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Wednesday 22 Nov 2017

चाबी ( आइजक़ बेशेविस सिंगर )


अनुवाद: इंदुप्रकाश कानूनगो
282, रोहित नगर(प्रथम), गुलमोहर, भोपाल 462039,
मो. 9981014157
अपरान्ह करीब तीन बजे, बेसी पापकिन ने गली में उतरने की तैयारी प्रारंभ की। बाहर निकलना, वह भी उत्तप्त गर्मी के किसी दिन, नानाभाँति मुश्किलों से संबद्ध था: सबसे अव्वल अपनी मोटी देह को किसी चोली में कसना, सूजे क्या फूले हुए पैरों को जूतों में फंसाना, घर पर ही स्वयं डाई किये हुए अतिशय उलझे उन केशों की जो कई वर्णों-पीले, स्याह, भूरे, लाल-से रंगी लटों के अनंतर बिखरे होते को काढऩा; फिर इतना पुख्ता इंतजार कर कक्ष छोडऩा कि अपनी नामौजूदगी के अवांतर पड़ोसी भीतर धमक लीनन, वस्त्र, दस्तावेज चुरा न पायें , या ऐसा न कर सकने से क्षुब्ध हो चीजों ही को इस तरह गड्डमड्ड न कर दें कि सही वक्त सही वस्तु नजर न आये।
इन आदम यंत्रणाओं के अतिरिक्त बेसी भूतों, डाइनों, दुष्टात्माओं से भी त्रस्त थी। नाइट टेबल में छिपायी अपनी ऐनक उसे स्लिपर्स में मिलीं। दवाइयों के खाने में रखी हेयर डाई की शीशी, कई दिनों बाद तकिये नीचे दबी मिली। किसी दिन रेफ्रिजरेटर में रख छोड़ा हुआ एक ‘बार्श बाट’ (चुकंदर का रस पीने का प्याला) कोई अगोचर वहाँ से उसे ऐसा उड़ा ले गया कि पूरा घर खंगाल मारी बेसी को वह वस्त्रों की अपनी अलमारी के किसी कोने में दीख पड़ा। उसकी सतह पर चिपकी वसा की मोटी परत बासी चरबी की बू मार रही थी।
किन-किन बाधाओं के बीच से गुजरी, कौन-कौन सी चालबाजियों को भुगती, तबाही और उन्माद से बचने के जतन के अनंतर कैसी कैसी बहस मुबाहिस में पड़ी-भगवान जाने। झाँसेबाजों और विकृतकामियों की-उससे गोपनीय, भेदभरी युक्तियाँ उगलवाने की खातिर-दिनरात अनवरत खनखनाती घंटियों के कारण उसने टेलीफोन ही कटवा दिया। प्यूएर्तोरिकाई दूधवाले ने एक दफा उस पर बलात्कार करना चाहा। पंसारी-दुकान के छोकरे ने उस का माल असबाब सुलगती सिगरेट से जला ही दिया होता। भाड़ा-नियंत्रण के अनंतर आबंटित उसके अपार्टमेंट में - जहाँ वह पैंतीस वर्षों रही- संयोजक और संचालक की मिलीभगत के तहत चूहों, छछूंदरों, तिलचट्टों का उत्पात मचवाया गया।
बेसी ने लंबे अर्से पहले से महसूस कर लिया था कि विद्वेषी बने रहने पर आमादा इन लोगों के खिलाफ  हर जतन-धात्विक द्वार, गोपनीय ताला, पुलिस, एफ.बीआई, को क्या वाशिंगटन में बैठे राष्ट्रपति तक को भेजे पत्र भी- निरर्थक हैं। तथापि जब तक साँस चले पेट में दाना तो डालना ही होगा। सब में - खिड़कियाँ भिड़ाने, गैस के बटन जाँचने, दराज कसने, - में वक्त लगा। एनसाइक्लोपीडिया के ग्रंथों, नेशनल ज्याग्रोफिक के पिछले संस्करणों, और सैम पापकिन के पुरातन बहीखातों में छिपा रखे अपने करंसी नोटों को बाकायदा प्रच्छन्न देख आश्वस्त हुई। कदापि इस्तेमाल न होती अंगीठी के लठ्ठों बीच तो यदाकदा आरामकुर्सी की गड्डियों तले वह अपने शेयर और बाँड दुबकाये रखती। अपने आभूषण उसने चटाइयों में यहाँ वहाँ सी रखे थे। वर्षों पूर्व बेसी ने बैंक में लॉकर ले रखा था, लेकिन जाने कब , जाने कैसे यह बात उसके मन आ बसी कि वहाँ तैनात पहरेदारों के पास मास्टर-कुंजियाँ होती हैं।
वह, करीब पाँच बजे, बाहर निकलने के लिए तैयार हो गयी। पल भर ठिठक अंतिम दफा दर्पण में अपनी हुलिया का विन्यास देखा- छोटा, फैला हुआ, सिकुड़ा माथा, चपटी नाक, और किसी चाइनीज की जैसी तिरछी अधमुँदी आँखें। ठुड्डी पर छितरी हुई हलकी सी श्वेत दाढ़ी। किसी फुलकारी से सिरजी लेकिन धुँधली पोशाक के ऊपर वह सिर को काष्ट चेरियों और अंगूरों से सँवरी किसी कटी फटी हैट में फँसायी हुई थी, पैरों को फूहड़ जूतों में। बाहर कदम रखने के पूर्व उसने तीनों कक्षों और रसोई का अंतिम मुआयना किया। हर कहीं कपड़े , जूते, और कभी नहीं खोले गये खतों के ढेर पड़े थे। लगभग बीस वर्ष पूर्व दिवंगत उसके खाविंद , सैम पापकिन, ने मरने के पूर्व सेवानिवृत्त जीवन फ्लोरिडा में बिताने के इरादे अपनी जायदाद  चुकता कर दी थी। वह अपनी पूँजी, बाँड, और बैंकों के बचत खातों की कई एक पासबुकों के साथ कतिपय गिरवीनामे भी बेसी के पास छोड़ मरा। आज तक कुछेक व्यावसायिक प्रतिष्ठान बेसी को पत्र, हिसाब-किताब, चेक भेजते आ रहे हैं। स्थानीय राजस्व विभाग उसे कर वसूली के नोटिस भेजता है। हर पखवाड़े किसी अंत्येष्टि संस्था से उसे किसी ‘खुली कब्रगाह’ में भूखंड खरीदने का विज्ञापन मिलता है। पूर्वोत्तर वर्षों के दिनों बेसी खतों के जवाब लिखती, चेक जमा करती, आमद-खर्च का हिसाब रखती रही। अब उसने सबकुछ त्याग दिया। समाचारों के अवांतर वित्तीय परिशिष्ट पढ़ती आयी बेसी ने अखबार ही खरीदना बंद कर दिया।
गलियारे के दरवाजे और उसकी चौखट के दरमियान बेसी कार्ड फंसा रखती जिनमें बने निशानों को सिर्फ  वह ही बूझ सकती थी। चाबी खाँचे को उसने पुट्टी से भर दिया था। और क्या कर सकती थी बेचारी- बच्चे, क्या रिश्तेदार, मित्र कोई नहीं ऐसी बेवा वह? ऐसा वक्त भी रहा आया जब द्वार खोल पड़ोसी बाहर झाँक उसके अतिरेकी सुरक्षा-प्रबंध की खिल्ली उड़ाते, कुछेक तो उसे चिढ़ाते भी। वह बीती बात हो गयी। बेसी किसी से बात नहीं करती। वैसे भी उसे ठीक से सूझ नहीं पड़ता था, वर्षों से पहनती आयी ऐनक के काँच किसी काम के नहीं रहे। किसी नेत्र चिकित्सक के पास जा नये लेंस लगवाना उसे भारी भरकम काम मालूम दिया। सब कुछ बड़ा मुश्किल- लिफ्ट में दाखिल होना उतरना तक कि जिसका दरवाजा हमेशा किसी धमाके से बंद होता।
बेसी अपनी इमारत से बस दो भूखण्ड ही आगे तक बमुश्किल जा पाती। ब्राडवे और रिवरसाइड ड्राइव के बीच गुजरती गली दिनोंदिनों आवर्धित होते शोर और गंदगी से भर गई थी। अधनंगे छोकरों के गिरोह इधर उधर दौड़ते रहते। घुंघराले बाल लहरा खूंखार आँखें तान परस्पर लड़ते काले लोग इस्पानी में गालियाँ बकते; उनके दरमियान नाटी-नाटी स्त्रियाँ होती जिनके भारी -भारी पेट प्राय: गर्भ से फूले होते। वे खरखराती आवाज निकाल ढिठाई से जवाब देतीं। कुत्ते भूँकते, बिल्लियाँ मिमियाती। कहीं जा भडक़ी आग बुझाने अग्निशामक गाडिय़ां, एंबुलेंस, और पुलिस - कारें दौड़ पड़ीं थीं। ब्राडवे पर पंसारी की पुरानी दुकानों को प्रतिस्थापित करे हुए सुपरमार्केटों में खाद्य सामग्री के पैकेट स्वयं उठा किसी ट्राली में धका ला कैशियर के आगे पंक्तिबद्ध खड़ा होना पड़ता था।
स्वर्ग के सिंहासन पर बैठे प्रभु , सुन जरा, सैम के मरने के बाद से न्यूयार्क - शायद पूरी दुनिया-चूर चूर हो गयी है। सारे सुशील लोग समूचे परिवेश से लोप हो गये हैं; उनकी जगहें चोरों, लुटेरों और रंडियों से आ घिरी हैं। तीन दफा बेसी के बटुए उड़ा लिये गये। पुलिस को रिपोर्ट करने पर वे बस हँस पड़े। जब कभी, कोई  शख्स सडक़ पार करना चाहे तो जान का जोखिम उठाये बगैर नहीं कर सकता। बेसी ने कदम नीचे रखा कि लौटा लिया। हाथ में बेंत रखने के सुझाव को यों मान ठुकरा दिया कि इतनी बूढ़ी या विकलांग तो अभी कतई नहीं हुई हँू। प्राय: हर पखवाड़े अपने नाखूनों पर लाल पॉलिश चढ़ाती यदाकदा गठिया उसे घर ही में रोके रखता , तब वह अलमारियों में से पहले कभी पहने जाते रहे वस्त्रों को निकाल , देह पर लगा आईने में स्वयं को निरख सूरत को परखती।
सुपरमार्केट का दरवाजा खोलना प्राय: नामुमकिन था। उसे पकड़ कोई थामे इसका इंतजार करना पड़ता। अपने ही में सुपरमार्केट को ऐसी जगह माना जाये कि जिसका अन्वेषण किसी शैतान ने किया होगा। आँखों को चौंधियाती रोशनी फेंकते लट्टू जलते। ट्रालियाँ धकाते लोग यों आगे बढ़ते कि राह आड़े आये किसी का ध्यान न हो तो उसे उलटा ही दें। कई शेल्फ  या तो बहुत ऊँचे या फिर बेहद नीचे थे। शोर इतना कि कान फट जायें, और  बाहर-भीतर के तापमान में जमीन आसमान का अंतर! चमत्कार ही मानें कि बेसी निमोनिया की लपेट में नहीं आयी। इन सबके ऊपर बात यह कि बेसी हमेशा दुविधाग्रस्त रहती। यह जवानी का लोभ नहीं वरन् आयु की अस्थिरता थी। बेसी के हिसाब से आज की गई खरीदी को पौन घंटे से ज्यादा नहीं लगना चाहिए था, लेकिन दो घंटे बीत चुके और सौदा अभी भी पूरा नहीं हुआ। अंतत: ट्राली खींच कैशियर की मेज तक पहुँची न पहुँची कि याद आया ओटमील का पैकेट तो उठाया ही नहीं। वह लौट पड़ी; तत्क्षण दूसरी स्त्री ने अपनी ट्राली वहां अड़ा दी। बाद में, जब हिसाब चुकाया तब नया बखेड़ा शुरू हुआ। बेसी के बैग की दाँयी बाजू रेजगी रखा छोटा बटुआ उलटी बाजू मिला। सोचो जरा, कौन यकीन करेगा कि ऐसा संभव हो सकता है। अगर किसी को बताये तो कहेगा- इसे तो पागलखाने का दरवाजा दिखाओ।  
बेसी के सुपरमार्केट की ओर निकलने तक दिन खासा उजला था; अब झुटपुटा छाने लगा। पीताभ और सुनहरा सूरज हडसन की, न्यूजर्सी के धुँधले टीलों की जानिब लुढक़ चला। ब्राडवे से सटी अट्टालिकाएँ सोखा हुआ ताप बाहर उगलने लगीं। अधोतलीय जालियों में से, जहाँ सबवे रेलगाडिय़ाँ घररघरातीं, बदबू भरी भभक उभरी। एक हाथ में सौदे का भारी थैला थामी बेसी दूसरे में अपना बटुआ कस कर पकड़ी हुई थी। पुराने दिनों ब्राडवे उसे कभी भी इतना खूँखार, इतना गंदा नहीं लगा होगा। वह चिकनाये डामर, गैसोलिन, सड़े फल, कुत्तों के मल की दुर्गंध भभका रहा था। फुटपाथ पर, फटे हुए अखबारों और सिगरेट के टुकड़ों के दम्र्यान कबूतर फुदक रहे थे। जेहन में उतारना मुश्किल कि ये जीव राहगीरों के सरपट कदमों तले दबने से कैसे बचते आये। प्रदीप्त आकाश से सुनहरी धूल बिखर रही थी। किसी दुकान के समक्ष लगे- कृत्रिम घास के बने - शेड के नीचे स्वेटशर्ट पहने हुए कुछ लोग पपीते का जूस, अनानास का जूस खड़े खड़े,  बेहद जल्दी में यों गले उतार रहे थे मानों उनके भीतर जल रही किसी आग को बुझा रहे हों। उनके सिर ऊपर इंदीयनों के आकार-प्रकार में तराशे नारियल लटक रहे थे। पास की किसी गली में , किसी टूटे नल से उछाल रहे फव्वारे में भी और नीचे जा बने गंदे पोखर में भी कतिपय काले और गोरे निर्वस्त्र बच्चे नहा रहे थे। गर्मी की उस तेज भभक के अंदर धीमी चाल चले आ रहे किसी ट्रक में लगे माइक्रोफोन से गरज रहे किसी कर्णभेदी गाने की, और उसे बीच बीच रोक, किसी राजनीतिक पद के लिए खड़े किसी उम्मीदवार के पक्ष में चीखती आवाजें उभर रही थीं। ट्रक के धुर पिछले सिरे खड़ी कोई लडक़ी- जिसके सिर पर लोहे के तार से तने खड़े बाल होंगे-पर्चे फेंक रही थी।
बेसी की शेष बची शक्ति के पार था सब कुछ: सडक़ पार करना, लिफ्ट में मदद के लिए प्रतीक्षा करना, और फिर पाँचवे तल्ले पहुँच दरवाजे के धमाके से बंद होने के पूर्व बाहर आना। दहलीज की पुट्टी हटा चाबी-खाँचा गोचर किया। चाबी फंसा घुमाई। लेकिन, ओह! चाबी टूट गयी। सिर्फ  उसका हैंडल भर ही हाथ में थमा रहा। अब बेसी के हृदय में समूची महाविपत्ति की धमक हुई। इमारत के अन्य लोग अपनी दूसरी चाबियाँ सुपरवाइजऱ के अपार्टमेंट में लटका रखतेे थे, लेकिन उसे किसी पर भरोसा नहीं था। इसके अतिरिक्त उसने ऐसा नया कांबिनेशन लाक लगवा लिया था कि जिसे - जैसा उसे पक्का यकीन था- कोई मास्टर कुंजी नहीं खोल सकती थी। किसी दराज में कहीं डुप्लीकेट चाबी थी जरूर- लेकिन अपने संग तो यही एक ही रखती थी। ‘‘सो, अब अंत आ गया,’’ बेसी ऊँचे स्वर अलापी।
कहीं से कोई मदद के लिए नहीं आया। पड़ोसी उसके जानी दुश्मन थे। सुपरवाइजऱ तो उसके पतन की राह ही ताक रहा था। बेसी का गला इस कदर रूँध गया कि वह रो ही नहीं सकी। उसने चारों ओर देखा-इस उम्मीद से कि वह प्रेत नजर आये जिसने उस पर यह अंतिम प्रहार किया है। बेसी ने, काफी अर्सा पहले से,  मृत्यु से बेखौफ  तानाबाना बिठा रखा था, लेकिन सीढिय़ों पर या गलियों में मरना तो अतिशय निष्ठुर मालूम दिया। और फिर यह यंत्रणा कब तक सहूँगी! मन एकाग्र कर सोचने लगी। क्या ताला चाबी बनाने सुधारने की कोई दुकान अभी खुली होगी? हो भी तो कारीगर को साइज़ कैसे बताए? उसे औजारों के साथ यहाँ लाना होगा। इसके लिए इन विशेष तालों के निर्माता से जुड़े मैकेनिक की जरूरत पड़ेगी। उसे औजारों के साथ यहाँ आना होगा। काश उसके पास इतना पैसा होता! वह तो खर्च के हिसाब से पैसा पास रखती रही है। सुपरमार्केट के कैशियर ने मात्र बीस सैंट भर ही उसे लौटाये हैं। ‘‘ ओह माँ! अब जीना नहीं चाहती मैं।’’  बेसी यिदिश  में बोल यों चौंक पड़ी कि उसे यह प्राय: पूरी भूली भाषा सहसा कैसे फिर याद आ गई।
सोच में उलझती सुलझती बेसी ने अंतत: मन कड़ा कर ठाना कि दोबारा गली में उतरेगी। कोई हार्डवेअर स्टोर या चाबियाँ सुधारती कोई न कोई गुमटी शायद खुली मिल जाये। तत्क्षण याद आया कि चाबी बनाने सुधारने का कोई ठिया निकटवर्ती इलाके में हुआ करता था। आखिर कुछेक अन्य लोगों की कुंजियाँ भी टूटती होंगी ही! लेकिन सौदा भरा यह भारी थैला कहाँ रखे? साथ ले जाना नामुमकिन। कोई विकल्प सूझ नहीं पड़ा । थैला दरवाजे पर ही टिकाया रहने देना होगा। ‘चुरा ही ले जायेंगे ना; और क्या?’ बेसी स्वयं से बोली। क्या मालूम पड़ोसियों ही ने जानबूझ मेरा ताला बिगाड़ा हो ताकि अपने अपार्टमेंट में न घुस पाऊँ और मौका देख वे मुझे लूट लें या मेरा असबाब उड़ा ले जायें!
गली में उतरने के पहले उसने अपना कान दरवाजे से सटाया। अनवरत उभरती भनभन के सिवा कुछ सुनाई न दिया कि जिसका कारण क्या उद्गम भी उसे ठीक से सूझ न पड़ा: कभी वह घड़ी की टिकटिक सी लगी तो कभी किसी गुंजन या आत्र्तनाद सी- क्या कोई सत्ता दीवालों के भीतर या पानी के नलों में फंसी हुई है? मन ही मन थैले- कि जिसमें रखे खाद्य पैकेटों को रेफ्रिजरेटर में आराम फरमाना न कि यहाँ गर्मी में तपना था- को खुदाहाफिज कहती हुई बेसी बुदबुदाई, ‘‘मक्खन पिघल जायेग, दूध फट जयेगा! कैसी सजा! मैं ही अभिशप्त हूँ, निंदनीय।’’ कोई पड़ोसी लिफ्ट से बस उतरने ही को तत्पर होगा कि बेसी ने उसे दरवाजा थामे रहने का इशारा किया। शायद वह कोई चोर हो सकता है। लूटपाट करने के जतन के अनंतर मुझ पर वार न कर दे? उसने नीचे आ उतरी लिफ्ट का द्वारा खोल उसे पकड़े रखा। बेसी ने शुक्रिया अदा करना चाहा लेकिन मुँह ना खुला। वैरियों का क्यों आभार माने? ये सब तो धूर्त चालबाजियाँ हैं।
गली में कदम रखते अंधेरा आ घिरा था। गटर का पानी बाहर बहने लगा था। स्याह पोखर में सडक़ के लैंप यों चिलकने लगे मानो किसी झील में हों। पड़ोस ही में कहीं फिर आग लगी होगी: उसे किसी सायरन की चीखती आवाज और अग्निशामक इंजन के घंटानाद सुनाई पड़े। उसके जूते भीग गये थे। ब्राडवे पर कदम रखते गरमी का ऐसा अहसास हुआ मानो टिन की शीट पर चल रही हो। दिन के समय में ही धूमिल रही आयी दृष्टि रात में तो प्राय: लुप्त हो ही चुकी थी। दुकानों में रोशनी तो थी लेकिन बेसी चीह्न नहीं पायी कौन क्या बेचता है। राहगीर उस पर गिर गिर पड़ रहे थे, बेसी को अब अफसोस हुआ बेंत हाथ में नहीं है। बहरहाल, आगे बढ़ शोविंडो के पास चली। उसने ड्रगस्टोर, बेकरी, कालीनों की दुकान, अंत्येष्टि प्रबंधन कार्यालय पार किया; वहाँ हार्डवेअर स्टोर नजऱ नहीं आया। बेसी आगे बढ़ती गयी। उसकी ताकत चुक चली , तथापि घुटने टेकना मंजूर नहीं किया। चाबी टूट गयी तो क्या मर जाये? पुलिस से विनय करूँ। कहीं कोई संस्था ऐसे मामलों में सहायक होती तो होगी! लेकिन कहाँ होगी वह?
कोई दुर्घटना हुई शायद। फुटपाथ दर्शकों से अटा हुआ था। पुलिसकारों और एंबुलेंस से सडक़ रूद्ध हो गयी थी। किसी ने होसपाइप से डामरकणों की बौछार की, संभवतया खून के दाग साफ करने के इरादे। बेसी ने ऐसा महसूस किया कि दर्शकों की आँखें किसी विचित्र तृप्ति से जा भरी है। ऐसे जन अन्य लोगों के दुर्भाग्य का मजा लेते हैं, उसने सोचा। इस कम्बख्त शहर में ऐसे हादसों भर ही से उन्हें सुकून मिलता है। नहीं, किसी से मदद लेने की गुहार नहीं करेगी।
वह किसी गिरजे तक आ पहुँची। चंद कदमों ने किसी पटबंद दरवाजे तक पहँुचा दिया। नीचे बैठने के लिए बेसी को बड़ा दम लगाना पड़ा। उसके घुटने डगमगाये। जूतों ने अंगूठों को और एडिय़ों को मसक दिया। बदन को कसी कोर्सेट ने किसी हड्डी को इतना दबा दिया कि देह दुखने लगी। ‘‘सो, शैतान की सारी ताकत आज मेरे खिलाफ आ चढ़ी है।’’ भूख और उसमें घुली उबकाई उसे सताने लगी। अम्लीय लार मुँह में आ भरी। ‘‘परमपिता, अब मेरा अंत आ गया है।’’ उसे यिदिश कहावत याद आयी,‘‘जो किसी सोच-समझ के बिना जियेगा, बिना कन्फेशन मरेगा।’’ उसने तो कोई वसीयत लिखने ही की अवहेलना की।
बेसी को झपकी लग गयी होगी, क्योंकि जैसे ही उसने आँखें फैला चारों ओर देखा तो क्या देखा: गहरी रात की नीरवता आ पसरी है, सडक़ प्राय: निर्जन और स्याह पड़ गयी है। दुकानों की शोविंडो की रोशनियाँ बुझी हुई हैं। गर्मी ने उमस में बदल कर बेसी को उसकी पोशाक के भीतर ठण्डक पहुँचा दी। तत्क्षण लगा उसका बटुआ चुरा लिया गया, हालाँकि वह एक सीढ़ी नीचे गिरा पढ़ा था जहाँ शायद जा खिसका होगा। बेसी ने वहाँ तक हाथ बढ़ाना चाहा लेकिन वह बेजान पड़ गया था। दीवार से टिका पड़ा उसका सिर किसी शिला समान भारी लगा। उसके पैर काष्ठ निर्मित तो कान पानी भरे लगे। उसने एक पलक ऊँची की-क्या नजर आया?-किसी समतल छत के ऊपर आकाश में नीचे आ लटका चाँद और उसके निकट चमक रहा एक हरिताभ तारा। बेसी ने जंभाई ली। वह प्राय: भूल चुकी थी कि कोई आकाश, कोई चाँद, तारे होते हैं। सालों से नीचे ही देखती आयी वह ऊपर कदापि नहीं देखी होगी। उसकी खिड़कियाँ पर्दों द्वारा इस शंका से ढंकी रहती कि सडक़ पार से कोई उसके घर भीतर झाँक सकता है। खैर, अगर आकाश है, तो ईश्वर भी होगा, फरिश्ते भी, स्वर्ग भी। नहीं तो उसके माता पिता की आत्माएँ कहाँ रहती होंगी? सैम भी तो अब वहीं होगा ना?
हाँ बेसी ने अपने सारे अनुष्ठान तज दिये थे। सैम की समाधि पर फूल चढ़ाने कब्रिस्तान कभी नहीं गयी। वह अधोतलीय शक्तियों से लडऩे-झगडऩे ही में इतनी अधिक उलझी रही कि उच्चस्थ सत्ताओं को भूल गयी। सालों में आज पहली दफा बेसी को प्रार्थना के किसी गीत को गाने की इच्छा हुई। शायद सर्वशक्तिमान प्रभु उस पर कोई दया न्यौछावर करें यद्यपि वह इस काबिल नहीं। स्वर्ग में विराजमान माता-पिता शायद उसके लिए अनुनय कर सकते हैं। कतिपय हिबू्र शब्द उसकी जबान पर आ झूमे लेकिन वह उन्हें उच्चार न पायी। फिर याद आया, ‘‘सुन, ओ इजऱाएल!’’ लेकिन उसके आगे? ‘‘मुझे क्षमा कर प्रभु,’’ बेसी बोल पड़ी। ‘‘मैं ही मुझ पर आ पड़ी विपत्तियों की मार खाने काबिल हूँ।’’
नीरवता और शीतलता कुछ ज्यादा ही बढ़ती गयी। टै्रफिक लाइटें लाल की बनिस्बत हरी होती गयीं, शायद ही कोई कार गुजरी हो। जाने कहाँ से आ निकला कोई नीग्रो सडक़ पर लडख़ड़ाता नजर आया। तनिक ही दूर खड़े उस शख्स ने बेसी पर नजरें धँसाई। लेकिन पलट कर चल दिया। बेसी को होश था कि उसका थैला महत्वपूर्ण दस्तावेजों से अटा पड़ा है, तथापि पहली दफा उसे अपनी संपत्ति से लगाव नहीं रहा। सैम खासी रकम छोड़ दिया गया था; वह अब निरर्थक है। अपनी वृद्धावस्था के लिए वह इस तरह सब बचाती आयी मानो अभी भी युवा हो। ‘‘कितनी उम्रयाफ्ता हूँ मैं ?’’ बेसी ने स्वयं से पूछा। ‘‘ इन सारे वर्षों क्या हासिल किया मैंने ? कहीं घूम ही आती! अपने धन के मजे मारती। किसी की मदद ही करती! ’’ उसके भीतर जाने क्या जोर से हँसा। ‘‘ मैं जरूर किसी दुष्टात्मा के अधीन रही आयी, सर्वथा स्वयं अपने में नहीं रही। अन्यथा इस गति की क्या कैफियत हो सकती है? ’’ बेसी बड़ी चकित हुई, लगा मानो गहरी नींद से जागी हो। टूटी चाबी ने उसके दिमाग का-सैम के अवसान के बाद बंद हो चुका-ताला खोल दिया।
छत की परली बाजू जा खिसका चंद्रमा-असामान्यतया आवृद्ध वह- लाल ही नहीं विरूपित भी लगा। अब फिजा पूर्णतया शीतल हो गयी थी। बेसी काँपने लगी। लगा निमोनिआ की गिरफ्त में जा फंसेगी, हालाँकि मृत्यु भय, बेघर होने के भय के साथ लोप हो चुका था। हडसन नदी की ओर से ताजा समीर बह आयी। आकाश में नये तारे उग आये। गली की राह काट फुटपाथ के सिरे आ ठिठकी किसी काली बिल्ली ने अपनी हरित आँखें सीधी बेसी के ऊपर गड़ा दीं। फिर, धीरे-धीरे, पूरी सतर्क वह निकट आने लगी। वर्षों से बेसी सभी पशुओं - कुत्तों, बिल्लियों, तोतों, चिडिय़ों तक-से नफरत करती आयी। वे रोग उपजाते हैं। सब चीजें गंदी करते हैं। बेसी यों मानती आयी कि हर बिल्ली में कोई न कोई शैतान बसा हुआ है। वह हमेशा आशंकित रहती कहीं किसी काली बिल्ली- जो हमेशा ही किसी बुरी बात का शकुन होती है-से सामना न हो जाये। लेकिन अब बेसी में इस जीव के प्रति प्यार आ उमड़ा कि जिसका कोई घर नहीं, माल नहीं, दरवाजा या चाबी नहीं; वह तो ईश्वर ही की उदारता के तहत जीती है। बेसी के पास आने के पूर्व बिल्ली ने उसका बटुआ सूंघा। फिर पूँछ ऊंची कर मिमियाते हुए उसने बेसी के पैर पर अपनी पीठ रगड़ उसे खुजाली। बेचारी भूखी होगी। मन करता है उसे कुछ खाने को दूँ। ऐसे जीव से कैसे नफरत की जा सकती है, बेसी चकरायी। ओ मेरी माँ! मैं बेशक डाइन के वशीभूत रही आयी। अब नया जीवन आरंभ करूँगी। उसके दिमाग में कोई विश्वासघाती ख्याल आ बैठा: शायद, फिर ब्याह कर लूँ ?
रात किसी एडवेंचर के बिना नहीं बीती। कुछ पल बीते बेसी को हवा में उड़ती कोई श्वेत तितली नजर आयी। वह थोड़ी देर वहाँ पार्क की हुई किसी कार पर मंडरायी फिर लोप हो गयी। बेसी जान गयी कि वह किसी नवजात शिशु की आत्मा है, क्योंकि सच्ची तितलियाँ अंधेरे में नहीं उड़तीं। फिर, कुछ क्षण बीते, आँखें क्या खुलीं कि आग का कोई गोला-किसी न किसी किस्म का चमकीला साबुनी बुलबुला, एक से दूसरी छत पर फैलता ही फैलता पीछे जा लोप होता हुआ-दीख पड़ा। उसे ऐसा बोध हुआ कि जो दीख पड़ा वह हाल दिवंगत किसी शख्स की आत्मा है।
बेसी अब नींद में क्या डूबी कि अतिशय चकरायी हुई उठी। पौ फट चुकी होगी, बल्कि सेंट्रल पार्क के सिरे से सूरज झांकने भी लगा, हालांकि बेसी उसे यहां से देख नहीं सकी, जबकि ब्राडवे पर आकाश गुलाबी और रक्ताभ हो गया था। बाँये खड़ी इमारत की खिड़कियों पर कांति प्रदीप्त हुई; उनके शीशे किसी जहाज के केबिनों के उजालदानों समान चिलक उठे। कोई कबूतर हवा में गोता लगा जमीन पर आ उतरा। अपने छोटे छोटे लाल लाल पैरों फुदक चोंच गड़ा गड़ा कुछ चुगने लगा जो शायद बासी रोटी के गंदे टुकड़े या सूखा हुआ कीचड़ होगा। बेसी चकरा गयी। ये पक्षी जीते हैं? रात में कहाँ सोते हैं? बारिश, ठण्ड, बर्फबारी कैसे बर्दाश्त करते हैं? मैं घर जाऊँगी, बेसी ने तय किया। लोग मुझे गलियों में रहने नहीं देंगे।
उठना अतिशय पीड़ादायी था। रात की शैय्या जा बनी सीढ़ी से बदन चिपका हुआ लगा। कमर दुखी, पैरों पर झुनझुनी आ चढ़ी। इस सबके बावजूद, वह घर की तरफ  धीरे-धीरे बढ़ी। साँसों में, भोर की-घास और काफी की महक मिली-हवा बह चली। अब वह अकेली नहीं। आस पास की गलियों से अनेक लोग उमड़ आये। वे काम पर जा रहे होंगे। स्टैंड पर अखबार खरीदे न खरीदे कि वे सबवे में ओझल हो गये। गुमसुम और विचित्रतया शांतमना नजर आये वे भी, यों लगे मानो चेतना को खँगालती रात के भीतर से परिमार्जित हो बाहर निकले हों। अगर इतनी भोर वे काम पर पहुंचने की राह पकड़े हुए हैं तो उठते कब होंगे, बेसी चकित हुई। नहीं, इस इलाके के सभी लोग दस्यु और हत्यारे नहीं माने जा सकते। किसी युवा शख्स ने तो बेसी को ‘गुडमार्निंग’ का अभिवादन दर्शाता सिर नवाया। उसने युवक को अपनी मुस्कान से जवाब देना चाहा, उसे यूँ महसूस हुआ कि वह अपनी उस स्त्री-भाव भरी मुद्रा को भूल गयी है जिसे किशोरवय से भलीभाँति जानती आयी; प्राय: पहला सबक यह उसे माँ ने सिखाया था।
अपनी इमारत पहुंचते ही उसे बाहर खड़ा आयरी सुपरवाइजर-उसका जानी दुश्मन-नजर आया। वह कूड़ा करकट बटोर ले जाने वाले कर्मचारियों से चर्चा कर रहा था। नन्हीं नाक, लंबे ऊपरी ओंठ, पोपले गाल, और नुकीली ठुड्डी से भरा चेहरा घुमा रहे उस भीमकाय पुरूष के सिर का एक गंजा भाग उसके पीताभ केशों से ढँका था। उसने चकित नजरों से बेसी को देखा। ‘‘क्या हो गया, दादीजी,?’’
हकलाते-हकलाते बेसी ने पूरा वाकया उसे बयान किया। उसने उसे, चाबी का, सारी रात हाथ में कसा हुआ हैंडल बताया।
‘‘ओह माँ,’’ वह चीखा।
‘‘मैं क्या करूँ ?’’ बेसी ने पूछा।
‘‘मैं दरवाजा खोलता हूँ।’’
‘‘लेकिन आपके यहाँ अतिरिक्त चाबी नहीं है।’’
‘‘हमें तो आग लगते क्षण सारे दरवाजे खोलने का अभ्यास है।’’
अपने अपार्टमेंट दौड़ पाँच चार मिनिट में लौटे सुपरवाइजर के हाथों में कतिपय औजार और बड़े से एक छल्ले में चाबियों का गुच्छा था। दोनों लिफ्ट से ऊपर पहुँचे। खाद्य पदार्थ भरा थैला देहलीज ही पर था हालांकि थोड़ा-बहुत खाली लगा। संचालक ताले के ऊपर औजार चलाते पूछ बैठा, ‘‘ये कार्ड क्या हैं? ’’
बेसी ने कोई जवाब नहीं दिया।
‘‘मेरे पास तत्क्षण आ जाती; इतनी उम्र में सारी रात यँू ही भटकी, ओ भगवान!’’ तत्क्षण कोई द्वार खोल गाऊन और स्लीपर्स पहनी, खूब साफ  किये बालों को पिनों पर लपेटी कोई नाटी स्त्री बाहर निकल बोल पड़ी, ‘‘आपको क्या हो गया? मैंने कई दफा द्वार खोल बाहर झाँका। बैग वहीं का वहीं पड़ा था। अंतत: मैंने उसमें से मक्खन और दूध निकाल अपने रेफ्रीजरेटर में रख दिया है।’’
बमुश्किल बेसी अपने आंसू थाम पायी। ‘‘ओह, मेरे प्यारे लोग,’’ वह बोली, ‘‘मुझे नहीं मालूम रहा कि ..............’’
स्ंाचालक ने चाबी का दूसरा सिरा खींच निकाला। कुछ पल थोड़ी हरकत और की। फिर जाने किस चाबी को फँसा कर घुमाया। दरवाजा खुल गया। दरारों में फंसे कार्ड नीचे जा गिरे। वह बेसी के साथ कुछ कदम भीतर चला, जिसे अपने -लंबे अरसे से वाकई निष्क्रिय-अपार्टमेंट की फफंूदियाहा गंध अब महसूस हुई। सुपरवाइजर बोला, ‘‘अब कभी, इस जैसी कोई घटना घटे, मुझे पुकार लगाना। इसी के लिए तो मैं तैनात हूँ।’’
बेसी ने उसे कुछ देना चाहा लेकिन उसके हाथ इस कदर अकड़ गये थे कि बटुआ खींच ही नहीं पायी। पड़ोसन उसका मक्खन और दूध ले आयी। अपने बेडरूम पहुंच बेसी बिस्तर पर निढाल जा गिरी। उसे छाती पर दवाब महसूस हुआ, वमन के लिए गला रूँधा। एड़ी से लगा वक्ष तक जाने कैसी भारी भारी सुरसुरी उभरी। सर्वथा अविचलित, तथापि देह की तरंगों बाबत, बेशक, जिज्ञासु हो बेसी ने उसे सुना; संचालक और पड़ोसन के बीच चल रही चर्चा को वह समझ नहीं पायी। ऐसा कुछ तीस वर्ष पूर्व किसी अस्पताल में आपरेशन के पूर्व बेहोश किये जाते क्षण हुआ होगा-डाक्टर और नर्स की बातें उसे बहुत दूर किसी बेगानी भाषा में गड्डमड्ड होती वाणी समान लगी थी।
तत्क्षण खामोशी आ पसरी जिसके अनंतर सैम नजर आया। दिन होगा न रात - कोई अजीबोगरीब झुटपुटा आ छाया था। अपने ख्वाब में बेसी को ज्ञात रहा आया कि सैम मर चुका है तथापि किसी भेदभरी युक्ति के सहारे कब्र से निकल उसने उससे मिलने की जुगाड़ बिठा ली है। बेहद शिथिल और व्याकुल वह बोल नहीं पा रहा है। वे व्योमरिक्त, भूहीन अंतरिक्ष स्थित मलबे भरी किसी सुरंग - किसी गुमनाम भवन के भग्नावशेष- स्याह और घुमावदार गलियारे, तथापि किसी न किसी दृष्टि के अवांतर परिचित लगते स्थान में से गुजरे। वे किसी ऐसे क्षेत्र जा पहुँचे जहाँ परस्पर जुड़ रहे दो पर्वतों के अवांतर जा रहा गलियारा सूर्यास्त या सूर्योदय समान नजर आ रहा था। वहाँ वे झिझकते क्या किंचित लजाते हुए ठिठके। वह उस हनीमून जैसी रात लगी जब वे केटस्किल्स के एलेनविले में होटल मालिक द्वारा प्रदत्त परिणय कक्ष में ठहरे थे। ठीक वे ही वचन, ठीक उसी शैली में उसके कानों भीतर गूँजे जो उसने उन्हें सुनाये होंगे: ‘‘आपको यहाँ किसी चाबी की दरकार नहीं। तशरीफ  ले जाइये,- और ‘‘मेज़ेल टोव।’’