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Wednesday 22 Nov 2017

बहु-प्रतीक्षित अक्षर-पर्व का नवम्बर 16 का उत्सव शीर्षक से परिपूर्ण अंक प्राप्त हुआ।

डॉ. ऋचा द्विवेदी, साईं रेजीडेन्सी, बैंक आफ बड़ोदा के सामने ,बरेली,243006
मो. 08755192890

बहु-प्रतीक्षित अक्षर-पर्व का नवम्बर 16 का उत्सव शीर्षक से परिपूर्ण अंक प्राप्त हुआ। यात्रा- वास्तव में यात्रा का मतलब है-गतिशीलता, जीवन में गति जरूरी है। स्पेनिश कवि नेरुदा की पंक्तियाँ याद आ रही हैं-आप धीरे-धीरे मरने लगते हो,जब आप नहीं करते कोई यात्रा। अजित कुमार जी द्वारा लिखित-दीवान पर दीवाना : एक अयात्रा-में उनका कहना कि- उल्लास और स्फूर्ति के क्षणों में, मैं अपने को युवा या वयस्क नहीं,केवल शिशु अनुभव कर पाता हूँ। वास्तव में जब हम बच्चे बन जाते हैं,तभी हम वास्तविक खुशी को आत्मसात् कर पाते हैं। गोवर्धन यादव जी का शेरों के बीच एक दिन काफी रोमांचक लगा। हरदर्शन सहगल जी का टूटी हुई जमीन के बहाने बरेली-काफी रोचक लगा। बरेली शहर का जिक्र हो और झुमके का न हो, ऐसा सम्भव ही नहीं। चूँकि मैं भी बरेली की हूँ और कटरामानराय की उन गलियों में रह चुकी हूँ जहाँ का लेखक ने जिक्र किया, तो ध्यान तो आकृष्ट होना ही था। डॉ इन्दिरा मिश्र जी का यूनान देश आँखों देखा हाल पढक़र ऐसी अनुभूति हुई कि वह अपने साथ-साथ हमें भी यूनान की सैर करा रहे हों। आदरणीय परम् श्रद्धेय ललित सर जी का यात्रा वृत्तांत रूचिकर व अपने इर्द-गिर्द अधिक प्रासंगिक लगा। जैसे उनका कहना-जो स्वअर्जित है,उसके अलावा और कुछ मुझे फलता ही नहीं है। ऐसा ही मेरे साथ है। वैसे भी रचना की सार्थकता तभी है जब वह पाठक की अनुभूति बन जाय। मनीष वैद्य जी द्वारा रचित चाँदनी रात में शाही मोहब्बत की गवाही से मुगलकालीन स्थापत्थ्य कला के नमूनों के बारे में पता चलता है। डॉ श्याम बाबू शर्मा जी का लेख सिक्किम की मनुर्भव: संस्कृति मेरे अन्दर भी सिक्किम भ्रमण का भाव उत्पन्न कर गया। वन्दना जी का परिकथा सा सुन्दर,गंगाजल सा निर्मल गोवा पढक़र वहाँ के वासियों की ईमानदारी के समक्ष नतमस्तक हूँ। अन्त में कहना चाहूँगी कि जैसा कि नाम से विदित है-उत्सव-इस एक शब्द ने कितने अर्थों को समेट रखा है। तो जाहिर है कि अंक भी विभिन्न उत्सवों रूपी यात्राओं का निरूपमता से संयोजन करने में तथा मानसिक पौष्टिकता का निर्वहन करने में पूर्णत: सफल रहा है।