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Monday 15 Oct 2018

अगस्त अंक सुखद आश्चर्य की तरह लगा, क्योंकि यह अंक स्वाधीनता की 69वींवर्षगांठ को समर्पित था।

सुभाष रस्तोगी, मोहाली, पंजाब। मो. 9815178549

अगस्त अंक सुखद आश्चर्य की तरह लगा, क्योंकि यह अंक स्वाधीनता की 69वींवर्षगांठ को समर्पित था। इसे देखकर धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान के उन पुराने हवा हुए दिनों का स्मरण होना और सुखद स्मृतियों से अभिभूत होना स्वाभाविक ही था। प्रत्येक दृष्टि से यह अंक संग्रहणीय बन पड़ा है। अशफाकउल्ला खां, जगदम्बा प्रसाद मिश्र हितैषी, अकबर इलाहाबादी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, जयशंकर प्रसाद, फैज आदि की भूली-बिसरी रचनाएं सचमुच हमारे इतिहास और समय की धरोहर हैं। ललित जी ने प्रस्तावना में नवप्रकाशित कविता संग्रहों की समीक्षा इतने गवेषणापूर्ण तरीके से की है कि इन कृतियों को पढऩे की जिज्ञासा मन में होती है, साथ ही वर्तमान कविता का विहंगम परिदृश्य भी उजागर हो उठता है। सर्वमित्रा जी का उपसंहार इस लिहाज से मानीखेज है कि तमाम रुढिय़ों की कारा को तोडऩे वाली, अपने प्राण गंवाने वाली महिलाओं के हिस्से में पुरुष समाज की नहींही क्यों आती है। सूर्यबाला का उपन्यास अंश व अन्य सभी रचनाएं सीधे पाठकों की चेतना पर दस्तक देती हैं।