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Sunday 15 Jul 2018

अक्टूबर अंक में डा.सेवाराम त्रिपाठी, ज्योति रघुवंशी के लेख महत्वपूर्ण हैं।

गफूर तायर

दमोह, मप्र. मो. 9826986919

अक्टूबर अंक में डा.सेवाराम त्रिपाठी, ज्योति रघुवंशी के लेख महत्वपूर्ण हैं। प्रभाकर चौबे का व्यंग्य नश्तरवान है। डा.रामप्रकाशजी ने रामकृष्ण श्रीवास्तव को स्मरण कर वे दिन याद करा गिए जब शुरु-शुरु में छपते थे हम। उर्मिला शुक्ल की पुस्तक मैं, फूलमती और हिजड़े पर लिखते हुए रमाकांत श्रीवास्तव ने स्त्री के संदर्भों के चलते हुए विमर्शों से अलग हट कर स्त्री की कुछ अनचीन्ही वंचनाओं, विडंबनाओं को रेखांकित किया है। कहानियों के स्त्री पात्रों को जिस तिरछी कोर से देखते हुए रमाकांत जी ने उन्हें अलग रूप में पहचाना है, उस नजर के लिए उन्हें साधुवाद। वैज्ञानिक दृष्टि व वस्तुनिष्ठता राजेश्वर सक्सेना का अतिमहत्वपूर्ण आलेख है। राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक संघ के अधिवेशन में यह पढ़ा गया था। वैसे कुछ सत्रों में उल्लेखनीय विचार चले थे। उसमें आपने (ललित सुरजनजी) भी सार्थक भूमिका निभाई थी। 10 सितंबर को दूसरे सत्र में जो महत्वपूर्ण बिंदु उठाए गए, वे आज हर पाठक और सजग नागरिक के लिए अनुकरणीय हैं। तथा तमाम साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक संगठनों को इन मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी ही नहींहिंदी के हित में और सामाजिक जागरुकता हेतु कारगर हैं- 1. अपने साहित्य को जन-जन तक कैसे पहुंचाएं, इसके उपाय और क्रियान्वयन पर कार्य हो। 2. प्रेमचंद के साहित्य को गांव-गांव तक पहुंचाएं और बच्चों तक इसकी पहुंच हो। 3. सोशल मीडिया पर ही इसे एक सार्थक लड़ाई मानते हुए, हथियार के रूप में प्रयोग हो। 4. सभी जनवादी, प्रगतिशील, साहित्यिक संगठन एक मोर्चा बनाकर जनजागरण और साहित्य की पहुंच हेतु मुहिम चलाएं। इन्हींबिंदुओं को छूती हुई प्रस्तावना भी महत्वपूर्ण है और यह सोचने वाली बात है कि हिन्दी दिवस मात्र एक रस्म अदायगी न रह जाए।
कविताओं में शैलेय, जीवन शुक्ल तथा हिमांशु द्विवेदी की गज़़लें अच्छी लगीं। अशोक बाजपेयी का साक्षात्कार देकर आपने नया दरवाजा खोल दिया। सर्वमित्राजी को सलाम कि उन्होंने उपसंहार में साहित्य अकादमी की खबर लेते हुए हिन्दी की दर्द भरी दास्तां को इन दो पंक्तियों में बयां कर दिया कि- हिन्दी केवल उनके लिए काम की भाषा रह गई है जिनकी स्वार्थसिद्धि इससे होती है।