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Friday 24 Nov 2017

फिदेल कास्त्रो : एक क्रांतिकारी जीवन का उत्सव


विनीत तिवारी
फिदेल कास्त्रो 90 वर्ष की उम्र में एक दीर्घ सक्रिय जीवन जीने के बाद 25 नवम्बर 2016 को इस दुनिया से रुखसत जरूर हुए लेकिन वे करोड़ों - अरबों दिलों में हमेशा के लिए बसे रहेंगे। वे बेशक दुनिया के दूसरे सिरे पर मौजूद एक छोटे से देश के शासक थे लेकिन उन्होंने अनेक देशों की आजादी की लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभायी और बेहतरीन मानवीय गुणों वाले मनुष्य समाज को बनाया। कहा जा सकता है कि अगर फिदेल न होते तो अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका के अनेक देशों के  मुक्ति संघर्षों का नतीजा बहुत अलग रहा होता। उनके निधन के उपरान्त इंदौर में उनके प्रशंसकों ने तय किया कि फिदेल की याद में कोई कार्यक्रम शोक या श्रद्धांजलि का नहीं किया जाएगा बल्कि उनकी याद में एक क्रांतिकारी जीवन का उत्सव मनाया जाएगा।
इसलिए 3 दिसम्बर 2016 को इंदौर के सभी प्रगतिशील-जनवादी और वामपंथी संगठनों द्वारा फिदेल कास्त्रो की याद में फिदेल कास्त्रो: एक क्रांतिकारी जीवन का उत्सव कार्यक्रम आयोजित किया। अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (एप्सो)  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ  इंडिया, भारतीय जन नाट्य संघ, जनवादी लेखक संघ, प्रगतिशील लेखक संघ, मेहनतकश, रूपांकन और संदर्भ केंद्र का ये संयुक्त आयोजन हिदी साहित्य समिति सभागृह में किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत में फिदेल कास्त्रो और क्यूबा का संक्षिप्त परिचय देते हुए जया मेहता ने बताया कि फिदेल कास्त्रो का यूँ तो पूरा जीवन ही संघर्षपूर्ण था लेकिन मैं तीन संघर्षों को उनके सबसे बड़े संघर्ष मानती हूं। पहला संघर्ष जो उन्होंने अपने देश क्यूबा को बटिस्टा की तानाशाही से आजाद कराया। दूसरा संघर्ष था क्यूबा जैसे पिछड़े देश में में समाजवादी व्यवस्था और समाजवादी चेतना कायम करने का। उनका तीसरा सबसे बड़ा संघर्ष था  कि जब  90 के दशक में सोवियत संघ का विघटन हो गया और पूर्वी योरप के देशों में समाजवादी व्यवस्थाएं ढह गईं तब बिना डगमगाए समाजवाद के परचम को क्यूबा ने थामे रखा। डॉ जया मेहता, आमिर और विक्की द्वारा अमेरिकी डाक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता सॉल लैंडो द्वारा फिदेल कास्त्रो पर बनाई हुई डॉक्यूमेंट्री फिदेल 1971 के चुने हुए हिस्से दिखाए गए।  डॉ. जया मेहता ने बताया कि जब फिदेल ने बटिस्टा के खिलाफ  गुरिल्ला लड़ाई छेड़ी तो उनके साथ मात्र 300 साथी थे जबकि उनके खिलाफ 10 हजार हथियारबंद सेना थी। फिल्म में फिदेल कहते हैं कि हम क्यूबा की सिएरा मेस्त्रा पहाड़ों के जंगल में थे जिसका हम चप्पा चप्पा जानते थे। हमारा मोर्चा सुरक्षित जगह पर था लेकिन फिर भी हमें स्थानीय किसानों और गाइडों का सहारा लेना पड़ता था। कई बार ऐसा हुआ जब लोगों ने हमें धोखा दिया। पद और पैसों के लालच में हमारी जानकारी सीआईए को दे दी गयी। कई बार हम बाल-बाल बचे और कई बार हमारे साथी शहीद हुए। उन्होंने हवाई जहाजों से भी हम पर हमले किए। लेकिन हर मुठभेड़ ने हमें मजबूत बनाया और कई बार बचने के बाद हमें ये भरोसा हो गया था कि अब हमें कोई नहीं हरा सकता। फिल्म में क्यूबा की क्रांति के 15  वर्ष पूरे होने पर फिदेल को क्यूबा के अपने देशवासियों को संबोधित करते दिखाया गया है। वे क्रांति की 15 वीं वर्षगाँठ को अपने साथी शहीद चे गुएवारा को समर्पित करते हुए सामने मौजूद लाखों की जनता से कैसे जोशीला संवाद स्थापित करते हैं। इसे लक्ष्य करके डॉ.जया मेहता ने फिदेल के बारे में चे गुएवारा की बात को साझा किया। चे कहते थे फिदेल का जनता से जुडऩे का तरीका कोई तब तक नहीं समझ सकता जब तक उन्हें उस रूप में कोई देख न ले। वे जनता से इस तरह संवाद स्थापित करते हैं मानो किसी चिमटे की दो भुजाएं एक जैसे कम्पित हो रही हों। बिलकुल सम पर। ये कम्पन बढ़ता जाता है और चरम तक पहुँचता है जिसमें फिदेल उस संवाद को संघर्ष, इन्किलाब की जीत की गर्जना से अचानक समाप्त करते हैं और वो जनता के भीतर बहुत देर तक झंकृत होता रहता है।
भोपाल से आये वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया ने अपनी 1970 के दशक में एक पत्रकार सम्मलेन में भाग लेने के लिए की गयी क्यूबा यात्रा के संस्मरण सुनाये। उन्होंने बताया कि वे पत्रकारों के एक दल के साथ सम्मेलन के लिए क्यूबा गए थे। उस समय क्यूबा मास्को से होकर ही जाना होता था। हवाई जहाज का ईंधन खत्म हो गया था। हमारा ढाई सौ पत्रकारों का दल था जिसमें कई संपादक भी शामिल थे। हमें कहीं उतरने की अनुमति नहीं मिल रही थी। नामचीन संपादकों ने अमेरिका और ब्रिटेन सहित तमाम देशों के राष्ट्रपतियों से बात की तब जाकर हमें बरमूडा में उतरने की अनुमति मिली। वहां हमसे हमारे कैमरे ले लिए गए और हमें कह दिया गया कि खिडक़ी से बाहर भी नजर मत डालिये वरना आपके साथ कुछ भी हो सकता है। वे लोग हमें खतरनाक समझ रहे थे क्योंकि हम क्यूबा जा रहे थे। यह खबर क्यूबा में भी पहुंच चुकी थी। जब हम क्यूबा उतरे तो वहां पर फिदेल कास्त्रो मौजूद थे। उन्होंने करीब आधा घंटे संबोधित किया। हम 15 दिन क्यूबा में रहे। लगभग हर दिन वे कार्यक्रम स्थल पर आते थे। हरदेनिया जी ने बताया कि फिदेल अपने हर भाषण से पहले अपने देश के पूर्वज जननायक-नायिकाओं को याद करते थे। भारत में हमारे यहां आजकल कुछ ऐसा हो रहा है जैसे आज के नेताओं से पहले के नेताओं ने कुछ किया ही नहीं। वरिष्ठ अधिवक्ता और इप्टा के संरक्षक समाजसेवी आनंद मोहन माथुर ने फिदेल के जीवन से प्रेरणा लेते हुए पूँजीवाद के खिलाफ  आवाज उठाने का आह्वान किया।
आयोजकों ने भोपाल गैस त्रासदी दिवस की बरसी पर मारे गए लोगों को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी।  साथ ही हिंदी और उर्दू जुबानों के बीच मजबूत पल की तरह सक्रिय रहे शायर बेकल उत्साही के निधन पर उन्हें भी श्रद्धांजलि दी गयी।