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Monday 20 Nov 2017

भीष्म साहनी का हानूश : करिश्मा बनाम ईजाद


डॉ. जयदेव तनेजा
पिछले दिनों अचानक कहीं शीन-काफ निजाम का ये शे’र पढऩे को मिला-
‘‘मेरे लिए जो कुछ भी तू कहता है ठीक है,
अपना भी तज्जिया तो किया कर कभी-कभी।’’
एक नाट्यालोचक के तौर पर मुझे ये महसूस हुआ कि पिछले लगभग पैंतालीस वर्षों में यही बात न जाने कितने नाटककारों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं-अभिनेत्रियों और पाश्र्व कर्मियों ने मेरे बारे में कही होगी? हम आलोचक लोग सही या $गलत अपनी राय किसी पत्र-पत्रिका में छपवाकर मुक्त हो जाते हैं- आत्मविश्लेषण प्राय: नहीं करते। अपनी आलोचना की स्वयं आलोचना कर पाना और सार्वजनिक रूप से अपने गलत निष्कर्ष को स्वीकार कर पाना आसान काम नहीं है। लेकिन शायद इसका एक व्यावहारिक विकल्प यह हो सकता है कि समीक्षक परस्पर आलोचना-प्रत्यालोचना करें, इससे एक गंभीर एवं स्वस्थ विमर्श की शुरूआत हो सकती है। परन्तु इसके लिए व्यक्तिगत राग-द्वेष और पूर्वाग्रह रहित होकर अपने पक्ष को तर्कों एवं प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करना-इसकी बुनियादी शर्त है।
आलोचना की इस मूल स्थापना से भी शायद ही कोई प्रबुद्ध व्यक्ति असहमत होगा कि किसी भी घटना, चरित्र या विषय के कई पहलू होते हैं। कोई रचनाकार/नाटककार अपनी रचना के लिए किस पहलू का चुनाव करता है और उसे किस रूप, शैली या शिल्प में अभिव्यक्त करता है- इसका पूरा अधिकार उसे है। उसके मंतव्य और दृष्टिकोण को ध्यान में रखते हुए ही समीक्षक रचना की प्रासंगिकता, सार्थकता, प्रभावशीलता तथा स$फलता-अस$फलता का विवेचना-विश्लेषण और मूल्यांकन करता है।
रचनाकार को अपने विषय का कौन-सा पहलू चुनना चाहिए था और उसे किस दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना चाहिए था- ये बताना समीक्षक का काम नहीं है। किसी भी रचना/नाटक की कसौटी उसके भीतर ही होती है। यदि कोई आलोचक उसे अपनी किसी पूर्व-निर्धारित मान्यता या कसौटी पर परखने का प्रयास करेगा तो वह नाटक के साथ कभी न्याय नहीं कर पाएगा। ये तो ऐसा ही है, जैसे हम किसी एब्सर्ड नाटक को यथार्थवादी नाटकों की दृष्टि से परखें और उसे पूर्णत: असफल नाटक सिद्ध कर दें।
आलोचना की इसी मूलभूत स्थापना के साथ अब हम ‘नया पथ’ के ‘भीष्म साहनी जन्मशताब्दी विशेषांक’ में प्रकाशित सुल्तान अहमद के आलोचना-लेख ‘‘हानूश : करिश्मा बनाम ईजाद’’ की प्रत्यालोचना करेंगे। अपने नाटक की भूमिका (दो शब्द) में नाटककार ने स्पष्टत: घोषित किया है कि, ‘‘यह ऐतिहासिक नाटक नहीं है। न ही इसका अभिप्राय: घडिय़ों के आविष्कार की कहानी कहना है। कथानक के दो एक तथ्यों को छोडक़र, लगभग सभी कुछ काल्पनिक है। नाटक एक मानवीय स्थिति को मध्ययुगीन परिप्रेक्ष्य में दिखाने का प्रयास मात्र है।’’
इस संदर्भ में समीक्षक सुल्तान अहमद भीष्म साहनी पर पहला इल्जाम ही ये लगाते हैं कि, ‘‘कहीं लोग ये न कह बैठें कि ये नाटक हकीकत के खिला$फ है, इस हिचकिचाहट ने भीष्म साहनी को ज्य़ादा हिम्मत से काम नहीं लेने दिया और वे ये दिखा बैठे कि हानूश ने घड़ी की ईजाद नहीं की थी।’’ इसके प्रमाण स्वरूप वह हानूश का ये संवाद प्रस्तुत करते हैं कि- ‘‘हु•ाूर बचपन में मैंने सुना था कि किसी देश में गिरजे पर एक घड़ी लगी है। वैसी ही घड़ी बनाने की ख्वाहिश मेरे भी दिल में उठी।’’ यहां ये समझ में नहीं आता कि आलोचक किस ‘ह$कीकत’ की बात कर रहे हैं? प्राग में निर्मल वर्मा ने भीष्म जी को एक किंवदंती सुनाई थी- जिससे केवल तीन बातें (तथ्य नहीं) पता चलती है- (1) चैकोस्लोवाकिया में बनी इस पहली घड़ी को हानूश नामक कुफ्ल-साज ने बनाया था। (2) उस अनपढ़ और निर्धन व्यक्ति को इसे बनाने में सत्रह वर्ष लगे थे और (3) राजा ने पुरस्कार स्वरूप उसे धन-दौलत और राजदरबारी का रूतबा देने के साथ ही अंधा बनाने का हुक्म भी दे दिया था। इनके अतिरिक्त भीष्म साहनी को का$फी खोजबीन और वहां के दूतावास से पूछताछ करने के बावजूद उस वक्त किसी ऐतिहासिक ‘हकीकत’ की कोई जानकारी नहीं मिली थी। और भीष्म साहनी तो सपनों और कल्पनाओं में निहित सच्चाई तथा जीवन की वास्तविकता से उद्घाटित सच्चाई में कोई अंतर ही नहीं मानते थे। उनकी मान्यता थी कि ऐतिहासिक तथ्यों की ‘प्रामाणिकता’ के बजाय रचनाकार की दृष्टि से ही विश्वसनीयता सबसे बड़ी और एकमात्र कसौटी है।1 इसलिए नाटककार के ‘हिम्मत’ न दिखाने की बात बेमानी है।
अब प्रश्न रहा हानूश के घड़ी बनाने या ईजाद करने का। हानूश के चरित्र से स्पष्ट है कि वह एकदम अनपढ़ कुफ़्ल-साज या मिस्त्री भर है। उसने बचपन में किसी घड़ी के बारे में सुना भर था। इसलिए बिना किसी घड़ी को देखे या उसकी तकनीक का क ख ग भी पढ़े या जाने के अपनी सूझबूझ और सत्रह वर्षों की आशा-निराशा भरी लगातार मेहनत और आर्थिक परेशानियों के बावजूद जो व्यक्ति देश की पहली घड़ी बनाता है- उसके संदर्भ में ‘बनाने’ और ‘ईजाद’ करने में क्या बुनियादी $फर्क है? इसके अतिरिक्त हानूश या लुहार जैसे पात्रों ने शायद ‘ईजाद’ जैसे शब्द कभी सुना ही न हो, और इस संभावना का प्रमाण ये है कि नगरपालिका के सदस्यों का नेता हुसाक हानूश को ‘बहुत बड़ा ईजादकार’2 कहता है और सुशिक्षित पादरी उस घड़ी के बनाए जाने के लिए ‘आविष्कार’3 शब्द का प्रयोग करता है। अत: स्पष्ट है कि ‘घड़ी’ के भेद’ की चर्चा न तो आवश्यक है और न मैलोड्रामा या जुमला मात्र है- जैसा कि आलोचक को लगता है इस भेद को हानूश ने अपने अनथक प्रयास से ही खोजा है और यही कारण है कि वह घड़ी के इस भेद का बचा रहना अपने जीवन के बचने या न बचने से भी अधिक महत्वपूर्ण समझता है।
इसके बाद का आरोप तो और भी ज्य़ादा हास्यास्पद है, क्योंकि नाटककार द्वारा आरंभ में ही यह स्वीकार कर लेने कि ‘उसका उद्दे्श्य घडिय़ों के अविष्कार की कहानी कहना बिलकुल नहीं है’, इसके बावजूद सुल्तान अहमद भीष्म साहनी पर इल्जाम लगाते हैं कि उन्होंने नाटक में हानूश से पहले बनी घडिय़ों का इतिहास क्यों नहीं बताया? यही नहीं वह बाकायदा ‘विकीपीडिया’ और ‘प्राग एफ.एम. गाइड’ से पूरी सोलह पंक्तियां उद्धृत करके सन् 996 में बनी पहली घड़ी से लेकर क्रमश: 1288, 1326 में विश्व के अलग-अलग देशों में बनी घडिय़ों का इतिहास बताकर शायद नाटककार के मुकाबले अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते हैं। इसी संदर्भ में वह रचनाकार को ये सलाह भी देते हैं कि हानूश को ‘ईजादकार’ न सही वह ‘ईजाद में इजाफा करने वाला’ तो दिखा ही सकता था। इस प्रसंग में सबसे दिलचस्प तथ्य ये है कि समीक्षक द्वारा अपने लेख में उद्धृत महाराज के दो प्रश्नों के उत्तर में हानूश स्वयं बताता है कि ‘मेरी घड़ी में नक्षत्र भी दिखाए गए हैं, हुजूर!’4 तथा ‘हमारी घड़ी ज्य़ादा बड़ी है।’5 अहमद साहब को ये भी आपत्ति है कि हानूश के भाई पादरी के अलावा चर्च का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई भी चरित्र नाटक में न होने के कारण उन पर ‘लालची’, ‘भ्रष्टाचारी’, ‘पाखंडी’ जैसे लगाए गए इल्जामों का कोई उत्तर नहीं देता और इसी कारण ‘गिरजे वालों के किरदार धुंधले-धुंधले रह गए हैं। इस संदर्भ में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि नाटक के दूसरे अंक के तीसरे दृश्य में महाराज के साथ स्वयं लाट पादरी का भी मंच पर प्रवेश होता है। परन्तु वह एकाध बार महाराज के कान में कुछ फुसफुसाता है और निर्दोष हानूश को अंधा किए जाने के आदेश पर भी कुछ न कहकर अमानवीयता धूर्तता का प्रमाण ही देता है।’
आलोचक को हानूश के चरित्र और व्यवहार को लेकर कई आपत्तियां है। उनका मानना है कि हानूश अपनी पत्नी कात्या और सौदागरों के दमदार चरित्रों के मुकाबले कमजोर नजर आता है। ध्यान से देखें तो हानूश-कात्या और सौदागरों की तरह एकायामी चरित्र नहीं है। वह एक आत्मसम्मानी, संवेदनशील और अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के बावजूद अपने सपने को करने के लिए एक सच्चा, धुन का पक्का और दमदार इंसान है। वह इस हद तक गरीब है कि उसका बच्चा सर्दी से ठिठुरकर बेइलाज मर जाता है, पत्नी के गहने-कपड़े बिक चुके हैं, कई बार घर में चूल्हा तक नहीं जलता, भाई के मेहरबानी से सिर पर एक छत है, वरना सब सडक़ पर होते इस सबका दुख और अहसास है उसे। उसमें पत्नी को कभी कोई सुख न दे पाने का अपराधबोध भी है। यहां-वहां से आर्थिक सहायता मांग-मांगकर सत्रह सालों तक अपनी खोज में ंलगा रहने वाला एकनिष्ठ, समर्पित और प्रतिबद्ध व्यक्ति कमजोर कैसे हो सकता है? क्या कोई कमजोर व्यक्ति जैकब जैसे सरकारी दृष्टि से अपराधी और पुलिस से छुपने वाले आदमी को अपने घर में पनाह देने की हिम्मत कर सकता है? यह आरोप तो ठीक वैसा ही है जैसा राकेश के ‘आषाढ़ का एक दिन’ में विलोम के मुकाबले कालिदास को कमजोर चरित्र कहा जाता रहा है। एक दुनियादार व्यावहारिक व्यक्ति की तुलना किसी भावुक कलाकार से कैसे की जा सकती है? अपने-अपने तुच्छ स्वार्थों में लिप्त लालची सौदागरों का उस हानूश से मुकाबला करना जिसने बिना किसी निजी स्वार्थ या अपेक्षा के, अपने युवा जीवन के सत्रह सुनहरी साल उस घड़ी पर न्यौछावर कर दिए- जिसके  बनने-न बनने के बारे में जिसे कुछ भी पता नहीं था- कहां तक न्यायसंगत है?
इसके अतिरिक्त सुल्तान अहमद को हानूश के ‘मकसद’ में कोई खास ‘उजलापन’ दिखाई नही ंदेता, और राजा के सामने उसके द्वारा दिए गए प्रश्नोत्तरों में उसके व्यक्तित्व का ‘खुशामदी’ पहलू भी नजर आता है। मकसद बताते हुए पादरी कहता है कि ‘अपने लिए कुछ हासिल करने के लिए वह थोड़े ही बना रहा है। शौक है और क्या?’ इस बात की तस्दीक स्वयं हानूश, लुहार और कुछ अन्य पात्रों के संवादों से भी होती है। किसी भी रचनाकार का बुनियादी मकसद आत्माभिव्यक्ति ही होता है। साहित्यकार, संगीतकार, नतर्क, चित्रकार अपने शौक या किसी स्वप्न की पूर्ति के लिए ही रचना करते हैं। उनके भीतर का रचनात्मक दबाव/तनाव उन्हें रचना करने के लिए विवश कर देता है।
हानूश ने घड़ी न तो राजा को खुश करने के लिए बनाई थी न किसी देश-प्रेम जैसी भावना से प्रेरित होकर। उसका मकसद कारोबारियों की लाभ-हानि वाली व्यवसायी-दृष्टि से भी नहीं जुड़ा था और भ्रष्ट चर्च की धार्मिक-सत्ता के आतंक से वह भयभीत था। जिस-जिसने उसे उसका लक्ष्य प्राप्त करने में सहायता की- पत्नी और बेटी, पादरी भाई, दोस्त ऐमिल, सहयोगी-शागिर्द जेकब, यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर, लोहार बिरादरी और नगरपालिका- वह सबका हृदय से आभार व्यक्त ही नहीं करता, सचमुच मानता भी है। परन्तु वास्तव में उसने ये घड़ी सर्वसाधारण के लिए बनाई थी। उसके मकसद की उज्जवलता पर संदेह करने वालों और महाराज के सामने डरकर बोले गए दोहराए गए संवादों के कारण उसे ‘चापलूस’ कहने वालों को, अंत से कुछ पहले कात्या के समक्ष प्रस्तुत उसके इस आत्म-स्वीकार की भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए- ‘‘मैंने अपने लिए तो घड़ी नहीं बनाई थी ना, कात्या, यह तो सबकी चीज थी। एक बार बन गई तो सबकी हो गई, मेरी कहां रह गई।’’
हानूश के मकसद का ‘उजलापन’ समझने के लिए घड़ी बना चुकने के बाद कात्या के ये पूछने पर कि अब वह क्या करेगा? हानूश के इस उत्तर को संवेदना के साथ समझने की जरूरत है-
‘‘क्या जानूं कात्या, अभी तो मैं बैठकर बीयर पीना चाहता हूं और खिली हुई धूप में घूमने चाहता हूं, और दोस्तों के साथ बतियाना चाहता हूं। या फिर कुछ दिन ताले बनाना चाहता हूं।’’
इसी के साथ व्यावहारिक कात्या का ये प्रश्न भी दृष्टव्य है, ‘‘तुम अजीब आदमी हो। जब ताले बनाने का वक्त था, उस वक्त तो तुम घड़ी बनाते रहे, और जब घडिय़ां बनाने का वक्त आया है तो तुम फिर से ताले बनाना चाहते हो।’’
हानूश ‘अजीब आदमी’ इसलिए है क्योंकि वह आम दुनियादार आदमी की तरह हिसाबी नहीं है। वह घड़ी धन-दौलत कमाने या पद-पुरस्कार-सम्मान पाने के किसी निजी लाभके अपने ख्वाब को पूरा करने के लिए बना रहा था।  वह जमीन से जुड़ा एक ऐसा आम आदमी है जो अपनी बेमिसाल कामयाबी के बावजूद अपनी जमीन से ही जुड़ा रहना चाहता है। वह इतना सहज और सरल  मासूम-सा साधारण आदमी है, जो राजा के दरबार में जाने के नाम से ही आतंकित हो उठता है। उसे समझ में ही नहीं आता कि वह घड़ी के बारे में राजा द्वारा पूछे गए सवालों का क्या जवाब देगा? जिन बातों के कारण समीक्षक महोदय को हानूश की शख्सियत का खु़शामदी पहलू नजर आता है, वे तो सब उत्तर उसे शुभचिंतक, मित्र ऐमिल तथा भाई पादरी ने तैयार करवाए हैं। हानूश तो वहां उनकी कही बातों को दोहराता भर है। नगरपालिका भवन में आयोजित समारोह का मुख्य अतिथि होने के बावजूद वहां की चकाचौंध से घबराकर एक कोने में सिकुडक़र खड़ा हो जाता है।  परन्तु महाराज प्रवेश करते ही घड़ी बनाने वाले को पूछते हैं। हानूश आगे आकर आदाब करता है। इसी बीच दस्तकार व्यापारी हानूश के बहाने से दरबार में अपने प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठा देते हैं। उनकी उतावली से महाराज सहसा क्रुद्ध हो जाते हैं और उन्हें डांटकर चुप करा देते हैं। इससे हानूश सहम जाता है। महाराज के प्रश्न पूछने पर हानूश वह जवाब देते हैं, जिसके आधार पर उसे चापलूस कहा गया है। लेकिन नाटक की समीक्षा करते वक्त आमतौर से साहित्यिक आलोचक-चिंतक रंग निर्देशकों की ओर बिलकुल ध्यान नहीं देते। यहां भी यदि आलोचक महोदय ने ‘फिर सहसा याद करके’ के निर्देश पर ध्यान दिया होता तो उन्हें यह बात आसानी से समझ में आ जाती कि ये संवाद मूलत: हानूश का नहीं है, बल्कि वह तो ऐमिल द्वारा कही हुई बातों को या दकरके दोहरा भर रहा है। अत: उन बातों के आधार पर हानूश के चरित्र का मूल्यांकन करना न्यायोचित नहीं होगा।
इसी तरह बड़े भाई पादरी के इस कथन कि ‘यदि हानूश कामयाब हो गया तो देश में बनने वाली यह पहली घड़ी होगी, महाराज इसे मालामाल कर देंगे।’ या ‘ये कुछ हासिल करने के लिए नहीं, बल्कि अपना शौक पूरा करने के लिए बना रहा है।’
इसी तरह लोहार का ये कहना कि ‘सफल होने पर हानूश का डंका दुनियाभर में बजेगा, उसको कितनी इज्जत मिलेगी। जो काम और कोई नहीं कर पाया, एक वह मालूमी कुल्फ्लसाज ने कर दिखाया।’
यहां पादरी के संवाद, पति के जुनून से नाराज और परिवार की आर्थिक समस्याओं से दुख कात्या को (हानूश की संभावित सफलता के सुखद परिणामों का उल्लेख करके) उत्साहित करने के उद्दे्श्य से कहे गए हैं। लोहार कात्या को समझाने के साथ-साथ अपने सहयोगी की सार्थकता की परिकल्पना करके अपने आपको भी आश्वस्त करना  चाहता है। इन संवादों में ‘राष्ट्रवादिता’ का पुट कहां हैं और ये संवाद समीक्षक के ‘तरक्की पसंद नजरिए’ के खिलाफ क्यों है? समझना मुश्किल है। ठीक इसी प्रकार, हानूश की निर्मल-उज्जवल आत्मा की गहराइयों से निकले उसके चरित्र के सारतत्व को अभिव्यक्त करते जिस संवाद को हानूश के भीतर से निकला हुआ स्वाभाविक सत्य न मान, लेखक द्वारा आरोपित जुमला कहकर नाटककार की रचनात्मकता को ही प्रश्नांकित कर देते हैं। वो संवाद ये है- हानूश: ...घड़ी बन सकती है, घड़ी बंद भी हो सकती है। घड़ी बनाने वाला अंधा  भी हो सकता है, मर भी सकता है लेकिन यह बहुत बड़ी बात नहीं है। जेकब चला गया ताकि घड़ी का भेद जिंदा रह सके, और यही सबसे बड़ी बात है।
सम्पूर्ण नाटक में हानूश की विकास यात्रा से यह स्पष्त: स्पष्ट हो जाता है कि उसके लिए घड़ी का बनाना इसलिए जरूरी था क्योंकि इसके माध्यम से ही ‘घड़ी का भेद’ जाना जा सकता था। अब जबकि वह भेद सुरक्षित हो गया है तो हानूश बिना अपनी जान की परवाह किए पूरी तरह निर्भय होकर अपने मन की बात सा$फ तौर से कह देता है। घड़ी की टन-टन की आवाज सुनकर उसकी आंखों में खुशी का आंसू चमकता है और वह सरकारी अधिकारी से बिना किसी हिचक के कहता है कि-
‘‘मैं तैयार हूं। जहां मन आए ले चलो।’’ अब उसे बादशाह को किसी बात की कोई स$फाई नहीं देनी। उसे विश्वास है कि उसकी घड़ी अब कभी बंद नहीं होगी। उसे अब किसी बात का कोई अ$फसोस, पछतावा या चिंता नहीं है। उसने अपने मकसद को पा लिया है- इसीलिए अब वह पूरी तरह संतुष्ट है, कोई इच्छा और लालसा शेष नहीं है। इसके बावजूद यदि उसके आलोचक सुल्तान अहमद को हानूश का यह संवाद एक दुमछल्ला और जुमला लगता है, जो उसके भीतर से पैदा नहीं हुआ और सिर्फ इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि वे उसे मैक्सिम गोर्की के उपन्यास ‘मां’ की मां के किसी संवाद की याद दिलाता है- तो उनके तरक्की पसंद नजरिया का मूलाधार समझा जा सकता है। तरक्कीपसंद नजरिया तो भीष्म साहनी का भी था, जो आजीवन रहा। दस वर्षों तक वह ‘प्रगतिशील लेखक संघ’ के महासचिव रहे। वामपंथी विचारधारा से प्रतिबद्ध होने के बावजूद, वह एक पार्टी एक्टीविस्ट और एक रचनाकार के लिए विचारधारा के अर्थ में जो अंतर होता है, इसे भी अच्छी तरह समझते थे। इस दृष्टि से मैं यहां ‘नया पथ’ के संपादक और वामपंथी विचारधारा के प्रतिष्ठित आलोचक-चिंतक मुरली मनोहर प्रसाद सिंह का यह उद्धरण प्रस्तुत करना चाहूंगा-
ऐंगेल्स/ माक्र्स, लेनिन , माओ आदि के उद्धरण देकर सृजनात्मक साहित्य लिखना कोरी नारेबाजी है। भीष्म साहनी इस फूहड़पन को अपनी शैली का हिस्सा नहीं बनाते। इसके बावजूद उनकी सभी रचनाएं माक्र्सवाद-लेनिनवाद के आधारभूत सिद्धांतों पर खरी उतरती है।’’
कथ्य की दृष्टि से भीष्म साहनी का सम्पूर्ण साहित्य समाजोन्मुखी यथार्थवादी धारा के अन्तर्गत आता है, और जैसा कि हम देख चुके हैं ‘हानूश’ भी उसका अपवाद नहीं है। परन्तु नाट्य विधा की अपेक्षाओं और रंग-शिल्प के लिहाज से इसे गंभीरतापूर्वक पढ़े तो इसमें कुछ विसंगतियों भी दिखाई देती हैं। जिनका संक्षिप्त उल्लेख मैं यहां करना चाहूंगा। हम सब जानते हैं कि भीष्म साहनी जीवनभर अपने अभिनेता, निर्देशक, नाट्यानुवादक नाटक और प्रगतिशील रंगान्दोलन के एक एक्टीविस्ट के रूप में रंगकर्म से जुड़े रहे। यह तथ्य भी किसी से छिपा नहीं कि इस नाटक को उन्होंने तेरह-चौदह वर्षों से न जाने कितनी तरह से और कितनी बार लिखा। इसे देश के अनेक चर्चित नाट्य-निर्देशकों ने कई बार सफलतापूर्वक अभिमंचित भी किया। नाट्यालेख की बहुसंख्य प्रशंसात्मक समीक्षाएं भी लिखी गई। इसके बावजूद कई स्थानों पर कलाकारों के प्रवेश-प्रस्थान, चरित्रांकन और क्रिया व्यापार को लेकर प्रकाशित नाट्यालेख में मौजूद असंगतियां या असावधानियां आश्चर्यजकित करती हैं। उदाहरण के तौर पर हम देखते हैं कि प्रथम अंक के पृष्ठ तीन पर यान्का अपनी मां कात्या के साथ मंच पर प्रवेश करती है और पृष्ठ नौ पर उसी के साथ प्रस्थान भी करती है। फिर अचानक पृष्ठ 21 पर प्रकट होकर दो छोटे से संवाद बोलती है और पृष्ठ 25 के अंत में ऐमिल और जेकब के साथ प्रस्थान करती है। यान्का पृष्ठ 21 पर संवाद बोलने के लिए कब और कहां से आती है और चार पृष्ठों के कार्य व्यापार में वह मंच पर क्या करती है- इसका भी कोई संकेत नाटककार नहीं दिया है।
हानूश पृष्ठ 18 पर लोहार के सामने यह स्वीकार करता है कि ‘‘अब तक गिरजे की ओर से मुझे मदद मिलती रही है।’’ यान्का भी पृष्ठ 21 पर ऐमिल को बताती है कि ‘‘गिरजेवालों ने वजी$फा देना बंद कर दिया है।’’ अर्थात अब वजी$फा मिलता रहा था। इसके विपरीत पृष्ठ 33 पर जार्ज और जान का ये वार्तालाप दृष्टव्य है-
जार्ज : पांच बरस पहले हानूश को जब माली इमदाद की जरूरत थी तो हानूश लाट पादरी के पास भी गया था। जानते हो, लाट पादरी ने उसे क्या जवाब दिया था?
जानू : क्या कहा था?
जार्ज- लाट पादरी ने कहा था कि तुम शैतान की औलाद हो जो घड़ी बना रहे हो। घड़ी बनाना इंसान का नहीं शैतान का काम है।
जान : खूब!
जार्ज : हानूश ने यह बात कुछ ही दिन पहले मुझे खुद सुनाई थी।
लाट पादरी ने कहा कि घड़ी बनाने की कोशिस करना ही खुदा की तौहीन करना है। भगवान ने सूरज बनाया है, चांद बनाना  है, अगर उन्हें घड़ी बनाना मंजूर होता तो क्या वह घड़ी नहीं बना सकते थे? उनके लिए क्या मुश्किल था? इस वक्त जार्ज की यह बात हानूश के उस कथन को भी सत्यापित होती है जब वह महाराज के पूछने के पर पुश्तैनी मकान उसके नाम करा देने के लिए अपने बड़े भाई पादरी का, लोहारों का और पिछले पांच से वजीफा देने के लिए नगरपालिका का आभार स्वीकार करता है। परन्तु वह कहीं भी चर्च का नाम नहीं लेता। घड़ी के बाद होने के बाद चर्चा करते आम लोगों के बीच से पृष्ठ 88 पर एक व्यक्ति का यह कहना कि ‘‘सुइयां खड़ी की खड़ी है। न मुर्ग ने बांग दी, न संत दर्शन देते हैं। घड़ी बिल्कुल चुप है। मुर्ग की बांग और संत के दर्शन देने वाली बात भी हानूश की घड़ी के संदर्भ में सत्य नहीं है। ’’
यूं तो हानूश और किसी हद तक उसकी पत्नी कात्या को छोडक़र भीष्म साहनी ने शेष पात्रों का चित्रांकन न करके उनके एकायामी रेखाचित्र भी बनाए हैं, परन्तु गिरजे के सर्वोच्च सत्ताधारी लाट पादरी के चरित्रांकन में तो हद ही कर दी है। वह दूसरे अंक के तीसरे दृश्य में महाराज के साथ पृष्ठ 62 पर प्रवेश करता है और लगातार मंच पर उपस्थित रहकर उनके साथ ही पृष्ठ 70 पर प्रस्थान कर जाता है। आठ पृष्ठ के इस अत्यंत नाटकीय, विडम्बनापूर्ण और त्रासद दृश्य में हानूश के बारे में लाट पादरी एक संवाद कि, ‘हमारे गिरजे के एक पादरी का भाई है।’ और एक स्थान पर ‘महाराज के कान में कुछ कहने’ के अलावा न तो कुछ बोलता है, न करता है। दया, करुणा, प्रेम तथा अन्य सभी मानव एवं नैतिक मूल्यों के रक्षक और पोषक चर्च का सर्वोच्च प्रतिनिधि लाट पादरी यहां धूर्त, मक्कार, क्रूर तथा अमानवीय पाखंडी व्यक्ति के रूप में सा$फ पहचाना जाता है- जब वह निर्दोष हानूश को अंधा किए जाने के आदेश पर भी कोई प्रतिक्रिया तक व्यक्त नहीं करता- विरोध की तो बात ही अलग है।
ये बिलकुल स्वाभाविक ही होगा यदि साहित्य के अधिकतर गंभीर पाठकों, समीक्षकों को विसंगतियों की ये चर्चा महत्वहीन या हास्यास्पद भी लगे। नाटक को पढ़ते समय इन पर प्राय: ध्यान नहीं जाता, परन्तु करते समय निर्देशक के लिए ये लापरवाही समस्या बन जाती है। जिसने कभी स्वयं अभिनय नहीं किया, उसके लिए ये अनुमान लगा पाना भी कठिन है कि किसी यथार्थवादी नाटक में अभिनेता के लिए बिना कुछ बोले या किए पांच-सात मिनिट तक चुपचाप मंच पर खड़े रहना कितनी कठिन चुनौती होती है?
और अंत में, मैं स्वीकार करता हूं कि आलोचना की प्रत्यालोचना करते ही मेरे अपने सभी सुरक्षा-कवच अर्थहीन हो जाते हैं। इसलिए मैं स्वयं को प्रत्यालोचना के लिए सहर्ष प्रस्तुत करता हूं।
165, नेहरू अपार्टमेंट्स
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