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Saturday 25 Nov 2017

सरलता का भंडार अनुपमजी


सर्वमित्रा सुरजन
दिखावे से भरी इस दुनिया में सरलता दुर्लभ है। सादगी भरा व्यवहार आज की दुनियादारी में बेवकूफी कहलाता है। कोई मोबाइल न रखे तो उसे पिछड़ा हुआ माना जाता है। सहज तरीके से बौद्धिकता की बातें करें, तो उसकी बुद्धिमानी संदिग्ध होती है। लेकिन अनुपम मिश्र इन तमाम पैमानों को बड़ी सहजता से, बिना आक्रोश, तेवर, या दुराग्रह के खारिज करते थे और इसके लिए उन्हें किसी को कुछ कहने की जरूरत नहींहोती थी, बल्कि उनके जीने, बोलने, लिखने का तरीका ही उनकी सरलता, सहजता को अभिव्यक्त कर देता था।
अनुपमजी सरलता का भंडार थे। उनके लेखन ही नहीं, जीवनशैली, पहनावे, व्यवहार और विचारों में सादगी, सरलता कूट-कूट कर भरी थी। वे बिना तामझाम के रहते थे। मोबाइल नहींरखते थे। अपनी बौद्धिकता का ढोल नहींपीटते थे। पांचसितारा होटलों में बैठकर, बोतलबंद पानी पीते हुए पानी की चिंता उन्होंने नहींकी, बल्कि भारत के देहातों की खाक छानी, पानी का इतिहास खंगाला, लोगों की समझ का आदर किया और फिर आज भी खरे हैं तालाब, राजस्थान की रजत बूंदें जैसी किताबें लिखीं, ताकि समाज वह ज्ञान फिर से याद करे, जो उसने पहले अर्जित किया था, लेकिन विकास की अंधी दौड़ में भुला बैठा है। आज भी खरे हैं तालाब, अनुपमजी की अनुपम कृति है, जिसे जब भी पढ़ो, ऐसा लगता है मानो प्यासे कंठ को मीठा पानी नसीब हो गया। आज बहुतेरे प्रकाशक पाठक न मिलने का रोना रोते हैं. लेखक बौद्धिक विलास में ही अपनी इज्जत समझते हैं। लेकिन जब आप आज भी खरे हैं तालाब पढ़ते हैं, तो समझ आता है कि लेखन ऐसा होना चाहिए जो बरबस पाठक को अपनी ओर खींच ले। अगर उसमें अनावश्यक जटिलता भरी होगी तो पाठक बिदकेंगे ही। पाठकों को जोडऩा है तो पहले उनके मर्म को छूना होगा। देश-विदेश की अनेक भाषाओं में इस पुस्तक के अनुवाद हुए। इस पर आधारित कार्यक्रम बने, जो रेडियो, टीवी पर प्रसारित हुए। अनेक सामाजिक संगठनों ने इस पुस्तक के माध्यम से जलसंरक्षण की परंपरा को सहेजने की मुहिम चलाई। अनुपमजी समाज को कुछ सिखाने नहींबल्कि समाज के पारंपरिक ज्ञान से सीखने के हिमायती थे। उनकी इस जीवनशैली के कारण ही दिल्ली जैसे आडंबरबहुल शहर में उनकी सादगी को लोग सलाम करते थे, उन्हें समय से बहुत आगे मानते थे। अनुपम जी को लोग बहुत तरीके से याद कर रहे हैं। किसी को वे विरले पर्यावरणविद लगते हैं, किसी को उत्कृष्ट संपादक, किसी को गांधी के सच्चे अनुयायी। सचमुच उनका जीवन और व्यक्तित्व ही ऐसा था कि उन्होंने जो भी कार्य किया, उसमें अनुपम श्रेष्ठता हासिल की। इसके लिए सहजता ही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी। उनके पिता कवि भवानीप्रसाद मिश्र की पंक्तियां हैं- जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख, और इसके बाद भी हम से बड़ा तू दिख। शायद इसी को मूलमंत्र बनाकर बहुत सरलता से गूढ़ से गूढ़ बातें उन्होंने लिखींऔर लोगों ने समझीं। उनके संपादन में गांधी मार्ग की अलग पहचान बनी। वे कथनी और करनी दोनों में सही अर्थों में गांधीवादी थे। गांधीजी को याद करने के लिए जो आडंबर भरे तरीके देश ने अपना लिए हैं, उनसे उन्हें तकलीफ होती थी। लाखों रूपए खर्च करके गांधी समाधि पर ज्योति जलाए रखना या बड़े-बड़े पुष्पहार अर्पित करना, सुरक्षा के तामझाम करना, उनके मुताबिक ये तरीके गांधी के सिद्धांतों के विपरीत थे। अंतिम कतार के व्यक्ति की चिंता ही उनके लिए सही तरीके से गांधी को याद करना था। अनुपमजी लिखने और पढऩे में भी अपने पिता की पंक्तियों का अनुसरण करते थे कि कुछ लिख के सो, कुछ पढ़ के सो, तू जिस जगह जागा सवेरे, उस जगह से कुछ बढ़ के सो। हालांकि बौद्धिकता का उनका मापदंड भी अलग ही था। स्कूल शिक्षा के बारे में उनके विचार इसकी पुष्टि करते हैं। यहां भी वे गांधी के तरीके को ही तवज्जो देते हैं। कक्षा में एक से लेकर पचासवें बच्चे तक सब पहले स्थान पर नहींआ सकते। कोई तो पीछे रहेगा ही। और इस पीछे रहने वाले बच्चे को पिछड़ा हुआ बच्चा क्यों माना जाए। उनके मुताबिक शिक्षा का तरीका ऐसा होना चाहिए कि बच्चों पर किसी तरह का मानसिक दबाव. आगे बढऩे की होड़, एक-एक अंक के लिए मारामारी का तनाव न रहे। बल्कि वे अपने आसपास के वातावरण को समझते हुए, उससे सामंजस्य बिठाते हुए, पढऩे का आनंद लेते हुए शिक्षा हासिल करें और अपने साथ-साथ अन्य साथियों को भी आगे बढ़ाएं, ऐसी पढ़ाई होनी चाहिए। उनके कुछ आलेखों में इस तरह के प्रयोगात्मक विद्यालयों का जिक्र है जो महंगे, निजी विद्यालयों या लाचार सरकारी स्कूलों से बिल्कुल अलग अपने विद्यार्थियों को शिक्षित कर रहे हैं और ये विद्यार्थी जीवन के हर क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। आज जब अनुपमजी नहींहैं, उनकी लिखी, कहींबहुत सी बातें याद आ रही हैं और आती रहेंगी। उनकी रिक्तता हमेशा महसूस की जाएगी।