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Monday 20 Nov 2017

समग्र जीवन-बोध का गाँव (गाँव का संक्रमणशील यथार्थ)

अजित कुमार राय
‘विमर्श’ विष्णुपुरम् कालोनी
न्यू कचहरी रोड, सरायमीरा - कन्नाौज - 209727 उत्तर प्रदेश
मो. 09839611435
आज लेखन की दुनिया में शहरी जमीन की कीमत बढ़ गई है। तद्भवी संस्कृति को सींचना आज चकाचौंध भरे विमर्शों के बाजार से बाहर होना है। अपनी कला के बाजार-भाव की चिंता किए बगैर डा. विवेकी राय लेखन के ऊँचे मचान पर चढ़ कर अपने खेत-खलिहान को अगोरते रहते हैं। गाँव उनका उपास्य है। भारतीय जन-गण-मन की राष्ट्रीय लय में उन्होंने गाँव की जिन्दगी को गाया है। उनका गाँव रेल की खिडक़ी से अथवा सिनेमा के पर्दे पर देखा गया गाँव नहीं, प्रगाढ़ संसक्ति के साथ जिया गया गाँव है । सांस्कृतिक अस्मिता के प्रति प्रतिबद्ध होते हुए भी वे गाँव के प्रति रोमांटिक दृष्टि नहीं रखते । उनका रचना-विवेक गाँव के नरक का साक्षात्कार भी करता है । जिन्दगी के अनुप्रास की शक्ल में लोक-जीवन के विरोधाभास और विडंबनाएँ पूरी वक्रता के साथ व्यक्त हुई हैं। मिट्टी की सर्जनात्मक शक्ति की गहरी पहचान रखने वाले श्री राय की ग्रामभित्तिक रचनाओं में जिन्दगी की अप्रकाशित पांडुलिपियों का सर्वेक्षण किया जा सकता है । एक शिक्षित ग्रामीण के अवलोकन-बिन्दु से गाँव के संक्रमणशील यथार्थ को समग्रता में देखने की निसर्ग-सिद्ध दृष्टि उन्हें प्राप्त है। किन्तु आलोचकों की नजर न लगे, इसलिए प्रकृति ने उनके माथे पर एक काला डिठौना (माँसा) लगा रखा है।
    कभी ‘आज’ के पन्नों पर मनबोध मास्टर के पर्याय बन गए डा.विवेकी राय ने आंचलिक पत्रकारिता का प्रतिमान गढ़ा था - गाँव के बेआवाज लोगों को आवाज दी थी । उनकी डायरी में जिन्दगी के छोटे-छोटे टुकड़े दर्ज होते थे। डायरी के पन्ने मिलकर जिन्दगी की एक पूरी किताब बन जाते थे। यह डायरी अपने समय का शिलालेख है। इसमें एक पूरा युग बोलता है। साथ ही हमारा रचना-समय भी जब-तब झाँक जाता है। योग्यतम की उत्तरजीविता के संदर्भ में एक पूरी उत्तरशती का संवेदनात्मक इतिहास तो उनमें अंकित है ही, उनके सम्मुख गाँव-घर के तमसाच्छन्न भविष्य की छायाएँ भी डोलती हैं । गाँव के भूगोल में पसरते अंधकार के बीच अमानवीकरण के स्याह बिम्बों और क्रूरता की परछाइयों को पकडऩे की कोशिश उनके लेखन की मुख्य प्रतिज्ञा है। सभ्यता के धक्के से संस्कृति के बिखर जाने और गाँव को नरक मानकर बुद्धिजीवी के पलायन से लेखक व्यथित है। जिन्दगी और मौत के बीच छटपटाते गाँव में अध्यापकी को यातना-गृह के रूप में देखने वाले विवेकी राय प्राइवेट शिक्षकों के अंतहीन शोषण और यंत्रणा के संदर्भ में आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं । यहाँ प्रबन्धक जीवन का नहीं, मृत्यु का बीमा कराते हैं और हमें किश्त-दर-किश्त ले जाते हैं । इस अनुभव को लेखक अपनी देशज भाषा और स्वायत्त शैली में मूर्त करता है । किन्तु रचनात्मक यथार्थ की एकरैखिक संरचना शायद अल्ट्रा माडर्न पाठकों को आश्वस्त न कर पाए । जाहिर है कि ढिबरी या लालटेन की रोशनी में लिखी गई कविता हैलोजन बल्ब और सोडियम लाइट की कविता से आस्वाद में भिन्न होगी । भिन्न को उद्भिन्न बनाने की संकल्पना के तहत लेखक द्वारा अक्षरों का यह अनुष्ठान चलता रहेगा चाहे उसकी कविता के पाठक हों या न हों । मैं ही जाने कितने त्यौहारों की होली जलाकर तो एक कविता लिख पाता हूँ । परंतु आत्म-संलाप के शिल्प में लम्बी दार्शनिक निष्पत्तियाँ कई बार ऊब पैदा करती हैं और ‘मदारी’ जैसों की पीड़ा को डायल्यूट भी करती हैं । वैसे ‘चतुरी चाचा की चि_ी’ पढ़ते हुए स्वप्न की फैन्टेसी के माध्यम से कृषक-जीवन की पीड़ा का मार्मिक आख्यान प्रस्तुत हुआ है। किसान यदि दोनों जून भोजन करने लगेगा तो डीह पर से उजड़ जाएगा। अमेरिका भले चाँद की चढ़ाई करे, पर हम तो अभी अपनी धरती को ही नहीं खोज पाए हैं। वैश्विक परिदृश्य में आज भारतीय किसान मिट्टी हो रहा है। एक प्राइवेट शिक्षक के बुखार में जलते सवालों की जो फन्तासी बुनी गई है, वह बड़ी संक्रामक है ।
मनबोध मास्टर की डायरी इतनी बड़ी है कि उसमें कहानी, संस्मरण, रेखाचित्र, रिपोर्ताज, ललित-निबन्ध - सभी समा जाते हैं। विधाओं की यह आवाजाही गाँव के खुले वातावरण की लय में है। वस्तुत: डा.विवेकी राय किसी विधा के प्रति नहीं, ग्राम-जीवन के प्रति प्रतिबद्ध हैं। गाजीपुर-बलिया के बीच फैले करइल अंचल का इतिहास इनमें स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद गाँव के जीवन और ग्रामीणों की मानसिकता में आये बदलाव का साक्ष्य प्रस्तुत करता है। साक्षी मैं भी हूँ - दो-तीन वर्ष तक किशोर-काल में मेरी पढ़ाई उसी अंचल में हुई थी। वहाँ की गरीबी, अशिक्षा, सामंती उत्पीडऩ, रूढि़-ग्रस्त समाज के बावजूद अभावों का उत्सव मनाते लोग आज भी मेरी स्मृति-मंजूषा में सुरक्षित हैं । गाँवों की पगडंडियाँ मार्गहीनता के किस मोड़ पर ले जाकर छोड़ देती हैं ! इसका रोमांचक अनुभव मुझे भी है। खासकर बरसात में करइल की मिट्टी की आसक्ति कई-कई जूते पहना देती है। इन सबके बावजूद कुछ ऐसा है जो हमें आज भी शहर से बार-बार गाँव की ओर खींच लेता है। सामूहिक भावना, आपसी सहकार, सम्वेदना-पर्व का उल्लास और शुद्ध पर्यावरण - ये गाँव के वैभव के उपादान हैं । जिन्दगी के इन्हीं मुहावरों को अपनी सहज भाषा-परंपरा में रचते हुए श्री राय भोजपुरी के सहस्रों शब्दों को हिन्दी में विन्यस्त करते हैं । इन शब्दों को पचाकर हिन्दी समृद्ध हुई है, उसकी अर्थ-सम्वेदना व ताजगी बढ़ी है।भाषा का यह स्थापत्य इस कृति की ‘अतिथि’, ‘छछलोल राय का तिलकोत्सव’, और ‘तिला-मूँगा’ की कहानियों में देखा जा सकता है। ‘अतिथि’ शीर्षक कहानी इस संग्रह का अतिथि-वक्तव्य है। संस्कृति के शेषनाग किसान की श्रद्धा के शोषण का वह चरम-बिन्दु है -‘‘आप हाथ-मुँह धोइए महाराज ! यहाँ कुत्तों की कमी नहीं है।’’ पर आज तो मनुष्य का ‘सत्त’ चला गया । इस सत्त की बेधक ‘तिला-मूँगा’ पुस्तक की सबसे मार्मिक कहानी है । इन लोककथाओं में गुड़ से अधिक मिठास है, पर उन्हें सुनने के लिए निश्छल बाल-मन चाहिए। लिखना लेखक की सर्जनात्मक अपरिहार्यता है। ‘गँवई गंध गुलाब’ के (अंग्रेजी के) मुंशी जी उर्फ शिवमंगल राय की सामाजिक शिवत्व की साधना को माथे पर त्रिपुण्ड की तरह धारण करने का मन होता है। ‘छछलोल राय के तिलकोत्सव’ में हास्य-परिष्कृत हास्य की सान्द्रता ग्रन्थि-बंधन के तनाव को मिटा कर हमें निग्र्रन्थि बनाती है। ग्रामीण जीवन की घटनाओं को बहुधा सामाजिक वृत्तियों का रूपक बनाकर प्रकृति-चित्रण की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया है।
स्वप्न या फंतासी के माध्यम से जिन्दगी के भयानक सचों के संसार को खोलने का उद्योग और आमजन की चिंताओं, आशा-आकांक्षाओं को स्वर देने की सिद्धि वस्तुत: हमारी कुंडलिनी को भी जाग्रत करती है। हाँ, इस प्रक्रिया में कलात्मक संयम कई बार बाधित भी हो जाता है । निम्न-मध्यवर्ग को नायक बनाने वाले डॉ विवेकी राय छोटी साँस की रचनाओं के बड़े लेखक हैं। समासत: भोजपुरी समाज के संदर्भ में वे प्रेमचन्द के सच्चे उत्तराधिकारी हैं।