Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

इतने भले न बन जाना साथी

 

पल्लब  
393 डी.डी.ए., कनिष्क अपार्टमेंट्स
ब्लाक सी एंड डी,
शालीमार बाग़
दिल्ली-110088

मनुष्य और प्रकृति का सम्बन्ध आदिम और सनातन है। साहित्य इस सनातन सम्बन्ध को देखता-समझता रहा है। यह देखना-समझना भी बहुत पुराना हो चला है। किन्तु विचारणीय है कि कविता में जिस राग के साथ मनुष्य और प्रकृति के सम्बन्ध को देखा गया है क्या वैसा और उतना गद्य में भी हुआ है ? पर्यावरण विमर्श एक नयी अवधारणा भले हो लेकिन पर्यावरण साहित्य से अभिन्न कभी नहीं रहा। अभिज्ञान शाकुंतलम में शकुन्तला की विदाई पर पेड़ रो रहे थे और सुमित्रानंदन पन्त के यहाँ प्रकृति का वैभव जिस विराट स्वरूप में आया है वह अविस्मरणीय है। तब भी विचार योग्य है कि हिन्दी गद्य ने पर्यावरण के सम्बन्ध में कैसी रचनाएँ दी हैं। काशीनाथ सिंह साठोत्तरी पीढ़ी के प्रतिनिधि कथाकार माने जाते हैं जिनकी शुरुआती कहानी सुख भी मनुष्य और प्रकृति के संबंधों पर लिखी गई थी। वहां नैसर्गिक सौंदर्य और सुख से दूर होते जा रहे मनुष्य की छटपटाहट प्रकट हुई थी। बाद में काशीनाथ सिंह जनवादी कहानी आंदोलन के पुरस्कर्ता कथाकार के रूप में भी जाने गए और भूमंडलीकरण के बाद आए नए दौर में तो उनकी रचनाएँ अपने समय की सटीक पहचान के लिए विख्यात हुई। जंगल जातकम, 1977 में  शालपत्र नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। यह आपातकाल का समय था और तब काशीनाथ सिंह जातक कथाओं की शैली में नए कथा प्रयोग कर रहे थे। एक तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए अंकुश का प्रतिरोध वहीं दूसरी तरफ प्रचलित सपाटबयानी से पृथक कला मूल्यों की रक्षा करते हुए जन त्रास का उद्घाटन - ये दो उद्देश्य काशीनाथ सिंह की तत्कालीन रचनाशीलता के मूल्यांकन में दिखाई देते हैं। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा है -मुझे दीक्षित करने वाले विद्वान लोग नहीं थे। मुझे कथा-साहित्य की ओर आकर्षित करने में मां द्वारा सुनाई गई कहानियों की बड़ी भूमिका है। मां बहुत अच्छी अच्छी कहानियां सुनाती थी। गांव में पुआल पर सोते थे। बहंगी लेकर कहार आते थे। रात-रात भर कहानियां सुनाते थे। भांड़ों का नाच होता था। इन सारी चीजों ने मन में कहानी के बीज बोए। मेरी नजर विचारधारा पर नहीं रही, जिंदगी पर ही रही।
जंगल जातकम पुरानी लोककथा का आभास देने वाली आधुनिक संवेदना की कहानी है। मनुष्य का प्रकृति के साथ सम्बन्ध बेहद विडम्बनापूर्ण है। मनुष्य प्रकृति की श्रेष्ठ रचना है और मनुष्य ही अपने उपभोग के लिए प्रकृति का दोहन करता है - दोहन की गति और मात्रा इतनी अधिक होती जा रही है कि न केवल प्रकृति और पृथ्वी पर संकट नजर आ रहा है अपितु इस दोहन के कारण मनुष्य का अस्तित्व ही संकटग्रस्त है। यह कहानी इस संकट की ही कथा है। कथा के केंद्र में घमोच, मनुष्य, कुल्हाड़े और बांस हैं। बात यह है कि स इलाके के जंगल में सब सामान्य - शांतिपूर्वक चल रहा था तभी एक शाम अचानक वहां घमोच आता है और उसके साथ कुल्हाड़ों की सेना है। कुल्हाड़े सिर्फ कुल्हाड़े हैं उनमें हत्था नहीं है। घमोच जंगल को साफ करना चाहता है, वह कुल्हाड़ों से कहता है - ‘बहादुरो ! यही वह बस्ती है जिसे हमें उजाडऩा है, खत्म करना है। हमें मनुष्यों के लिए मिल खड़ी करनी है, कारखाने बनाने हैं, कोयले की खान खोदनी है। ये निहत्थे पेड़, झाड़-झंखाड़ ! इनके लम्बे-चौड़े आकार से डरने की जरूरत नहीं। हमें जल्दी ही इनके वजूद को मिटा देना है... यह विकास के लिए आवश्यक कार्रवाई है जो जंगल या कहें प्रकृति के विध्वंस के साथ ही प्रारम्भ हो सकती है। मनुष्यों की आबादी लगातार बढ़ रही है और इस आबादी के लिए संसाधन चाहिए। लेकिन क्या इसके लिए विनाश आवश्यक है ? कोई दोस्ताना सम्बन्ध नहीं हो सकता ? इस द्वन्द्व पर दुनिया भर के माक्र्सवादी विचारकों-समूहों की समझ कभी एकमत नहीं हो सकी। काशीनाथ सिंह चूंकि अपनी कहानी के संस्कार लोक से ग्रहण करते हैं इसलिए उन्हें विकास का मनुष्यविरोधी चेहरा साफ दिखाई पड़ता है। उनके लिए सिद्धांत और दर्शन से ऊपर जीवन है। लोक से यह जीवन ऊर्जा ग्रहण कर रहा है। यह आकस्मिक नहीं है कि यहाँ न केवल जातक कथाओं का ढांचा है अपितु लोक की तरह यहाँ पेड़ बोल रहे हैं, कुल्हाड़े चीख रहे हैं और मुख्य पात्र का नाम भी घमोच है। पूर्वांचल में घमोच का आशय सिर्फ बहुत भारी आदमी से ही नहीं होता अपितु यह इस भारीपन के निहितार्थ हैं। कहानी में यह भारीपन असल में पूंजी का भारीपन बन जाता है। जिसका एकमात्र लक्ष्य मुनाफा, एकाधिकार और उपभोग है। इसकी दशा बहुत दर्शनीय है जिसका वर्णन पेड़ अपने मुखिया बूढ़े बरगद से कर रहे हैं - ‘‘हम उसके बारे में कुछ नहीं जानते !...सौम्य, उसके गाल इतने फूले हैं कि आँखें लुप्त हो गई हैं। उसकी लाद इतनी निकली है कि टाँगें अदृश्य हो गई हैं, उसके बदन का भार इतना अधिक है कि घोड़ा मेंढक हो गया है। हे सौम्य, ऐसे को मनुष्य नहीं कहते।’’ कहानी में आए पेड़ मनुष्यों और उसके जीवन के बारे में अधिक नहीं जानते, वे अपनी जिज्ञासाओं को बार बार बरगद के पास ले जाते हैं लेकिन जितना जानते हैं उसके आधार पर वे समझ गए हैं कि ऐसे को मनुष्य नहीं कहते। मनुष्य होने की गरिमा की सामान्य कसौटियां भी यह पूरा नहीं कर पा रहा है -  जो तोंददार और घमोच था, घोड़ेे पर बैठा था और उसकी वजह से घोड़ा टट्टू हो गया था, यहाँ तक कि उससे चला नहीं जा रहा था। उस घोड़े की बागडोर आगे-आगे चल रहे एक दूसरे जीव के हाथ में थी। ऐसा लगता था जैसे वह गाज फेंकते टट्टू समेत भारी-भरकम जीव को खींच रहा हो। घमोच सहित घोड़े को खींचने वाला मनुष्य है और ऊपर बैठा मनुष्य अब मनुष्य नहीं धन पशु हो गया है। यहाँ आगे इस धन पशु और पेड़ों के मध्य आए संवाद अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। पेड़ घमोच से कहते हैं -  ‘धन्य हैं श्रीमान, धन्य हैं। आपको घोड़ा खींच रहा है। आप समेत घोड़े को मनुष्य खींच रहा है फिर यह कैसे मान लें कि आप मनुष्य के हित के लिए यहाँ पधारे हैं ?’ अब इस बात पर कुछ कहना किसी धन पशु को कैसे गवारा हो सकता है? घमोच को भी नहीं होता। कहानीकार उसे पहचानता है और आगे का वर्णन है - गर्व से उन्मत्त घमोच ने मनुष्य की ओर देखा। मनुष्य घोड़े के जबड़े को सहलाते हुए बोला, ‘‘मैं साक्षी देता हूँ कि श्रीमान् सत्य कह रहे हैं।’’ अर्थात मनुष्य इस धन पशु का इतना पालतू बन चुका है कि वही अपने स्वामी की तरफ आए कटु सवाल का जवाब देकर खुद को धन्य महसूस कर रहा है। पेड़ समझ रहे हैं और उनका निष्कर्ष है - ‘‘हे भद्र, हमारे पूर्वजों और मनुष्यों का बड़ा ही अन्तरंग सम्बन्ध रहा है। उनके लिए हम अपने पुष्प, अपने बीच छिपी सारी सम्पदा, कन्द-मूल, फल, पशु-पक्षी सब कुछ निछावर कर चुके हैं और आज भी करने के लिए प्रस्तुत हैं। विश्वास करें, शुरू से ही कुछ ऐसा नाता रहा है कि हमें भी उनके बिना खास अच्छा नहीं लगता। जवाब में उन्होंने भी हमें भरपूर प्यार दिया है। लेकिन आप ?...हमें सन्देह है कि आप मनुष्य हैं !’’ पेड़ों का संदेह करना मनुष्यता के पक्ष में प्रकृति की गवाही है। यहाँ आपातकाल की छाया भी दिखाई दे जाती है जब पेड़ सीधे घमोच से पूछते हैं - ‘क्षमा करें श्रीमान। आप घोड़े पर हैं। आपके साथ कौवों सरीखी यह भारी फौज है। मनुष्य जब भी आए हैं, उन्होंने हमसे मदद ही माँगी है, कभी धमकी नहीं दी।...आप हमारे प्रश्न का उत्तर दें।’ घमोच इस प्रश्न पर दाँत भींचकर घोड़े की अयाल अपनी मु_ी में कस लेता है और कहता है - ‘मिट्टी और पानी के भुक्खड़ो ! कुछ सुनने के पहले यह जान लो कि अनर्गल प्रश्न का उत्तर देना मेरी आदत नहीं।’ असल में पहले ही घमोच ने फतवा जारी कर चुका है -‘हम मानवता के लिए आए हैं पेड़ों ! वापस नहीं जाएँगे।’ मनुष्य को गुलाम मानवता के लिए बनाया और अब प्रकृति का विध्वंस भी मानवता के खातिर। यह अद्भुत तर्क है जो बार बार लौटकर आता है। शासक इसी तर्क के सहारे हत्याओं को संगत ठहराते हैं। इसी तर्क के सहारे आदिवासी जंगलों से  धकेले जाते हैं। इसी आधार पर गुंडों और लम्पटों को राष्ट्र के सबसे सच्चे सेवक होने के प्रमाण पत्र जारी किये जाते हैं।
लेकिन यह विडम्बना नहीं है। विडम्बना यह है कि मारे जाने पर भी हत्यारों का समर्थन करते हैं। कहानी की संरचना में यह मध्य वर्ग है जो दो रूपों में आ रहा है। घमोच के घोड़े को खींचता और फिर पट्टनग्राम के बाँसों के रूप में। हरवंश भी कहानी में है और उसकी नियति चारा बन जाने में है। हरवंश जैसे लोग इसी बात में अपने जीवन की सार्थकता समझते हैं कि हत्यारे ने उससे हाथ मिलाया। याद कीजिये शोले का नायक न वीरू था, न जय और ठाकुर भी नहीं। वह गब्बर था जो हिंसा और अन्याय को स्थापित कर रहा था। आज के दौर में हत्यारों की पहचान कतई कठिन नहीं है लेकिन जो हत्यारों के साथ सेल्फी लेने के लिए बावले हुए जा रहे हैं उन्हें अपने आत्मघात को पहचानने की समझ देना अत्यंत कठिन है।
कहानी आगे बढ़ती है और बावजूद बूढ़े बरगद की धमकी - डाँट फटकार के घमोच अगले दिन जंगल की कटाई के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है। वह कुल्हाड़ों की बेचारगी जानता है कि बिना हत्थों के उनसे पेड़ नहीं कटेंगे तो इसके उपाय में पट्टनग्राम के बाँसों को साधता है। घमोच का प्रतिनिधि मनुष्य उन्हें समझा रहा है - ‘ हम आप लोगों को हाथोहाथ लेंगे। अपने घर, मकान, झोंपड़े में रखेंगे, बस्तियों में बसाएँगे, कहीं भी जाएँगे तो आपको अपने साथ ले जाएँगे...यहाँ न आप लोगों को दूसरों के आगे तनकर खड़ा होने का अधिकार है और न किसी को खड़ा होने के लिए एक बीते से ज्यादा जमीन दी गई है।...हाँ तो बोलिए, आप लोगों को हमारे कुल्हाड़ों का बेंट होना मंजूर है ?...ऐसी ही ढेर सारी बातें !...’ क्या ये बातें अनसुनी है? धर्म, जाति और क्षेत्र की अस्मिता के आधार पर विभाजन करती राजनीति की आवाजें इससे भिन्न है?
यह सही है कि आपातकाल की छाया में लिखी गई इस कहानी के केंद्र में पूंजी के वर्चस्व में प्रकृति के विध्वंस की चिंता है लेकिन आपातकालीन राजनीति की कालिमा यहाँ साफ साफ दिखाई दे रही है। फिर पर्यावरण हो या प्रेम; पूंजी और राजनीति का गठजोड़ - इनके स्वार्थ, इनकी भूख अनजानी नहीं है। यह कहानी बहुत छोटे कलेवर में इस प्रपंच को खोल रही है। कहानी का अंत बूढ़े बरगद के रूदन से होता है। वह कविता जैसी निम्न पंक्तियाँ सुनाते हुए रो पड़ता है -  
लेकिन जब पेड़ हाथ मिलाता है आदमी से
पेड़ के खिलाफ
लोहा लोहे के खिलाफ
आदमी आदमी के खिलाफ
सबके सब कटते हैं  
सुख के भोला बाबू याद आते हैं जिनकी चिंता डूबते सूरज के सौंदर्य से वंचित रह गए अपने स्वजनों के लिए है। यह चिंता जंगल जातकम में व्यापक और गहरी हुई है। पर्यावरण के सवाल आज विशव की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं और विकास की शाश्वत समझ ली गई अवधारणा को चुनौती दे रहे हैं। हिन्दी कहानी को गौरव है कि 1977 में इस जटिल दृश्य को एक रूपक के माध्यम से देखने-समझने की कोशिश की गई। बरगद से बात करता हुआ पेड़ घमोच और उसके कुल्हाड़ों से नहीं डर रहा है। वह कहता है  - मुझे उस पालतू मनुष्य से डर लग रहा है।