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Wednesday 22 Nov 2017

अक्टूबर-16 के अक्षर पर्व में कई लेख महत्वपूर्ण हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में राजेश्वर सक्सेना का स्वागत वक्तव्य वर्तमान स्थितियों पर ध्यान आकर्षित

 

 -डॉ. गंगा प्रसाद बरसैया
ए-7, फारचून पार्क, जी-3, गुलमोहर, भोपाल-39

अक्टूबर-16 के अक्षर पर्व में कई लेख महत्वपूर्ण हैं। प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में राजेश्वर सक्सेना का स्वागत वक्तव्य वर्तमान स्थितियों पर ध्यान आकर्षित करने वाला होकर भी एक विचारधारा से प्रेरित है। वे निश्चित रूप से विद्वान, चिन्तक हैं पर संस्था के जुड़ाव का दायित्व निभाना भी जरूरी है।
अंक का महत्वपूर्ण लेख डॉ. गोरेलाल चंदेल का है जिसमें उन्होंने ‘समुद्रमंथन’ के मिथक माध्यम से आर्यों-अनार्यों (देवता व राक्षस) के बीच हुए स्वार्थी और गैर बराबरी के खेल का अच्छा विवेचन किया है। कुछ लोग इस प्रस्तुतीकरण से सहमत भले न हों किन्तु उनके निष्कर्षों को नकारा नहीं जा सकता। डॉ. चंदेल बधाई के पात्र हैं। इसी प्रकार डॉ. सेवाराम त्रिपाठी ने मैथिलीशरण गुप्त के काव्य पर नई दृष्टि से प्रकाश डाला है। हिन्दी का एक बहुत बड़ा वर्ग उन्हें ‘नुक्कड़ कवि’  व पुरातनवादी आदि कहकर नकारता भले रहा हों, परन्तु उनके साहित्यिक प्रदेय को कम करके आंकना न्याय संगत नहीं, दुराग्रहपूर्ण है। डॉ. त्रिपाठी ने उनके व्यापक काव्य-फलक और तत्कालीन संदर्भ में उसकी महत्ता का दिग्दर्शन बड़ी गंभीरता से कराया है। प्राय: आरोप यही लगता था कि ‘प्रगतिवादी सोच के साहित्यकार उनकी महत्ता नहीं स्वीकारते।’ डॉ.त्रिपाठी स्वयं प्रतिष्ठित वरिष्ठ प्रगतिवादी चिंतक हैं। उन्होंने बड़ी ईमानदारी और तटस्थता से गुप्त जी के सभी काव्य-पक्षों पर प्रकाश डालते हुए उसकी कालजयी महत्ता प्रतिपादित की है। उन्होंने उनके सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, भारतीय व राष्ट्रीय पक्षों की चर्चा की है और युग के साथ उनके गतिशील सामयिक चिंतन को भी रेखांकित किया है। उन्होंने निष्कर्षत: लिखा कि ‘अपनी साधारणता में गुप्त जी की कविता असाधारण है और उनका यही असाधारण उन्हें हमेशा महत्वपूर्ण बनाए रखता है।’ बहुत अच्छा लेख है।  अशोक बाजपेयी तो अपने वक्तव्यों में सदैव चर्चित रहे हैं। उनकी सोच, उनकी रचनात्मकता और उनकी भाषा निराली है। वे अपनी अभिव्यक्ति में दुनिया की चिंता नहीं करते और कभी-कभी अटपटे शब्दों का प्रयोग कर चौंकाते हैं। जैसे इसी में उनका यह वाक्य ‘हमारे जमाने में गद्य का बहुत विकराल विस्तार हुआ है। यहां विस्तार तो समझ में आता है किन्तु विकराल शब्द के प्रयोग का औचित्य समझ से परे है। वैसे पूरा वक्तव्य अच्छा है।
उपसंहार में सर्वमित्रा जी ने हिन्दी दिवस के अवसर पर साहित्य अकादमी के आयोजन पर जो प्रश्न उठाया है वह महत्वपूर्ण और विचारणीय है। इतनी बड़ी संस्था को बहुत सोच-समझकर आयोजन का स्वरूप बनाना चाहिए क्योंकि वह देश की शीर्ष साहित्य संस्था है जिसका प्रभाव पूरे देश पर पड़ता है।