Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

कसूर

डॉ. कमल चोपड़ा
1600/114, त्रिनगर,
दिल्ली - 110035.
मो. 9999945679
रात काफी हो गई थी। आसपास की झुग्गियों से खडक़ते हुए बरतनों, बिलबिलाते हुए बच्चों, कलपती हुई बुढिय़ा, खांसते खंखारते हुए बूढ़ों, झींकती हुई स्त्रियों और शराब के भभूके से भरी गालियों की आती हुई आवाजें कुछ कम हो गई थीं।
उन झुग्गियों की एक संकरी सी  गली के बीचों बीच बैठा खजुआया कुत्ता अपनी पिछली टांग से अपना अगला कान खुजा रहा था । दूर से गिरते पड़ते आते हुए एक शराबी को देखकर कुत्ता अपनी नैतिक जिम्मेवारी के तहत उठ खड़ा हुआ । नशे के बावजूद शराबी की नजर कुत्ते पर पड़ी तो घबराहट के मारे पसीना-पसीना हो गया । ज्यों ही कुत्ते ने गुर्राते हुए अपना कदम आगे बढ़ाया, मौत को अपनी ओर बढ़ता देख शराबी मारे घबराहट के पास ही की अधखुले अधटूटे से दरवाजेवाली एक झुग्गी की ओर लपका । कच्ची लकड़ी की फट्टियों से बना दरवाजा उसके जरा सा धकेलने पर खुल गया था। दरवाजे को रोकने के लिये आगे अटकाई गई ईंट एक तरफ  को हट गई थी । अन्दर घना घुप अन्धेरा था । नशे के कारण सिकुड़ी हुई उसकी पुतलियां घने अंधेरे को भेद नहीं पा रही थीं। जरा सा खडक़ा झुग्गी के अन्दर अपने दो तीन छोटे-छोटे बच्चों को लेकर सोई हुई विशंभरी के कानों तक पहुंचा ही था कि वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। इस तरह अचानक अंदर घुस आये अन्जान व्यक्ति को देखकर उसका जैसे सांस ही सूख गया - ‘‘क.... क... कौन?’’झूलते हिलते अपने शरीर पर काबू पाने की कोशिश की शराबी ने, पर हड़बड़ी में वह पास पड़े बरतनों पर गिर पड़ा। विशंभरी ने थोड़ा कडक़ होकर पूछा - ‘‘तू है कौन ? कहाँ से घुसा आ रहा है?’’ जल्दी से खड़ा होते हुए शराबी ने कहा - ‘‘वो साला एक कुत्ता मेरे पीछे पड़ गया....’’
    - ‘‘मेरा ई घर मिला तुझे ? वो भी रात के इस बखत ?’’
    बाहर झांका विशंभरी ने । कुत्ता इस बीच जा चुका था। डरकर शराबी ने पैंतरा बदला और लडख़ड़ाती जुबान से कहा - ‘‘वो..... राम आसरे हां वो रामआसरे.... मन्ने सोचा ये आसरे का घर है .... यहीं कहीं रहता था ..... ’’ बड़ी फुर्ती से विशंभरी ने पास ही पड़ा हुआ डण्डा उठाया और उसकी ओर लपकी - हाट.... हट..... कुत्ते कमीने.... अब बहाने टिका रहा है । बरतन चुराने आया था... जानती हूँ तुम जैसे स्मैकियों को ......’’ दुरदुराये जाने के बावजूद वह कुछ क्षण तक नशे में बेसुध सा वहीं का वहीं खड़ा रहा लेकिन तब तक सिर के पास से होता हुआ एक डण्डा उसके कंधे पर आ लगा तो वह बिलबिलाता हुआ बाहर की ओर बढ़ा - ‘‘क्या.... मैंने किया.... किया क्या है ? मैं तो राम आसरे का घर समझ के.... गल्ती से..... मैं कोई चोर हूँ... किया क्या है ?... कुछ किया भी है मैंने?.....’’
    - ‘‘ठहर कमीने बताती हूँ.........’’
    - मैं तो गल्ती से.... किया भी है मैंने कुछ ? मैंने.......’’
    कुछ असामान्य सा पाकर उसकी छोटी लड़कियां उठ बैठीं और रोने लगी थीं। बारह साल का बड़ा लडक़ा बिन्नू उन्हें चुप कराने की कोशिश करने लगा था। गाली-गलौज, झगड़े-झंझट और मार-पिटाई जैसी बातें उस झुग्गी बस्ती के लिये नई नहीं थीं। अगर ऐसी घटना कहीं आसपास ही हो रही हो तो उसमें शामिल होकर उससे मजा लेना उनका धर्म हो जाता है। बच्चे बूढ़े औरतें जवान अपने अपने काम धाम या नींद छोडक़र अपनी-अपनी झुग्गियों से बाहर निकलने लगे। क्या बात हुई क्या बात हुई कहते हुए आगे बढऩे लगे थे। बात समझ लेने के बावजूद कोई उस पर विश्वास नहीं कर रहा था - ‘‘ठीक-ठाक बता दे बे क्या बात हुई?’’ शराबी को लगा वह बुरी तरह फंस चुका है । लोग उसे बुरी तरह मारेंगे। कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं करेगा। पड़ोसी पड़ोसी का ही साथ देगा । उसने वहां से भाग निकलने की कोशिश की लेकिन झुग्गी वालों ने उसे धर दबोचा। आज तो उन्हें जैसे मौका मिला था अपनी मर्दानगी दिखाने का। ऐसे कैसे जाने देते उसे? चारों तरफ  घुप्प अंधेरा था। वहाँ जमा लोगों की आपस में खुसर-पुसर और खीं खीं जारी थी। बीच-बीच में कोई कोई आदमी यों ही ललकारता हुआ बडक़ मारता - ‘‘मारो स्साले को .....ं’’ विशंभरी अपनी पूरी ताकत उस अनजान शराबी को गालियां देने में लगा रही थी । अन्दर रोते हुए उसके बच्चे उसके लगी आग में जैसे घी का काम कर रहे थे। गलियों में घूम-घूमकर लोहे की बाल्टियों को तल्ले लगाने वाले अधबूढ़े बिज्जू लोहार ने आगे बढक़र विशंभरी से पूछा - ‘‘ठीक ठाक बता बात के हुई थी ? इस साल्ले नै तै हम देख लेंगे.....’’
    - ‘‘बात तो.......’’
    उसके कुछ बोलने से पहले ही अन्दर ही अन्दर से बिन्नू के बुरी तरह खांसने और उबाकने की आवाज सुनकर वह घबराकर झुग्गी के अन्दर दौड़ी - ‘‘क्या हुआ ? क्या हुआ मेरे लाल को .....’’
    बिज्जू लोहार वहीं का वहीं खड़ा रह गया । उसे लगा विशंभरी ने उसकी बात को तरजीह नहीं दी है। खिसियाकर रह गया वह - ‘‘साली, जानबूझकर बात को टाल गई । दाल में कुछ काला है!
झुग्गी वालों से घिरा हुआ शराबी उनके आगे हाथ-पांव जोड़ रहा था - ‘‘मुझे जाने दो। मैं तो इधर गलती से आ गया। नशे के कारण कुछ नहीं सूझा मुझे और कुछ अंधेरा.... मैं तो उधर इंदिरा गांधी कैम्प की झुग्गियों में रहता हूँ । अंधेरे में भटक गया......’’
    - ‘‘झूठ बोल रहा है स्साला.... पैंदे पे दो लात पड़ेंगी तो साला.....’’
    - ‘‘मैंने कुछ नहीं किया..... यकीन करो.... मुझे जाने दो......’’
    रामदास कबाड़ी जिसकी बीवी को मरे तीन साल हो गये थे और आमतौर पर विशंभरी की झुग्गी के चक्कर काटता रहता, सुबह जब विशंभरी शान विहार की कोठियों में काम करने के लिये जाती तो वह भी काफी दूर तक उसके पीछे-पीछे जाता । विशंभरी को सब पता था लेकिन उसने कभी उसे घास नहीं डाली थी । बल्कि एक बार तो विशंभरी ने शान विहार के मोड़ के पास चप्पलों से उसकी पिटाई भी कर दी थी। आज रामदास कबाड़ी को अपनी खुंदक निकालने का मौका मिल गया था - ‘‘साली ने खुद ही बुलाया होगा.....चोरी छिपे नया धंधा शुरू किया होगा। हुंह साली बड़ी सती सावितरी बनी फिरती है? .....मुझे तो पहले ही शक था... आज असलियत खुली साली की ..... बड़ी खिलाड़ी औरत है साली.....दो साल हो गये इसके पति को मरे.... क्या पता उसे भी इसी साली ने खुद ही कुछ पिला-खिलाकर मारा हो?’’
    पीछे खड़ी औरतों की खुसर-पुसर की आवाज भी अब थोड़ा ऊँची, स्पष्ट और एकमत हो गई थी - ‘‘रांड ने खुद ही बुलाया होगा इसे .... हाय-हाय देखो तो है कैसी छिनाल है और ऊपर से कैसी सती पवित्तर बनती है?’’
    शराबी का चढ़ा हुआ नशा काफी कुछ उतर चुका था। इतने लोगों के बीच से बचकर भाग निकलना उसे असंभव सा लग रहा था। लोगों के शक की बात अब तक उसके कानों तक भी पहुंच चुकी थी। उसे लगा यहां से बच निकलने का यही एक रास्ता हो सकता है। उसने अपने माथे का पसीना पोंछा और थोड़ा सहज दिखने की कोशिश करता हुआ बोला - ‘‘हां हां... आप लोग ठीक कह रहे हैं ?’’
    - ‘‘क्या ठीक कह रहे हैं ?’’
    थोड़ा झेंपने शरमाने के अंदाज में शराबी ने धीरे से कहा - ‘‘ये औरत खुद बुलाकर लाई थी मुझे..... मैं तो मेन सडक़ से जा रहा था ...... इंदिरा गांधी कैम्प की अपनी झुग्गियों की ओर मुडऩे लगा कि इस औरत ने बुला लिया । कहने लगी पैसों की जरूरत है......’’
    बिज्जू लुहार उछला - ‘‘मैंने तो पहले ही कह दिया था । हुई न वही बात.... मानते हो.... सब पता रहता है हमें.....’’ रामदास कबाड़ी ने छाती चौड़ी करते हुए कहा - ‘‘सबसे पहले तो मैंने खुद कहा था कि..... निकली ना वही बात... हम भी कच्ची गोलियां नहीं खेले....’’  ‘‘इस रांड को तो देखो ?.... हैं ?’’ विशंभरी अपनी झुग्गी के अन्दर बिन्नू की उल्टी साफ  कर रही थी। बाहर लोग खुलकर उसे गालियां देने में जुट गये थे।   ‘‘जब खुद बुलाके लाई तो फिर झगड़ा किस बात पे हुआ? थोड़ा अटकते और अकबकाते हुए शराबी बोला -‘‘झुग्गी पे पहुंचकर बोली पांच सौ लूंगी मैंने कहा इतने तो मेरे पास हैं भी नहीं । बोली सीधी तरह निकाल वर्ना...... शोर मचा दूंगी। बुरी तरह फंस जाओगे। मेरे पास इतने पैसे थे ही नहीं तो देता कहाँ से?’’
    भीड़ पर अपनी बातों का असर होता देख शराबी ने थोड़ा उत्साहित होते हुए कहा - ‘‘आप खुद समझदार हैं । मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ । मैं तो खामखाह फंस गया...’’ बस्ती के आधे लोग समझते थे विशंभरी ऐसी नहीं है पर आधे समझते थे वह ऐसी ही है। दो साल पहले बस्ती में जहरीली शराब पीकर कई लोग मर गये थे। लाशें पुलिस ले गई थी। लोगों का कहना था कि कम से कम पच्चीस लोग मरे होंगे लेकिन पुलिस ने कहा सिर्फ आठ लोग मरे हैं। विशंभरी के पति को भी पीने की बहुत बुरी लत थी। वह मरने वालों में से एक था। कुछ लोगों ने भट्टी के पास पड़ी उसकी लाश को ले जाते हुए पुलिस को देखा था पर...... पुलिस ने उसका नाम गुमशुदा लोगों की लिस्ट में जोडक़र उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कर ली थी। विशंभरी को भी पता था कि उसका पति जहरीली शराब पीकर मर चुका है पर पुलिस के भुलावे को सच समझकर अपने मन को तसल्ली देने के लिये बाद में कई दिन तक उसे ढूंढती रही थी। वह कहीं होता तो मिलता? उसका पति पीछे छोड़ गया तीन छोटे-छोटे बच्चे और एक झुग्गी ।
    पति के चले जाने से वैसे तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ा था। वह पहले भी कोठियों में चौका बरतन करके कमाकर लाती थी और घर चलाती थी और अब भी वह अपने हाथों से कमाती थी और बच्चे पाल रही थी। उसका पति तो पीकर घर में ही पड़ा रहता था पर उसके रहते उसे बस्ती वालों के इशारों और नजरों का निशाना नहीं बनना पड़ता था जैसा कि उसे अब बनना पड़ रहा था। बस्ती में लौडे लफंगों से लेकर ऐसे खबीस खूसटों की कमी नहीं थी जो कि हमेशा विशंभरी पर नजर गड़ाये रहते। ये बात और है कि उसने कभी उनकी फब्तियों-फिकरों की परवाह ना कर उन्हें कभी घास नहीं डाली थी। इसलिये उसे कई बार अपने बारे में उल्टा सीधा झूठ सुनना भी पड़ता और कई बार उसे गाली-गलौज भी करनी पड़ती। कई बार उसे जूती भी उतारनी पड़ती। जैसे भी था वह किसी तरह अपनी इज्जत बचाये लिये आ रही थी कि पता नहीं कहाँ से आज ये शराबी उसके घर में आ घुसा था । बुखार से बुरी तरह तप रहे बिन्नू का खांसते-खांसते सांस रूकने को हो आया था। उसकी लगातार बिगड़ती हुई हालत को देखकर घबराकर विशंभरी रोने लगी थी। बाहर जमा लोगों की भीड़ बढ़ गई थी । उंगलियाँ विशंभरी की ओर उठ गई थीं - ‘‘साली शर्म के मारे अन्दर जा घुसी है....’’
    - ‘‘बाहर कैसे निकले ? अंदर घुसकर रो रही है साली !’’
    - ‘‘हद हो गई बेशर्मी की .....’’
    पीछे खड़ी सफेद बालोंवाली मरियल सी बुढिय़ा एकाएक अपने दोनों हाथों को हवा में झटकारते हुए झींकने लगी - ‘‘हाये हाये.... कैसा जमाना आ गया राम राम .... झुग्गी में तीन-तीन बच्चों के मौजूद रहते इस रांड ने ग्राहक बुला लिया? कमजकम बच्चों का कुछ शर्म करती....हाय हाय बच्चों के सामने.... हया-शर्म लिहाज कुछ तो होती है।’’
     ऐसे कहा उस मरियल बुढिय़ा ने जैसे उसे ग्राहक के बुलाये जाने पर एतराज नहीं बल्कि बच्चों की मौजूदगी में बुलाये जाने पर एतराज था।
    - ‘‘मुझसे सुनो असलियत......ं’’ किरानेवाले लाला लखमी चंद ने आगे बढक़र सबको चुप कराया फिर गहरा राज खोलने के अंदाज में फुसफुसाया - ‘‘असल में बिशंभरी है तो शरीफ  औरत पर.... मजबूरी जो न करवाये। आज आई थी मेरे पास कहने लगी - लाला जी पांच सौ रूपया उधार दे दो। मेरा बच्चा बीमार है। इलाज करवाना है। बोली जो कहो करने को तैयार हूँ। मैं ठहरा सीधा सादा... मुझे क्या समझ क्या करने कराने को तैयार है । वो तो अब समझ में आया कि...ऐसी बात थी.....’’
    - ‘‘फेर दिये तमने पांच सौ....’’
    - कहां से देता मैं ? मैंने कहा - ‘‘नगद नोट मेरे पास तो धरे नहीं मैं तो इतना कर सकूं.... दाल चावल उधार चाहियें तो ले जा.....’’
    - ‘‘हाँ ठीक है.... इतनी मदद क्या कम है ?’’
    फिल्मी स्टाईल मारते हुए रामदास कबाड़ी बोला - ‘‘मजबूरी बहुत बुरी चीज होती है साहब... ! अपने बीमार बच्चे के लिये एक माँ कुछ भी बेच सकती है साहब... इज्जत तो बहुत मामूली चीज है ।’’
    - ‘‘बेचारी मजबूर औरत ......’’
    - ‘‘बे.....चा.....री......’’
    सहानुभूति के शब्द थे उनके पर उनमें सहानुभूति नहीं व्यंग्य ही व्यंग्य था । वे जैसे चटखारे ले रहे थे। थोड़ी देर पहले काली अंधेरी वीरान सी लगने वाली बस्ती अचानक भूत-भूतनियों के रात्रि मेले में बदल गई थी । हंसी मजाक, फिसफिसी चीख चिल्लाहट गाली गाना सब कुछ जारी था। इस बात पर लगभग सभी एकमत थे कि कुछ देर पहले हुई घटना किसी घोर अनर्थ से कम नहीं थी। सारा दोष विशंभरी का था।
रामदास कबाड़ी और लोहार विशंभरी की झुग्गी के पास खड़े होकर उसे सुना-सुनाकर कहने लगे - ‘‘बेचारी, मजबूरी औरत... क्या करती ?’’
    - ‘‘दूसरों की मजबूरी तो कोई समझता नहीं.... बस्स लोगों को तो बातें बनाने का मौका चाहिये - हा हा......’’
    - ‘‘यही तो मैं कह रहा हूँ किसी की मजबूरी कोई समझता नहीं!’’ कहते कहते रामदास की हंसी छूट गई थी ।
    बिन्नू के मुंह पर छींटे मारकर विशंभरी उसे होश में लाने का प्रयास कर रही थी। लोगों की बातों से ज्यादा वह बिन्नू की हालत देख-देखकर थरथरा रही थी। इस सबमें सारा दोष विशंभरी का ही है या शराबी का भी थोड़ा बहुत दोष है। वहाँ जमा लोगों में इस बात की बहस भी छिड़ गई गई थी। इक्का दुक्का लोग शराबी को भी थोड़ा बहुत कसूरवार ठहरा रहे थे। लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना था कि सारा कसूर विशंभरी का ही है।
    - ‘‘इसमें शराबी का क्या कसूर ? औरत के आगे तो बड़े-बड़े रिषी मुनि तपस्वी अपनी तपस्या भूल जायें। ये बेचारा तो मामूली आदमी है !’’
    - ‘‘सारा कसूर उसी का है जो अन्दर छुपी बैठी है.... उसी साली ने यहाँ की मर्यादा भंग की है.....’’
    - ‘‘हाँ, औरत को मजा चखाया जायेगा तभी मजा आयेगा वर्ना किसी को भी मजा नहीं आयेगा.... हाँ.....हाँ......’’
    एकाएक सभी विशंभरी की झुग्गी के आगे आ जमे थे । मरियल बुढिय़ा के साथ तीखा और तेज बोलने वाली दो तीन औरतें तो उसकी झुग्गी के अन्दर ही जा घुसी। बाकी लोग अन्दर बाहर गिद्धों की तरह जमा हो गये थे। विशंभरी उन्हें अन्दर आया देखकर चुन्नी से अपना सिर मुंह ढंकने लगी थी।
    बुढिय़ा बड़बड़ाने लगी - ‘‘अरी बड़ी शर्म-धर्मवाली बन रही है। तूने तो यहीं बुला लिया! बस्ती बिरादरी का कुछ भी डर ना था तुझे? हैं?’’
    - ‘‘अपनी ना सही दूसरों की इज्जत का ख्याल तो करना ई चईये था! औरत को अपनी इज्जत आप बचानी चाहिये। मर्दों की तो बस एक ही जात होती है। अपनी मर्दानगी जाहिर करने के लिये पीछे खड़े कुछ जीर्ण जर्जर आदमी उसे सीधे ही माँ बहन की गालियों पर उतर आये थे।
    - ‘‘था कौन वो ? पहले से जानती थी तू उसे ?’’
    अपनी सफाई में कई बार रोते-रोते उसने कहा कि उसने उस शराबी को नहीं बुलाया था। दरवाजा खुला देखकर गलती से उसके घर आ घुसा था। लेकिन कोई उसकी बात मानने को तैयार नहीं था।
    सब सुन रहा था बिन्नू । दोनों छोटी बच्चियां डरी सहमी कोने में दुबकी जा रही थीं। बिन्नू का मन हो रहा था वह सबको वहाँ से मार भगाये। वह चीखना चाहता था पर आवाज ही बाहर नहीं आ पा रही थी।
    - ‘‘कितने पैसों में बात तय हुई थी? दे कितने रहा था?
    - ‘‘पहले ही बात बिगड़ गई या सब कुछ हो हवा चुका था? कुछ मिला भी या यों ही .......
    जहर भरे शब्दों से वह बुरी तरह आहत हो आई थी। तडफ़ड़ाकर रह जाने के सिवाय वह कुछ नहीं कर पा रही थी। पीछे से प्रहार अभी जारी थे - ‘‘अरे हमें बुला लेती.... हम फैसला करवा देते! पड़ोसी होते किसलिये हैं?’’
    बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था उससे। गुस्से से कांपने लगी थी वह - ‘‘मैं कैसे साबित करूं ? ना मैंने उसे बुलाया, ना मैैं उसे जानती हूँ... मुझे और परेशान मत करो ।’’
    - ‘‘बड़ी सती सावतरी है तू? ऐसे कैसे जाने दें ? हम लोग गरीब जरूर हैं पर.... तुझे नहीं हमें तो अपनी इज्जत प्यारी है ।’’
    रोते काँपते हुए वह गिड़गिड़ाई - ‘‘पहले ही दुखों की मारी हुई हूँ.... मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो......’’
    - ‘‘ऐसे कैसे छोड़ दें ? और तू यहाँ धंधा करे? शरीफों की बस्ती है ये रंडीखाना नहीं बनने देंगे इसे...... साली रंडी.....’’
    चीख पड़ी वह - ‘‘हरामी.... कमीने कीड़े पड़ेंगे तेरे.... मुझ बेसहारा निर्दोष पर इल्जाम लगाता है ! कल को तेरी बहन बेटी भी मेरी तरह बिना कसूर के फंस सकती है.... तब देखूंगी तुझे.....’’
    लोहार चीखा - ‘‘खबरदार.... साली हमारी बहन बेटी का नाम मत लियो ’’
    - ‘‘अब तो बड़ी मिर्चें लग रही हैं....?’’
    - ‘‘तू सबको अपने जैसा समझती है ?’’
    - ‘‘मैंने किया ही क्या है? जो मेरे पीछे पड़ गये हो ?’’
    - ‘‘अभी तो लखमी लाला खड़ा है हमारे बीच में जीता जागता सबूत है ! बोल तूने उससे पांच सौ रूपये मांगे थे या नहीं ?’’
    बिना किसी झिझक के विशंभरी ने कहा - ‘‘हाँ मांगे थे.... ’’
    - ‘‘बदले में तूने क्या कहा था लाला को? कि तू कुछ भी करने कराने को तैयार है?’’
    - ‘‘कहाँ है लाला ? मेरे सामने कहे.... कीड़े पड़ेंगे तुम सब झूठों को.....’’
    लाला ने पीछे खड़े-खड़े ही कहा - ‘‘आई नहीं थी तू पैसे उधार मांगने ?’’
    - ‘‘आई थी तो मैंने कहा था.... मेरी झुग्गी का दरवाजा टूटा हुआ है ठीक करवाना है। बच्चा बीमार है पैसों की सख्त जरूरत है अगले महीने ही लौटा दूंगी जो थोड़ा बहुत हरजाना हो वो भी ले लेना.... बाकी बातें अपने पास से बना ली ?... उल्टा ये तो मुझे पैसे देने को तैयार था । गन्दी नजरों से देख रहा था ये मुझे । इसकी नीयत गंदी देखकर मैं तो पैसे लिये बिना ही लौट आई.... ये हरामी कमीना उल्टा मुझे बदनाम.....’’
    लाला की ओर देखकर हंसने लगे सभी। लाला को जवाब नहीं सूझ पड़ रहा था।
    ऐसी उम्मीद नहीं थी लाला को कि एकदम चुप रहने वाली वो औरत सबके सामने यों एकाएक फूट पड़ेगी। अकबकाकर रह गया वह - ‘‘मैं तो..... वो मैंने तो.....’’ क्षणभर लाला की भीड़ में भद्द उड़ गई। बगलें झांकता रह गया वह।
    हंसी मजाक ताने फिकरे और.... लाला को शर्मिन्दा देखकर बस्ती वालों को मजा आ रहा था। एकाएक सबके मजे पर पानी फेरती हुई सी किसी की आवाज आई - ‘‘सब इधर मजा ले रहे थे और उधर......उधर वो शराबी भाग गया........’’
    - ‘‘धत तेरे की .... बेड़ा गरक हो गया । उस साले को भी तो कुछ सबक सिखाया जाना चाहिये था। वर्ना वो तो किसी दिन फिर इसे बदनाम बस्ती वो क्या कहते हैं रेड लाइट एरिया समझकर चला आयेगा । पकड़ा गया तो कह देगा गलती हो गई । पर अब क्या हो सकता है? उसे यों ही नहीं जाने देना चाहिये था । एक वही तो विशंभरी के खिलाफ  हमारे पास सबूत था.....’’
    - ‘‘अब बातें बना रहे हो पहले क्यों नहीं ध्यान दिया ? तुम पकड़ के रखते उसे ? अब क्या बचा है ? सारा मजा ही किरकिरा कर दिया ।’’
    आपस में ही उलझ गये थे वे लोग । ज्यादातर लोगों को उसके भाग जाने का मलाल हो रहा था । हाथ मलते हुए एक ही बात दोहरा रहे थे - ‘‘अब क्या बचा है ? सारा मजा ही किरकिरा हो गया......’’
    मजा ही खराब हो गया । मजा ही खराब कहते हुए कुछ लोग अपनी-अपनी झुग्गी की ओर लौटने लगे । तंग कर रहे लोगों पर भडक़ कर पड़ गई विशंभरी - ‘‘जो भी मुझ पर झूठा इल्जाम लगायेगा मैं पुलिस में उसी के नाम की रिपट लिखवा दूंगी.....’’
    जवाब में लोग बेशर्मी से खी खी कर रहे थे । पीछे से किसी ने शरारत से सीटी बजाई। किसी ने अजीब सी डरी आवाज में कहा - ‘‘प....पुलिस....पुलिस आ गई .....’’
    पुलिस का नाम सुनते ही सब एक दूसरे को भागता देखकर अपनी अपनी मर्दानगी भूलकर अपने-अपने बिलों की ओर लपके। कुछ ही मिनटों में गली फिर से निर्जर हो गई थी ।
    विशंभरी ने भी अपनी झुग्गी का टूटा-फूटा दरवाजा अन्दर से भिडक़ दिया था ।
    दोनों छोटी बच्चियां सिकुडक़र एक तरफ को सो गई थीं । बिन्नू के बुखार से तपते माथे पर विशंभरी ने गीला कपड़ा रखा और खुद भी पास ही लेट गई। झुग्गी के अन्दर बाहर काला घना घुप्प अंधेरा भरा हुआ था। उसे अपनी हालत पर रह रहकर रोना आ रहा था। जाने कितनी बार उसे अपनी गीली आंखों को पोंछना पड़ा था - ‘‘कोई बात नहीं। जैसे कैसे वक्त कट ही जायेगा। और चार पांच साल की बात है बस्स..... बिन्नू बड़ा हो जाएगा। फिर उसे किसी बात की चिन्ता नहीं रहेगी....’’
    बिन्नू ने बीमार सी आवाज में कहा - ‘‘माँ......’’ उठ बैठी वह - ‘‘हां बेटे .....!’’
    - ‘‘मां.... तूने उस कुत्ते कमीने शराबी को बुलाया ही क्यों ? मुझे बुखार था तो क्या हुआ....उतर जाता.....नहीं तो मर जाने देती मुझे। क्यों बुलाया?’’ जलती हुई लकडिय़ों में धकेल दिया जैसे किसी ने उसे । क्षणभर में सब कुछ जलकर जैसे राख हो गया। क्या जवाब दे वह ? एकाएक वह झुंझलाई - ‘‘तू भी तो यहीं था ? क्या हुआ क्या नहीं ? सब यहीं तुम लोगों के सामने ही तो हुआ ?’’ गहरी खामोशी घिर आई । झींगुरों की आवाजें माहौल को और भी भयावह सा बना रही थीं । थोड़ी देर बाद बिन्नू बोला - ‘‘माँ ! मैं मर भी जाऊँ पर तू आगे से ऐसा मत करना ।’’
    - ‘‘क्या ? कैसा ? मैंने अब भी क्या किया है जो आगे ना करने को कह रहा है ? बिना किसी गलती के बैठे बिठाये मुझे ये क्या..... ?’’
    कलपने और अंदर ही अंदर रोने के सिवाय कोई चारा नहीं था उसके पास।
    झुग्गियों में ही रहने वाले एक झोलाछाप डाक्टर ने सुबह शाम टीके लगाकर छुट्टियों में बिन्नू का न्यूमोनिया ठीक कर दिया था। इलाज के पैसे भी वह एक दो महीने बाद लेने को राजी था।     धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा सोचा था उसने । अब दिन रात उसे झुग्गी का दरवाजा ठीक करवाने की चिन्ता लगी हुई थी । लेकिन पैसों का जुगाड़ कहीं से भी नहीं बैठ पा रहा था । वैसे भी उस घटना के बाद आसपास के लोगों का व्यवहार कुछ बदल सा गया था। लोगों की नजरों में उसके प्रति हिकारत और उपहास देखकर उसके दिलोदिमाग पर जहरीले सांप फुफकारने लगते । लेकिन वह बर्दाश्त करके रह जाती ।
    बीमारी के कारण कई दिन से बिन्नू साइकिल वाले के पास काम सीखने नहीं जा पाया था । उसके दोस्त उसे चिढ़ाते - ‘‘अब इसे काम की क्या जरूरत है? इसकी मां ने जो नया काम शुरू कर लिया है।’’
    बेनागा ही कोई ना कोई उसे चिढ़ा देता । रोज ही वह किसी न किसी के साथ मार पिटाई कर बैठता । एक दिन तो बुरी तरह जख्मी होकर लौटा था वह । मां ने उसे समझाने की कोशिश की तो वह उल्ज्ञटा उसी पर झुंझला उठा था - ‘‘तेरी वजह से ही तो मुझे यह सब देखना सहना पड़ रहा है.....?’’
    क्या वाकई इस सबमें उसका कहीं कुछ कसूर है? उसे सोचने को विवश होना पड़ रहा था। दुुख उसे इस बात का था कि अपनी ही औलाद उसे निर्दोष नहीं मान पा रही थी । सारा कसूर झुग्गी के दरवाजे का है। उसने सोचा जैसे भी हो उसे अब झुग्गी का दरवाजा ठीक करवाना है।
    अगले ही दिन सुबह-सुबह पैसों के इंतजाम के लिये घर से निकली थी वह । लौटने में भी उसे देर हो गई थी । उसे लौटा देखकर बिन्नू उस पर चिल्लाकर पड़ गया - ‘‘इतनी देर कहाँ लग गई तुझे ?’’
    बेटी ने रोते कहा - ‘‘भाई ! आज फिर मार पिटाई करके लौटा है । आज फिर लडक़ों ने उसको चिढ़ाया। चोटें भी लगी हैं इसके....’’
    - ‘‘क्यों रे घर में टिककर नहीं बैठ सकता ? क्या जरूरत है उनसे लडऩे मरने की ?’’
    - ‘‘लडक़े कह रहे थे झुग्गी वाले डाक्टर को तेरी मां ने तेरे इलाज के लिये पैसों के बदले इज्जत दी है?’’
    - ‘‘हाय राम..... नास जाये उन कमीनों का.... पैदा हुए नहीं और ऐसी-ऐसी बातें? इलाज के पैसे छोड़ेगा वो डाक्टर? उधार के चक्कर में महीने बाद ही सही दुगनी चमड़ी उतारेगा! दुनिया में उधार सुधार नहीं चलता क्या? कोई जरूरी नहीं ऐसों के मुंह लगने की । .... दुनिया तो बकती रहती है । किस-किसका मुंह पकड़ेगा तू? क्या-क्या बर्दाश्त करना पड़ रहा है मुझे मैं ही जानती हूँ.......!’’
    आँखें पोंछते हुए बोली - ‘‘कल झुग्गी का दरवाजा ठीक करवाना है। पैसों का इंतजाम हो गया है । कितना मुश्किल है पैसों का इंतजाम मैं ही जानती हूँ .......’’
    सुनते ही बिन्नू की आंखें खुली की खुली रह गई । उसने सोचा - ‘‘माँ ने किसी को यहां तो नहीं बुलाया पर खुद कहीं जा के...... इसका मतलब लोग ठीक कहते हैं ।’’ आंखों में खून उतर आया उसके। एकदम चुप हो आया वह। मां के आग्रह के बावजूद उसने रोटी भी नहीं खाई। बच्चियों को रोटी खिलाकर विशंभरी लेट गई थी ।
    झुग्गी में अंधेरा भरा हुआ था । आसपास से आता हुआ टीवी रेडियो और लोगों का शोरगुल नींद को उनकी आंखों के पास फटकने भी नहीं दे रहा था ।
    एकाएक विशंभरी को लगा झुग्गी में कोई है। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, चाकू का एक वार उसकी कोहनी पर लगा। उसने देखा बिन्नू के हाथ में सब्जी काटने वाला चाकू था और वह अपनी मां पर वार कर रहा था। अपने बचाव के लिये चीखी वह। डर के मारे सन्न रह गई वह।
    बिन्नू चीखा - ‘‘पैसों के इंतजाम के लिये अब तू बाहर जाने लगी है ? इतनी देर से आई आज तू पैसों का इंतजाम करके ?’’
    - ‘‘मैं तो जहाँ काम करती हूँ वहीं से पैसे लेने गई थी । मालिक सुबह ही कहीं निकल गये थे । मालकिन बोली शाम को आयेंगे तो उनसे लेकर दे दूंगी । मैंने इंतजार किया । शाम को वे आये तो उन्हीं से पैसे लेकर आई हूँ इसीलिये देर हो गई......’’
    - ‘‘झूठ बोलती है तू.......’’
    - ‘‘कमीने...... मैं तेरी माँ हूँ । मैंने कुछ किया भी नहीं । तू बीमार था। तेरे चक्कर में मैं बदनाम हो गई और उल्टा तू अपनी उसी मां को मारना चाहता है?’’ नीचे बैठकर रोने लगी वह। बिन्नू पर जैसे खून सवार था - ‘‘मैंने कहा था मुझे मरने दियो पर ऐसा काम मत करियो .....पर तू.......’’
    इस बीच ढीली पड़ आई विशंभरी पर चाकू के दो और वार कर दिये थे बिन्नू ने। नीचे गिर पड़ी थी विशंभरी। बच्चियों की कुरलाहट झुग्गी में भर गई थी ।
    - ‘‘मैं मर जाऊँगी । अपने आप ही । मर जाऊँगी रे......तू मत मार रे....तेरे हाथों मरी तो तुझे सजा हो जाएगी रे.....’’
    चाकू फेंककर झुग्गी से बाहर होता हुआ बोला - ‘‘जा रहा हूँ मैं .... कभी नहीं आऊँगा अब । कभी नहीं आऊँगा..... कभी नहीं आऊँगा’’
    इससे पहले कि पड़ोसी आते और बात को समझते बिन्नू वहाँ से भाग चुका था। जो सुनता दहलकर रह जाता। बारह साल का बच्चा माँ की हत्या करने चला था। गनीमत थी कि पड़ोसियों ने विशंभरी को समय पर अस्पताल पहुँचा दिया था। देर हो जाती, खून ज्यादा बह जाता तो खतरा हो सकता था । चाकू के जख्म उसकी कंधे कोहनी और जांघ पर ही बने थे। चार दिन बाद वह अस्पताल से लौट आई थी। बहुत रोई थी घर आकर वह - ‘‘निर्दोष बेकसूर हूँ मैं । ये तो सिर्फ  मैं जानती हूँ या मेरा भगवान। अनाड़ी था बिन्नू पेट या पसलियों में चाकू मारता तो...... । एक ही बेटा था मेरा गलतफहमी के चलते वो भी छिन गया..... ????’’ झुग्गी का दरवाजा ठीक करवाने के लिये किया गया पैसों का जुगाड़ विशंभरी के जख्मों के इलाज में खर्च हो गया था। दरवाजा फिर भी ठीक नहीं हो पाया था। कई दिन तक ढूंढते रही वह बिन्नू को। पर बिन्नू का पता नहीं चला तो नहीं ही चला। आखिर थक हारकर बैठना पड़ा था उसे। टूटे हुए दरवाजे और बिन्नू को याद करके रो रही थी वह एक रात । पास लेटी छोटी बेटी ने उसकी आंखें पोंछते हुए कहा - ‘‘माँ तू उस दिन पैसों के इंतजाम के लिये गई ही क्यों? जो हुआ हो गया पर अब कभी भी ‘पैसों के इंतजाम’ के लिये मत जाना ।’’ जलते हुए अंगारों जैसे बेटी के शब्द उसके समूचे वजूद को जलाने झुलसाने लगे थे। उसे लगने लगा था सचमुच ही वो शराबी उसकी इज्जत ही उतारकर ले गया है। झुग्गी के दरवाजे के पास आकर गली का कुत्ता गुर्राने लगा । झट से उठ बैठी वह । इससे पहले कि कुत्ता झुग्गी में आ घुसे, उसने पास पड़ा डंडा उठाया और कुत्ते को दे मारा । कुत्ते को बहुत दूर खदेड़ आने के बाद इत्मीनान से बैठती हुई बोली - ‘‘किसी तरह बची खुची इज्जत तो बचानी ही है न ?’’
अपनी नन्हीं सी आंखें चौड़ी करते हुए बेटी ने पूछा - ‘‘माँ औरतों की इज्जत होती है? कोई करता है?’’