Monthly Magzine
Saturday 18 Nov 2017

नीला मर्तबान


अशोक कुमार प्रजापति
‘पारिजात भवन’
1112/बी-6, मौर्य विहार कॉलोनी (कुम्हरार)
पो.-बहादूरपुर हाउसिंग कॉलोनी, पटना-800026
मो. 09771425157
राजधनी एक्सप्रेस की गुलाबी गद्दीदार बेड पर नीलू की जैसे ही आँख खुली, उसने अपने आपको भागती हुई दुनिया में पाया। गाड़ी हल्की सी रोशनी भरी प्रात: कालीन शांति के बीच अपनी मंजिल की तरफ  सरपट दौड़ रही थी। पत्थरों के घने जंगलों का अंतहीन सिलसिला शुरू हो चुका था। सजी-धजी अट्टालिकाएँ दरख्तों से होड़ लेती लाईन से स्वागत में खड़ी थी। उसकी मासूम-सी उत्सुकता लिए आंखें नई दुनिया देख रही थी।
‘‘पापा-पापा देखो-देखो कितने बड़े-बड़े फूल खिले हैं!’’ रेलवे लाईन के किनारे इशारा करती नीलू चिल्लायी।  
‘फूल और लाईन किनारे!’-राघव हड़बड़ाकर सीट पर उनींदा -सा उठ बैठा और बड़ी- सी खिडक़ी से बाहर बेटी के देखने की दिशा में झांकने लगा।
‘धत तेरे की’! अरे वो फूल-वूल नहीं है- शहर के कचरे हैं कचरे, जिसमें रंग-बिरंगी प्लास्टिक की हवा भरी थैलियाँ लहराती हुयी चमक रही हैं। ‘कचरा-फूल’! अब थोड़ी देर में हम नई दिल्ली पहुँचने वाले हैं।’’ -वह हकीकत बयां करता बोला।
नीलू का कोमल हृदय घोर निराशा में डूब गया और वह फिर से दौड़ती हुई दुनिया में कुछ अचंभित करनेवाली चीजें ढूढने लगी। यात्री अपने-अपने सामान सहेजने लगे।
जरा दूर लाईन के समांतर एक खुली सडक़ अजगर की तरह पसरी थी, उस पर मोटर गाडिय़ाँ शहर की ओर बेतहाशा भागी जा रही थी।
‘‘वो देखो पापा, कित्ता बड़ा चूहा हमारी रेलगाड़ी से रेस लगाते दौड़ रहा है!’’ आश्चर्य से आँखें फाड़े नीलू एक बार फिर पुलकित होती बड़े अजगुत वाली बात बोली।
वह फिर चौंका! दरअसल वह काले रंग की तिपहिया ऑटो थी और काले ध्ुँए का पुच्छल्ला छोड़ती दिल्ली की ओर दौड़ रही थी। दूर होने की वजह से वह भूरे रंग की दुमदार चूहे की शक्ल का लग रहा था। दर्जनभर टैक्सियाँ भी खटमल की तरह रेंग रही थीं।
 अपनी बेटी की बचकानी बातों पर मुस्कुराता हुआ उसकी दृष्टिकोण को स्पष्ट करने की कोशिश की। ‘‘हाँ, यहाँ दिल्ली में इतने बड़े-बड़े हजारों चूहे हैं और हम चूहे पर सवार होकर अपना डेरा चलेंगे। चलोगी न?
और सचमुच में पूरा परिवार हरे-पीले चूहे पर सवार होकर रास्ते भर अपना-अपना मुंह रूमाल से ढांपे आर के पुरम के सरकारी क्र्वाटर में पहुँचा। घर-गृहस्थी का सामान पहले ही पहुँच चुका था जिन्हें व्यवस्थित करने में माँ और रत्ना को पूरे तीन रोज लगे।
प्रदूषण के मारे स्कूलों ने अपने-अपने छात्रों के लिए मास्क अनिवार्य कर दिये। पहले स्कूली बच्चों की पहचान उनके विशेष ड्रेस से होते थे, पर अब मास्क के रंग से पहचाने जाने लगे थे। सभी स्कूलों के मास्क के अपने-अपने रंग थे। मां मास्क को बैल-बछड़ों के मुँह पर चढ़ाये जाने वाला जाब कहती थी। मुँह पर मास्क चढ़ाना नीलू को बड़ा अटपटा और कष्टकर लगता। मास्क लगाने को रत्ना को बेटी की बड़ी मान- मनौव्वल  करनी पड़ती, हालाँकि ऐसा करते हुए उसे बड़ी पीड़ा होती थी, लेकिन सब्जी मंडी या मार्केट जाते हुए उसे भी मास्क लगानी पड़ ही जाती थी। कभी-कभी मास्क की वजह से वह पड़ोसियों तक को नहीं पहचान पाती जबकि वे बगल से गुजर रहे होते थे। दिल्ली आने के पूर्व इस तरह की समस्या का उसे तनिक भान तक नहीं था।
इस मास्क-मास्क के खेल ने तो एक दिन हद ही कर दी थी। एक शनिवार को राघव स्कूल गाड़ी से नीलू की कद-काठी की दूसरी बच्ची को अपने घर उठा लाया। मास्क लगे चेहरे को वह वह पहचान नहीं पाया। घर आकर बच्ची के मास्क उतारते ही वह अवाक रह गया- वह नीलू के स्कूल की दूसरी बच्ची थी। वह उसे गोद में उठाये दौड़ा-दौड़ा फिर से उसी जगह पहुँचा। नीलू वहीं खड़ी रो रही थी। उस बच्ची की मम्मी पास ही में हैरान परेशान खड़ी थी। अपनी-अपनी बच्ची को पाकर दोनों बेहद खुश हुए लेकिन उदासी और विषाद उनके चेहरे पर चिपके थे।
    ‘‘अरे भाई साब चेहरा न सही, गले में पट्टे से लटक रहे आई- कार्ड तो देख लेने चाहिए थे ? तैने तो मेरे को परेशान करके रख दी- आईंदा ऐस्सी गलती ना होए जी!’’-उस पंजाबन की हिदायत थी
    ‘सौरी’ कहकर वह एक अज्ञात भय से कांप उठा और नीलू को गोद में उठाये, सीने से चिपकाये डेरा लौटा। माँ और रत्ना की सौ बात सुननी पड़ी सो अलग से। उस रोज के बाद नीलू को सख्त हिदायत दी गयी कि ऑटो से उतरने के बाद मास्क हटा ले ताकि किसी को कन्फ्यूजन न हो। लेकिन प्रदूषण की प्रबलता को देखते हुए ऐसा करना व्यावहारिक नहीं था। स्वास्थ को खतरा था।  बड़ी गंभीर सोच विचार के बाद नीलू को पीले रंग की पानी की बोतल लाकर दी गई ताकि उसे आसानी से पहचाना जा सके। पर सप्ताह भर में ही कई बच्चों के कंधों से हू-ब-हू बोतलें लटकने लगी। सो यह उपाय भी दिल्ली सरकार के प्रदूषण रोकने के सारे उपायों की तरह फ्लॉप साबित हुआ।
    फसलों की कटनी का मौसम चल रहा था और खेत गेहूँ की बुआई के लिए तैयार हो रहे थे। पंजाब-हरियाणा के ग्रामीण क्षेत्रों में फसलों के ठूँठ बड़े पैमाने पर जलाये जा रहे थे जिससे भूरे धूल भरे बादल उमड़ते घुमड़ते दिल्ली के आकाश में छा गये। आकाश में दो हरे-बैंगनी इन्द्रधनुष उग आये। हवा में, जो कि पेट्रोलियम की गंध लिये भी, तनिक गर्माहट थी।
    जो दिल्ली कभी बाबुओं के शहर के रूप में जाना जाता था, अब कारों के शहर के रूप में बदनाम हो चुका था। दिल्ली और बिजिंग के बाशिंदों के फेफड़़े एक साथ काले हो रहे थे। इस मामले में दोनों  भाई-भाई साबित हो रहे थे।
    पूरे देश के गाँव-कस्बों से बड़ी संख्या में लोगों का झुंड किसी न किसी बहाने से दिल्ली में आकर बसते जा रहे थे। परिणामत: राजधानी रोज ब रोज मधुमक्खी के छत्ते की तरह बड़ा बेडौल आकार ग्रहण करता जा रहा था। दिल्ली में लोग ठसम-ठस ठूँसते जा रहे थे। छत्तों को तो एक न एक दिन अपने ही बोझ के मारे टूटकर धरती पर बिखरना ही होता है। राघव भी उन्हीं मधुमक्ख्यिों में से एक था। वह कृषि मंत्रालय में दो वर्षों के ‘डिपूटेशन’ पर आया था और वहीं अंतिम रूप से समंजित होने की कोशिश में लगा था।
    शिशिर के बादल, जिनसे हर चीज पर नील सी छाई हुई थी, धीरे धीरे खिसक गये। सूरज चमचमाने लगा और क्षितिज कांच की तरह झिलमिलाने लगा। हवा सीटी-सी बजाती बहे जा रही थी। बादलों की जगह अब धीरे-धीरे धुँआ ले रहा था। और अब गुनगुनी ठंडक की दोसाला ओढ़े दीपावली का त्योहार आ गया। अपने साथ धुँए के बादलों का उपहार भी लेता आया। शाम ढलते ही लक्ष्मी पूजन का मुहूर्त था। रत्ना पूजा की थाली सजाये आरती गाने की कोशिश कर रही थी लेकिन मुँह से स्पष्ट बोल नहीं फूट रहे थे। पास ही में बैठी माँ, जो मिट्टी के दीये में तेल -बाती डाल रही  थी, जोर-जोर से लगातार खांसने लगी। यह सब तब हो रहा था जबकि अभी लाखों पटाखें फूटने बाकी थे। लक्ष्मी देवी के परम्परागत स्वागत में जो दरवाजे-खिड़कियाँ खुले रखे गये थे, राघव ने आनन-फानन में बंद कर दी ताकि प्रदूषित हवा कम से कम कमरे में घुसे। अमावस की उस काली रात को न उसके दरवाजे खुले और न दूसरों के। नीलू छत पर जाने के लिए मचलती रही लेकिन उसे बड़ी क्रूरता से कमरे में बंद रखा गया।
    कुछ देर बाद पूरा शहर लावे की तरह फूटने-फटने लगा और पटाखों के जलने-फूटने का सिलसिला देर रात गये तक जारी रहा। बड़ी हिम्मत कर राघव अपनी जिद कर रही बेटी को एक अदद छुर्रछुर्री जलाने छत पर ले गया लेकिन मास्क लगे होने के बावजूद दस पंद्रह मिनट में ही उसका दम घुटने लगा। लस्त-पस्त बड़ी मायूस चेहरा लिये वे कमरे में लौट आये। पूरा परिवार पहली बार दीपावली बंद कमरे में मना रहा था। अल्लसुबह वह रोज की तरह माँ को साथ लेकर डीयर पार्क की तरफ निकला। चहुँ ओर घना और तीक्ष्ण रसायन मिला धुंआ छाया था। हवा बिल्कुल बंद। पीपल के पत्ते तक नहीं डोल रहे थे। पेड़-पौधे और इमारतों पर भी ये कब्जा जमाये बैठे थे। सडक़ों पर छाया धुंआ गाडिय़ों के आने जाने पर थोड़ा हिलता-डुलता और फिर से वहीं स्थिर हो जा रहा था। सैर को निकले लोगों का दम घुटने लगा और लोग मुँह पर रूमाल दाबे वापस लौटने लगे। राघव को भी सांस लेने में तकलीफ  होने लगी। माँ का दम फूलने लगा। आगे वह वापस होता या कुछ और सोच-समझ पाता कि माँ सीना थामे फुटपाथ पर लुढक़ गयी। वह सहायता के लिए चारों चीखने-चिल्लाने लगा लेकिन सडक़ पर बहुत कम लोग थे और जो थे भी वे अपने आप में डूबे थे। पुलिस का कहीं अता-पता नहीं था। थक हार कर वह किसी तरह माँ को क्र्वाटर तक लाया। वह बेचैनी से छटपटा रही थी और जोर-जोर से सांसें खींच रही थी। उसने ठंडक के बावजूद ए.सी. चला दी लेकिन इसका कोई खास प्रभाव नहीं पड़ रहा था। उसके ब्लॉक में तीन लोगों के पास कारें थी। एक डीजल चालित और दो विषम संख्या वाली। लेकिन आज इवेन डे था सो भारी जुर्माने की वजह से कोई तैयार नहीं हुआ। डीजल गाडिय़ों को तो पहले ही प्रतिबंधित किया जा चुका था। यहाँ किसी को औरों की क्या पड़ी थी। यह कोई गाँव-कस्बा तो था नहीं, महानगर था भाई! ये राष्ट्रीय स्तर की सोचवाले होते हैं। अड़ोसी-पड़ोसी जैसे संकीर्ण विचारों में कोई सिर नहीं खपाता।
    माँ की तबियत हरपल बिगड़ती जा रही थी। पड़ोसी का बालक दरवाजा खोलकर नीलू के साथ खेलने के  फिराक में उसके दरवाजे तक ठुमकता हुआ आया पर अगले ही पल उसकी मम्मी उसे उठाकर अपने साथ ले गयी और फटाक से दरवाजा बंद कर लीं। चारों तरफ से वह निराश हो चुका था, और वक्त था कि भागता ही जा रहा था। माँ के कष्ट उसे देखे नहीं जा रहे थे। वह बड़ी मान-मनौव्वल के बाद माँ को साथ ले आया था, बाबू जी गाँव छोडक़र आने से दो टूक शब्दों में इनकार कर चुके थे। रह-रहकर माँ पिताजी को बड़ी करूण शब्दों में पुकार उठती।
    अंतत: उसने मुँह पर गमछा लपेटी और टैक्सी की तलाश में सेक्टर चार की तरफ भागा। चार और पांच के पास टैक्सी स्टैंड था जिसमें भाड़े पर गाडिय़ाँ मिलती थीं। स्टैंड में भी ऑड-इवेन जन्य सन्नाटा पसरा था। सौभाग्य से एक सरदार ड्राईवर धुएं से लड़ता गाड़ी के शीशे चढ़ाकर बैठा था। जैसे-तैसे रोज के बनिस्बत तीगुने भाड़े पर वह हास्पीटल जाने को राजी हुआ।
    हास्पीटल में जलजले की तरह का नजारा था। पूरा हास्पीटल बच्चे-बूढ़े मरीजों से अँटा पड़ा था, बरामदे तक में मरीज लुढक़े पड़े थे। अब और की गुंजाइश नहीं रह गयी थी। मजबूरन वह दूसरे हॉस्पीटल पहुँचा वहाँ भी लगभग वही नजारा था लेकिन किसी तरह उसे जेनरल वार्ड में एक बेड मिल गया। तिगुने-चौगुने कीमत पर ऑक्सीजन लगाये जा रहे थे। नर्सिंग होम वालों की चाँदी थी। ऑक्सीजन और सेलाईन के लिए मारा-मारी मची थी। वह खुद भी हांफ रहा था। कुछ भाग दौड़ की थकान से तो कुछ प्रदूषित हवा की मार से।
    हड़बड़ी में वह मोबाइल साथ रखना भूल गया था। नर्सिंग होम वाले कम से कम दस हजार अग्रिम जमा करने की जिद पर अड़े थे, वरना मरीज के नाक से ऑक्सीजन हटा लेने की ध्मकी दे रहे थे। माँ आंसू भरी कातर निगाहों से उसकी बेबसी देख रही थी। माँ को अकेला छोडक़र क्वार्टर जाने की बात सोचा भी नहीं जा सकता था। सब तरफ जल्दी मची थी। रह रह कर सडक़ों पर एम्बुलेंस की कूक सुनाई दे जा रही थी जो माहौल को और भी भयानक बना दे रही थी। एक दयालु लडक़ी ने अपना मोबाईल उसकी तरफ  बढ़ाया। ‘‘रत्ना, मां सिरियस है, ऑक्सीजन लगी है। जल्दी से कम से कम बीस हजार रुपये लेकर पहुँचो वरना कुछ भी हो सकता है ! ’’
 ‘‘लेकिन इतने रुपये हैं कहाँ? वो धनतेरस के दिन सिक्के खरीदने में निकल गये। तीन-चार हजार से ज्यादा पैसे नहीं बचे हैं और अभी आधा महिना बाकी पड़ा है।’’
    हे ईश्वर! इन भगवानों और रूढि़वादी परम्पराओं ने तो बेड़ा गर्क कर दिया! डेबिड कार्ड पहले ही खाली हो चुका है। अभी तक सी.टी.जी. के पैसे भी नहीं मिले हैं ।
    ‘‘रत्ना एक काम करो, मेरे नीले जींस की जेब में क्रेडिट कार्ड पड़ा है। कार्ड लेकर आ जाओ, यहाँ कार्ड  से भुगतान की सुविधा है। ’’
    ‘‘नीलू को भी लेती आना, अकेले कहाँ छोड़ोगी?’’
    ‘‘लेकिन वो तो स्कूल गयी! ऑटोवाला आया था।’’
    ‘‘ओह गॉड !! आज एक साथ सारी मुसीबतों से पाला पड़ा है।
    ‘‘अच्छा, पड़ोसी को जरा बता देना । लेकिन जल्दी, करो समय नहीं है।’’
    ‘‘अरे वो सब बच्चों को लेकर शहर से बाहर चले गये हैं, पूरा ब्लॉक लगभग खाली हो चुका है। टीवी पर प्रदूषण का ‘‘रेड अलर्ट’’ जारी हुआ है।’’
‘‘और तिसपर नीलू को स्कूल भेज दी? वो अब लौट रही होगी। स्कूल कॉलेज तो बंद कर दिये गये हैं। जरा याद करके मोबाईल लेती आना।’’ उसने हिदायत दी और मोबाइल लडक़ी को लौटाते हुए थैंक्स बोला।
    उसका चेहरा पसीने से तरबतर हो रहा था। उसे लगा कि रत्ना के आते आते कहीं माँ के प्राण पखेरू न उड़ जाये। वह फिर से हाथ जोड़े गिड़गिड़ाता मैनेजर के पास पहुँचा और इलाज शुरू करने की मिन्नतें करने लगा।
    सॉरी मिस्टर राघव, वीआईपी पेशेेंट के वजह से आपको कहीं और शिफ्ट करना पड़ेगा। यह सुनकर उसके होश फाख्ता हो गये।
    ‘‘वैसे बगल के वेटिंग रूम में पंखे हैं और ‘एयर प्यूरीफायर’ भी लगा दिया गया है। कुछ देर तक मरीज को वहाँ रख सकते हैं, पर जितना जल्दी हो शिफ्ट कर जायें।’’
    वह आगे कुछ कर पाता कि ऑक्सीजन का मास्क हटाकर हास्पीटल के कर्मचारी माँ को वेटिंग हाल में शिफ्ट करने लगे। वह चिंता और क्रोध से कांपने लगा। इतना बेबस वह जीवन में कभी नहीं हुआ था। वेटिंग हाल में थोड़ी राहत थी लेकिन भीड़ अधिक होने की वजह से शुद्ध हवा अपर्याप्त साबित हो रही थी। तकरीबन आधे घंटे के बाद घबरायी हुई रत्ना पहुँची तो वह बुरी तरह हांफ  रही थी। चेहरा ऐसे काले पड़ गये थे गोया भाड़ झोंक कर आ रही हो।
    पैसे के बल पर एक साधारण से क्लिनिक में माँ को भर्ती कर वह थोड़ा निश्चिंत हुआ। एक दो इंजेक्शन लगते ही स्थिति में तेजी से सुधार होने लगा और अपनी सांसों से लड़ती हुई मां थककर सो गई। दोनों तनिक निश्चिंतता से चाय पी ही रहे थे कि उधर से ऑटो वाले का पफोन आया कि स्कूल अगले आदेश तक बंद कर दिया गया है। नीलू को लेने आ जायें। बहुत धुंआ है बच्चों का दम घुट रहा है।
    ‘‘भाई, उसे जरा घर तक छोड़ दो, मैं दस पंद्रह मिनट में पहुँच रहा हूँ।’’
 ‘‘ठीक है साहब लेकिन मैं आपके पहुँचने तक इंतजार नहीं कर सकता, और भी बच्चे हैं- सब बुरी तरह हांफ खांस रहे हैं। मास्क का भी कोई असर नहीं हो रहा।’’
    माँ को रत्ना के हवाले कर वह तेजी से सडक़ की तरफ  भागा। धुंआ घना होता जा रहा था और सडक़ें सुनसान । बस-ऑटो लगभग बंद थे और लोग बहुत मजबूरी में जरूरी काम से घरों से निकल रहे थे। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था। लगा कि उसका पूरा परिवार दम घुटने से मर जायेगा। एक स्कूटर वाले की मदद लेकर वह सेक्टर एक तक पहुँचा और वहाँ से अपने क्र्वाटर में। जहरीली रसायनों मिश्रित धुंए से आँखों में तेज जलन हो रही थी।
    नीलू सीढ़ी पर बैठी रो रही थी। आंखें लाल और सूजी हुई। मास्क आंसुओं से गीले थे। राघव को देखते ही वह दौड़ उसके गोद में निढाल हो गयी। जहरीला धुंआ नीलू को भी अपने गिरफ्त में ले चुका था। ब्लॉक में भयानक सन्नाटा पसरा था।
अचानक उसका फोन बजने लगा।
उधर से उसका दोस्त रवि रैना था।
‘‘यार राघव, बॉस को बोल देना मैं एक सप्ताह नहीं आ पाउंगा । वे  स्वीच ऑफ किये हैं। जवाब में राघव ने अपनी सारी हकीकत बयां कर डाली।
‘‘अरे राघव! एक पल की भी देर किये बिना दिल्ली से फुट्ट ले मेरे भाई! काले धुंए की चादर तीन-चार दिन तक टलने वाला नहीं। लगता है, न्यूज नहीं देखी तूने? मौसम वैज्ञानिकों ने सैटेलाईट की तस्वीर के हवाले से चेतावनी जारी की है।!’’
‘‘हाँ, तू एकदम ठीक कह रहा है, लेकिन मैं ऐसी हालत में जाऊं तो कहाँ जाऊं? मां गंभीर है और अब बच्ची की भी स्थिति बिगड़ती जा रही है। मेरी तो बुद्धि काम नहीं कर रहा। बैंक बैलेंस लगभग शून्य है। क्रेडिट कार्ड का ‘कैश लिमिट’ खत्म हो चुका है। मैं तो दिल्ली का ‘डिपूटेशन’ लेकर बुरे फंस गया यार।’
ऑक्सीजन के सिलिंडर पर कितने लोग और कितने दिन जिंदा रहेंगे। शाम तक तो सब समाप्त समझो। समय है भाई, जल्दी शहर छोड़ दे। पैसे की चिंता ना कर, आधे घंटे में मैं तेरे खाते में ई-बैंकिंग से पचास-साठ हजार रुपये ट्रांसफर कर दे रहा हूँ । तू  एकाउंट नम्बर मैसेज कर दे। समझ गये न ? जल्दी करो। मेरा गांव तीन-चार सौ किलो मीटर से ज्यादा दूर है , वरना यहाँ आ सकते थे। फिलहाल मथुरा-वृंदावन जानेवाली ‘एक्सप्रेस हाईवे’ पकड़ ले मेरे दोस्त। स्थिति सामान्य होने पर वापसी की सोचना।’’
‘‘हाँ, ठीक है। पर पैसे जरूर ट्रांसफर कर दें रवि, जल्दी ही लौटा दूँगा।’’
‘‘अरे यार, उसकी चिंता ना कर। पहले जल्दी निकलो वरना भाड़े की गाड़ी भी नहीं मिलेगी। ’’
उसे रवि की सलाह अमृतवाणी की तरह लगा। वह तेजी से इसी दिशा में सोचने लगा। वह जल्दी-जल्दी जरूरी सामान पैक करने लगा। नीलू डरी सहमी बदहवास बाप को टुकुर टुकर  देखती रही। कुछ देर बाद ट्रेवेल  एजेंसी को फोन किया और जल्दी से एक टैक्सी भेजने का अनुरोध् किया।
‘‘ठीक है जी, दस मिनट में गाड़ी पहुँच जायेगी लेकिन भाड़े दुगुने होंगे। मंजूर है तो बोलो वरना गाड़ी की डिमांड बढ़ी हुई है। जल्दी बोलो जी।’’
‘‘लगता था एजेंसी वाला भी तैयार बैठा था, तपाक से शर्तें रख दी।’’    ‘‘ओके ,ओके - मंजूर है पर जरा जल्दी। मैं तैयार होकर इंतजार कर रहा हूँ। वह हड़बड़ा कर बोला और पता नोट कराने लगा।
जब वह हॉस्पीटल पहुँचा तो उस वक्त माँ कुछ ठीक थी और सास-बहू, बाप-बेटी की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रही थी। नीलू की हालत देखकर रत्ना रोने लगी।
दवाखाने से कुछ जरूरी दवाइयां खरीदी और पांच मिनट में पूरा परिवार गाड़ी में सवार हो गया। रत्ना और मां को नहीं पता था कि वे कहाँ जा रहे हैं। राघव को यथाशीघ्र दिल्ली से बाहर निकल जाने की जल्दी थी। उसके दहशतजदा चेहरे को देखकर रत्ना को प्रश्न करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वह बेटी को लेकर बेहद चिंतित थी और सारा ध्यान उसी पर केन्द्रित था। गढ़वाली ड्राइवर को भी दिल्ली से बाहर निकलने की जल्दी थी। वह इस परिस्थिति में भी तनिक प्रसन्न दिख रहा था। रवि ने साठ हजार रुपये एकाउंट में डाल दिए। उसने ईश्वर और रवि को एक साथ धन्यवाद दिया और राहत की सांस लेकर सीट पर आराम से बैठ गया। हाईवे पर बड़ी संख्या में गाडिय़ां दिल्ली से दूर भागी जा रही थीं। इक्के-दुक्के वाहन शहर की ओर आ रहे थे। बीस-पच्चीस मिनट बाद वे खुली और चमकीली धूप वाले विस्तृत मैदानी भाग में थे। यहाँ का नजारा बिल्कुल शांत और सामान्य था। हवा में मिठास थी। वे जी भर हवा पी रहे थे। उसके इशारे पर ड्राइवर ने चाय-नाश्ते की एक दुकान पर गाड़ी रोक दी। पीछे मुड़ कर देखा। दिल्ली काफी पीछे छूट चुका था। उपर काले धुंए का बादल कुकुरमुत्ते की शक्ल लिये छाया था। लग रहा था मानो शहर पर कोई आण्विक बम फूटा हो।
उस ‘गैस चैम्बर’ से निकलकर पूरा परिवार खुश था। ड्राइवर ऊंची आवाज में दिल्ली में मचे कुहराम का सजीव वर्णन कर रहा था जिसे दुकानदार और उसके नौकर चाकर बड़े हैरत से सुन रहे थे। नवजीवन प्राप्त माँ गाड़ी से निकलकर दुकान में लगी पीली कुर्सियों में से एक  पर बैठ गयी और चाय की इच्छा जाहिर की। माँ और रत्ना चाय पीने में लगे थे। नीलू मौका देखते ही तितलियों के पीछे भागी और उसके पीछे राघव। रत्ना दिल्ली आने के बाद पहली बार नीलू को इतना खुश देख रही थी। वहाँ से कुछ दूरी पर गांव के बाहर एक खण्डहर सा खलिहान था। खलिहान से बीस-पच्चीस कदम पूरब पगडंडी से जुड़ा एक पक्के का छोटा सा मंदिर था जिसकी सबसे निचली सीढ़ी पर नंगे पैर खड़ी एक प्रौढ़ा कुछ बुदबुदाती हुयी बार-बार अपना कान विनम्रता से छू ले रही थी। वह दुनिया से बेखबर देवताओं से संवाद कर रखी थी। कुछ देर बाद हाथ पैर धोकर मां भी रत्ना को साथ लिए मंदिर के पास चली गई, नंगे पैर और उसी तरह मंदिर के आगे सिर झुकायी, कान छुए और चेहरा आकाश की तरफ किये कुछ इस तरह बुदबुदायी मानो वह अपने स्वर्गवासी पूर्वजों से बात कर रही हो। वह अपने परिवार पर आये विपत्ति की उन्हें खबर कर दुआ सलामती मांग रही थी।
हमेशा की तरह दिन ढलने लगा। हाईवे पर अबतक हजारों गाडिय़ों गुजर चुकी थीं। तरोताजा ड्राइवर आगे की यात्रा के लिए बैठ चुका था और यात्री परिवार के सवार होने के प्रतीक्षा करने लगा। नीलू मैना की तरह फुदकती हुई रत्ना की गोद में बैठ गई और मां एक बार फिर मंदिर की दिशा में बेचारगीपूर्ण उदास चेहरा लिए विदा में हाथ जोड़ दी।     लडक़पन में रत्ना दिल्ली को लेकर तरह तरह के सपने देखती थी। पति के सहारे वह अपने ख्वाबों की दुनिया में पहुंच भी गयी, लेकिन चंद रोज बाद ही उसके मंसूबे पानी के सप्तरंगी बुलबुले की तरह फूट गये।
चार दिन बाद तेज पछुआ के साथ बूँदा-बांदी हुई और दिल्ली के आसमान से जहरीली हवा कहीं और चली गयी। जानलेवा प्रदूषण का खतरा टलने की ‘न्यूज बुलेटिन’ प्रसारित होते ही लोग भूखे टिड्डे की तरह फिर से दिल्ली की ओर लौटने लगे। एक सप्ताह बाद राघवेन्द्र भी सपरिवार लौट आया। ज्यों-ज्यों दिल्ली नजदीक आ रही थी, उनके चेहरे पर फिर से दहशत छाती जा रही थी। सब खामोशी की चादर ओढ़े सफर तय कर रहे थे।  दिल्ली युद्धग्रस्त शहर की तरह लुटा पिटा दिख रहा था।
वृंदावन से लौटकर राघव ने सबसे पहले आर. के. पुरम वाला फ्लैट खाली कर दिया और वहाँ से दूर एक छ: मंजिले अपार्टमेंट कीे छठी मंजिल पर फ्लैट ले लिया। वहाँ प्रदूषण कम और हरियाली अधिक थी।
दिसम्बर के अंतिम दिन चल रहे थे। भीषण ठंड का आगाज हो गया और दिल्ली अक्सर घने कुहरे में लिपटा-दुबका रहने लगा। स्कूलों में बड़े दिन की छुट्टियों समय से पहले ही कर दी गयी। तय कार्यक्रम के अनुसार राघव को अ_ाईस दिसम्बर को अपने गांव लौटना था। उसे एक जनवरी को हर हालत में दफ्तर ज्वाईन करना था क्योंकि बजट की तैयारी बड़े जोर-शोर से शुरू हो चुकी थी। रत्ना और नीलू का मकर संक्राति के बाद लौटने का कन्फर्म टिकट था। मां की वापसी अभी तय नहीं थी। वह अबकी पिता जी को भी साथ लाना चाहता था। गांव पहुँचकर उनसे राय मशविरा कर दिन तय करने थे।
लेकिन अचानक ही कोहरे का कहर शुरू हो गया। घना धुंध एक बार फिर से छा गया। हवा पहले की तरह स्थिर थी, ऊपर से ठंडक भी गजब की। दिल्ली वाले फिर से दहशत के आलम  में जीने लगे। मौसम वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी थी कि ‘स्मॉग’ एक सप्ताह से अधिक दिनों तक रह सकता है। स्थिति पहले से खतरनाक और विकट होगी। राघव का परिवार भी भय से गुजरने लगा। नीलू और उसकी दादी हमेशा गुमसुम बैठे रहते। रत्ना और राघव के मन में भी उटपटांग ख्यालात आते रहते। कोहरे की वजह से सैकड़ों रेल गाडिय़ाँ कैंसिल कर दी गयी थी जिसमें वह गाड़ी भी शामिल थी जिससे राघव के परिवार को दिल्ली से गांव लौटना था।
बड़े दिन की कड़ाके की ठंडी शाम थी। सभी अपने-अपने ख्यालों में खोये अपनी अनुभूतियों को छिपाने में लगे थे। राघव उनकी डरावनी खामोशी भंग करने के लिए रह-रह कर सातवें वेतन आयोग से मिलने वाली भारी भरकम लाभ की चर्चा छेड़ दे रहा था। यह भी कि वह एरियर में मिलने वाले पैसे से एक नई कार किस्तों में खरीद लेगा। लेकिन इन उत्साहित करने वाली बातों का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता दिख रहा था। नीलू के चेहरे से मुस्कान जैसे हमेशा के लिए गायब हो चुके थे। मां भी बहुत कम बोलती थी। इन दोनों के व्यवहार से रत्ना और राघव बहुत परेशान थे।
सब सो रहे थे या सोने की कोशिश में करवटें बदल रहे थे, लेकिन आज की रात उसे नींद नहीं आ रही थी। दुकानें और रेस्त्रां कब के बंद हो चुके थे सो इस भीषण ठंड में कहीं जाने की सोचा भी नहीं जा सकता। आखिरी बस सडक़ को नापती निकल गयी। सामने पांच मंजिली भवन का पिछला हिस्सा अंधेरे से पुता था और खिड़कियाँ अंधी आंखों की तरह दीवाल से जड़ी थीं। नीचे घने वृक्षों के बीच सडक़ चिकनी, तंग और गहरे गलियारे की तरह लग रही थी। रात सांय-सांय करती गुजर रही थी।
इस शहर का तो वर्षों पहले विशाल मर्तबान में कायांतरण हो चुका था। अब इस पर ढक्कन भी लग चुका है। बंद मर्तबान में कोई जीव कितनी देर जिंदा रह पायेगा?
वह बड़ी देर तक खिडक़ी के उस पार कुहरे के बीच सितारों को ढूंढने की कोशिश में लगा रहा पर कुहरे के बीच से चांद की नीली आभा के सिवा आसमान में कुछ नहीं दिखाई दे रहा था। थक हार कर वह किचेन में कॉफी बनाने चला गया। वह बड़ी गंभीरता से कुछ बड़ा निर्णय लेने की उधेड़बुन में लगा था ।
कॉफी खत्म होते-होते उसने निर्णय किया कि वह अब दिल्ली को अलविदा कह देगा। कल सुबह ही वह आगरा के लिए निकल पड़ेगा और वहां से जो भी गाड़ी मिलेगी, अपने गांव चला जायेगा। न हो तो वह टुरिस्ट कार ले लेगा, लेकिन अब अपने परिवार को और अधिक कष्ट सहने नहीं देगा। बाद में वह भी अपने मूल कैडर में लौटने का आवेदन दे देगा- बात नहीं बनी तो इस्तीफा देने पर भी विचार करेगा!
उसने माँ और रत्ना को जगाया। नीलू स्वत: जग गयी। भीगी रात में सब चौंक पड़े। उसने बड़ी संजीदगी से घोषणा कि हम सुबह आगरा और वहाँ से गाँव के लिए प्रस्थान करेंगे। सो जरूरी सामान पैक कर लें। नीलू अब गाँव में ही पढ़ेगी। उसके निर्णय से सबके चेहरे खिल उठे। अगले ही पल घर में आपा-धापी और भागम-भाग शुरू हो गयी। सबके चेहरे प्रसन्नता से चमक रहे थे और वे अपने-अपने काम में व्यस्त थे। जैसे-तैसे उस रात की भोर गुजरी ।
और ठीक आठ बजे राघव परिवार इस विशाल पारदर्शी नीले मत्र्तबान को हमेशा के लिए अलविदा कह रहा था। वे अपने सरल-सुगम दुनिया में लौट रहे थे जहां की आबोहवा संजीवनी थी और गुजर-बसर करना आसान था ।