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Monday 20 Nov 2017

रवीन्द्रनाथ और शिलांग


राजेन्द्र उपाध्याय

बी-108, पंडारा रोड,  नई दिल्ली- 110003
मो. 9953320721

रवीन्द्र नाथ ने विपुल लेखन किया, पर यात्राएं भी कई देशों-प्रदेशों की कीं।  उन दिनों आज की तरह यात्राएं करना इतना सुगम भी नहीं था कि उड़े और कुछ ही घंटों में वहां पहुंच गए। रवीन्द्रनाथ ने पानी के जहाज में, विमान में बैठकर कई देशों प्रदेशों की यात्राएं कीं। कई कई दिन तक जहाज में बैठकर यात्रा करना पड़ता था तब भी वे दूर दूर देशों प्रदेशों में गए। पूर्वोत्तर के आठ राज्यों-सिक्किम, त्रिपुरा, मिजोरम, मणिपुर, असम, मेघालय, अरूणाचलप्रदेश और नागालैंड के साथ-साथ उन्होंने बंगलादेश की भी कई बार यात्राएं कीं। बंगलादेश का राष्ट्रगान भी लिखा। हिमाचलप्रदेश के शिमला और उत्तराखंड के मल्लारामगढ़ में भी उनके मकान मिलते हैं। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्टेशन पर भी वे कुछ देर रूके हैं। वहां स्टेशन पर इसके प्रमाणस्वरूप एक पट्टिका लगी है। अविभाजित असम की राजधना शिलांग में वे तीन बार आए-1919, 1923 और 1927 में। उनसे पहले उनके बेटे रतिनाथ गर्मी की छुटिटयों में 1919 में मई-जून में आए थे। उन्होंने अगली पूजा की छुट्टियों में यानी अक्टूबर 1919 में रवीन्द्रनाथ को शिलांग चलने के लिए कहा। रवीन्द्रनाथ सपरिवार यहां आए और यहां की प्राकृतिक सुषमा देखते ही रह गए।अक्टूबर के महीने में शिलांग में फूल ही फूल खिलते थे। कवि का मन अल्हादित हुआ और उन्होंने यहां कई प्रकृतिपरक कविताएं लिखीं। रवीन्द्रनाथ की अवस्थ तब 68 वर्ष की हो गई थी। उस समय के हिसाब से वे वाध्यर्कय में थे। उनके लिए कलकत्ता से यहां की यात्रा कितनी कष्टकर रही होगी। वे यहां लगभग एक महीना रहे। वे तीन बार आए। शिलांग में रहकर ही रवीन्द्रनाथ ने अपना अंतिम और कालजयी उपन्यास शेशेर कविता लिखा। जोगा जोग की रचना भी यहीं हुई। गोरा के बाद जोगाजोग ही रवीन्द्रनाथ का सबसे बड़ा उपन्यास है। 1923 की यात्रा में ही रक्तकर्बी नाटक यहीं रहकर लिखा गया। शेशेर कविताके17 अध्यायों में से 13 अध्याय शिलांग की पृष्ठभूमि वाले हैं। यहां के चीड और युक्लिप्टस के पेड़ों ने कवि कुलगुरू को आंतरिक प्रेरणा दी है । यहां उन्होंने कई कविताएं लिखीं और अंग्रेजी में अनुवाद भी किए।
    रवीन्द्रनाथ यहां तीन बार आए तो तीन बंगलों में ठहरे। रीलबांग के ब्रुकसाई बंगलों में शेशेर कविता लिखा गया। 1923 में रीलबांग जीतभूमि में दूसरी बार रहे। सोलेमनबिला में जोगाजोग उपन्यास की रचना हुई। इनमें से सोलेमनबिला अब नष्ट हो गया है। ब्रुकसाईड  का संरक्षण सरकारी हाथों में आ गया। यहां रवीन्द्रनाथ की भव्य मूर्ति लगी है और रवीन्द्र स्मारक बना है। ब्रुकसाईड जीतभूमि का भी सरकार ने कुछ पुनरूद्धार किया है। बंगला चिटगांव डिवीजन के असिस्टेंट कमिश्नर के पास था। इसमें आजकल 1990 से रवीन्द्र आर्ट गेलरी सरकार चला रही है। यह सब काम आजाद के बहुत बाद रवीन्द्रनाथ की शतवार्षिकी मनाए जाने के भी बहुत बाद में 1982 में व्यक्तिगत प्रयासों से ही हुआ। इसमें भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद का कार्यालय भी है। यहां 2010 में रवीन्द्र भवन भी बनाया गया है। श्रीमती मालविका विशारद ने रवीन्द्रनाथ एवं शैलीबास शिलांग में रवीन्द्रनाथ के शिलांग प्रवास की अच्छी प्रामाणिक जानकारी जुटाई गई है। वर्षों के अनुसंधान के बाद विश्व भारती ने 2007 में इस ग्रंथ को प्रकाशित किया है। इसमें रवीन्द्रनाथ के सैंकड़ो पत्रों, कविताओं और शेशेर कविता के अध्ययन-मनन के बाद उनकी यहां की यात्रा की प्रामाणिक जानकारी दी गई है। शेशेर कविता रवीन्द्रनाथ का थोड़ा क्लिष्ट बांगला में लिखा, कविताओं से भरा उपन्यास है। श्रीमती मालविका के अथक प्रयासों के बाद ही सरकार ने यहां की रवीन्द्रनाथ की समृद्ध विरासत को सहेजने का काम हाथ में लिया। केन्द्र, राज्य सरकार, संस्कृति मंत्रालय, विश्वभारती को कई बार चिट्ठी-पत्री के बाद यह सब संभव हो पाया। पर अभी भी राज्य सरकार की पर्यटनसूची रवीन्द्रनाथ के रहने के स्थान शामिल नहीं है। लेडी रानू मुखर्जी को लिखे पत्रों में भी टैगोर ने यहां के महत्वपूर्ण स्थलों भवनों, यहां के चीड़ वनों के बारे में लिखा है। फेअरवेल माय फ्रेंड शेशेर कविता के अंग्रेजी अनुवाद में भी यहां की मधुर स्मृतियां हैं। एकटी चुनी और एकटी दिन कविताएं भी यहां लिखी गई हैं। लगभग सौ बरस पहले रवीन्द्रनाथ यहां बड़े बेटे-बहू, गायक देवेन्द्रनाथ टैगोर, उनकी पत्नी कमलादेवी, कवि के जीवनीकार प्रभात कुमार मखोपाध्याय और पीए साधुचरण के साथ आए थे।
    अब जरा आखिरी कविता में वर्णित शिलांग के बारे में देखें - 1923 के 82 साल बाद भी शिलांग बहुत बदला नहीं है। अनुवाद धन्य कुमार जैन का है रवीन्द्रनाथ टैगोर रचनावली खंड.21- देश के पहाड़ या पहाडिय़ों पर जितनी भी विलासिता की बस्तियां हैं उनमें से इन लोगों के लिए चांदमारी करने की सबसे तंग जगह है शिलांग। कुछ दिन तो उसके बीत गए पहाड़ की ढाल पर देवदार वृक्षों की छाया के नीचे किताबें पढ़ते-पढ़ते। किंतु उसे सहसा सुंदर दिखाई दे जाते वहां के वन-जंगल और पहाड़-पहाडिय़ों के दृश्य और साथ ही मन पर वे पूरी तौर से घने होकर छा भी नहीं जाते। मानो वे किसी रागिनी के एकरस अलाप जैसे हो, जिनमें न स्थायी हैस न ताल है न सम है।अर्थात उसमें अनेक तो हैं किंतु एक नहीं।
वह सोच रहा था कि पहाड़ की ढाल से उतर कर सिलचर के भीतर से जहां जो चाहे पैदल भाग खड़ा होगा, ठीक उसी तरह आषाढ़ आ पहुंचा पहाड़ों और वनों में अपनी सजल घन छाया की चादर धरती पर लुटाता हुआ। खबर मिली की चेरापूंजी के पर्वत-शिखर ने नववर्षा के मेघों के सामूहिक आक्रमण को अपनी छाती पर झेल लिया है और घन-वर्षण अब निर्झरिणियों को उन्मत कर के कूलहीन-तटहीन कर देगा। उसने तय किया कि ऐसे समय तो कुछ दिन के लिए चेरापूंजी के डाकबंगले में जाकर वह ऐसा मेघदूत जमा देगा कि जिसकी अदृश्य अलकापुरी की नायिका अशरिटी बिजली सी होगी। घने वन की छाया है। पतली सी पगडंडी नीचे खसियों के एक गांव की तरफ उतर गई है। अधबीच में एक क्षीण झरने की धारा ने गांव जाने के उस रास्ते को अस्वीकार करते हुए उस पर अपने अंधकार के चिन्ह-स्वरूप गोलगोल कंकड बिछाकर अपना एक अलग रास्ता चालू कर दिया है। वहां पत्थर पर दोनों जने बैठ गए। ठीक उसी जगह गड्ढा जरा गहरा हो गया है और वहां कुछ पानी भी जम गया है मानो हरे परदे की छाया में कोई परदानशीन युवती खड़ी हो और बाहर कदम रखने में डर रही हो।
शेशेर कविता (आखिरी कविता) उपन्यास 1923 में यहां जरूर लिखा गया, पर पूरा किया रवीन्द्रनाथ ने इसे अपनी दक्षिण यात्रा के दौरान बंगलूर में। जीतभूमि और ब्रुकसाईड बंगले शिलांग में पास-पास ही है। ब्रुकसाईड में वो पलंग है जहां रवीन्द्रनाथ सोते थे। सोफासेट भी उस जमाने का है। लिखने की मेज कुर्सी भी शायद नहीं है। रवीन्द्रनाथ के एक दो चित्र लगे हैं बाकी तो आज के कलाकारों के चित्र हैं। बंगले में उस जमाने में काम आनेवाले फायरप्लेस हंै। रवीन्द्रनाथ की बड़ी प्रतिमा भी बाहर आंगन में लगी है। तीन चार किताबें रखीं है जिनमें शिलांग का प्रसंग है। शेशेर कविता के साथ उसका  अंग्रेजी अनुवाद फेयरवेल मॉयफ्रेंड भी है। साथ ही बंगला में लिखी मालबिका विशारद की रवीन्द्रनाथ एवं शैलीवास शिलांग तथा उमा पुरकायस्थ की अंग्रेजी में टैगौर इन पाईनयार्ड शिलांग किताबे रखीं हैं। टैगोर इन पाईनयार्ड शिलांग में उस जमाने के शिलांग और रवीन्द्रनाथ की दुर्लभ तस्वीरें दी गई हैं। दोनों पुस्तकंे इन दोनों लेखिकाओं के गहन शोध, गहन और गहरे अध्यवसाय की परिचायक हैं। दोनों पुस्तकें संग्रहणीय हैं। इन दोनों के गहन प्रयासों से ही शिलांग में रवीन्द्रनाथ की स्मृतिरक्षा के उपाय किए गए हैं।
जीतभूमि में केवल एक पट्टिका लगी है कि रवीन्द्रनाथ यहां अप्रैल-मई-जून 1923 में रहे और रक्तवर्णी नाटक तथा शिलांगेट चिट्ठी आदि कविताएं लिखीं।जीतभूमि का मालिक तब कोई और था और अब कोई और है। लैटुमखरा में स्थित वह घर अब गिरा दिया गया है जहां रवीन्द्रनाथ कभी रहे थे। 1930  में एक अध्यापक हेलेमोनडिंगदोहखोगफाई ने पहली बार खासी भाषा में महाकवि की कुछ कविताओं का अनुवाद किया। इसके बाद गीतांजलि सहित कई कृतियों का अनुवाद समय समय पर कई अनुवादकों ने खासी और गारो भाषाओं में किया है। सेंट एडमंडस कॉलेज के प्राचार्य और साहित्य अकादमी में मेघालय के प्रतिनिधी सिल्र्विनस लेमारे ने शेशेर कविता का खासी में अनुवाद किया है।