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Saturday 18 Nov 2017

पागल कुत्ता

मलयालम कहानी
एस.के. पोट्टेक्काट्ट
अनुवाद- डॉ. आरसु
साकेत, स्पिनिंग मिल के पास,
 पो. चेलेंबरा, जिला- मल्लपुरम- 673634, केरल
मो. 9847762021

सूर्योदय काफी पहले हुआ था। लेकिन किरण अब तक नहीं जाग उठा। जो धोती पहनी थी उससे शरीर ओढक़र वह सिकुड़ लेटा है। वैसे तो नींद पहले ही टूट गई थी। शरीर पूरा गंदा है। काले मोटे कपड़े के भीतर एक मेंढक के समान आंख खोलकर बिना हिले लेटा है।
यों आधा घंटा बीत गया। फिर वह धीरे उठा। धोती ठीक करके पहन ली। दो-तीन बार खांसी आई। फिर आंगन में उतर आया और चारों ओर देखने लगा।
किरण की बूढ़ी मां आंख मूंदकर एक आंगन में बैठी है। वे नब्बे साल की हैं। रोशनी में फेंके गए उल्लू के समान वह बुढिय़ा दिख पड़ती है। किरण का छह साल का लडक़ा चात्तन नारियल के डंठल से खेल रहा है। डंठल के दो छोरों पर दो लकडिय़ां बांध रखी है। उसको एक बैल के रूप में मानकर रस्सी से बांध रखा है। हाथ में एक छड़ी है। वह लेकर बैल को हांकने के ढंग से कुछ आवा भी निकाल रहा है। अपने आप बोलते हुए गर्दन हिलाकर पूरे आंगन में चक्कर काट रहा है।
कुटिया के सामने विशाल खेत है। किरण ने उस ओर देखा।  फसल काट ली थी। इसके बाद खेत खाली पड़ा है और कुछ काम शुरू नहीं है। फसल में मिला धान सब अब तक खत्म हो गया है। पिछले तीन महीनों से कुटिया के लोग भूख से तरस पड़ते हैं।
उसकी चेरूमी (जाति विशेष) की धीमी आवाज सुनाई पड़ी। वह एक बच्चे को जन्म देने वाली है। ऐसा लगा कि अविलंब प्रसव होने वाला है। बहरहाल किरण के पास कुछ भी पैसा नहीं है। हां, एक चवन्नी बची है, किरण ने खेत की ओर देखा। उधर की शून्यता उसके विचारों में भी फैल गई। उसके सामने और कोई चारा नहीं है।
किरण धीरे-धीरे खेत की ओर चल पड़ा। वह कुछ समय तक उधर झुककर खड़ा हो गया। पोखर से हाथ में पानी लेकर दो-तीन बार मुंह धोया, कुल्ला कर लिया। धोती के पल्लू से चेहरा पोंछा। मेड़ से होकर सडक़ को लक्ष्य करके चल पड़ा।
सडक़ पर पहुंचा था। उधर एक दूकान के सामने एक बड़ी भीड़ को देखा। उसका ध्यान उधर टिका। भीड़ से जरा हटकर जिज्ञासु  होकर वह उधर खड़ा हो गया। रामन नायर तथा आले मापिला बातें कर रहे थे। वह उस ओर ध्यान देने लगा।
‘‘कहिए रामन नायर जी- कंडक्कुरूप्प की दुकान के सामने बड़ी भीड़ है- क्या वजह है?’’
‘‘सुनिए- चाप्पुण्णी नायर जी का वह लाल कुत्ता है, वह पागल हो गया है। कल उसने पांच कुत्तों तथा एक गाय को काटा। आज सुबह वण्णान केलु के लडक़े को भी काटा। केलु लडक़े को अस्पताल ले जा रहा है। उसके पहले गांव के मुखिया का प्रमाण पत्र लेना है। उसके लिए इधर आया है।’’
‘‘गांव-मुखिया के प्रमाण पत्र की क्या जरूरत है?’’
‘‘पागल कुत्ता काटने का मामला है तो पांच या छह आना सरकार देगी। यह यात्रा तथा अन्य खर्च के लिए है।’’
अलि मापिला उस भीड़ में जल्दबाजी में घुस लिया। लडक़े को गोद में बिठाकर कर केलु लोगों की ओर देख रहा था। अब क्या करना होगा? उसके चेहरे पर दयनीय भाव झलक रहा था।
सिर पर सब्जी की टोकरी रखे चंतन ने केलु को उपदेश दिया- ‘‘केलु, लडक़े को लेकर जल्दी जा। मुखिया घर में होंगे।’’
केलु लडक़े को कंधे पर ढोकर मुखिया के घर की ओर चल पड़ा। भीड़ तितर-बितर हो गई। किरण भी वापस गया। वह करुप्पन की चाय दुकान के सामने आ गया। दुकान के सामने सडक़ के छोर पर बैठकर उसने कहा- ‘‘एक चाय दो भइया।’’
दस मिनिट में उसे चाय मिली। ‘‘शक्कर और पत्ती सब कायदे से डाला है। आगे कुछ मत पूछना।’’ चाय वाले ने कहा।
पहले एक चाय के लिए कहेगा। चाय देने पर आगे कहे पत्ती ज्यादा हो गई। रा पानी डालो- ऐसा कहेगा। वह देने पर फिर कहेगा- शक्कर कम है मालिक। तब शक्कर डालेगा। यों बार-बार चाय मांगना किरण की आदत है। करुप्पन को इसका पता है। शक्कर और चाय पत्ती का दाम बढ़ते वक्त करुप्पन ऐसी मांग का ख्याल नहीं करेगा।
मालिक की चेतावनी से किरण निराश हो गया। गिलास दोनों हाथों से पकडक़र दो-तीन बार फूंक-फूंककर वह चाय पीने लगा। चुस्कियां लेते समय उसने कोई शिकायत नहीं पेश की। आधा भाग पीकर उसने गिलास नीचे रखी। दुकान की मेज पर बाजी केले के पत्ते में रखे पकवान पत्तिरि ढेर की ओर उसने लालच से देखा।
उसे एक पकवान मिलना जरूरी है। पैसे की कमी है।
‘‘एक पत्तिरि दें, इसका पैसा कल दे सकूंगा।’’ आखिरी शब्द उसने धीमे स्वर में कहा था।
‘‘अरे पैसा नहीं है तो पत्तिरि मत खाना।’’ दुकानदार दूसरे आदमी की चाय बना रहा था। चम्मच की आवा सुनाई पड़ी। फिर कहा- ‘‘अरे जल्दी चाय पीकर गिलास खाली करना।’’
किरण बहुत निराश हो गया। आखिरी बूंद तक उसने चूस ली। जेब से एक सिक्का लेकर गिलास के साथ रखकर वह खड़ा हो गया।
काफी समय वह सडक़ पर घूमता फिरता रहा। एक घंटा यों ही बीत गया। उसने दूर से देखा कि वण्णान केलु गांव मुखिया के घर से वापस आ रहा है, केलु का मामला क्या हो गया यह किरण जल्दी जानना चाहता है। वह मेड़ से हटकर खड़ा हो गया।
‘‘क्या मुखिया से मिला? जरूरी काग मिल गया?’’ किरण ने ऊंची आवाज में पूछा।
‘‘हां, मिल गया, मिल गया, अब अस्पताल जाना है’’ केलु ने उत्तर दिया।
‘‘कितना पैसा मिलेगा?’’
‘‘रोज छह आने मिलने की उम्मीद है। इक्कीस दिन तक सुई लगानी है।’’ केलु ने चलते-चलते कहा।
किरण खेत में उतरा। सूने पड़े खेत के मेड़ से होकर सिर झुकाकर वह आगे बढ़ा। तब किरण के मन में पागल कुत्ते तथा छह आने की आमदनी की बातें उठ रही थी।
उस रात को बहुत देरी से वह अपनी कुटिया लौट आया। दिनभर घर में किसी ने माड़ का पानी तक नहीं पिया था। सोम को उसकी पत्नी खेत जाकर अर्वी का डाल तथा ‘तकरा’ पत्ती काटकर ले आई थी। पत्नी बीमार तथा गर्भिणी थी। अभी काटकर ले आई पत्ती और डाल पकाकर उसने खाई थी। किरण के आने के पहले वह सो गई थी।
अगले दिन पौ फटने के पहले चेरूमन (जाति विशेष) चिल्लाने लगा। ‘‘हाय!- मुन्ना पागल हो गया।’’ यह चीख सुनकर चेरूमी जाग उठी। किरण एक लाठी लेकर घर के चारों ओर मंडरा रहा है। वह पत्नी के पास दौड़ आया। अरी बरामदे में लेटे लडक़े को पागल कुत्ते ने काटा है।
चेरूमी ने किरण के मुंह की ओर देखा- इसके दांतों पर खून की बूंदें पड़ी हैं। चेरूमी ने विस्मय और संदेह में पडक़र पूछा- ‘‘क्या बात है, बोलो? तुम्हारे दांतों में खून कैसे आया?’’
किरण परेशान हो गया। धोती के पल्लू से उसने मुंह का खून पोंछ डाला। फिर चेरूमी को चेतावनी दी- ‘‘बदमाश चुप रहना।’’
चेरूमी ने मुन्ने को देखा। उसके पैर से खून आ रहा  है। वह चिल्ला रहा है। वाकया क्या हुआ है? मुन्ने को भी इसका पता नहीं है।
चेरूमन की चीख तथा खलबली सुनकर पड़ोसी तथा कुछ राहगीर उधर दौड़ आए। किरण ने उसको समझाया। बरामदे में सोये मुन्ने को पागल कुत्ते ने काटा पैर में चोट लगा है। काटने के बाद कुत्ता केतकी के जंगल की ओर दौड़ा। उदास तथा घबराए स्वर में किरण ने मार्मिक ढंग से सारी बातें कहीं।
उसका वर्णन था- लाल रंग का कुत्ता है। पैरों के बीच पूंछ दबा रखी है। मुंह खोल रखा है। जीभ बाहर डाली है। उससे लार टपकती है। हांफते हांफते दौड़ रहा हैा।
यह सुनकर दूधवाला कणारन नायर ने कहा- ‘‘तब वह  पागल कुत्ता ही होगा।’’ कल वण्णान केलु के मुन्ने को भी काटा था- ऐसा किसी ने कहा।
‘‘अब उसको जिंदा मत रखना। जिधर दिखाई पड़े उधर पीट-पीटकर मार डालना है। किरण बोलो, वह किस दिशा में भाग गया था?’’
‘‘पल भर ही मैंने देखा था। फिर वह शैतान कहीं गायब हो गया।’’
गांव-मुखिया जाग उठकर बरामदे में आए। आंगन में खड़े किरण को देखा। मुन्ने को कंधे पर रखा है। बहुत दुखी दिखाई पड़ा।
मुखिया को देखते ही किरण ने मुन्ने के पैर को नोचा। फिर गुस्से भरे स्वर में कहा- ‘‘रो, रो ना’’ चात्तन बिलखने लगा।
मुखिया ने पूछा- चेरूमन, क्या मामला है- क्यों आया है?
‘‘मालिक, मेरे मुन्ने को पागल कुत्ते ने काटा- ं...’’ चेरूमन भी रोने लगा।
‘‘फिर पागल कुत्ते को मार डाला है क्या?’’
‘‘मालिक कुत्ता कहीं भाग गया।’’
‘‘का- गधे, क्या तू उसे देखता रहा? कौन सा कुत्ता है?’’
‘‘जी, वह चाप्पुजी मालिक का लाल कुत्ता है।’’
‘‘कल वण्णान के मुन्ने को भी काटा था। क्या वही कुत्ता है?’’
‘‘जी- वही कुत्ता है।’’
‘‘इधर के लोग एकदम नालायक है। एक पागल कुत्ते को पीट-पीटकर मार डालाना भी इनको नहीं आता। कमीने लोग हैं।’’
कुछ बुदबुदाते हुए मुखिया बरामदे में आ  बैठे। ‘‘अब मैं क्या करूं?’’
‘‘मालिक, कागज’’
सुबह मुखिया ने एक प्रमाण पत्र दिया। किरण के मुन्ने को पागल कुत्ते ने काटा है।
 किरण चात्तन को कंधे में डालकर जल्दी शहर के अस्पताल की ओर चल पड़ा।
एक लंबी सुई मुन्ने को घुसेड़ दी। दवा इंजेक्ट करते समय मुन्ना का आर्तनाद सुनाई पड़ा। तब चेरूमन ने उसे जोर से पकड़ लिया।
उस दिन किरण बेहद खुशी से घर लौटा। सिर पर एक गमछे में सेर भर चावल बांध रखा है। उसके ऊपर केले के छिलके का एक गुच्छा, हाथ में एक पुडिय़ा में मन्ती मछली है। कंधे पर थका-मांदा मुन्ना भी है। अस्पताल से गु•ाारे के लिए पैसा मिला था। उसमें से सिर्फ एक आना उसने शराब खाने में खर्च किया था।
फिलहाल चार बार इंजेक्शन दे चुका था। चात्तन के शरीर में सूजन आने लगी। हिलना-डुलना सब मुश्किल हो गया। इस हालत में भी किरण ने इलाज में कोई बाधा नहीं आने दी। वह मुन्ने को ढोकर अस्पताल पहुंचाता रहा। मुन्ने को अस्पताल ले जाते समय राहगीरों से वह गर्व के साथ पूरी बातें कहता रहा। मुन्ने को पागल कुत्ते ने काटा, गांव मुखिया ने प्रमाण पत्र दिया। इंजेक्शन के लिए अस्पताल में सुविधा मिली।
सात इंजेक्शन पूरे हो गए। तब तक लडक़ा बहुत कमजोर हो गया।
एक दिन मुन्ने ने कहा- बाबूजी आगे सुई मत लगाना। लेकिन किरण टस से मस नहीं हुए। डाकिया जिस प्रकार ठीक समय पर कंधे पर झोली लेकर चलता है उसी प्रकार किरण भी अपना काम करता रहा। मुन्ने को कंधे पर ढोकर अस्पताल चलना उसकी दिनचर्या बनी।
ग्यारह इंजेक्शन पूरे हो गए। उसके शरीर में सूजन आ गई। वह एकदम पीला पड़ गया। इस नाजुक हालत में डॉक्टर ने कहा कि अब इंजेक्शन बंद करें।
किरण को डॉक्टर ने आदेश दिया- ‘‘अब कुछ दिनों तक मुन्ने को अस्पताल नहीं ले आना।’’
यह सुनकर किरण का चेहरा फीका पड़ गया। वह मुन्ने को लेकर झोपड़ी लौटा।
अगले दिन सुबह किरण ने देखा- चात्तन बेहोश होकर चटाई में लेटा है। श्वास की गति धीमी पड़ी है। नाम मात्र की धडक़न बाकी है।
‘‘मुन्ना, मुन्ना- चांकुट्टी’’ किरण ने सहानुभूति से पुकारा। वह न हिला न डुला। थोड़ी देर बाद वह धडक़न भी समाप्त हो गई।
किरण ने घबराहट से चेरूमी को पुकारा। नवजात शिशु की हल्की रुलाई उसे उत्तर के रूप में मिली।
किरण एक पागल कुत्ते के समान बाहर की ओर भाग गया।
-(रचनाकाल- 1943 )