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Thursday 23 Nov 2017

दर्पण है प्रत्येक गज़़ल


चंद्रभान भारद्वाज
672, साईं कृपा कॉलोनी
बॉम्बे हास्पीटल के पास
इंदौर (म प्र)452010
मो. 09826025016

एक बहर पर एक गज़़ल डॉ. ब्रह्मजीत गौतम का नवीनतम गज़़ल-संग्रह है।  इससे पहले उनकी गद्य और पद्य दोनों विधाओं में आठ कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें वक्त के मंजऱ एक गज़़ल संग्रह भी है। इस प्रकार एक बहर पर एक गज़़ल इनका दूसरा गज़़ल-संग्रह है। डॉ. ब्रह्मजीत गौतम मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षाविभाग में हिंदी के प्राध्यापक रहे हैं। वे हिंदी काव्य-विधा के निष्णात विद्वान ही नहीं, वरन उर्दू गज़़ल के अरूज में भी उन्हें महारत प्राप्त है। यही कारण है कि  उन्होंने अपने प्रस्तुत गज़़ल संग्रह में न केवल एक बहर पर एक गज़़ल लिखी है, वरन उस बहर के अरकान लिख कर उस बहर के समतुल्य हिंदी के छंद का भी उल्लेख किया है। वैसे उर्दू के छंद शास्त्र (अरूज) में सौ से भी अधिक बहरों का वर्णन मिलता है। लेकिन उनमें अधिकतर ऐसी बहरें हैं, जो उर्दू या हिंदी भाषा की प्रकृति के कारण इनकी रचना इन भाषाओं से मेल नहीं खाती। अत: एक बहर पर एक गज़़ल में वर्णित 65 बहरें वे ही बहरें हैं, जो प्रचलन में हैं। यद्यपि इन 65 बहरों में से भी अधिकतर ज्यादा प्रचलन में नहीं हैं, लेकिन अध्ययन और ज्ञानवर्धन की दृष्टि से ये महत्वपूर्ण हैं तथा डॉ. ब्रह्मजीत गौतम ने इनका उल्लेख करके एक प्रशंसनीय कार्य किया है, जो नवोदित गज़़लकारों के लिए तथा शोध के विद्यार्थियों के लिए मार्गदर्शन का कार्य करेगा।
उर्दू गज़़ल अपनी परिपक्व अवस्था में है जबकि हिंदी में गज़़ल लेखन अपनी प्रारंभिक अवस्था से ही गुजर रहा है। उर्दू में उस्ताद और शागिर्द की परंपरा रही है। वहाँ कोई भी गज़़लकार बिना उस्ताद के गज़़ल-लेखन में पदार्पण नहीं करता लेकिन हिंदी गज़़ल-लेखन में ऐसी किसी प्रथा का प्रचलन नहीं है। हिंदी में गज़़ल लेखन बिना यथेष्ट मार्गदर्शन के प्रारम्भ हुआ है, इस कारण हिंदी गज़़ल-लेखन अधिकतर दोषपूर्ण रहा और इसी कारण उसे आलोचना का भी शिकार होना पड़ा है। अरूज के पर्याप्त ज्ञान के बिना तथा यथेष्ट मार्गदर्शन के बिना लिखी गईं गज़़लें उपहास का कारण भी बनीं। असल में गज़़ल लिखने और गज़़लकार कहलाने के लिए गज़़ल के छंदशास्त्र (अरूज) का पर्याप्त ज्ञान तथा उसका अक्षरश: ईमानदारी से अनुपालन करना नितांत आवश्यक है। समकालीन गज़़ल विधा को समर्पित डॉ. गौतम के  प्रस्तुत गज़़ल-संग्रह की गज़़लें केवल छान्दसिक कसौटी पर ही खरी नहीं उतरतीं, वरन समसामयिक समस्याओं, सामाजिक और मानवीय सरोकारों, राजनैतिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सन्दर्भों पर भी अपनी पैनी दृष्टि डालती हैं। इसके उदाहरण स्वरुप निम्न शेर देखें जो स्वयं इन स्थितियों का उल्लेख करते हैं-
 
हमारी तुम्हारी सभी की व्यथा
समेटे हुए है गज़़ल सर्वथा
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महल का सफर छोड़ कर आजकल
    गज़़ल कह रही है कुटी की कथा
****
सियासत में रहकर बड़े बन गए
न लें आप इस बात को अन्यथा
****
आज के राजनेताओं की आम सभा के लिए भीड़ एकत्र करना भी ठेके का काम हो गया है, क्योंकि इन नेताओं की ऐसी मान्यता है कि जितनी ज्यादा भीड़ उतने ही वे शायद अधिक विख्यात हैं। इस किराये की भीड़ को न नेता से कुछ लेना-देना है और न उन आम सभाओं से। इस स्थिति को बड़े ही रोचक अंदाज में निम्न शेरों में रेखांकित किया गया है, देखें:
 फिक्र छोड़ आप मंच पर पधारियेगा
 भीड़ का बखूबी इंतजाम हम करेंगे
जो भी कोई आपकी मुखालफत करेगा
कीजिये यकीं उसे तमाम हम करेंगे
 
राजनैतिक परिस्थितियों को उद्घाटित करते कुछ और शेर देखें -
 
राजनीति में तो अब राज है न नीति है
नायकों को फिर हो क्यों फिक्र लोक-लाज की
****
कैसे ऐसे तंत्र को लोकतंत्र हम कहें
जिसमें सबको फिक्र है सिर्फ अपने ताज की
 ****
जाति, मजहब के नाम पर
नित्य होते वबाल हैं

प्रभु-भरोसे है देश वह
आप जिसके दलाल हैं
 
आज सामाजिक वातावरण इस कदर दूषित और विडंबनाओं से परिपूर्ण है कि आम आदमी का जीना दूभर हो गया है। वह न तो घर में अपने को सुरक्षित अनुभव करता है और न बाहर। गुंडागिरी अपनी चरम स्थिति में है। लूट, हत्या, डकैती आज समाज में एक साधारण घटना बन कर रह गई है। किसी को भी व्यवस्था या कानून का कोई डर नहीं है। कहना गलत न होगा कि इस गुंडागर्दी की पीठ पर भी कहीं न कहीं राजनीति और व्यवस्था का हाथ रहता है। इन स्थितियों को दर्शाते डॉ. गौतम के कुछ शेर देखें-
 
घिर गईं आकाश में काली घटायें
और धरती पर तमस छाया घना है

बिजलियाँ भी आँख दिखलाने लगी हैं
घर, डगर में घोर सन्नाटा तना है
 
क्या करें असहाय राजा और मंत्री
क्रूर काली शक्तियों से सामना है
 

मंच पर तो आप करते हैं उसूलों की वकालत
किन्तु रखते हैं दुनाली लोग ऐसा कह रहे हैं
 
खेल का सामान अथवा युद्ध सामग्री खरीदें
आप खाते  हैं दलाली लोग ऐसा कह रहे हैं
 
यह प्राकृतिक नियम है जब तक पुरानी पीढ़ी द्वारा स्थान रिक्त नहीं किया जाता, तब तक नई पीढ़ी अपना अस्तित्व स्थापित नहीं कर पाती। पुरानी परम्पराओं और रूढिय़ों को तोड़ कर ही नई राहें और परंपराएँ स्थापित होती हैं। इस प्राकृतिक नियम को इन गज़़लों में खिजाँ पेड़ और बहार के प्रतीकों  के माध्यम से बड़े ही सुंदर ढंग से व्याख्यायित किया है। देखें-
 खिजां में जब तलक पेड़ों से पत्ते गिर नहीं जाते
बहारें लाख मचलें पर नए पत्ते नहीं आते
नया रचना है तो मिटना जरूरी है पुराने का
नियम कुदरत का यह व्यवहार में हम क्यों नहीं लाते
आज देश के पूरे रंगमंच पर राजनीति और धर्म के क्षेत्र में जिस अपराधीकरण और छल-छद्म की पौध लगी हुई है, उनकी जड़ें गहरे तक जमीं हुई हैं। डॉ. गौतम ने इसे उजागर करने का प्रयास किया है, कुछ उदाहरण देखें-
 
कैसा अजीब दिन गया कैसी अजीब रात है
फिर सुबह से ही बिछ गई छल-छद्म की बिसात है
 
मंचों से नारी-शक्ति की देते हैं सब दुहाइयाँ
मंचों की बात और है पर घर की और बात है
 
फानूस बन के लोग कुछ जीते हैं उम्र भर यहाँ
मेहनतकशों के भाग्य में लेकिन अँधेरी रात है
 
जहाँ तक संग्रह की भाषा और शैली का प्रश्न है,  ऐसा प्रतीत होता है कि शब्द डॉ गौतम के अंतस से स्वत: ही निसृत हो रहे हैं। उन्होंने गज़़ल के माध्यम से जीवन के विभिन्न रूपों को चित्रित किया है। इनमें मिलन है तो विरह भी है, खुशी है तो गम भी है, समाज में फैली कुरीतियों का वर्णन है तो प्रेम भाईचारा और मानवसेवा का सन्देश भी है। श्रमिक, किसान और सैनिकों के लिए कवि के हृदय में गहरा सम्मान है, जो अनेक गज़़लों में देखा जा सकता है। जीवन जीने की सच्ची राह दिखाती ये गज़़लें समाज की कुरीतियों, भ्रष्टाचार, अनैतिकता के साथ आदर्शों की गिरावट की ओर  भी सचेत करती हैं-
ये कलम हमें दी कबीर ने, जो है सच के साथ रही सदा
ये जहाँ में रुतबा कमायेगी, सदा अपने नेक कलाम से
 
वो गरीब जाँ से चला गया, उसे न्याय भी तो कहाँ मिला
बड़ी शान से जो बरी हुआ, बड़ा आदमी है वो नाम से
 
खटते हैं मिलों में जो, फुटपाथ पे सोते हैं
क्यों मेरे हृदय में भी, उन सबका बसेरा है
 
कैसे मिलेगी जीत अंधेरों को राह में
हर गाम पर है जल रहा उम्मीद का दिया
 
इन गज़़लों के बारे में डॉ. गौतम ने स्वयं भी अपने अंतस के विचार स्पष्ट किये हैं- एक बहर पर एक गज़़ल
सीधी सच्ची नेक गज़़ल
 
जीवन के हर  कोने की
झाँकी है हर एक गज़़ल
 अंत में मेरा यह मानना है कि डॉ. ब्रह्मजीत गौतम का यह संग्रह गज़़ल के क्षेत्र में एक सन्दर्भ.ग्रन्थ के रूप में सराहा जायेगा और सदैव चर्चित रहेगा।