Monthly Magzine
Tuesday 21 Nov 2017

आधुनिक व्यंग्य की समस्याएं

राहुल देव
 9/48 साहित्य सदन, कोतवाली मार्ग, महमूदाबाद अवध, सीतापुर उप्र- 261203
मो. 09454112975
गद्य अगर ‘जीवन संग्राम की भाषा’ है, तो व्यंग्य इस संग्राम का सबसे शक्तिशाली शस्त्र।
.सूर्यकांत त्रिपाठी निराला
संपादकों, आलोचकों का पता नहीं लेकिन हिंदी के पाठक सबसे पहले व्यंग्य पढऩा पसंद करते हैं। वह व्यंग्य पढऩा चाहता है। इसलिए हमें अच्छे व्यंग्य लिखने होंगें। व्यंग्य लिखना सबसे कठिन है। व्यंग्य क्या है? हम अच्छे व्यंग्य कैसे लिखें? एक व्यंग्यकार के लिए निरंतर इस बात का अनुसन्धान करते रहना बहुत जरूरी है। वह समाज का साहित्यिक डाक्टर है। इस सम्बन्ध में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी द्वारा अपनी प्रसिद्द पुस्तक कबीर में दी गयी निम्नलिखित परिभाषा मुझे व्यंग्य की सबसे सटीक परिभाषा मालूम देती है- वह लिखते हैं- व्यंग्य वह है जहाँ कहने वाला अधरोष्ठों में हँस रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठा हो और फिर कहने वाले को जवाब देना अपने आपको और भी उपहासात्पद बना लेना हो जाता हो।
किसी व्यंग्य रचना की परख के लिए मेरी दृष्टि में व्यंग्य के प्रतिमान व्यंग्य की भाषाशैली, विचार, विट, आयरनी, वक्रता, प्रवाह, तुक, बिम्ब, प्रतीक, शिल्प, व्यंग्यदृष्टि, रम्यता, हास्य, सरोकार, साहस, अंतर्विरोध और विसंगतिबोध, पठनीयता, रोचकता, जीवंतता, यथार्थबोध, कल्पनाशीलता, प्रयोग आदि हो सकते हैं। जरूरी नहीं है कि हम जब व्यंग्य के मूल्यांकन के प्रतिमानों को लेकर किसी व्यंग्य के पास जाएँ तो वह उन सभी प्रतिमानों को पूरा कर सके, यह व्यावहारिकता में संभव भी नहीं। या किसी एक प्रतिमान के आधार पर हम किसी व्यंग्य को श्रेष्ठ घोषित करने लग जाएँ। यह भी सही नहीं। व्यंग्य में उन प्रतिमानों को किस तरह बरता गया है यह देखना उद्देश्य है। व्यंग्य जिस चीज को लेकर आगे बढ़ा है उसकी परिणति कैसी हो रही है। और उसकी सार्थकता में उनका योगदान क्या है। कहीं ऐसा तो नहीं कि लेखक अपनी चालाकी में व्यंग्य के सभी प्रचलित प्रतिमानों का अपने पक्ष में मनमाना दोहन करता रहे और आलोचक उस पर ही मुग्ध होकर उसे महान रचना का तमगा थमाकर आगे बढ़ जाए। रचना की ऊपरी साज सज्जा की अपेक्षा प्रतिमानों की सहायता से रचना के आंतरिक पक्ष के सौंदर्य को उद्घाटित कर पाना आलोचकीय विवेक की परीक्षा है। जिसकी समकालीन दौर में नितांत कमी है। लेखकीय मंतव्य को पाठक तक ठीक ठीक पहुँचाना उसका आलोचकीय दायित्व है और साहित्यिक कर्तव्य भी। एक अच्छे लेखक को आलोचक या समीक्षक के बजाय पाठक के लिए ही लिखना चाहिए। लेकिन जब लेखक ऐसा नहीं करते और लिखते समय आलोचक या समीक्षक को ध्यान में रखते हैं तो लिखने की सारी कहानी गड़बड़ा जाती है। यह बात व्यंग्य के साथ साथ अन्य विधाओं के लिए भी कही जा सकती है।
मेरे विचार से व्यंग्य में पठनीयता एक जरूरी प्रतिमान की तरह से है । साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा व्यंग्य के लिए इस बात पर ज्यादा जोर इसलिए दिया जा रहा है क्योंकि यह साहित्य की एक ऐसी शैली है जिसमें लेखक अपनी हर पंक्ति के साथ सीधे सीधे पाठक से मुखातिब रहता है। इसलिए व्यंग्य में व्यंग्योक्ति, पठनीयता और प्रवाह का विशेष ध्यान रखा जाता है। भाषा के सरल और सहज रूप में विट और आयरनी के प्रयोग उसके प्रवाह और पठनीयता को को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है। सम्प्रेषण और पठनीयता में अंतर है। सहज होकर अपनी बात को कहना सम्प्रेषण है और अगर पूरी रचना में कही गयी आपकी बातों को पाठक अपनी पूरी रूचि और आनंद से पढ़ ले तो कहेंगें रचना पठनीय है। ये दोनों बातें एक दूसरे से जुड़ी तो हुई हैं लेकिन एक ही नहीं हैं। जो रचना हमने लिखी है वह पठनीय है या नहीं इसका सबसे अच्छा उत्तर रचनाकार के पास ही मौजूद होता है। तात्कालिक आत्ममुग्धता को छोड़ दें तो उसे सब पता होता है कि उसने जो रचना लिखी है वह पठनीयता या अन्य प्रतिमानों पर भी कहाँ ठहर रही है? अगर अपनी ही रचना को लिखते समय आप रचने के आनंद को महसूस नहीं कर पा रहे तो निश्चित रूप से पाठक को भी उस रचना से कोई रस प्राप्त नहीं होगा। व्यंग्य में फिर चाहे वह हास्य के स्थल हों या करुणा के दृश्य, बड़े रचनाकारों की रचनाएँ इसका प्रमाण हैं। कई बार जब मैं कोई व्यंग्य पढऩा शुरू करता हूँ तो देखता हूँ कि मैं उसे स्वयं एक पैरे से आगे नहीं पढऩे का इच्छुक हो रहा हूँ । तनिक से विषय को रबड़ की तरह खींचने की प्रवृत्ति से पठनीयता का ह्रास होता है। ऐसे में अगर आप बीच बीच में पंच भी देते रहें तब भी बात नहीं संभलती। पाठक उससे संवेदित ही नहीं होता, वह उसे वहीं छोडक़र आगे बढ़ जाता है और आपकी सारी चालाकी धरी की धरी रह जाती है। हिंदी का पाठक आज भी बहुत समझदार है। लेखक का पाठक पर और पाठक का लेखक पर विश्वास रचना की पठनीयता के जरिये ही कायम रहता है। व्यंग्यकार कहलाये जाने के इच्छुक लेखकों को यह जान लेना चाहिए कि तुरत-फुरत अखबार से कोई विषय विसंगति को पकडक़र व्यंग्य के चोले में कुछ भी लिख देने से न तो प्रसिद्धी मिलने वाली है और न ही पाठक की कोई सहानुभूति। जब तक कि उसमें उसे आपका कुछ नहीं दिखता है। वह आपकी भाषा से लेकर आपकी संवेदना, अनुभव, विचार, भाव कुछ भी हो सकता है। व्यंग्य साहित्य की वह उपविधा है जिसका रास्ता पठनीयता से होकर ही गुजरता है। इसके लिए मुक्तिबोध के शब्दों में कहूँ तो संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना की जरुरत है।
एक भरे-पूरे लेख में जिसे आप व्यंग्य कहते हैं कथ्य से व्यंग्यात्मक संगतियां न बैठा पाना भी व्यंग्यकारों की असफलता का एक कारण माना जाना चाहिए। आरोप-प्रत्यारोप की भाषा व्यंग्य की भाषा नहीं है जहाँ पर व्यंग्य लेखक एक भावावेश के तहत अपने मन का गुबार निकाल दें बस। और कहीं अगर यह गाड़ी प्रवृत्ति पर व्यंग्य करने के बजाय व्यक्ति पर व्यंग्य करने की राह पकड़ ले तो व्यंग्य के साथ दुर्घटना होना तय मानिये। यह सारी प्रक्रिया भाववाद के अंतर्गत एक गैररचनात्मक उपक्रम है जिसे अधिकतर व्यंग्यकार जाने-अनजाने ही अपने व्यवहार में लेते रहते हैं। व्यंग्य की रचनाप्रक्रिया का यह संकट लेखकीय चेतना को व्यंग्य की गहराई तक ले जाने में बाधक है और इससे व्यंग्य व्यंग्य न रहकर एक असमर्थ गद्य जैसा कुछ बन जाता है जिससे पाठक की चेतना पर तो खैर क्या ही प्रभाव पड़ेगा। अपनी व्यक्तिगत खुन्नसें निकालने के लिए आप पाठक और विधा को अपना मोहरा न बनाएं। इस बात का खतरा अन्य विधाओं की अपेक्षा व्यंग्य में इसलिए भी अधिक होता है क्योंकि ज्यादातर व्यंग्यकार अखबारी कॉलम से शुरू कर साहित्य में अपनी जगह तलाशते हैं और जब उन्हें उचित स्थान नहीं मिलता तो अपनी कमियां न देखकर आलोचकों-संपादकों के दोषदर्शन पर उतर आते हैं।
विट और आयरनी यानि वाक्पटुता और व्यंग्योक्ति, तंज किसी भी व्यंग्य के आंतरिक गुण होते हैं। एक श्रेष्ठ व्यंग्य में इन तत्वों का उचित समावेश बहुत जरूरी है। व्यंग्य के यह गुण व्यंग्यकार की स्वभावगत प्रकृति से उपजते हैं। हिंदी में व्यंग्य की परम्परा में इन प्रतिमानों के रचनात्मक प्रयोग के परसाई के बाद श्रीलाल शुक्ल सबसे अच्छे उदाहरण हैं । इनके सटीक प्रयोग से व्यंग्य में कसाव आता है और उसकी पठनीयता में वृद्धि होती है। व्यंग्य में इन तत्वों को लाते समय भाषिक सजगता की भी आवश्यकता होती है। भाषा के सरल और सहज रूप में विट और आयरनी के प्रयोग उसके प्रवाह को गति प्रदान करके एक प्रभावशाली रूप देने में सहायक सिद्ध होता है।
अपने एक आलेख सपाटबयानी की भीतरी बनावट में आलोचक और व्यंग्यकार सुशील सिद्धार्थ व्यंग्य में सपाटबयानी को लेकर वाजिब सवाल उठाते हैं। जैसा कि सुशील जी ने अपने आलेख के अंत में प्रश्न भी किये कि सपाटबयानी तो किस तरह की सपाटबयानी। व्यंग्य तो किस तरह का व्यंग्य। सरोकार तो किस तरह के सरोकार। आलोचक की भूमिका इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे प्रश्नों के उत्तर रचना के भीतर से ही निकलने चाहिए। मेरे लेखे सपाटबयानी को रचना में किस तरह बरता गया है यह देखना भी जरूरी है। खाली सपाटबयानी को दूर से देखकर ही पूरी रचना से मुंह मोड़ लेना रचना के साथ अन्याय होगा। हाँ सपाटबयानी की अधिकता भी कोई अच्छी बात नहीं। इस लिहाज से अगर हम अन्य विधाओं जैसे कि कविता की ओर जाएँ तो देख सकते हैं कि साठोतरी कविता में सपाटबयानी को काव्यगुण के रूप में स्वीकार किये जाने के ऐतिहासिक कारण भी थे। दरअसल सपाटबयानी के गुण का सहारा लेकर लेखक अपनी कमी छुपाने लगे जिससे इस प्रतिमान को व्यापक स्वीकृति मिलने में कठिनाई हुई। सपाटबयानी को साध पाना सबके बस की बात नहीं। उसकी आड़ लेकर खराब लिखना घोर प्रतिभाहीनता और रचनात्मक कृतघ्नता की निशानी है। सपाटबयानी अर्थगर्भा होती है केवल एक सपाट कथन मात्र नहीं। मुझे लगता है रचना में इसके लिए सपाटबयानी की जगह सटीकबयानी शब्द का प्रयोग करना ज्यादा अच्छा रहेगा।
व्यंग्य में प्रचलित चुटकुलों का समावेश व्यंग्य की साहित्यिकता और मौलिकता दोनों के लिए घातक प्रवृत्ति है। व्यंग्यकारों को जहाँ तक सम्भव हो इनसे बचना चाहिए। जिस तरह इधर की तमाम कविता में आप देखिये तो पूरी कविता में आपको एक दो चमकदार पंक्तियाँ दिख जाएंगी। आलोचक भी सुविधा के लिए उनके आधार पर अपने काव्यमूल्य दे देता है। फिर तो उन एक दो पंक्तियों का ही मूल्य रहा, बाकी सारी रचना लिखना ही व्यर्थ रहा। समकालीन दौर में ऐसा सलूक कहानी के साथ भी बहुत हो रहा है। तमाम अनावश्यक विवरणों के बीच आपको अलग से ही कहानी का कोई चमकदार टुकड़ा दिख जायेगा। इसलिए एक सतर्क लेखक को अपनी रचना के अनावश्यक प्रसंगों पर निर्ममतापूर्वक पुनर्दृष्टि अवश्य डाल लेनी चाहिए और उनके होने का औचित्य सिद्ध करना चाहिए। यह बात व्यंग्य में अक्षरश: लागू होती है। अपने ईमानदार मंसूबों के बावजूद ऐसा व्यंग्य टुकड़ों में तो प्रभावित करता है लेकिन उसका कोई समग्र सकारात्मक प्रभाव पाठक तक नहीं पहुँचता। पच्चीकारी का नाम व्यंग्य नहीं है। ऐसे व्यंग्य एक व्यंग्य से एक बड़ा व्यंग्य न बन पाने को अभिशप्त रह जाते हैं। एक अच्छी शुरुवात को कोई मुकम्मल जहाँ नहीं मिलने पाता। सुविधापूर्ण तरीके से अखबारी कतरनों से विषय उठाकर व्यंग्य लिखना और समय और समाज के अंतर्विरोधों को पहचानकर जीवन और सत्य का सूक्ष्म अन्वेषण कर व्यंग्य लिखने में बड़ा फर्क है। लिखना कोई पिकनिक मनाना नहीं बल्कि एक बड़ी संघर्षयात्रा है इसलिए इस यात्रा पर चलने से पहले पर्याप्त तैयारी भी आवश्यक है। इस बात को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना अच्छा है।जो गरीबों की आहें नहीं सुन सकते वे मानवता को बचाने की बात न करें । जिनके घर के बाहर कुत्ते से सावधान की तख्ती लगी हुई है वे अतिथि सत्कार करने का ढोंग न करें। जो अपने पड़ोसियों के नाम तक नहीं जानते वे मानवीय संवेदनाओं के दिनोंदिन कम होते जाने का ढोल न बजाएं। पद, पुरस्कार और जोड़तोड़ की राजनीति में जुटे रहने वाले साहित्यकार जो लिख रहे हैं पाठक किस आधार पर उसे विश्वसनीय माने? ऐसा साहित्य झूठा साहित्य है। लेखक का कृतित्व उसके व्यक्तित्व से जुड़ा होता है।  जो लोग लेखक के लेखन को उसके व्यक्तिगत जीवन से अलगकर देखने के हिमायती हैं मैं उनसे सहमत नहीं हो पाता। हम गुड़ न खाएं इस बात का उपदेश देने का हक उसी को है जो स्वयं गुड़ नहीं खाता। यह नैतिकता की बात है। शब्दों से खेलना और शब्दों को जीने में अंतर की पहचान करनी ही होगी। हमारा लेखन तभी प्रभावी और विश्वसनीय होगा जब हमारे लेखन और जीवन में साम्य हो। साम्य का मतलब यह नहीं है कि लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभवों से परे जाकर कुछ लिख नहीं सकता, वह जरूर लिखे लेकिन वह लिखा हुआ ऐसा न हो कि पाठक को पढ़ते समय दूर से ही गवाही देने लगे कि वह एक व्यापक सामाजिक अनुभव नहीं है। लेखकीय ईमानदारी जिसे मुक्तिबोध कलाकार की व्यक्तिगत ईमानदारी कहते हैं वह यही है कि आपकी कथनी और करनी में अंतर न आने पाये।
हरिशंकर परसाई जी का व्यक्तित्व और कृतित्व मेरी उपरोक्त बात का सबसे अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है। परसाई मुक्तिबोध के समकालीन रहे हैं। उनका पूरा जीवन संघर्षों में बीता।  उन्होंने कई खण्डों में भी न समा पाने वाला विपुल लेखन किया।  हिंदी व्यंग्य को आलोचकों की अस्पृश्यता से मुक्त कराया। शरद जोशी भी आजीवन लेखन के प्रति ही समर्पित रहे। व्यंग्य की गुणवत्ता से समझौता किये बिना उसे लोकप्रिय बनाने में उनका अप्रतिम योगदान है। परसाई और शरद जी राजनीति और नौकरशाही के समाज के दो महत्त्वपूर्ण हिस्सों को पकडक़र पटरियों की तरह समानांतर रचनात्मक हस्तक्षेप करते हुए साहित्य के माध्यम से लोक चेतना को झकझोरते मिलते हैं। इनके कई विषय तात्कालिक होते हुए भी ऐतिहासिक महत्त्व के सिद्ध होते हैं। आज उनकी कृतियों के पुनर्पाठ और प्रासंगिकता के सवाल उनकी रचनात्मकता की कालजयिता को प्रमाणित करते हैं। श्रीलाल शुक्ल सरकारी अफसर होते हुए भी लिखने के प्रति हमेशा बहुत संजीदा और ईमानदार रहे। ये तीनों ही अपनी विधा के मास्टर हैं। इन कालजयी लेखकों को अपने लेखन पर विश्वास था इसलिए वे आलोचना से कभी घबराये नहीं। ऐसी रही है हमारी व्यंग्य परम्परा। आज के व्यंग्यकारों को इनसे, इनके लेखन से प्रेरणा लेनी चाहिए। यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि आखिर हम लिख क्यूँ रहे हैं और हमने लिखने के लिए व्यंग्य का ही रास्ता क्यों चुना है? इन दो प्रश्नों का उत्तर जिसे मिल गया वह सही मायनों में व्यंग्य लेखक बन गया। व्यंग्य लेखन की असल चुनौती यही है कि व्यंग्य में व्यंग्य हो। आज अधिकांश व्यंग्यों में पाठक को व्यंग्य में व्यंग्य ही नहीं मिला रहा। व्यंग्य केवल गुदगुदाता या हँसाता ही नहीं वरन व्यंग्य में करूणा की अंतर्धारा भी बह सकती है जो आपको कभी भावुक करती है, उदास करती है और करूणा से ओतप्रोत भी कर देती है। व्यंग्यकार बेहद महत्वपूर्ण सवालों का उत्तर व्यंग्यपूर्ण लहजे में ढूँढने वाला शख्स है। एक व्यंग्य लेखक को अपने समय और समाज को देखकर उसमें अपनी सृजनात्मकता कायम रखकर साहित्य की मूल्यवत्ता भी अर्जित करनी चाहिए। साहित्य न तो दांत निपोरकर और न ही दांत पीसकर कहे गये सच को स्वीकारता है। व्यंग्य लेखन एक कला है अत: उसकी कलात्मकता अपनी पूरी साहित्यिकता के साथ आत्मसात और व्यक्त होनी चाहिए।
समकालीन कविता में विष्णु नागर जैसे व्यंग्य के बड़े कवि की मौजूदगी के बावजूद गंभीर व्यंग्य के अच्छे कवियों की नितांत कमी है। यह बताता है कि गद्य व्यंग्य की अपेक्षा व्यंग्य कविता की दिशा में अभी लम्बी दूरी तय करनी बाकी है।  हिंदी में नागार्जुन और धूमिल जैसे गंभीर व्यंग्य कवियों की एक समृद्ध परम्परा रही है। आधुनिक व्यंग्य कविता में हास्य और तात्कालिक आनंद की प्रधानता ने व्यंग्य के गंभीर काव्य स्वरुप को क्षति पहुंचाई है, शायद इसी कारण स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों की भी व्यंग्य कविताओं को प्रकाशित करने में उतनी रूचि नहीं रह गयी है।