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Friday 24 Nov 2017

पाव पर भारी पांव


के.पी. सक्सेना ‘दूसरे’
संस्कृति भवन मार्ग
टाटीबंध, रायपुर
(छग) 492099
 मो. 9584025175
ऐसा भला कहीं हो सकता था कि राजधानी में कोई साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित हो और उसमें स्वनामधन्य विद्यावाचस्पति पंडित विद्यासागर के दर्शन न हों ! वे न केवल शहरए अपितु प्रदेश के स्थापित साहित्यकार थेए बल्कि उनके शिष्य तो उन्हें कब का राष्ट्रीय स्तर का घोषित कर चुके थे। इधर उन्हीं के श्रीमुख से ज्ञात हुआ था कि उन्हें अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्थान संस्थान की ओर से जिनेवा सम्मेलन में जाने का आमंत्रण मिलना था किंतु सत्ता परिवर्तन से  सारा गुड़ गोबर हो गया और हमें लगा कि गुड़ गोबर होने से बच गया क्योंकि पहले तो अंतरराष्ट्रीय कहते-कहते ही उनकी जवान कई बार र में अटक जाती थी, किंतु अब बस लिखते समय ही र का दुरुपयोग कर बैठते हैं।
 इस पर उनका साफ  कहना है, वो क्या करें ! ये मुआ र है ही ऐसा, लीजिए बात हिंदी के र की चली और हम लगे अंग्रेजी को गरियाने। बस यही हम भारतीयों की बात उनको अच्छी नहीं लगती। अरे अंग्रेजी हमारी कोई फादरटंग थोड़े न है। पर करें क्या ! परनिंदा के सुख जैसा कोई और सुख है ही नहीं। ये तो गोसॉईं जी तक कह गए हैं ! हां तो मै कह रहा था कि पंडित विद्यासागर अगर अंतरराष्ट्रीय लिखने में लडख़ड़ा जाते हैं तो ये मत समझिएगा उनका हाथ हिंदी में भी तंग है। अलबत्ता ये कसूर र का है। र है ही इतना उद्दंड, उसको जब भी आधा लिखने की कोशिश करेंगे कभी एक चाल नहीं चलेगा ! पृथवी लिखो तो प के नीचे लटक जाएगा निर्माता में म के सर पर चढ़ जाएगा। क्रीड़ा में जहां अपनी एक टांग तिरछी लगाएगा वहीं ट्राली में दोनों और र को छोडिय़े, स और ष के उच्चारण में तो वे बाकायदा शास्त्रार्थ करने को तैयार हो जायेंगे। गोसाईं जी की रामायण लेकर सामने  खडे हो जाएंगे और पूछ बैठेंगे कि इसमें श का कहां प्रयोग हुआ है, जरा दिखाइए तो !
लोग नाहक अंग्रेजी की खिल्ली उड़ाते रहते हैं कि  पी यू टी का उच्चारण अगर पुट है तो बी यू टी का बुट क्यों नही ! नालेज या निमोनिया की स्पेलिंग में जबरन ऐसे वड्र्स डालने का क्या सबब, जब उन्हें उच्चारित ही नहीं करना ! और तो और  अब केमिस्ट्री या केमिकल को ही ले लो, शुरू सी से करते हैं और बोलते के से हैं ! भैया अगर क से इतना ही मोह है तो स्पेलिंग में के क्यों नहीं कर देते! ऐसा करने से कौन सा आल्पस पर्वत छोटा हो जाता!  बल्कि बच्चों को ही स्पेलिंग रटने में सुविधा हो जाती।
खैर, छोडि़ए इस बहस को भाषा विज्ञानियों के लिए, अब उनकी भी तो रोजी-रोटी इन्हीं सब बारीक मुरकियों से लगी है। ऐसा मेरा नहीं, पंडित जी का कहना है। सब कुछ सीधा सरल बना देंगे तो कौन उन्हें सेंटेगा ! वो क्या शोध करेंगे या कराएंगे? विद्यार्थियों को डॉक्ट्रेट काहे में कराएंगे !
हां ! तो बात यहां से चली थी कि यदि आयोजन में पंडित जी अध्यक्ष या मुख्य अतिथि की आसंदी पर स्थापित नहीं दीख पड़ते तो वह आयोजन किसी भी दृष्टि से स्तरीय मानक का नहीं माना जाता। ऐसा तय है। फलस्वरूप जब कॉफी हाउस में एक दिन एक नए-नए व्यंग्य में पैठ जमा रहे लेखक की मुश्किल से छपी पुस्तक के विमोचन की बात उठी तो शुभचिंतकों ने उससे एकमतेन यही कहा।
बेटा, अगर इसी सागर में गोते लगाने का मन बना लिया है तो गंडा ताबीज पंडित जी से ही बंधवा। यानी किताब उन्हीं से विमोचित करवा ले!
अब कोई भी लेखक वैसे चाहे जितना भी इगोस्टिक हो, बात जब अपनी रचना की आती है तो वह अक्सर कछुआ या केंचुआ सा हो जाता है और यही उस निरीह जीव के साथ भी हुआ। बावजूद इस सत्य के कि उसे विद्यासागर की विद्वत्ता का सारा इतिहास पता था कि कैसे पत्राचार से प्राप्त उपाधियां, सुदूर पूर्वोत्तर के किसी विश्वविद्यालय से प्रायोजित कोविद या विद्याविशारद जैसा कोई प्रमाण पत्र तथा दक्कन के किसी संस्थान से डॉक्ट्रेट, जिसमें विद्यार्थियों की भौतिक उपस्थिति तक वांछित नहींरहती, हथिया कर वो आज स्थानीय विश्वविद्यालय की सर्वशक्तिमान सलाहकार समिति की एक विशेष हस्ती बन  चुके हैं।
 अभी कुछ वर्ष पूर्व ही देश में ऐसी कई संस्थाएं कुकुरमुत्ते की तरह उग आई थीं। हमारे ही शहर ने लगभग 102 यूनीवर्सिटी खुलने और बंद होने का रिकार्ड बनाया था। बस समझ लीजिए तभी की उपज से उपजे थे ये पं विद्यासागर जी, जो अब तक तो अपने हाथ के नीचे से कई डॉक्टर निकाल चुके थे, पर ये निरीह जीव मरता क्या न करता वाली कहावत को मन ही मन स्मरण करता हुआ आखिर एक दिन पंडित जी की चौखट पर लम्बवत हो ही गया।
गिड़गिड़ाहट को भांपते हुए, अत्यधिक व्यस्तता के बावजूद पं जी ने उसकी पुस्तक को विमोचित करने का भार स्वीकार कर उसे उपकृत कर दिया। आश्वासन से गदगद लेखक, अपनी व्यंग्य आलेखों पर संकलित पुस्तक एक पाव की कहानी की एक प्रति अनुशीलनार्थ सौंप कर गंगा नहाया जैसी अनुभूति को प्राप्त हुआ।
निर्धारित तिथि की पूर्व संध्या पर लेखक ने पंडित जी को दुबारा अगले दिन के आतिथ्यभार की याद दिलाने का अपना धर्म  निभाया साथ ही यह अनुनय करने से नहीं चूका कि यदि वे पहले ही एक नजर  पुस्तक पर डाल लेंगे तो श्रोता उनके ज्ञान का भरपूर लाभ उठाने के साथ साथ पुस्तक में निहित संदेश भी सरल एवं सहज भाव से समझ सकेंगे।
दूसरे दिन, स्थापित परिपाटी के अनुसार नियत समय पर मात्र दो सज्जन उस छोटे से हॉल में मौजूद थे, पहला गरीब लेखक और दूसरे अपरिचित से बुजुर्ग हो चले एक महापुरुष दूसरे ने पहले को स्वयं यह कहकर अपना परिचय दिया कि वे फलाने महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य हैं और कार्यक्रम की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किए गए हैं। लेखक ने अपनी अल्पज्ञता पर क्षमा मांगी, क्योंकि वह उनसे कदापि परिचित न था और उन्हें किसी माध्यम के रिफरेंस से आमंत्रित कर लिया गया था, खैर! अब वह उन्हें बैठने को कह ,मोबाइल पर माइकवाले को शीघ्र आने के लिए डांटने में व्यस्त हो गया।
 लगभग घंटे भर बाद आधे हॉल में लोग इस तरह प्रकट होकर मंडराने लगे कि हॉल अपनी बेहाली को छुपाने का प्रयास करने लगा। अब लेखक को लगा कि यदि और देर हुई तो जो आ चुके हैं वो भी जाना न शुरू कर दें। उसने पंडित जी को मोबाइल से सम्पर्क किया उधर से पीए का त्वरित जवाब आया-
 हॉल भर जाय तो सूचना दें। पंडितजी तैयार बैठे हैं।
पीए का यह जवाब सुनकर तो निरीह प्राणी की फंूक ही निकल गई। ये तो न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेंगी वाली बात हो गई। भागकर लेखक ने यह  समाचार अपने उस सहयोगी से  बताया जो अक्सर ऐसे आयोजन का मास्टर माइंड कहलाता था। उसने पलक झपकते ही इसका निराकरण कर दिया। वह बोला कह दो कि हॉल भर गया है और यदि ज्यादा देर की तो लोग वापस जाना शुरू कर देंगे क्योंकि शहर में एक जगह मंत्री जी का कोई आयोजन है, जहां भोजन का भी प्रावधान है अत: ये लोग वहां जाने  के लिए उतावले हो रहे हैं। अब यह तो सभी जानते हैं कि जिस तरह भाषण किसी भी पार्टी का हो, भीड़ के चेहरे तो वही रहते हैं। पंडित जी भी इस कटु सत्य से वाकिफ  थे अत: कुछ ही देर में भय प्रकट कृपाला हो गए।
मंच पर अध्यक्ष, मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि के स्थापित होते ही सरस्वती वंदना के लिए सर्वसुलभ सुश्री कुमुदनी ने कैमरा मैनों को अपना सुर कम पोज़ दिया और कार्यक्रम चल निकला। पत्रकार और कैमरामैन अब तक इसलिए शेष थे कि एक तो उन्हें आगे जिस प्रोग्राम में जाना था वह मंत्री जी का था, तो वहां समय से पहुंचने का कोई मतलब ही नहीं था और दूसरे यहां अब कोल्ड ड्रिंक के बाद गरम समोसे की महक आने  लगी  थी।
बहुप्रतीक्षित वह शुभ घड़ी आई और एक पाव की कहानी का विमोचन सम्पन्न हुआ विभिन्न कोणों से फोटो सेशन और वांछित औपकचारिकताओं के बाद मुख्य अतिथि जो पूरे आयोजन के दौरान या तो झपकियां लेते रहे या पड़ोस में बात करते रहे थे, अपने उद्बोधन के लिए खड़े हुए, अब जैसा कि प्राय: होता है इतने बड़े साहित्यकार को इतना समय कहां मिला था कि वह  अदने से नवलेखक की पुस्तक खोलने का समय निकाले, सो उन्होंने इस सिद्धांत के मद्देनजर कि हाँडी का एक चावल टटोलना ही काफी होता है, एक नजर पुस्तक के शीर्षक पर डाली और शुरू हो गए।
पहले आधे घंटे तक आजकल लिखे जा रहे साहित्य पर धारा प्रवाह  बोलने के बाद बड़े सकुचाकर यह कहते हुए कि ऐसे अवसरों पर सरस्वती, साक्षात उनकी जिव्हा पर आ विराजती हैं, कहा- मित्रो, इस पुस्तक का शीर्षक स्वयं में इतना समर्थ है कि सारी बात एक संकेत में कह जाता है। अरे शारीरिक विकलांगता भी कोई विकलांगता है? असल बात है जज्बा! एक पांव ही काफी है मंजिल पाने के लिए..बशर्ते इरादा पक्का हो। दो पांवों से चले तो क्या तीर  मारा ! चलो तो ऐसे कि जमाना तुम्हारे पदचिन्हों पर चलने के लिए लालायित  हो  उठे। याद करे और इस नवोदित लेखक में भी मुझे ऐसी सम्भावनाएं नजर आ रही हैं। अत: आप इस लेखक को नहीं, इसके रचना धर्म को प्रोत्साहित करें जिससे इसका लेखन समाज के लिए एक मिशाल बन सके।
तालियों की गडग़ड़ाहट के बीच समारोह जब सम्पन्न हो गया तो लेखक एक कोने में सर पकड़े बैठा मिला। उसका कहना था कि पुस्तक पांव पर नहीं पाव पर थी, वह पाव जो मुम्बई का वड़ा पाव कहलाता है। वह पाव जो कभी सेर का चौथाई होता था, वह पाव।