ आटा छोटी खिडक़ी से होता हुआ बाहर बरामदे में आ रहा था।
इसके बाद हमें मुख्य रसोई घर दिखाया गया। काफी बड़ा कमरा था, किन्तु रोशनी बहुत कम। बिजली के बल्बों से पूरा कमरा आलोकित था। बायीं ओर लोहे के बहुत बड़े-बड़े आयताकार चार तवे रखे थे। उनके नीचे भट्ठी जैसी जलती आग। पूरा तल ढका जा सके, इस प्रकार सभी तवों पर एक साथ मशीनी गति से औसत साईज की अनेक गोल-गोल रोटियां तेजी से पटकी जा रही थी और मामूली सेंक लगते ही फटाफट कच्ची-पक्की उठाकर एक बहुत बड़े टोकरे में डाली जा रही थी। रोटियों को देखकर मन पूछता था- क्या इन्हें खाया जा सकता है?
इसके बाद हम थोड़ा आगे बढ़े तो दो बहुत बड़े-बड़े बर्तन जमीन पर रखे मिले। हमें बताया गया कि यह दाल है और वह सब्जी। एक बड़े कर्छे से उस तरल पदार्थ को हिलाकर, नीचे तक घुमाकर दिखाया गया। दाल को देखकर मेरी और प्रिंसिपल की आंखों में तैरते संशय और आश्चर्य को, पास खड़े कर्मचारी ने भांप लिया। उसने पतले, पीले, तरल पदार्थ में खूब नीचे तक कर्छे को घुमाया और भरा हुआ कर्छा हमें दिखाते हुए कहा- ‘‘देखिए मैडम, यह दाल है।’’ हमें विश्वास हो गया कि यदि उतनी गहराई तक कोई जाए तो उसे दाल मिल सकती है। यही हाल दूसरे बर्तन में पकाई गई सब्जी का था। पीले रंग के इस सूप को देखकर मैंने पूछा- ‘‘यह कौन सी सब्जी है?’’ उत्तर मिला- ‘‘कई सब्जियां मिक्स हैं।’’
लबालब भरे दोनों बर्तनों में से भाप उठ रही थी। महक का दूर-दूर तक नामोनिशान नहीं था। मैं पल भर देखता रहा दाल, सब्जी और रोटियों को और फिर आंखें मंूदकर मन ही मन कहा, रोटियों में मौजूद हे अन्न-देवता! दाल और सब्जी में मौजूद हे जल देवता! तुम्हें शत्-शत् प्रमाण! इस जेल की हवा में सांस लेने वाले इन अभिशप्त प्राणियों के पेट की आग को बुझाते रहना!!
स्वीकृत कार्यक्रम के अनुसार हमारी विजिट पूरी हो चुकी थी। खुला आंगन और अंधेरी गुफा जैसे जेल ऑफिस को पार कर हम जेल के मुख्य द्वार पर आ गये थे। जेल अधीक्षक और जेलर ने हमारे स्कूल के बच्चों की प्रशंसा करते हुए कहा- ‘‘मैडम! आपके स्कूल के बच्चे बड़े डिसिप्लिंड हैं।’’
चमकती आंखें और कौतुहल के साथ जेल में घुसे बच्चे बोझल मन और लटके हुए चेहरे लेकर वापस जा रहे थे। जेल अधीक्षक ने एक बच्चे से पूछा- बेटा! जेल के अंदर की यह वि•िाट आपको कैसी लगी?’’
बच्चेे ने तत्काल अंग्रेजी में उत्तर दिया- ‘‘सर! ए प्रैक्टीकल वार्निंग!’’ हिन्दी में अनुवाद था- ‘‘श्रीमन! यह हम सबके लिए एक साक्षात् चेतावनी है।’’
मुख्य द्वार पर खड़े जेल अधीक्षक ने मुझसे और प्रिंसिपल से कहा- ‘‘अब चाय पीकर जाइयेगा।’’ हमने जल्दी से दोनों हाथ जोडक़र कहा- ‘‘धन्यवाद!’’ और तेज कदमों से उस अभिशप्त हवा से बाहर आ गए।