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Monday 20 Nov 2017

भक्ति काल में कृष्ण काव्यधारा


 डॉ. बूला कार
   119, रायल कृष्णा,
एमराल्ड हाईट्स
स्कूल के पास ए.बी.रोड राऊ
 इन्दौर 453331 म.प्र.
  मो. 9425844990
उत्तर भारत में ज्ञान मार्ग, योग मार्ग और भक्ति मार्ग की धाराएँ स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होती रही हैं। और समयान्तर में वे दूसरे को प्रभावित करती रही हंै। परन्तु लोगों में विश्वास था कि उत्तर भारत में भक्ति की धारा दक्षिण भारत से प्रवाहित हुई है लेकिन वास्तविकता ऐसी नहीं है। उत्तर भारत में भागवत धर्म के रूप में भक्ति का अस्तित्व अति प्राचीन काल से ही मिलता है, काल क्रम से यह धारा अति क्षीण हो गयी थी और इसका व्यापक विस्तार दक्षिण भारत में हुआ। अलवार भक्तों के तमिल गीतों से यह स्पष्ट होता है कि दक्षिण में ईसा की चौथी शताब्दी से दसवीं शताब्दी तक भागवत भक्ति की प्रधानता रही। दक्षिण भारत के आचार्यों में मुख्यत: रामानुजाचार्य, विष्णु शर्मा, निम्बकाचार्य और माधवाचार्य ने अलवार भक्तों से वैष्णव भक्ति की प्रेरणा प्राप्त की, और इन्होंने भागवत भक्ति को उत्तर भारत में पुनर्जीवित किया। इन आचार्यों ने शंकराचार्य के मायावाद का खण्डन किया तथा जीव और जगत की सत्यता की स्थापना की। ब्रह्म के सगुणरूप के प्रति इनमें आग्रह मिलता है। विष्णु के भिन्न-भिन्न अवतारों में केवल राम और कृष्ण तथा उनकी शक्तियों के रूप में सीता और राधा के प्रति ही इनमें आस्था और विश्वास के भाव मिलते हैं। वैदिक साहित्य में कर्म, ज्ञान और उपासना के विशेष संकेत मिलते हंै। ऋग्वेद में विष्णु शब्द का प्रयोग भिन्न-भिन्न अर्थों में हुआ है। विष्णु के लिए वेद मंत्रों में लोक-रक्षक नाम दिया गया है। इस प्रकार वैष्णव भक्ति का आदि स्त्रोत वैदिक वांग्मय माना जाता है। वैष्णव धर्म में विष्णु के लिए नारायण शब्द का प्रयोग होता है। महाभारत में भी विष्णु के लिए नारायण का प्रयोग है। वैष्णव भक्ति में वासुदेव का उल्लेख मिलता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कृष्ण भक्ति का संबंध पुराणों से ही स्थापित होता है। हरिवंश पुराण में कृष्ण के व्यक्तित्व के दो रूप मिलते है। प्रथम के अन्तर्गत कृष्ण के वैभव विलास का वर्णन है, इसमें कृष्ण के ऐश्वर्य पूर्ण रूप का चित्रण है, उनके व्यक्तित्व का दूसरा रूप वह है जिसमें उनके माधुर्य रूप के वर्णन में श्रृंगार लीलाएँ है। महाभारत में कृष्ण द्वारा दस्युओं का वध, रूक्मणि का हरण, सुदर्शन राज की मुक्ति एवं काशीनगरी का वृहद चित्रण है। अन्य पुराणों में भी कृष्ण के ऐश्वर्य रूप का चित्रण मिलता है। परन्तु हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के मध्यकालीन कवियों का ध्यान कृष्ण के इस व्यक्तित्व की ओर नहीं गया। भागवत में भी कृष्ण के जीवन की समग्रता मिलती है। यहाँ ऐश्वर्य और माधुर्य का संयोग मिलता है। आधुनिक अनुसंधानों की प्रक्रिया के संदर्भ में भी कृष्ण भक्ति और कृष्ण काव्य के मूल्यांकन का प्रयास किया गया है।
    हिन्दी के कृष्ण भक्ति साहित्य के मूल्यांकन में गीत गोविन्द का सन्दर्भ ग्रहण किया जाता है। इस काव्य में कृष्ण नायक और राधा नायिका है। सखियाँ लीला सहचरी है। जयदेव के अतिरिक्त इस वर्ग के प्रमुख कवियों में उमापतिधर शरण, गोवर्धनाचार्य, छोपी आदि के नाम कृष्ण-काव्य के विकास के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण है। कृष्ण के माधुर्य, ऐश्वर्य के पूर्ण रूप के दर्शन पुराणों में ही देख पाते है। सख्य, वात्सल्य और श्रृंगार के साथ आध्यात्मिक लीला और भौतिक लीलाओं का योग भी इसमें मिलता है। गोपाल कृष्ण-भावना का विकास हरिवंश पुराण वायु पुराण और भागवत पुराण में मिलता है। हरिवंश पुराण में कृष्ण की श्रृंगार लीला का विस्तृत वर्णन है। भागवत में भी कृष्ण के जीवन की समग्रता मिलती है। वैष्णव भक्ति के सन्दर्भ में राधा-कृष्ण भावना का विकास माना जाता है।
    हिन्दी साहित्य के इतिहास में विभाजित तीन कालखण्डों - आदिकाल, मध्यकाल और आधुनिक काल में मध्यकाल-भक्तियुग, में सगुण काव्य धारा में राम भक्ति और कृष्ण भक्ति सर्वविदित है। कृष्ण भक्ति धारा के विकास का पूर्व में उल्लेख के पश्चात् भक्ति युग में कृष्ण काव्य धारा का अध्ययन, यहाँ अपेक्षित है। उत्तर भारत में भक्ति की धारा को नये सिरे से प्रवाहित करने का पूर्ण श्रेय स्वामी रामानंद और वल्लभाचार्य को है। वल्लभाचार्य ने श्री कृष्ण भक्ति का प्रचार किया। वे नाना शास्त्रों के प्रकाण्ड पंडित थे। इनका प्रवर्तित मार्ग पुष्टिमार्ग कहलाता है। ईश्वर के अनुग्रह से ही प्रेमप्रधान भक्ति और जीव की प्रवृत्ति होती है। ईश्वर के इस अनुग्रह को ही पोषण या पुष्टि कहते है। इसी से इस मार्ग को पुष्टिमार्ग कहते हैं। यह ईश्वर के अनुग्रह पर पूर्ण रूप से निर्भर रहने का मार्ग है, इसमें शास्त्र विहित विधि निषेध का बंधन नहीं है। भगवान के अवतार को लक्ष्य बनाकर लीलागान करने वाले भक्तों में वल्लभाचार्य के शिष्य, सूरदास के पूर्व उड़ीसा के संस्कृत कवि जयदेव, बंगाल के चंडीदास और मिथिला के विद्यापति की चर्चा होती है। सूरदास वल्लभाचार्य के शिष्य थे। सांप्रदायिक जनश्रुतियों के अनुसार वे वल्लभाचार्य से दस दिन छोटे थे। सूरदास जब कृष्ण भाव में तल्लीन होते थे, तो स्वत: अलंकार शास्त्र उनकी कविता में समाहित हो जाती थी। वल्लभाचार्य के पुत्र गोस्वामी वि_लनाथ ने महाप्रभु के शिष्यों में से चार और अपने शिष्यों में से चार भक्तों को चुनकर अष्टछाप की स्थापना की थी। वल्लभाचार्य के शिष्यों में सूरदास, कृष्णदास, परमानंद दास, कुंभनदास और वि_लदास के शिष्यों में नंददास, चतुर्भुजदास, छीतस्वामी और गोविन्द स्वामी अष्टछाप की मर्यादा पा चुके थे। इन सबमें सूरदास और नन्ददास सर्वश्रेष्ठ थे। वल्लभाचार्य के चार शिष्यों का वर्णन चौरासी वैष्णवन की वार्ता में, और वि_लनाथ के शिष्यों के वृत्तान्त दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता में संग्रहीत है। नन्ददास की पुस्तकों में कृष्ण के वात्सल्य, श्रृंगार और भक्ति भाव की प्रमुखता पायी जाती है। रास पंचाध्यायी, सिद्धांत पंचाध्यायी, रूप मंजरी, रसमंजरी आदि पुस्तकें प्रसिद्ध है। अष्टछाप के सभी कवियों में लीलागान और कृष्ण का रूप माधुर्य-वर्णन की प्रवृत्ति पाई जाती है। कृष्ण की अनन्य उपासना करने वाली मीराबाई के गीतों में प्रेम निवेदन और विरह-व्याकुलता की बहुलता है। उनके कुछ पदों में निर्गुणभाव की भक्ति भी मिलती है। इसके अतिरिक्त कृष्ण भक्ति काव्य में रसखान, ध्रुवदास, घनानंद, कवि उल्लेख्य हैं। माधुर्य भाव के भक्त कवियों की भांति मीराबाई का प्रेमनिवेदन और विरह-व्याकुलता सहज और साक्षात सम्बंधित है। डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी साहित्य का इतिहास में लिखा है - उनके कुछ पदों में निर्गुण भाव की भक्ति भी मिलती है परन्तु गिरधर नागर को उद्देश्य कर लिखे गए भजनों में मीराबाई जिस प्रकार सहज और स्थित प्रज्ञ दिखाती है, उसी प्रकार उनके भजनों में नहीं दिखती............ भगवद विरह की पीड़ा को कम कवियों ने इतना मादक  और प्रभावोत्पादक बनाकर प्रकट किया होगा। मीरा का काव्य कृष्ण काव्य है- परन्तु मीरा कृष्ण के प्रति अपनी प्रेमानुभूति और विरहानुभूति की अभिव्यक्ति में ही निरन्तर व्यस्त रही हैं उन्हें कृष्ण की विविध लीलाओं का वर्णन करने की आवश्यकता ही नहीं अनुभव हुई ।
    कृष्ण काव्य में सूरदास को जितनी प्रसिद्धी मिली, उतनी ख्याति किसी को नहीं मिली। उनके लिखे तीन ग्रंथ - सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी प्रमुख है। सूरसागर में कुल बारह स्कन्ध है। प्रथम स्कन्ध में सूरदास के विनय के पद संग्रहीत है। दूसरे स्कन्ध से बारहवें स्कन्ध तक में कृष्ण लीला का वर्णन है। सूरदास की वृत्ति श्रीकृष्ण के बाल और किशोर रूप में इतनी रमी है, मानो वे कृष्ण के इन रूपों का सचित्र वर्णन करने के लिए ही जन्मे थे। सख्य भाव की भक्ति से सूरदास का सूरसागर सराबोर है। वल्लभ संप्रदाय में भक्त अपने आराध्य का सखा बनकर उसकी लीलाओं में सहचर की भांति आनंद लेता है। उद्धव श्री कृष्ण के सखा थे। अत: सूरदास को उद्धव का अवतार माना जाता है। इसका आधार उनमें अपने आराध्य के प्रति सख्य भावना की प्रधानता ही है। सखा बनकर ही वे अपने भगवान से उद्धार के लिए संघर्षरत भी हो जाते है और ललकारते हुए कहते है।
आजु हौं एक-एक कर टरिहों।
कै हमहीं कै तुमहीं माधव अपुन भरोसे लरिहौं।
आत्म निवेदन का स्वर भक्तिकाल के कृष्ण काव्य का प्रधान स्वर है। अपनी दीन-हीनता का वर्णन करके भक्त अपने प्रभु से अपने उद्धार के लिए निवेदन करता है। सांसारिक माया मोह से ऊबकर प्रभुचरण में शरण पाने की कामना करता है। सूरदास पुष्टिमार्गी भक्त थे। पोषण तद्नुग्रह की पुष्टि मार्ग का मूल सिद्धान्त है, जिसका अर्थ है- ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने पर ही भक्त की भक्ति भावना की पुष्टि होती है। इसीलिए सूरदास ने अपने अधिकांश पदों में कृष्ण का अनुग्रह प्राप्त करने की कामना की है। वल्लभ संप्रदाय में रागानुराग भक्ति स्वीकृत है, जिसे प्रेमा भक्ति भी कहते है। प्रेमा भक्ति में वात्सल्य और श्रृंगार दोनों प्रकार के प्रेम है। प्रेमा भक्ति वल्लभ संप्रदाय की भक्ति का केन्द्र होने के कारण वल्लभाचार्य ने श्री कृष्ण के बाल और किशोर रूप की उपासना को ही प्रमुखता दी थी। सूरदास वल्लभ सम्प्रदाय के भक्त होने के कारण उन्होंने अपने आप को कृष्ण की बाल तथा युवा लीलाओं तक ही सीमित रखा है। राधा-कृष्ण की बाल सुलभ चेष्ठा में वात्सल्य भाव का चित्रण है। वात्सल्य रस का ऐसा मनोरम चित्रण सूरदास के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता था। तुलसीदास ने भी रामचरित मानस, कवितावली, विनय पत्रिका गीतावली में राम के वात्सल्य रूप का चित्रण किया है, किन्तु ब्रजभाषा की माधुरी से संयुक्त करके बंद आंखों से सूर ने जो चित्र अंकित किए हैं वे नि:सन्देह अप्रतिम है।
    भक्तिकाल में निवृत्ति के प्रचलन के विरोध में प्रवृत्ति की भावना को खड़ा किया गया था। कबीर आदि ने ज्ञान की चर्चा करके जीवन के प्रति वैराग्य की भावना को प्रसारित कर, व्यक्ति को अलगाव की स्थिति तक पहुँचा दिया था। इस अवस्था के विरोध में सगुण मार्गीय कवियों ने लोकदृष्टि को ध्यान में रखकर सहज मार्ग का निरूपण किया। तुलसी ने राम को और सूर ने कृष्ण को अपना आलम्बन निश्चित किया था। तुलसी ने प्रबंध का सहारा लेकर मर्यादा पुरूषोत्तम की स्थापना की और सूर ने मुक्तक का सहारा लेकर लीलामय कृष्ण की रूप माधुरी का जीवन में संचार किया। सभी सहृदयों ने रस लिया। इसी रस की अपेक्षा सूर के कृष्ण बहुत आगे तक काव्यालम्बन का आधार बनते रहे। वल्लभ सम्प्रदाय की वैचारिक निष्पत्तियों के आधार पर ही कृष्ण भक्ति प्रचलित हुई। अपने सम्पूर्ण वैचारिक तथ्यों को वल्लभाचार्य ने लोकोन्मुख स्वरूप प्रदान किया वे सगुण कृष्ण को ही परम ब्रह्म और दिव्य रूप स्थापित करते है। उन्होंने ब्रह्म, अक्षर ब्रह्म और पुरूषोत्तम ब्रह्म जो क्रमश: जगत, निर्गुण एवं कृष्ण के पर्याय रूप में ग्रहण किए गए। वल्लभाचार्य की उपासना पद्धति में वात्सल्य की प्रमुखता रही है, कदाचित इसी कारण सूर अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा बाल लीलाओं में अधिक रमे हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है - वात्सल्य और श्रृंगार के क्षेत्रों का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने अपनी बंद आंखों से किया, उतना किसी और कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का वे कोना-कोना झांक आए।
    कृष्ण भक्ति के साथ सूररचित भ्रमर गीत का उल्लेख आवश्यक है। भ्रमर गीत, सरसता, चतुराई एवं वाग्विदग्धता की दृष्टि से हिन्दी काव्य की अमूल्य निधि है। इसमें सभी रसों का सामंजस्य है। श्रृंगार, वात्सल्य भक्ति, करूण, शांत रस की बहुतायत है। सूर ने अंधे होते हुए भी मानव हृदय को अत्यन्त गहराई से एवं नाना रूपों से परखा था। भ्रमर गीत में उन्होंने अपनी उस अनोखी परख को कृष्ण, यशोदा राधा, गोपियों कुब्जा और उद्धव के अनेक रूपों में प्रकट किया है। इस काव्य का समस्त भाव-सिन्धु इन्हीं पात्रों के हृदयों से नि:सृत होने वाले प्रेमरस और दर्शन से पूर्णता को प्राप्त हुआ है। भ्रमर गीत का समस्त कथानक श्रीकृष्ण के प्रेम पर आधारित है। भ्रमर गीत की काव्य-धारा का उद्भव श्रीमद् भागवत से हुआ तथा अष्टछाप के प्रमुख तीन कवियों - सूरदास, नन्ददास एवं परमानंददास ने उसमें अनेक मौलिक उद्भावनाओं का सन्निवेष कर उसे एक नवीन दिशा प्रदान की। भागवत में भ्रमर गीत स्वतंत्र काव्य या विषय के रूप में नहीं था, किन्तु सूरदास की अद्वितीय प्रतिमा ने उसे अपने सागर में स्थान देकर एक ऐसे अद्भुत आत्मा वाले मोती का रूप प्रदान किया, जिससे उसका स्वतंत्र अस्तित्व चमक उठा। सूरसागर में पड़ा रहकर भी वह एक स्वतंत्र काव्य बन गया। भागवत के आधार पर भ्रमरगीत- काव्य की स्वतंत्र परम्परा को जन्म दिया, यह परम्परा भक्ति काल से आधुनिक काल तक अबाध गति से चली आ रही है।
भक्ति काल में वस्तुत: कृष्णभक्ति इस काल का प्रमुख काव्य-विषय है। सत्रहवीं शताब्दी तक के साहित्य में इसकी प्रधानता बनी रही। कृष्णभक्ति विषयक काव्य में एक ऐसा माधुर्य है, जो धर्म और विश्वास के बंधनों से बहुत ऊपर है।