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Friday 24 Nov 2017

लोक जगत में जगतीकरण की सेंध

डॉ. श्यामबाबू शर्मा
85/1, अंजलि काम्पलेक्स
शिलांग(मेघालय)-793001 मो. 9863531572
‘पीछे लगाा जाइ था लोक वेद के साथ’ महात्मा कबीर की स्पष्ट घोषणा है कि वे वेदों, धर्म ग्रंथों और पोथियों को वह महत्व नहीं देते जो तरजीह लोक से प्राप्त ज्ञान को। और यह उनका लोकवेद सर्वोपरि। लोक के प्रवाह में जो सहज निर्मलता और ताजगी होती है वह अनायास उसकी भाषा, साहित्य और लोक को भी प्राप्त होती है। मानव के उन्नयन और उसके गरिमापूर्ण जीवन की चरितार्थता में अतएव उसकी भूमिका निर्विवाद है। वेद-पुराण और स्मृति ग्रंथों की दुहाई देने वाले बाबा तुलसी भी वेद मत के साथ लोक मत को समादर स्थान देते हैं। चित्रकूट की महासभा में विद्वान पंडित, राजनीतिज्ञ, माताएं और अयोध्या का जनमानस राम को वापस चलने की प्रार्थना अपने-अपने तरीकों से करता है परंतु...राम ते अधिक राम का नामू। पिता की आज्ञा का उल्लंघन.? भरत की भ्रातृभक्ति एवं उनके चरम त्याग के वशीभूत मुनि वशिष्ठ को उनके अयोध्या वापस लौटने के लिए वेदों के दर्शन के साथ साधुमत और लोकमत के अनुसरण का परामर्श देना पड़ता है-
भरत विनय सादर सुनिअ करिअ विचार बहोरि
करब साधुमत लोकमत नृपनयन निगम निचोरि।।
(अयो.दो.258)
    इतना आदरणीय सम्माननीय हमारा यह लोक, सामाजिक सांस्कृतिक चेतना की गंगोत्री सदृश निस्संदेह आज नाना प्रदूषणों, अपवर्जकों और जहरीले आयातित, डेबिटेड रसायनों से ग्रस्त होता जा रहा है। भोगवाद के अंधानुकरण से अपवित्र लोक के अनेक स्रोतों में अर्थ केन्द्रीयता की भूमिका पर विचार करना सामयिक संदर्भ बन चुका है।
‘लोक आनन्दा: च मोदा: च मुदा: च मुद: प्रमुद: आसते।’(ऋगवेद 9 वाँ मंडल-7,9,11) आनंद मोद और प्रमुद की आप्त मन: अवस्थाओं में लोक की विद्यमानता है। ‘लोक’ शब्द एक विराट समाज की ओर संकेत करता है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार यह लोक परिष्कृत होता है और स्वाभाविक जीवन जीते हुए श्रम के बलबूते उत्पादन करता हुआ दूसरों का भरण-पोषण करता है। इसका सीधा संबंध जीवन से है। प्रकृति और परिवेश से ही उर्वर जुझारूपन और शक्ति ग्रहण करता मांगलिक परिवेश का निर्माण करता है। जीवन को नश्वर मानते हुए भी यह उसे अन्यात्मक नहीं मानता।
कुछ वर्ष पूर्व ‘वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो’ की मांग के साथ असंतोष और आक्रोश की आग स्पेन, फ्रांस और ब्रिटेन होती हुई पूँजीवाद के गढ़ अमेरिका तक जा पहुंची। ‘वॉल स्ट्रीट’ अर्थात दुनिया का सबसे मशहूर और ताकतवर शेयर बाजार। तीसरी दुनिया के देशों में भी अपने-अपने ढंग से इसके पर्यायों पर निशाना साधा गया। इसके पहले भी भूमण्डलीकरण के विरोध में आंदोलन होते रहे हैं परंतु उनमें शामिल लोग आदर्शवादी या अराजकतावादी के रूप में पहचाने गये। जोड़-घटाना यह कि जिन आर्थिक नीतियों के चलते यह अपना डंका पीटे जा रहा था वे ही समधुर के बजाय कनफोडू-विस्फोटक हो गईं। लेकिन तान तो छिड़ चुकी है और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गुन गुना ही नहीं रही बल्कि जबरदस्त ब्रेक डांस कर रही है। क्या भवन-भाषा और क्या भूषा-भोजन, भजन तक इसकी गिरफ्त में। एक ‘ग्लोबल पावर स्ट्रक्चर’ हमारी अभ्यस्त जीवन शैलियों को पूरी तरह बदलने की तैयारी कर रहा है। बिना रक्तपात और रोक-टोक के लूट का दूसरा नाम है-भूमण्डलीकरण। यह छीना-झपटी मात्र भौतिक सुख संपदा और और मानवीय संसाधनों तक सीमित रहती तो कदाचित भरपाई करना सहज होता परंतु यह बेशकीमती लोक को भी खाय जात है। सांस्कृतिक वैविध्य का विरोधी यह दर्शन हमारी लोकसंस्कृति को दुर्बल करता जा रहा है। इसने संवेदनशीलता और लोक के विचारों का रकबा कम किया है परंतु अपने गृह की सुध से परे। ‘पर’ का आयतन ‘स्व’ की संकीर्णता में। सांस्कृतिक तहस-नहस को इसने एक सुंदर खेल बना दिया है। विकास का ढ़ोंगी। मनुष्य तक को प्रोडक्ट और कंज्यूमर में तब्दील करने वाला बहुरूपिया एक तरह का नव उपनिवेशवाद ही है। यह अपना विजय रथ मीडिया, बाजार, विश्व बैंक तथा डब्ल्यू टी ओ आदि अस्त्रों-दिव्यास्त्रों का संधान करते आगे बढ़ा रहा है।
पूंजी के शातिराना दर्शन में विश्वग्राम की बेहद आकर्षक झांकी है। विचित्र यह कि-भाई नवीन वसुधैव कुटुंबकम की यही अवधारणा है। इतनी गहरी साजिश हमारी सभ्यता-संस्कृति सह रही है, झेल रही है-अयं निज: परोवेति गणना लघुचेतसाम
उदार चरितानान्तु वसुधैव कुटुंबकम।।
 उदारमना सहृदयों के लिए तो यह संपूर्ण वसुंधरा ही परिवार है। उदारवादी चिंतकों ने इसको अपनी सुविधानुसार अपने पाले के फायदों के लिए रीडिफाइन कर लिया और परिणाम? संस्कृतियों का समन्वय वसुधैव कुटुंबकम और इनका सामरिक-वैचारिक दासत्व ही भूमण्डलीकरण है। कहां चूके हम कि पंचमकार के अधुनातन वज्रयानी साधक बन गये। रेव की वेब्स ने चिंतन और वैचारिकता को काट-छांटकर चिप में लाकर ही संतोष नहीं किया, सेल्फी बना दिया। यात्रा जारी है। जूठन को एडवांस की संज्ञा देने वाले ......विद्वजनों को दंडवत! उदारीकरण से आई उस उधारीय उघारीय संस्कृति को सैल्यूट जिससे हम मॉडर्न कहलाए। बाहर से चकाचक, अंदर से स्खलित। सबकुछ......शेष।
नीली रोशनियों की बांहों में नववधू सी मुस्कराती बाजार का समय है यह और तमाम प्रतिभाएं इसकी चाकर-आशिक। हड़पो, झपटो और डपटो नवीन लोक के प्रस्थान बिंदु है। हमारे घरों की सीढिय़ां सडक़ तक आ गई हैं और लिप्साएं अपराध तक ये क्या कम प्रगति है! नव वज्रयानी साधक ग्लोबल विलेज की चौखट पर जाप करने पर आमादा हैं। अब हम जीते हैं तो केवल बाजार के लिए और चाहते हैं तो केवल समृद्धि की समृद्धि। हमारा, मूल्यगत पराभव और सांस्कृतिक अस्मिता का लोप इस कदर कि अब हमें याद दिलाया जाता है कि आज मदर्स डे है, फादर्स डे। नवीन त्यौहार नवीन रूपों में। कंपनियां मालामॉल-विश कीजिए। उसके एक दिन पहले ही संदेशा कि ‘ऑल कॉल्स एण्ड एस एम एस विल बी चार्जड ऐज पर बेस टैरिफ ऑन एकाउण्ट ऑफ  ब्लैक डे।’ हमें मां की, पिता की याद दिलाने वाले इतने हितैषी-किसके हमारे या अपने? याद कीजिए कि कभी हमने अपने माता-पिता को यह कहते पाया हो कि मैं तुम्हें.....। बच्चों के सामने पूरी मर्यादा होती थी। पीढ़ी परिवर्तन ऐसा कि अब उन्हें प्राय: आंखों की ओट लेनी पड़ जाती है। औपचारिकताओं का अट्टहास कि पति-पत्नी के पवित्र रिश्तों में भी गिफ्ट्स का आदान-प्रदान। सवाल कर दिए जाते हैं कि यह संस्कारों का प्रकटीकरण है तो ऐसे उधारीय संस्कारों को दूर से ही दंडवत नमस्कार। बचपन में हमारे बाबा-दादा बताया करते थे कि फलां से खेत-खलिहान के झगड़े के चलते बात-व्यवहार बंद था। कभी उनके उनके सबसे पूज्य रिश्तेदार का आगमन हुआ। वे घर भूल गए और चौपारि में बैठे बाबा से पूछा-बात-बतकही में मालूम पड़ा कि ये तो उनके दामाद जी हैं। तुरंत हांक लगाई गई कि नातेदार आए हैं। शरबत पानी आता। और घर के किसी बच्चे को आदेश दे दिया जाता कि भइया को उन बाबा के दुवारे पहुंचा आओ-सादर। यह दामाद पूरे गांव का दामाद होता था। आपसी खींच-तान अपनी जगह और सामाजिक व्यवहार अपने स्थान पर। पड़ोसी की बिटिया विवाह योग्य होती तो चिंता होती कि सुयोग्य वर तलाशना है। कहीं पता चलता तो- भइया देख लिया जाय। यह सब आज शायद कहानीनुमा लग रहा हो परंतु कुछ दिन पहले यही हमारी समृद्धता थी। समृद्ध लोक। अब हमें अपनी खबर नहीं, पड़ोसी तक कैसे पहुंचे?
उपभोक्तावाद तथा बाजारवाद के कारण जिस तरह सांस्कृतिक, सामाजिक, पारिवारिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है उसका मुकाबला साहित्य की प्राचीनतम विधा बखूबी कर रही है। नेम, फेम और मनी का जो जुनून इंसान पर सवार है उसमें एक दूसरे की खैरियत जानने का रूटीन गायब है। इतना एकाकीपन कि-
बाबा को जानता था सारा शहर
पिता को भी चार मोहल्ले के लोग जानते थे
मुझे नहीं जानता मेरा पड़ोसी मेरे नाम से
अब सिर्फ  एलबम में रहते हैं
परिवार के लोग एक साथ
टूटने की इस प्रक्रिया में क्या-क्या टूटा है
कोई नहीं सोचता
(दो पंक्तियों के बीच, राजेश जोशी, पृ.55)
    अब घर नहीं, मकान हैं। बस्तियां नहीं बसती। सीमेण्ट के जंगल हैं और उनमें लाशों के झुरमुट। श्रीकान्त वर्मा ने बहुत पहले इस छीजते लोक जीवन पर चिंता व्यक्त की थी। कृत्रिमता और बनावट की बुनावटों में उलझा जन निस्तेज हांफ  रहा है। सब कुछ इतना पास-पास परंतु-
इतने मकान पास-पास सटे-सटे
मगर प्रेम नहीं
इतना घनत्व
इतनी संकुलता
इतनी एकता
मगर सभी कटे-कटे
सहमति नहीं, भाषा नहीं, प्रस्ताव नहीं
एकसाथ उठी हुई मु_ियां नहीं
केवल क्रौंच-चीख
इतनी समीपता
इतना नैकट्य
इतना सहवास
किंतु स्पर्श में
पुलक नहीं
(माया दर्पण, श्रीकांत वर्मा,पृ.64)
    मुंह उतरे हुए हैं और विषवयारी की लगाम से हांकते हुए आयातित संस्कृति से कोड़ा कसने की कोशिशें तेज हैं। भारतेन्दुजी ने कहा था कि परदेशी माल और परदेशी वस्तु (विचार) पर भरोसा मत करो लेकिन हम हउसे-फउसे इसकी ओर हपटे जा रहे हैं। ‘जहां देखी तवा परात वहां बिताई सारी रात।’ बाजारवाद के कसते शिकंजे तथा समरूपीकरण के चलते पूरी दुनिया में सांस्कृतिक विविधता के विरुद्ध समानता का प्रच्छन्न प्रयास लगता है विश्व बाजार। व्याख्याओं का अधिकार इसके पास है और लोकप्रियता का अचूक, अतिआकर्षक जगत। इस नितांत बनावटी नवीन लोक में मनुष्य के रन्ध्र-रन्ध्र को संक्रमित करने का मधुर रसायन है। रचनात्मकता और कला के तमाम रूप सिकुड़ते जा रहे हैं। आत्मनिष्ठ, अकेले, संवेदनहीन, स्वार्थपरायणोन्मुख मनुष्य का सामाजिक थका-थका सा लगता है। कला में कीमत की बैलेन्सशीट। पहले हम जरूरत पडऩे पर बाजार जाते थे अब बाजार दरवाजे...नहीं घर तक घुस गया है। क्लिक करें डिलिवरी लें फिर विचार कि प्रोडक्ट का यूज कैसे, क्यों, कब, कहां? लोक को मिट्टी से उखाड़ दिया है इसने। आयातित इत्र छिडक़कर मदहोश करने का इंतजाम। हमार अपना बासी इनका फटाफट वाला फास्ट फूड। हमारे कुएं, चापाकल दूषित रसायनों के भण्डार, इनकी पैक्ड बाटल हाइजीनिक। पारंपरिक पिछड़े, संस्कारों का श्राद्ध करने वाले एडवान्स। अष्टभुजा शुक्ल की पंक्तियां याद आ रहीं हैं-
एक हाथ में पेप्सी कोला
दूजे में कंडोम
तीजे में रमपुरिया चाकू
चौथे में हरि ओम
कितना ललित ललाम यार है
भारत घोड़े पर सवार है
एड्स और समलैंगिकता की
रहे सलामत जोड़ी
विश्व ग्राम की समता में
हमने सीमाएं तोड़ी (दु:स्वप्न भी आते हैं, अष्टभुजा षुक्ल, पृ.77)
घर्षण, मिश्रण और प्रदूषण के इस दौर में जीवन को शांति और संबल देने वाली लोकविधाओं का अनुसरण करने वाला ‘पिछड़ा’ है। बाजार के सेठों ने इसे अपने ढंग से विज्ञापित किया। मुठभेड़ के बजाय भार्गान्तरीकरण का बढिय़ा विकल्प चुना गया। उन्होंने लोक के सहज स्वाभाविक उन्मेश को ग्लोबल हाट में प्रदर्शनीय बिक्री के एक माल के रूप में बदल दिया जिसकी रचना समूह से इतर भीड़ के आनंदोल्लास के लिए की जाने लगी। लोक पूंजी के क्षत-विक्षत दागों से कषाय होने लगा। बावजूद इसके कहा जाता रहा ....‘दाग अच्छे हैं।’ सार संक्षेप यह कि लोक का औद्योगीकरण फल-फूल रहा है। इसकी कल में मधुर हैं, सुस्वादु हैं। यह दीगर कि इसके साइड इफेक्ट्स ऐसे कि सभ्य समाज उच्चारण नहीं करना चाहता।
    प्लूटो की राय थी कि वस्तुगत रूप से अपने आंतरिक चरित्र में जो चीज सच नहीं है वह मनुष्य के लिए आत्मगत रूप से अच्छी और सच्ची नहीं हो सकती। नग्न स्वार्थ के हृदय शून्य व्यवहार के सिवा मनुष्यों के बीच और दूसरे संबंधों, सरोकारों का स्पेस कम होना आश्चर्य पैदा नहीं करते। सामूहिकता के ह्रास, विशेषीकरण के प्रभ्युदय और जीवन के पक्षों के अंतरावलंबन के बदलते स्वरूपों ने लोक कला के प्रकार्यों के नए प्रकार प्रकट किए। सामाजिक सुखों, दुखों को अभिव्यक्त करने वाले विविध पक्षों यथा लोक-नाट्य, लोकनृत्य और लोकगीत को चटख रासायनिक रंगों में सराबोर कर प्रस्तुत किया गया। अब अम्मा के सोहर, लचारी, गारी उन्हीं के साथ विदा हो गए लगते हैं। बिरहा, पचरा, कत्थक, नकटउरा, जात्रा, ललिते, नौटंकी तथा बहुरुपिया, रामलीला, भड़ैती, कठपुतलियां कहां खो गईं? प्रदर्शनकारी कला या परफार्मिंग आर्ट के समय में हमें दर्शक बनाए रखने के लिए मल्टीप्लेक्स हैं, फार्मूला वन की रेसें हैं, हिंसक पहलवानी के बाहुबलियों का पराक्रम-प्रदर्शन है। भकुआई नजरों से हम इनकी भाटगीरी करते नहीं थक रहे। कुरुचि में रुचि का रसास्वदन। विचलन और उबकाई तक को कैश कराने की कोशिशें-
अम्मा अब तो दुख
बाजार में बिकता है
दुख के खरीदार भी बहुत हो गए आजकल
बड़े-बड़े ज्ञानी ध्यानी तक ले जाते ंहैं
और जिन्हें
सब कुछ खरीदने की आदत
छुटपन से ही पड़ी हुई है
उसको पहले वे खरीदते हैं
फिर थोड़ा काट-छांटकर
रंग रोगन से उसकी चुभती सी आकृति को
दर्शनीय मुद्रा देते हैं
(अम्मा से बातें और कुछ लंबी कविताएं, भगवत रावत, पृ.52)
माता के परसे की, मघा के बरसे की महक.......कहां है? जीने की सारी कवायदें टेरर मार्केट के विलास में। हम परजीवी और वे वैम्पायर। बड़ा लुटेरा समय हैं-
छीन लिया है इसने
बच्चें के खिलौने और मासूमियत
दादी की लोरियां और किस्से
उत्सवों का उल्लास
स्नेहीजनों का हास-परिहास
  (बाघ दुहने का कौशल, रमण कुमार सिंह,पृ.31)
जीवन के तमाम व्यापार उग्र से उग्रतर होते जा रहे हैं। वाल्टर बेंजामिन ने कहा था कि बर्बरता का इतिहास संस्कृति में नई खोज के लिए जमीन तैयार करता है। हमने पूजा को प्रतिमा से, प्रतिमा को पंडाल से, पंडाल को बिजुरिया चकाचौंध से, चकाचौध को अश्लील गीतों से, गीतों को कनफोडू संगीत से, संगीत को भौंड़े नाच से, नाच को छिछोरी फब्तियों से, अपमानित किया है। हमारे दशहरे, होलियों, ईद, मुहर्रम, बैशाखियों और दीवालियों पर क्रूरतम प्रहार जारी है। मीडिया तुरही तान देकर इसका पथ प्रशस्त करने वाला साबित हुआ है। बटोरने का संस्कार आज के लोक का लोकाचार बनता जा रहा है। मनुष्य और प्रकृति परिवर्तनशील है इसलिए हम यह आशा कर सकते हैं कि हवस और आत्मकेन्द्रित लोक की बर्बरता से हम मानवीय, परोपकारोन्मुख उदात्त लोक की ओर वापस लौटेंगे। पुन: महात्मा कबीर की पंक्तियां कौंध रही हैं-
कहां बनावत पौरिया लामी भीत उसार।
घर तो साढ़े तीन हाथ घणा तो पौने चार।।