Monthly Magzine
Thursday 23 Nov 2017

सडक़ पर जिन्दगी

सुनील जैन ’’राही’’

कविता के लिए नया नाम नहीं है मानिक बच्छावत। मानिक बच्छावत का कविता संग्रह सडक़ पर जिंदगी क्या वाकई में सडक़ पर जिन्दगी का अहसास कराता है या फिर सडक़ पर पल रहे अपराध, हवस के दरिन्दे, चकलाघर, बदहवास नारी की व्यथा कथा है। कविता अपने आरम्भ से लेकर अंत तक यह तो तय कर जाती है कि वह केवल सडक़ पर बिखरी जिन्दगी के बारे में बहुत कुछ कहती है। उनके बारे में जो सडक़ पर जीते हैं और उनके बारे में भी जो सडक़ पर जीने वालों की जिन्दगी को सडक़ बना कर छोड़ देते हैं। वैसे तो सडक़ पर जिन्दगी को दौड़ते देखा है, रेंगते देखा है और चलते-चलाते भी देखा है, लेकिन हर शहर की अपनी मर्यादा होती है, अपनी सांस्कृतिक परम्परा होती है और कोलकाता का इतिहास तो सबसे अलग है। भूख ऐसी चीज है जो सब मर्यादाओं को तोड़ देती है, बिखेर देती है खेत में और ढूंढते रह जाते हैं, सडक़ के लोग चावल के कुछ दाने और मिलता क्या है वही गरीबी, भुखमरी और शरीर दहन की प्रक्रिया, जिसमें पाये दाने उबाले जाते हैं, नमकीन बनाये जाते हैं, रात को सजाकर थाली में परोसे जाते हैं और सुबह कुम्हलाये दाने भूख की भूख को मिटाकर उसी सडक़ पर नहाने से लेकर अन्य क्रियाकलापों के लिए फिर से तैयार हो जाते हैं, फटे कपड़ों से झांकते बदन और मटमैले चेहरों के साथ।
    मानिक जी की कविता सडक़ पर जिन्दगी की बात करती है, लेकिन उनके दायरे में केवल सडक़ ही नहीं आती। वे अपनी कविताओं के माध्यम से उस समाज की बात करते हैं, जिसे आसानी से कोलकाता की सडक़ों पर देखा जा सकता हैै और महसूस किया जा सकता है। उनकी कविता गद्य शैली की कविता है। अपनी बात कहने में सक्षम है। कविता के माध्यम से चित्र उभरते नहीं है, बल्कि मन मस्तिष्क पर उकेरते हुए निकल जाते हैं, अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं। पाठक सोचता रह जाता है, कोलकाता महानगर की जिन्दगी में कुछ बदलाव आया है या फिर वही गांवों और कस्बों से आती विधवाएं, बालिकाएं या अन्य किसानी गिरस्ती में लगी महिलाएं आकर जिस्म अदायगी में रम जाती हैं तथा मजबूरी में घिसड़ जाती हैं। कविता को गद्य के माध्यम से प्रस्तुत करने में सबसे बड़ी बाधा आती है कि गद्य को कविता (पद्य) के रूप में लोग पढ़ें और उसे गद्य की श्रेणी में भी न रखें।
    कोलकाता के देह व्यापार की ओर विशेष रूप से इंगित करती हैं, कविताएं। इन कविताओं की संख्या ज्यादा है, लेकिन पुराने कोलकाता की याद दिलाती हैं, पुराने बंगाल की याद दिलाती हैं, सडक़ पर गुजार रहे लोगों के मन की बात स्पष्ट, सपाट शब्दों में तीखे लहजे में अपनी गद्यात्मक शैली में कह जाते हैं। पाठक के लिए एक जैसी कविताओं को पढऩे के बाद भी उसे अलग सा महसूस होता है। किसी कविता में एक पहलू है तो दूसरी कविता में दूसरा पहलू। बछावत की कविताओं से ऐसा महसूस होता है, इन सडक़ वालों को उन्होंने काफी करीब से देखा है, काफी कुछ महसूस ऐसा किया है जो आम आदमी नहीं कर पाता। छोटी-छोटी बातों को जानना और उसे प्रस्तुत करना दोनों ही मुश्किल काम है। नारी केवल भोग्या है, इसी तथ्य पर आधारित कविताओं में संवेदनाओं के पहाड़ खड़े हैं, आप उन्हें देख सकते हैं, लेकिन उन्हें पार नहीं कर सकते। पहाड़ को समझना आसान है, उसे शब्दों में समेटना मुश्किल। उसी पहाड़ स्वरूप में पहाड़ जैसे समाज के जानेमाने समाज सेवकों को फुटपाथ पर नंगा देखा भी है, उसका चित्रण भी है, लेकिन बेबसी नारी की ही है।
लड़कियां अपना-अपना रास्ता
खोज रही हैं पेट के लिए
जीवन के लिए
-----
चौथी जो सबसे सुन्दर है
चकले में चहक रही है।
    मानिक बच्छावत केवल चकले, देह व्यापार की ही बात नहीं करते हैं। इस संग्रह में इन कविताओं के अलावा भी बहुत कुछ है। संवेदना बिखेरती, आत्मीयता से ओतप्रोत, जीवन के तीखे व्यंग्य की अनुभूति अनायास महसूस करा जाते हैं, जैसे उन्होंने कुछ कहा ही नहीं लेकिन बहुत कुछ कह जाते हैं कुछ शब्दों में। लेखक की व्यथा हो या मदर टेरेसा का सहानुभूति भरा व्यक्तित्व अथवा मां का ममत्व। कुछ भी तो नहीं छूटा है इस कविता में संग्रह में। हां एक बात तो कहनी ही होगी कि हर कवि का का अपना क्षेत्र होता है, उसकी भावनात्मक गहराई होती है, उसका देखने का नजरिया किसी एक विषय पर केन्द्रित होता है, यही बात इस कविता संग्रह में भी परिलक्षित होती है। वह कोलकाता की सडक़ों पर फलता-फूलता देह व्यापार। लेकिन इसे अपराध की श्रेणी में रखकर प्रस्तुत नहीं किया गया है और न ही एक बुराई के रूप में। यह चित्रित है-एक मजबूरी, गरीबी का उत्थान और मनुष्य का पतन, बड़ी-बड़ी अट्टालिकाओं के नीचे पलते गरीबी के व्यभिचार की कथा।
    मैं अथवा कोई भी इसे व्यभिचार की श्रेणी में नहीं रखेगा, बस यह पेट का व्यापार है, टुंडी से नीचे का व्यापार है, अगर टुंडी के नीचे कुछ नहीं होता तो न सडक़ होती, न सडक़ पर गंद होता, न सडक़ पर कविता होती। जैसा चल रहा है, वैसा चलने दो। सभी रोटियां सेक रहे हैं कोई पेट पालने के लिए तो कोई पेट पर।
    मानिक बच्छावत जी ने अपनी बात को सहज तरीके से प्रस्तुत किया है। कविताओं में दम है। पढऩे के लिए बैठना है तो एकांत जरूरी है, भावनाओं को समझना है तो संवेदना जरूरी है।
    पुस्तक के बारे में बेबाक रूप से कहना ही पढ़ता है कि-ग़लतियों को दरकिनार कर दिया गया, भाषा सटीक, शब्दों का चयन भाव के अनुसार है। स्थान और भावनाओं के माध्यम से कवि चित्र खींचने में सक्षम है और पाठक महसूस करता है चित्र को और उसमें घटित होने वाली घटनाओं को।
पुस्तक का आवरण चित्र कविता के विषय अनुरूप और कवताओं को मर्म को सार्थक करता है। पठनीय और संग्रणीय दोनों है। कोलकाता के बारे में जानने के लिए भी जरूरी है, इस अवधारणा के साथ कि कोलकाता एक विशाल जनसंख्या वाला शहर ही नहीं बल्कि बड़ी-बड़ी समस्याओं वाला शहर भी है। शायद इसीलिए संत टेरेसा ने इसे अपनी कर्मभूमि के रूप में अपनाया।  ठ्ठ