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Wednesday 22 Nov 2017

अपराध किसका...सजा किसको!


महेंद्र दुबे
अधिवक्ता, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायलय, बिलासपुर (छग) चैम्बर न. 36, उच्च न्यायालय परिसर, बोदरी, बिलासपुर, छत्तीसगढ़
 मो. 9993051692,
गर्मियों के तपते दिन शुरू हो चुके थे। सूर्योदय और दोपहर के बीच की सुबह यूँ लगता था जैसे आत्महत्या कर चुकी हो सूरज चढ़ते ही तपन झुलसाने लगती थी। जेल के बाहरी गेट के बगल में पेड़ की छाया में जमा मुलाकातियों की भीड़ में सुमित्रा अपने तीनों बच्चों के साथ बैठी हुई थी। उदास और बेरंग चेहरे पर बार बार उभर आते पसीने को आँचल से पोंछ लेती थी। चार साल का बेटा बार बार पेड़ के इर्द गिर्द पार्क की गयी गाडिय़ों की ओर भागता और उस पर चढऩे की जोर आजमाइश करने लगता था मगर वो उसे खींच कर अपने पास ले आती थी। बगल में दोनों बेटियां शांत बैठी अपने भाई की उछल कूद पर बीच बीच में मुस्कुरा देती थी।
पति जेल में बंद है। तीन माह पहले गांव में सरपंची चुनाव के दौरान पुराने सरपंच ने घर के पीछे बाड़ी में शराब रखवा दी थी। पति को मुफ्त की पीने को मिल जाती और फिर पुराने सरपंच ने उसकी उस वक्त मदद की थी जब एक बार गांव के एक झगड़े में पुलिस पकड़ कर ले गयी थी । तीन हजार में मामला सुलटवा कर रात में ही उसे छुड़वा दिया था। सुमित्रा ने बहुत समझाया था कि मना कर दे सरपंच को.... मगर सरपंच का एहसान चुकाने की गरज और खुद के मुफ्त की पीने की चाह में डपट दिया था उसने सुमित्रा को।
मगर गाँव के सरपंच विरोधी खेमे को खबर हो गयी। मुखबिरी कर दी किसी ने..पुलिस का छापा पड़ गया......घर की बाड़ी से शराब बरामद हुई...पति गिरफ्तार, इस बार सरपंच ने भीे हाथ खड़े कर दिये.... चुनाव का समय है...कोई सुनेगा नहीं.....चुनाव हो जाने दो....उसके बाद कुछ करता हूँ... पहले थाने लाया गया....फिर कचहरी और फिर जेल दाखिल।
वो मुलाकात में नाम लिखा चुकी थी। पिछली बार आयी थी तो छुट्टी घोषित हो गयी थी मुलाकात बंद थी। रोजी का भी हर्जा हुआ था और मुलाकात भी नहीं हुई थी। तीन महिने से थाना जेल और कचहरी दौड़ रही थी...वकील से मिलती तो रिमांड, चालान, सरकारी वकील और कागज पत्तर का खर्चा बता कर पैसे मांगता रहता और पूछने पर हर बार यही दोहरा देता कि अगली पेशी में जमानत मिल जायेगी। मुलाकात के बाद वकील से मिलने कचहरी भी जाना है...जल्दी हो जाता तो आधे टाइम का काम ही पकड़ लेती...इसी सोच में डूबी आसपास की गाडिय़ों पर यूँ ही नजर हटाते टिकाते समय काट रही थी कि भीड़ उठकर जेल गेट से भीतर की ओर बढऩे लगी...मुलाकात शुरू हो चुकी थी।
वो भी उठी..बेटे को गोद में उठाया और दोनों बेटियों को साथ लिए जेल कैम्पस के भीतर दाखिल हो गयी। जेल बिल्डिंग की बाहरी दीवार पर लगभग तीन फीट ऊपर जालियां गुंथे मोटे मोटे सींकचों के भीतर से मुंह घुसाये कैदी खड़े थे। सींकचों के इस पार मुलाकातियों की आपस में धक्का मुक्की करती भीड़, शोर शराबे के बीच भीतर खड़े अपनों से बातचीत करने की मशक्कत कर रही थी। बेटे को गोद में उठाये सुमित्रा दोनों लड़कियों के साथ पसीने में भीगती सींकचों तक पहुंच गयी। सींकचों के पीछे कम रोशनी में उसका पति खड़ा नजर आ रहा था।
इतना दिन कहाँ मर गयी थी....वकील से मिली कि नहीं....का बोला वकील....अभी दारू वाले तीन आदमी छूटे है....मेरा जमानत काहे नहीं हो रहा है? पति ने एक साथ ढेर सारे सवाल उसकी ओर फेंक दिया।
शनिचर को आयी थी...छुट्टी रहा....मुलाकात बंद था....वकील से मिली थी....बोला है....अगली पेशी में जमानत करा देगा....अब मैं का जानूँ काहे नहीं हो रहा है...तीन हजार दी हूँ....पांच हजार और मांग रहा है...इन्तजाम में लगी हूँ...जल्दिये दे दूंगी।
सरपंच से बात काहे नहीं करती...वो ही ना दारू रखवाया था...चुनाव हार गया तो का हुआ...जायेगी तबे ना मदद करेगा...घर में बइठे रहेगी तो तेरे घर थोड़ी आयेगा वो।
दो बार गयी थी...कहता है कोर्ट का मामला है...जो करेगा वकील ही करेगा...बोल रहा है...अपना वकील से करवा देगा....20 हजार लगेगा.....जान तो रहे हो खेती चौपट हो गयी है....बनी मजूरी में जइसे तइसे पेट पर्दा चल रहा है बीस हजार कहाँ से आयेगा....खेत रेहन रखो तो भी दस हजार से ज्यादा कोई नहीं देगा।
बताओ वो ही साले के चलते जेल हो गयी हमको और मदद करना तो दूर हरामी थाना तक नहीं आया था....सुमित्रा तू कईसे भी कर..... जमानत करा हमारी...पैसा का मुंह मते देख...बेंच दे खेत....वईसे  भी का रखा है अब खेती में... तीन साल से पेट भर दाना भी तो नहीं मिलता है!
खेत कैसे बेच दें....जऊन भी होता है...अपना कुछ तो है...दो दो बेटी है...खेत रहेगा तो भूखे तो न मरेंगे आज नहीं तो कल भगवान देगा ही...हम इंतेजाम कर लेंगे तुम चिंता नहीं करो...ईहां से वकील के पास जाउंगी...कुछ भी करके जमानत कराने को बोलूंगी। सुमित्रा ने प्रतिवाद के साथ उसे आश्वासन दिया।
सुमित्रा की गोद में लटका बच्चा इधर उधर देखता अपनी दोनों मुठ्ठियों में बिस्किट धरे चूस रहा था कि उसकी नजर सींकचों के उस पार खड़े अपने पिता की ओर पड़ गयी .....बाबू...बाबू ....चीखता हुआ बच्चा बिस्किट फेंक कर सींकचों की ओर लटक गया....वो राड के बीच से हाथ निकाल कर बच्चे का चेहरा पकड़ कर उसे पुचकारने लगा....दोनों बेटियां खिसक कर पास आ गयी...उसकी आँखे भीगनें लगी....वो तड़प उठा...बच्चा राड को मुठ्ठी में भिंचे उछलने लगा...औरत की नजर राड के बीच से बाहर निकल कर बच्चे के चेहरे से खेल रहे पति के हाथों पर पड़ी...ताजा चोट के तीन चार निशान दिख रहे थे।
......ये चोट कईसे लगी है....जेल में मारपीट होती है का?
..मत पूछ सुमित्रा....नरक में है हम...गरीब का कउनो सुनवाई नहीं है इंहा....थाना में केतना बोले कि दारु सरपंच रखाया था...कोई सुना ही नहीं...तू दी तो थी तीन हजार थानेदार को....कहाँ माना...बस मारा नहीं....येही अहसान किया....पर इंहा तो रोजे पीटते हैं...कहते हैं......घर से पईसा मँगाओ....कउन घर से पईसा मंगा के दें...सुमित्रा...हमको निकाल इंहा से...जादा दिन रह गये तो मर जाएँगे हम...जेल बाबू से मिलते जाना...जऊन पईसा धरी हो दे ही देना उसको..कुछ तो बचे रहेंगे। बेटे के चेहरे पर फिरते उसके हाथ कांपने लगे...आंखों से आंसुओं की धार बहने लगी...राड पकड़े सुमित्रा की गोद से बच्चा उछल कर बाप के पास जाना चाह रहा था...दोनों बेटियां भी सुबकने लगी थी...सुमित्रा ने बेटियों को चुप कराया, बेटे के हाथ से राड छुड़ा कर उसे सीखचों की पहुँच से दूर किया और अपने आंसुओं को रोकते हुए पति का हाथ पकड़ लिया!
तुम चिंता मत करो...मैं आज ही जाऊंगी... सरपंच के पास...अब खेत का अउ घर का...बिक जाये.. जऊन बिकना हो...तुम रो नहीं...हम है...खुदे को काहे न बेचना पड़े..हम छुड़ायेंगे तुमको...तुम अपना धियान रखो...हम जेल बाबू को पईसा दे कर ही जायेंगे... अब कुछ नहीं होगा तुमको!
भीतर से जेल प्रहरी ने सुमित्रा को जाने का इशारा किया। सुमित्रा अपने बच्चों के साथ पीछे हटती हुई मुलाकातियों की भीड़ से बाहर आ गयी। जेल बाबू से मिली, उसे 500 रुपिया दिया, हाथ जोड़ और बच्चों के साथ घर चल दी।
रास्ते भर पति के आंसुओं से उसका मन, आत्मा और शरीर भींगता रहा। घर पहुंचते तक जमीन मकान तो क्या उसकी खुद की कीमत पति को जेल से निकालने में लगने वाले बीस हजार रूपये से ज्यादा कुछ नहीं रह गयी थी। दरवाजा खोलते ही सुमित्रा ने आँचल में बंधी गाँठ खोल कर दस रुपिया निकाला और दोनों बेटियों को देकर बिस्किट ले आकर खाने को कह कर उन्हें दूकान भेज दिया। भीतर आकर पेटी से जमीन के कागज निकाले, बेटे को गोद में उठाया और पुराने सरपंच के घर की ओर निकल गयी.....बीस हजार में खेत बेचने।