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Friday 24 Nov 2017

बिथोविन और मोजार्ट की धुनों का गुंजन है जहाँ- ऑस्ट्रिया


संतोष श्रीवास्तव

सी-1।1, स्नेह नगर
गर्वमेंट क्वार्टर्स, अपो. गर्व .पालिटिकल कालेज,
औरंगाबाद-431005
ऑस्ट्रिया शब्द मेरे मन में हलचल मचा रहा था। विश्व प्रसिद्ध संगीत की धुनें तैयार करने वाले बिथोविन और मोजार्ट ने यहीं पर संगीत में कमाल हासिल किया था। यहीं जर्मन भाषी ऑस्ट्रियाई लेखक स्टीफन स्वाइग ने उत्कृष्ट साहित्य रचा था। यहीं ऑस्ट्रिया का अंतिम बादशाह चाल्र्स और महारानी जीटा जो हैब्सबर्ग खानदान के थे, ने राज किया। यह खानदान पीढ़ी दर पीढ़ी सात सौ बरसों तक शासन करने के लिए प्रसिद्ध था। उन दिनों स्कूलों में काइजर गीत गाये जाते थे।
ऑस्ट्रिया के बॉर्डर पर हमारे पासपोर्ट की चैकिंग हुई। बहुत फुर्तीले थे पासपोर्ट अधिकारी। मिनटों में काम निपटाकर उन्होंने मुस्कुराते हुए हमें अलविदा कहा। ऑस्ट्रिया में 1964 से 76 तक इन्सब्रुक शहर में नेशनल गेम्स आयोजित किये गये थे। इन्स नामक नदी के किनारे बसा होने के कारण इस शहर का नाम इन्सब्रुक है। यह स्की के लिए प्रसिद्ध है। 32,389 स्क्वेयर माइल में बसे ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना है। आबादी ।.6 मिलियन। पूरा देश नौ प्रॉविंस (राज्यों) में बँटा है। मुख्य व्यवसाय टेक्सटाइल और लकड़ी का है। चालीस प्रतिशत टैक्स हर चीज पर लिया जाता है। जर्मन और अंग्रेजी भाषा बोली जाती है। बेहद खूबसूरत जंगलों, पहाड़ों, नदियों, झीलों के बीच बसे ऑस्ट्रिया के कोहरे भरे मौसम और ठंडी हवाओं ने मन मोह लिया। दो ट्रेक वाली सडक़ के किनारे हरी एस्बेस्टस दीवार का लम्बा सिलसिला स्विट्जरलैंड जैसा लगा। मनुष्य भले ही सीमाओं में बँट जाए पर प्रकृति नहीं बँटती। प्रकृति ने अपना सौंदर्य लुटाने में कोई भेदभाव नहीं बरता। जैसा स्विट्जरलैंड वैसा ही ऑस्ट्रिया। दस किमी लम्बी सेंट एंथोनी टनल से गुजरते हुए अंदर कतार से लगी लाल लाइट्स पर बरबस नजरें टिक जाती हैं। टनल के बाद रिफ्रेशमेंट के लिए कोच ट्रोफाना टिरॉल में रुकी। यूरोप का नियम है हर दो घंटे की ड्राइविंग के बाद आधा घंटा ड्राइवर का सुस्ताना जरूरी है। यूरोप यात्रा का यह तीसरा देश है मेरा। अभी तक जिस एक बात ने पग-पग पर मेरा ध्यान खींचा है वह है यहाँ की सफाई, प्रदूषण के प्रति जागरूकता। यहाँ के वासी अपने देश को उतना ही प्रेम करते हैं जितना अपने घरों को। इसीलिए घरों की तरह की साफ सुथरे, सजे-धजे मोहित कर देने वाले स्थल हैं सारे। भारत की तरह सडक़ों के किनारे खड़े होकर मैंने किसी को पेशाब करते नहीं देखा। यह बड़ा संगीन जुर्म माना जाता है अपने देश के सार्वजनिक स्थलों को दूषित करना। उसके लिए हर मील पर आधुनिक सुविधाओं से पूर्ण टॉयलेट बने हैं।
ट्रोफाना टिरॉल के पेट्रोल पंप की बनावट बड़ी शानदार थी। विशाल शॉपिंग लाउंज में ऊपर कतार में टंगी तीन-तीन के गुच्छों में कच्ची भुनी, अधभुनी मकई के भुट्टे और फूलों के चक्र लटके हुए थे। रिफ्रेशमेंट के बाद फिर कोच रवाना हुई। रास्ते में स्की जंप ट्रेनिंग सेंटर मिले। ठंड में लोग यहाँ स्की के लिए आते हैं। पहाड़ों पर ताजी गिरी बर्फ थी। ताजी बर्फ में चमक होती है। वर्गिस पहाड़ पर ओलम्पिक स्टेडियम था। स्टेडियम में चालीस हजार लोग बैठ सकते हैं। पत्रकारों और मीडिया से जुड़े लोगों के लिए अलग-अलग बैठने को स्थान है। मैं देख रही हूँ स्टेडियम की ओर जाते पहाड़ पर बने तीन हरे रास्ते..... मानो हरे कार्पेट बिछे हों। मुझे अपने देश की पगडंडियाँ याद आ गईं और पगडंडियों के संग हवा में घुल आई सरसों, मटर की महक..... पल भर को मैं खुद को भुला बैठी।
इन्सब्रुक में 14 वीं से 17 वीं शताब्दी में बने मकान, इमारतें आज भी सुरक्षित हैं। लेकिन हर दूसरा मकान पहले मकान के रंग से मेल नहीं खाता। मकानों की ऐसी इन्द्रधनुषी छटा पर मैं मुग्ध हो गई। सडक़ें भी 1।वीं सदी की बनी हैं। स्लेटी पत्थरों से जड़ी। उन्हें उसी रूप में आज भी सँवारा जाता है। सामने था ट्रंपल आर्च। आर्च के उस तरफ की मूर्तियों के चेहरे खुश नजर आ रहे थे, इस तरफ के उदास।
स्पेन के राजा की लडक़ी के साथ ऑस्ट्रिया की रानी मारिया थिरीस के लडक़े की शादी तय हुई थी। लेकिन सगाई के दिन ही राजा की मृत्यु हो गई। खुशी और गम का प्रतीक है ये आर्च। अजय के बताने पर मैंने कलाकार की कला को नमन किया जिसने भावनाओं का अक्स पत्थरों पर उतार दिया था। उसी के पाश्र्व में सुनहले रंग का महल है जो नोबल फैमिली के टोन एन्ड टैक्सी ने बनवाया था। गोल्डने सडाखल रूफ गॉथिक शैली में बना अनानास के छिलकों जैसी पीतल और ताँबे की खिड़कियों वाला था। मैकमिलन बहुत ही रोमांटिक था और अपनी गॉथिक शैली की बनी बाल्कनी में बैठकर विभिन्न खेलों का आनन्द लेता था। उसकी बेहद खूबसूरत दो बीवियाँ थीं। दोनों की मूर्तियाँ राजा की मूर्ति के आजू-बाजू थीं। किंग लिओपोर्ड की पाँच मूर्तियों वाला बना फव्वारा, सेंट एन्स कॉलम तथा हाईब्लींग हाउस। एक इमारत तो ऐसी दिख रही थी जैसे ईसाईयों की शादी का केक। उस पर कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था। इन्सब्रुक ऐतिहासिक शहर है लेकिन जहाँ ये ऐतिहासिक इमारतें हैं वह पुराना शहर कहलाता है। सडक़ पार करते ही नया शहर शुरू हो जाता है। जैसे सपनों में सैर करते-करते नई सुबह में आँख खुल जाए। सामने एक चौक था जहाँ सारे राष्ट्रीय कार्यक्रम होते हैं, परेड होती है। वहीं डॉल म्यू?ियम है। अब भूख लग आई थी। अजय हमें ‘साहिब’ नाम के भारतीय रेस्तरां में ले आये जहाँ हमें डिनर लेना था। रात के आठ बज रहे थे। सडक़ों पर धूप और बिजली के संगम में ऑस्ट्रियाई औरतों के चेहरे संगमरमरी नजर आ रहे थे। रात हमने होटल ‘बॉन अल्पिना’ में बिताई। सुबह तरोताजा होकर बाल्कनी में आकर खड़ी हो गई। रात भर बारिश हुई थी, सडक़ें गीली थीं पर अभी आसमान साफ था। अचानक बाजू वाले चर्च से घंटे बजने लगे। चर्च की इमारत पर सुनहले काँटों की बड़ी सी नीली घड़ी लगी थी। ओक का पेड़ हवा में झूम रहा था। दाहिनी ओर बहुत सारी टाइल्स वाले टेरेस वाले घर थे। टेरेस पर पत्थर और कंकरीट क्यों बिछा था यह मेरी समझ में नहीं आया। चर्च से आते प्रार्थना के हल्के हल्के स्वर सुन मेरे हाथ जुड़ गये, आँखें मूंद गईं... तभी इंटरकॉम पर सूचना मिली – रिसेप्शन में आपसे कोई मिलने आये हैं। यहाँ मेरी सखी वनिता और उसके पति दिनेश रहते हैं। दोनों पढ़ाई के बाद शादी होते ही यहाँ आ बसे थे लेकिन हिन्दी के लिए वे अब भी काम कर रहे हैं। वनिता कवयित्री है और दिनेश खुद गज़़लें लिखते हैं, खुद कम्पोज करते हैं। दो साहित्यिक पत्रिकाओं से भी जुड़े हैं ये जो विदेश में फैले भारतीय परिवारों के बीच एक भावनात्मक रिश्ता जोडऩे के लिए निकाली जाती हैं और ‘पेन हिन्दुइजम’ को फैलाने का प्रयास करती हैं। रिसेप्शन में बैठी वनिता चहककर उठी और गले लगकर रो पड़ी – कितने दिनों बाद मिल रहे हैं हम। दिनों नहीं बरसों..... इस बीच मेरा हेमंत चला गया।  मेरे भी आँसू उसका कंधा भिगोने लगे। दिनेश अजय से हमारे कार्यक्रम की जानकारी ले रहे थे। तय हुआ कि म्यूजियम देखने के बाद अजय मुझे वनिता के घर लेकर जाएँगे। वहीं डिनर होगा हमारा।
      नाश्ता हमने साथ किया। रास्ते में दिनेश और वनिता को उनके घर छोड़ते हुए हम स्वरोस्की क्रिस्टल म्यूजियम देखने रवाना हुए जो वाटन्स में है। चेकोस्लोवाकिया से स्वरोस्की नाम का युवक जब ऑस्ट्रिया आया तो उसने यह जान लिया था कि वाटन्स के पहाड़ों में हीरे जैसी चमक, रूप, रंगवाला क्रिस्टल मौजूद है। क्रिस्टल को तराश कर आभूषण और सजावट की चीजों का उसने व्यापार शुरू कर दिया और अरबपति बन गया। जब हम म्यूजियम पहुँचे तो पार्किंग प्लेस पर जॉर्जेट के सिलेटी झंडे लहरा रहे थे। जो दर्जनों की संख्या में थे। उन झंडों पर स्वरोस्की लिखा था रोमन लिपि में। सामने एक हरी घास से भरे पहाड़ पर बड़ा सा हरा मानव सिर बना था। आँख की जगह बड़े बड़े दो क्रिस्टल लगे थे और मुँह से पानी निकल रहा था जो एक बड़े से जलाशय में गिर रहा था। आसपास जड़ी चार सफेद चट्टानों से भी पानी की पिचकारी बुलेट की तरह छूटती और जलाशय में जाकर गिर जाती। प्रवेश द्वार पर ही मैंने गौर किया कि पहाड़ की जिस घास को मैं असली समझ रही थी वह प्लास्टिक की थी। अन्दर दो मंजिल का म्यूजियम है जिसमें कई प्रकार के आभूषण, जानवर, कमरे की छत पर लगाने वाले झूमर सब क्रिस्टल से बने लाइट में जगर मगर कर रहे थे। मैं पूरा म्यूजियम घूमकर सोफे पर जा बैठी। लोग खरीदी कर रहे थे। मेरा हेमंत होता तो मैं भी अपनी होने वाली बहू स्वाति के लिए कुछ खरीदती पर विधाता ने मुझे इस सुख से वंचित कर दिया।
      सभी को उनकी मनमानी जगहों पर छोड़ हम वनिता के घर आ गये। वनिता का बंगला गुडिय़ों की कहानी जैसा रंग बिरंगा, सजा धजा और खिले फूलों की क्यारियों वाले बगीचे वाला था। गेट पर लाल पत्तियों का सदाबहार पेड़ पहरेदार सा खड़ा था। लॉन पर दो सफेद पालतू बिल्लियाँ उछलकूद मचा रही थी। वनिता खाना बनाने में जुटी थी, दिनेश सलाद काट रहा था और दोनों बेटियाँ टेबिल लगा रही थीं- यहाँ नौकर नहीं होते। सब काम हाथ से ही करना पड़ता है। ऑफिस से लौटकर मैं और वनिता दोनों बेटियों से घर का काम निपटाते हुए हिन्दी में ही बात करते हैं। बताया दिनेश ने। तभी तो यहाँ पैदा हुई दोनों लड़कियाँ हिन्दी अच्छा बोल लेती हैं। मेरा अनुभव है कि विदेश में बसा हर अप्रवासी भारतीय हम से अधिक भारतीय है। भारतीय भोजन और बेहतरीन गज़़लों के बीच शाम गुजार कर हम होटल लौटे। सभी कार से हमें होटल छोडऩे आये। मेरी असुविधा है कि यहाँ पीने का पानी बाथरूम के वॉशबेसिन सी ही लेना पड़ता है।
-यहाँ नलों में आने वाला सारा पानी ही पीने का पानी है स्वच्छ और कई बार स्वच्छ होने की प्रक्रिया से गुजरा हुआ। आपको आदत डालनी होगी- कहकर दिनेश हँस पड़ा।
चूँकि साल्जबर्ग पहुँचने में छ: सात घंटे तो लग ही जाएँगे हम अलस्सुबह ही बोरिया बिस्तर बाँध निकल पड़े। साल्जबर्ग में ऑस्ट्रियन लेखक स्टीफन स्वाइग ने कई वर्ष गुजारे थे और मेरे लिए यह सोच अद्भुत रोमांचकारी थी कि मैं उन जगहों पर चलूँगी जहाँ कभी स्टीफऩ चले होंगे। अजय बताते हैं कि साल्जबर्ग सबसे खूबसूरत जगह है। वहाँ नाटकों के लिए बहुत स्पेस है। कई असरदार नाटक वहाँ खेले जा चुके हैं। पिछले दिनों कालिदास की शकुन्तला भी मंचित की गई, सुनकर मैं रोमांच से भर उठी। आखिर बहुप्रतीक्षित साल्जबर्ग आ ही गया। आल्प्स पर्वत की वादियों में बसा..... कोहरे की चादर ओढ़े। भीगा भीगा सा.....फूलों की रंगीन बिछावन ने साल्जबर्ग को जैसे अपने में समेट लिया हो।...... अलसाये सौंदर्य और रूमानियत से भरा साल्जबर्ग मेरी आँखों के सामने था। पल भर को मैं चित्रित सी हो गई।
यह वर्शेटस गार्डन है..... यहां हिटलर सबसे छिप कर रहा है- अजय के कहने पर मैं हँस पड़ी-तानाशाह हिटलर को भी कहां कहां छुपना पड़ा.....कभी ब्लैक फॉरेस्ट में तो कभी वर्शेटस गार्डन में।
ठंडी बयार चल रही थी। हम स्टीफन स्वाइग के मकान के सामने थे। यह मकान 17 वीं सदी के एक आर्च बिशप की शिकारगाह था। आल्प्स पर्वत की ही एक ढलवाँ चोटी पर बना नौ कमरों, गलियारों और विशाल खंभों वाला यह भव्य मकान किसी किले से कम न था। कहते हैं 18वीं सदी में बादशाह फ्रांसिस भी इस मकान में कई दिन रुका था और उसने यहाँ के गलियारों का आकार बढ़वाया था। पास ही एक 17 वीं सदी का गिरिजाघर भी था। सीढिय़ाँ चढक़र टैरेस पर पहुँचते ही ऑस्ट्रिया की भव्य प्रकृति आँखों को बहुत ठंडक देती थी। मकान के सामने सुरक्षा अधिकारी खड़ा था। पूछने पर उसने स्टीफऩ स्वाइग का पूरा इतिहास बयान कर दिया। उसने बड़े गर्व से हमारे साथ फोटो खिंचवाई और बताया कि उसे इस बात पर नाज है कि स्टीफन ऑस्ट्रियाई थे परन्तु इस बात पर नाराजगी है कि उन्होंने आत्महत्या कर ली लेखक को कभी अपने दुख दर्द नहीं देखने चाहिए..... वह तो दूसरों के दुख दर्द अपनी कलम से बाँटने के लिए पैदा होता है।
मैं उस साधारण से व्यक्ति की झील सी गहरी नीली आँखों की गहराई को नापने में असमर्थ थी। पहली बार अपने लेखक होने पर थोड़ा सा गर्व हुआ। थोड़ा सा यूँ लगा जैसे इस भव्य कर्म का एक सिरा मेरी कलम से भी तो जुड़ा है। मैं भी उसका एक हिस्सा हूँ।