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Thursday 23 Nov 2017

बाबूराव बागुल और ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में अभिव्यक्त दलित-चेतना का तुलनात्मक अध्ययन

शेख हीना अनवर
shaikheenaanwar@gmail.com

प्रस्तावना:
‘तुलनात्मक’ शब्द का प्रयोग व्यवहारिक जगत में तौलना, गिनना, जोडऩा, साम्य-भेद की पहचान आदि के लिए प्रयुक्त किया जाता है । तुलना में दो या दो से अधिक भिन्न भाषाओं, कृतियों, सिध्दांतों में, राष्ट्रीय या सांस्कृतिक समूहों के साहित्य का अध्ययन किया जाता है । साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन व्यापक दृष्टि प्रदान करता है। अपने आरंभिक स्वरूप में साहित्य के क्षेत्र में इसका प्रयोग नगण्य था। जैसे-जैसे संस्कृतियों का विचार-विनिमय बढ़ा वैसे-वैसे उसमें विस्तार के साथ विकृति भी हुई। फलत: साहित्यिक लेन-देन की प्रक्रिया बढ़ी। संचार-साधनों में प्रचुरता आयी और काल-परिवर्तन होते गये ।        
‘तुलनात्मक साहित्य’ विश्व साहित्य के अध्ययन में अपनी भूमिका के कारण अपना महत्व स्थापित करने में सफल रहा है । साहित्य के साथ-साथ सांस्कृतिक अध्ययन की राहें भी अनुवाद की सहायता से तुलनात्मक साहित्य ने खोल दी हैं। इससे न केवल भौगोलिक अपितु सांस्कृतिक, राजनैतिक, आर्थिक रूप से समाज के समीप आने में मदद मिली है ।    
अंग्रेजी के ‘कॉम्पेरेटिव’ शब्द का रूपांतरण ‘तुलना’ है । अंग्रेजी में सर्वप्रथम इस शब्द का प्रयोग मैथ्यू अर्नाल्ड ने एम्पियर के शब्दों ‘इस्तवार कोंपारातीव’ का अनुवाद करते हुए सन् 1848 में किया था। फ्रांसीसी में इस शब्द का प्रयोग ‘सादृश्य’ के लिए किया जाता है अर्थात् भिन्न-भिन्न साहित्य में इसका प्रयोग विभिन्न रूप में हुआ है । हेनरी एच.एच रेमाक ‘तुलना’ को परिभाषित करते हुए कहते हैं कि- तुलनात्मक साहित्य एक राष्ट्र के साहित्य की परिधि के परे दूसरे राष्ट्रों के साहित्य के साथ ‘तुलनात्मक अध्ययन’ है तथा यह अध्ययन कला, इतिहास, समाजविज्ञान, विज्ञान, धर्मशास्त्र आदि ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों के आपसी संबंधों का भी अध्ययन है।
साहित्य में पारस्पारिक तुलना करने की शैली ‘तुलनात्मक’ कहलाती है। साहित्य कल्पबद्ध नहीं होता है। वह कालजयी होता है। अत: विभिन्न भाषाओं के साहित्य, विभिन्न कालों और विभिन्न रचयिताओं के साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन किया जा सकता है। इससे विभिन्न देशों एवं जातियों के बीच पारस्परिक भाव विनिमय सहज होता है। संस्कृति और सामाजिक परिवेश में निहित अंतर स्पष्ट होता है। दोनों साहित्यों की विशेषताएँ स्पष्ट होती हैं, सांस्कृतिक एकता की प्रतिष्ठा का मार्ग उन्मुक्त होता है तथा विभिन्न प्रान्तों के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक साम्य-वैषम्य लोगों की जीवन शैली तथा भाषाओं के स्वरूप उद्घाटन हेतु तुलनात्मक साहित्य की आवश्यकता पायी जाती है।    
‘तुलनात्मक’ शोध अधिक उत्तरदायित्व का कार्य होता है। भारत एक बहुभाषी देश है इसलिए तुलनात्मक साहित्य का अधिक महत्व है। अत: साहित्यिक अध्ययन के आधार पर अनेक भाषाओं के पारस्परिक संबंधों को रेखांकित किया जाता है। अनेकता में एकता अन्वेषण तुलनात्मक अध्ययन का मुख्य लक्ष्य होता है। हिन्दी भाषा और साहित्य को केंद्र में रखकर प्रादेशिक भाषाओं के साहित्यिक अध्ययन से राष्ट्रीय एकता अखंड बनी रह सकती है। यह कार्य यदि दो भाषाओं की कृतियों में किया जाए तो पाठक को दोनों भाषाओं का परिचय रहना जरूरी हैं जिसमें समानता और असमानता सरल और स्पष्ट रूप से तुलनात्मक अध्ययन से समझी जा सकती है ।    
 ‘तुलनात्मक अध्ययन’ से तात्पर्य उस रचना की साम्यता और विषमता के विश्लेषण से होता है। दो रचनाकारों का भिन्न-भिन्न आदिवासी जातियों पर लिखना उनके भिन्न परिवेश का सूचक है। यह भिन्न परिवेश ही रचना की मूल संवेदना को एक दूसरे से अलग बनाता है।     
दलित आंदोलन एवं चिंतन, परम्परागत हिन्दू समाज व्यवस्था द्वारा निर्मित वर्ण व्यवस्था एवं जाति भेद के प्रतिरोध की उपज है। दलित चिंतन की शुरूआत चार्वाक, बुद्ध से ही सिद्धों एवं नाथों तक आ पहुँची। जिन्होंने वर्ण व्यवस्था एवं जतिगत भेदभाव का प्रखर रूप में विरोध किया था। आगे यह कबीर, रैदास और फिर ज्योतिबा फुले, पेरियार और डॉ. अम्बेडकर से होते हुए आज के प्रमुख दलित चिन्तकों के माध्यम से आज के ज्वलन्त प्रश्नों का सामना करते हुए हमारे सामने मौजूद है।
दलित चिंतन का उद्देश्य केवल इन दु:खों, पीड़ाओं तथा शोषण से मुक्ति तक ही सीमित नहीं किया जा सकता, जिन्हें धर्म के नाम पर एक खास तबका अपने उद्देश्य प्राप्ति एवं स्वार्थों के लिए उपयोग में लाया करता था। विख्यात दलित चिंतक ओमप्रकाश वाल्मीकि का मानना है कि, दलित व्यथा, दु:ख, पीड़ा, शोषण का निवारण देना या बखान करना ही दलित चेतना नहीं है, या दलित पीड़ा का भावुक और अश्रु-विगलित वर्णन, जो मौलिक चेतना से विहीन हो। चेतना का सीधा संबंध दृष्टि से होता है। जो दलित सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, सामाजिक भूमिका की छवि के तिलस्म को तोड़ती है, वह है दलित चेतना। दलित मतलब मानवीय अधिकारों से वंचित। सामाजिक तौर पर जिसे नकारा गया हो। उसकी चेतना यानी दलित चेतना।
विषय प्रस्तुति:
असल में दलित चिंतन, दलितों की मुक्ति एवं सामाजिक समानता की बात करता है जो सदियों से हिंदू सवर्ण समाज द्वारा शोषण का शिकार हो रहा है। इसकी मुक्ति के लिए लगातार संघर्ष करने की बात भी करता है जिसका आधार डॉ. अंबेडकर के वे मूल विचार हैं जो उन्हें हमेशा प्रेरित करते हैं- शिक्षित बनो, संगठित हो और संघर्ष करो। किन्तु शिक्षा के अभाव में आज भी कई दलित परिवार दिहाड़ी-मजदूर बनने के लिए विवश हैं। शिक्षा के बाद भी कई दलित युवकों को काम एवं सामाजिक सम्मान के अभाव में अन्यान्य मार्गों को अपनाना पड़ता है। बाबूराव बागुल की कहानी ‘शिक्षण’ में इसी समस्या को उभारा गया है। कहानी का मुख्य पात्र ‘लक्ष्मण जाधव’ पढ़ा-लिखा युवक अपने ही जीजा का खून कर जेल में अपना जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर हो जाता है। वहीं वाल्मीकि की कहानी ‘कुचक्र’ में आर. बी. के आरक्षण से प्रमोशन के विरोध में उसके खिलाफ कुचक्र रचकर उसके ही सवर्ण साथी हवालात में बंद करवा देते हैं। आर. बी. जब निशिकांत को एक गुंडे से पीटने से बचाता है किन्तु उसके प्रमोशन को रोकने के लिए, निशिकांत को पीटने के जुर्म में उसे ही जेल भेजने का कुचक्र रचा जाता है। इस प्रकार दोनों कथाकारों के पात्र पढ़े-लिखे होकर भी त्रासदीय जीवन जी रहे हैं। आर. बी. तथा लक्ष्मण जाधव इसी दलित युवा वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। किन्तु दूसरी तरफ वाल्मीकि की कहानी ‘अंधड़’ का शिक्षित दलित युवक मि. लाल अपने ही समाज से नफरत करता है। उसका मानना है कि दलित बस्तियाँ नरक होती है, वहाँ गंदगी एवं अशिक्षा का साम्राज्य होता हैं। वह वहाँ जाना तक पसंद नहीं करता और अंत में अपने ही जड़ों से कट जाता है, जिसका पश्चाताप उसे कहानी के अंत में होता है। वाल्मीकि की बहुचर्चित कहानी ‘पच्चीस चौका डेढ़ सौ’ में एक दलित युवक अपने समाज पर हो रहे सूदखोरी के अन्याय को इसी शिक्षा के कारण उजागर कर पाने में सफल होता है। वह शिक्षा ही थी जिसने दलित युवा वर्ग को सदियों से चले आ रहे कई सूक्ष्म प्रकार के शोषण के खिलाफ आन्दोलित किया तथा उसके प्रतिरोध में जाने का साहस दिया। स्थानीय सूदखोर चौधरी दलितों को सूद पर पैसा देता है। सुदीप के पिता को सौ रूपये देकर प्रति माह पच्चीस रूपये वसूल करता है और सौ रूपयों के बदले एक-सौ पचास का सूद वसूल करता है। इसी शोषण के खिलाफ सुदीप आवाज उठाता है। जहाँ सुदीप के पिता चौधरी को अपना पालनकर्ता मानते हैं किन्तु जब सुदीप इस शोषण को उनके सामने उजागर करता है, तब वे भी चौधरी से नफरत करते हैं। और अंत में वे कहते हैं, -कीड़े पडेंगे चौधरी.... अंत में कोई पानी देनेवाला भी नहीं बचेगा।  बाबासाहब डॉ. अम्बेडकर ने सही कहा था कि शिक्षा ही दलितों के उद्धार का एकमात्र माध्यम है। यहाँ शिक्षित होने के कारण ही सुदीप अपने पिता को चौधरी की श्रध्दा से मुक्ति दिलाता है, उसके शोषण से अवगत कराता है। कहानीकार यहाँ पूर्णत: सामाजिक बोध से युक्त दलित चेतना की अभिव्यक्ति देने में सफल रहा है।
कहा जाता है दलितों के प्रति गाँवों में शिखर पर पहुँच चुकी अस्पृश्यता और बेरोजगारी ने उन्हें शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर किया। किन्तु शहरों में भी बेरोजगारी एवं जातिभेद ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। बागुल की कहानी ‘सक्तमजुरी’ में इसी प्रकार के एक परिवार का चित्रण किया गया है। फर्नाडिस और उसके साथी काम के अभाव में अपने परिवार की भूख मिटाने के लिए कई प्रकार की मशक्कत करते हैं। अपने परिवार को लेकर दर-ब-दर भटकने के बावजूद अन्न का इन्तजाम न कर पाने के कारण वे ताश के पत्तों के जुए का व्यवसाय करने पर मजबूर होते हैं। गाँव से आए हुए मजदूर प्रशिक्षण के अभाव में इस प्रकार का रास्ता अपनाते हुए आम तौर पर पाए जाते हैं, जिनमें दलित वर्ग की संख्या अधिक है। वाल्मीकि की कहानी ‘बैल की खाल’ में मरे हुए जानवरों को ढोनेवाले दलित वर्ग का चित्रण किया गया है। कहानी के पात्र ‘काले’ और ‘भूरे’ साहूकार के मरे हुए ढोर की खाल शहर के बाजार ले जा रहे होते हैं किन्तु रास्ते में उनके सामने ट्रक के नीचे आकर एक बछड़ा मर जाता है। उसकी जान बचाने के चक्कर में वो बैल की खाल नहीं बेच पाते हैं। जिसके चलते उनका परिवार भूखा रह जाता है। बाबूराव बागुल की कहानी ‘भूख’ में इसी प्रकार भूख से बिलखता परिवार केंद्र में है। इन दोनों कहानियों में मानव की आदिम आवश्यकता भूख को केन्द्र में रखा गया है। रोजदारी पर काम करने वाले, अर्थात् काम करो तो चूल्हा जलेगा अन्यथा एक परिवार भूखा सोएगा, यही वर्तमान स्थिति अधिकतर दलित परिवारों की होने के कारण, एक दिन की भी बेरोजगारी गाँवों और शहरों में दलित परिवार को भूखा सोने पर विवश करती है और उनके चूल्हा-चक्की इसी तरह उदास रहते हैं, उनके घर के अंदर दाने खून को पसीना बनाकर ही आते हैं एवं कौवे की आँखें कभी-कभार ही चमक उठती हैं।
कई विद्वानों ने वर्णवादी सामाजिक संरचना को दास प्रथा का आधार होने की बात कही है। दास प्रथा आज भी गाँवों-कस्बों में अपने सूक्ष्म रूप में मौजूद है। किन्तु क्या कारण है कि हमेशा से ही और वर्तमान समय तक दलितों को ही आर्थिक दास बनाए रखा गया है। दलितों को आर्थिक रूप से कमजोर बनाए रखने के लिए एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया के तहत कुचक्र रचा गया। तथा उनके आर्थिक एवं मानसिक गुलाम बनाए जाने के बाद उनकी स्त्रियों पर अनेक प्रकार से शारीरिक एवं मानसिक जुल्म ढाए गए हैं। वाल्मीकि की कहानी ‘जिनावर’ में इसी शोषण को विषय बनाया गया है। चौधरी एक लडक़ी को अपने बेटे की पत्नी के रूप में उसके मामा से खरीदकर लाता है, किन्तु स्वयं ही उसके साथ अपनी काम वासना को तृप्त करने की कोशिश करता है। लेकिन वह लडक़ी विरोध करती है, तो उसे बेसहारा बनाकर घर से बाहर निकाल दिया जाता है। चौधरी अपने दास से कहकर उसे अपने मायके भिजवा देता है। बाबूराव बागुल की कहानी ‘आई’ में ‘पांडु’ की माँ को ठेकेदार अपनी रखैल बनाकर रखता है और उसका शारीरिक शोषण करता है। जब पांडु को इस बात का पता चलता है, तो वह अपनी माँ की मजबूरियों को समझे बगैर उसे बेसहारा छोड़ देता है। बागुल की एक अन्य कहानी ‘लूटालूट’ में भी वंचाळा का पति उसे कुछ पैसों के बदले वेश्यालय में धोखे से छोड़ जाता है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि स्त्री का इस पितृसत्तात्मक समाज में किस तरह शोषण होता रहता है।
ओमप्रकाश वाल्मीकि की बहुचर्चित कहानी ‘सलाम’ में एक ऐसे युवक का चित्रण किया गया है, जो सदियों से चली आती हुई सलाम प्रथा का विरोध करता है। इस प्रकार का प्रतिरोध ‘पच्चीस चौका डेढ़ सौ’ कहानी के सुदीप में और बाबूराव बागुल की ‘शिक्षण’ कहानी के पात्र लक्ष्मण जाधव में दिखाई देता है। इसी कहानी का ‘प्रभाकर’ जहाँ अपने समाज के लिए आंदोलन करता है वहीं वाल्मीकि की कहानी ‘अंधड’ का मि. लाल अपने ही समाज से घृणा करता पाया जाता है, जहाँ से वह आया है। इस प्रकार दोनों कथाकारों के यहाँ दलित चेतना के कई रूप दिखाई देते हैं। जहाँ युवा अपने समाज के प्रति समर्पित होकर कार्य कर रहे है, शोषण के विरूद्ध आवाज उठा रहे हैं, वहीं कई ऐसे युवकों का चित्रण भी इनकी कहानियों में हुआ है जो अपना ही उद्धार करके दलित समाज से घृणा करते देखे जा सकते हैं। कई ऐसे भी पात्र इनके यहाँ हैं जो अपने ही समाज की स्त्रियों का शोषण करते हैं, उन्हें वेश्या बनने पर मजबूर करते हैं, उन्हें बेसहारा छोड़ देते हैं, और कई उनका सहारा बनते हैं। कई पात्रों में भूख एवं अपनी अस्मिता के प्रति जागृत भाव भी देखा जा सकता है, तो कई अपने ही जीवन की उलझनों में उलझे रह जाते हैं। दोनों कहानीकार अपने-अपने क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाने में सफल हुए हैं और उसका कारण उनका यथार्थवादी दृष्टिकोण एवं उसे अभिव्यक्त करने का साहस है।
आधार ग्रंथ:
1.मरण स्वस्त होत आहे -  बाबूराव बागुल, लोकवाङमय गृह, संस्करण-6        मुंबई-25
2. जेंव्हा मी जात चोरली -  बाबूराव बागुल, लोकवाङमय गृह, मुंबई-25
3. सलाम - ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, सं.6 (2000) दिल्ली-110051
4. घुसपैठिये -  ओमप्रकाश वाल्मीकि, राधाकृष्ण प्रकाशन, सं.2008  दिल्ली-            110051
संदर्भ ग्रंथ:
1. दलित साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र –  ओमप्रकाश वाल्मीकि
2. आधुनिक साहित्य में दलित विमर्श – देवेन्द्र चौबे
3. मराठी साहित्य परिदृश्य – चंद्रकांत बांदिवडेकर