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Tuesday 21 Nov 2017

दाई माँ

 डॉ. बी एस त्यागी
140, अंकित विहार, पचैण्डा रोड़
मुजफ्फरनगर 215001
मो 9456669403
सोना! ओ, सोना...!
चौधरी बलबीर ने गली के नुक्कड़ पर खड़े होकर आवाज दी। कोई जवाब न मिलने पर उसे बड़ा ताज्जुब हुआ, नहीं तो ये लोग पहली ही आवाज पर दौड़े चले आते थे। उसकी रोबदार कडक़ आवाज से ही पहचान लेते थे। थोडा गुस्से में उसने इघर उघर देखा। तभी मटमैले सफेद फ्राक में हाँफती हुई एक दुबली-पतली लडक़ी आई। उसके बेतरतीब रूखे बाल सूखी टहनी पर किसी चिडिय़ा के घोंसले की तरह दिख रहे थे।
चिडी! चौधरी ने उसे घूरकर देखा।
वह घबरा गयी और सिर नीचा किये चुपचाप खड़ी रही। जब पड़ोस के बच्चे इसे चिड़ी कहकर बुलाते थे तो आपे से बाहर हो जाती थी। फिर नाराज होकर उन पर गालियों की बौछार करने लगती थी। लेकिन वह चुपचाप खड़ी अपने दायें पैर के अँगूठे से जमीन कुरेदती रही।
सोना कहाँ मर गयी? चौधरी ने कडक़ कर पूछा।
दाई माँ नहीं है। सुबह चली गयी थी..., उसने बुझी-सी आवाज में कहा।
    फूलपुर गँाव के बाहर निचली जाति की छोटी-सी बस्ती है। इसमें पिछले बीस बरसों से सोना रहती है। लोग उसका असली नाम तो भूल ही गये। वह पूरे इलाके में दाई माँ के नाम से मशहूर है। जब वह फूलपुर में ब्याह कर आई थी तो इस काम को कतई करना नहीं चाहती थी। यह काम उसने अपनी माँ से सीखा था। उसकी माँ प्रसूति कार्य में निपुण थी। उसके पति जग्गा के पास छ: ठिकाने थे। इन्हें कमाने में उसका आधा दिन निकल जाता था। वह झाडू लागाकर गोबर उठता और बाहर खत्ते में डालता। दुपहर को उन घरों से रोटी लेकर लौटता। इसके अलावा जग्गा जमीदारों के खेतों में भी काम करता था। यह सीजन का ही काम होता था। सोना बेंत की बहुत ही सुन्दर टोकरियाँ बनाती थी। जग्गा हर शनिवार को शाहपुर की पैंठ में बेच आया करता था। दोनों अपनी छोटी-सी दुनिया में बड़े खुश थे। ऐसा लगता दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हों।
    जब जग्गा अचानक बीमार हुआ और छ: महीने तक खाट पर पड़ा रहा, सोना को ठिकाने कमाने जाना पड़ा। जग्गा के अलावा सोना के इस दर्द को कोई नहीं समझता था। बचपन से ही उसे यह काम पसन्द नहीं था। इस बात को लेकर कई बार उसकी माँ की डाँट पड़ती।
हाँ-हाँ, तू तो राजकुमारी है। क्यूँ करने लगी इस काम को?
अच्छा नहीं लगता।
तुझे तो जमींदार के घर पैदा होना चाहिए था।
अरे बच्ची है... उसका पिता बीच में टोकता और प्यार से उसका हाथ पकडक़र बाहर ले जाता।
जब जग्गा छप्पर के नीचे पड़ा सोना को टोकरी उठाकर जाते देखता, उसका मन तड़प उठता। सोना ने अपने मन की भावनाओं को कभी जग्गा के सामने आने नहीं दिया। उसके चेहरे पर मुस्कान होती। वह अच्छी तरह जानती थी कि जग्गा उसे कितना चाहता है। आज उसे जग्गा के बोल याद आ रहे थे।
जब तक मैं हूँ तुझे जमीदारों के घर जाने की कोई जरुरत नहीं।
और वह सदैव अपने शब्दों पर कायम रहा। चाहे जो हुआ उसने सोना को जाने नहीं दिया।
 ऐसे क्यों देख रहे हो? सोना ने जग्गा के माथे पर हाथ फेरते हुए कहा।
जग्गा का गला भर आया। उसने सिर हिलाते हुए जोर से आँखें बन्द कीं।
फिक्र मत करो। जल्दी ही ठीक हो जाओगे, उसने जग्गा का हाथ थामते हुए कर कहा।
हकीम जी ने सोना को बताया कि जग्गा को टी बी है तो वह अन्दर ही अन्दर काँप गयी।
क्या यह बहुत ही...?
हकीम जी इस पर चुप रहे। सोना की समझ में नहीं आया कि हकीम जी ने उसकी बात सुनी नहीं या वह जवाब देना नहीं चाहते थे।
ये लो...
हकीम जी ने पुडिय़ाँ जमीन पर रख दी। सोना ने उन्हें उठाया और एक बार फिर हकीम जी के चेहरे को देखा। इस चुप्पी ने सोना के मन में शक पैदा कर दिया।
हकीम जी चुप क्यों रहे? क्यों, क्या बीमारी गम्भीर है? नहीं, वे इतने समझदार और तजुरबेदार हैं। बहुत लोगों को ठीक किया है, जग्गा को भी ठीक कर देगें, जरुर.. जरुर। अपने आँसुओं पर काबू पाते हुए वह घर की ओर तेज कदमोंके साथ बढ़ गयी।
    जग्गा की मौत के बाद वह अकेली पड़ गयी। यदि गाँव की पुरानी दाई भरतो उसकी मदद न करती तो वह जीवन से ही निराश हो जाती। उसने उसकी हिम्मत बढ़ायी और इस पेशे में उसकी रुचि पैदा की। सोना का खोया आत्मविश्वास लौट आया। अब वह लगभग सन्तुष्ट थी। कभी-कभी परेशान अवश्य हो जाती  पिछली बातों को याद कर किन्तु जल्दी ही संभल भी जाती थी।
   जैसे ही सोना दुपहर बाद घर आयी तो चिड़ी ने बताया कि चौधरी उसे बुलाने आया था।
कहाँ चली गयी थी, दाई माँ?
क्यूँ?
चौधरी नाराज हो रहा था।
नाराज! उसकी घरवाली को तो दो दिन पहले ही देखा था। अभी टाइम है। कोई आसार नहीं थे। क्या मेरा अन्दाजा गलत था? नहीं, मेरा अन्दाज मुश्किल से ही...। अगर ऐसा है तो... सोना मन ही मन बुदबुदायी। थोड़ी बेचैनी चेहरे पर उभर आयी।
सोना पड़ोस के गाँव कर्णपुर सुबह ही चली गयी थी। वहाँ एक औरत को बच्चा होना था। उसे कई घंटों तक दर्द होता रहा। यह उसका पहला बच्चा था। उसे पूरे समय वहाँ रहना पड़ा। बच्चा पैदा होने और उससे जुड़े सारे काम-काज निपटाने के बाद ही वह वहाँ से चल पायी थी। वह थकी हुई थी। उसका मन था कि थोड़ी देर कमर सीधी कर ले। लेकिन वह चौधरी की आदत को जानती थी। यदि वह दुबारा आ गया तो गन्दी से गन्दी गाली देगा और पूरा पड़ोस तमाशा देखेगा। इसलिए वह उसकी हवेली की ओर चल दी। हवेली गाँव के दूसरे छोर पर थी। जग्गा की मौत के बाद चौधरी थोड़ा पिघल गया था। जब वह  उसका ठिकाना कमाने जाती तो बड़ी नरमी से बोलता।
कैसी है, सोना?
अच्छी हूँ, मालिक।
चिन्ता मत करना। अगर किसी चीज की कभी जरुरत हो, तो बता देना।
सोना गोबर टोकरी में डालती हुई सिर हिला देती। थोड़ी देर खड़ा वह उसे ताकता रहता। कई मौकों पर उसकी उदारता सोना के लिए आश्चर्य थी। नहीं तो इन नीची जाति के लोगों के साथ उसने कभी सीधे माथे बात नहीं की। शुरू में तो उसकी उदारता का कारण वह नहीं समझी। किन्तु बाद में उसे सब कुछ साफ हो गया था।
सोना चौधरी के घर जैसे ही पहुँची, उसने उसे बरामदे में कुर्सी पर बैठे हुक्का गुडग़ुड़ाते देखा। दो बच्चे उसके पास में खेल रहे थे।
आइये दाई साहिबा! चौधरी ने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा।
सोना थोड़ी सकुचायी और बिना कुछ बोले अन्दर चली गयी। चौधरी ने उसके नितम्बों को लयात्मक ढंग से उठते गिरते देखा। वह लम्बी-चौड़ी कद-काठी वाली औरत थी।
    उसने चौधरी की घरवाली निशा की जाँच की। सुबह हल्के-से दर्द  के साथ स्राव हो गया था।
अभी एक या दो दिन लगेंगेें, सोना ने उसके पेट को धीरे से सहलाते हुए कहा।
हल्का-फुल्का ही खाना।
निशा हल्की-सी मुस्कान के साथ खड़ी हो गयी।
रोज के हल्के काम-काज करते रहना। इन शब्दों के साथ सोना बाहर आ गयी।
सब ठीक है? चौधरी ने उसके नजदीक आते हुए पूछा।
जी, सब...।
सोना ने उसकी तरफ देखे बिना ही कहा और बाहर आ गयी। चौधरी ने सिर हिलाया और उसे जाते हुए एक बार फिर देखा। थोड़ी दूर जाकर सोना ने मुडक़र एक बार देखा। चौधरी अपनी खिचड़ी मूछों में मुस्करा रहा था।
    सोना संवेदनशील औरत थी। वह जानती थी कि बच्चे को जनने के बाद औरत का दूसरा जन्म होता है। वह जच्चा-बच्चा का पूरा ध्यान रखती। जब दर्द शुरू होते तो वह औरत से अपना तादात्म्य स्थापित कर लेती थी और मानसिक स्तर पर उसके साथ जीती। ये बड़े ही नाजुक क्षण होते थे। परिवार में खुशी छा जाती थी। जरा-सी चूक खतरनाक साबित हो सकती थी। परिवार जच्चा-बच्चा दोनों से हाथ धो सकता था। इसलिए वह पूरे समय गम्भीर व तनाव में रहती। ऐसा लगता मानो वह सालों से मुस्करायी ही नहीं। वह धीरे-से बोलती। जच्चा को भी उसकी उपस्थिति महसूस होती। उसे अच्छा लगता। सोना का प्रेम व पूरा समर्पण जच्चा को आश्वस्त रखता था। वह मन ही मन प्रार्थना करती रहती। जब तक बच्चे की चीख सुनाई न पड़ती, उसकी साँस अटकी रहती। फिर उसकी आँखें खुशी के मारे छलछला उठती। चेहरा चमक जाता। हल्का महसूस करती। फिर आसमान की ओर देखते हुई आँखें बन्द कर चुपचाप खड़ी रहती। मानो उसकी प्रार्थना सुन ली गयी हो।
जच्चा के प्रसव से पहले ही सोना मानसिक रूप से उसी प्रक्रिया से गुजरने लगती थी। वह रोमांचित हो जाती थी। बहुत कुछ उसके अन्दर घट जाता। एक विचित्र-सी अनुभूति उसे होती और मीठी-सी फुहारों में उसका तन-बदन भीग जाता।
किन्तु कभी-कभी एकान्त में उसका मातृत्व रो उठता था। वह बेचैन हो जाती थी। कोई नहीं था उसकी इस बेचैनी को समझने वाला। कोई नहीं था जिसके सामने वह अपने मन की व्यथा कह दे। माँ बनने की इच्छा इतनी घनीभूत हो जाती थी मानो उसका संपूर्ण अस्तित्व इसमें ही निहित हो। जबकि वह जानती थी कि उसकी इच्छा का काई अर्थ नहीं। फिर भी वह चाहती थी कि उसकी गोद में एक बच्चा हो। वह उसे अपने हाथों से खिलाये-पिलाये। उसका मन होता कि बच्चा उसके पेट से वक्ष तक अपने छोटे-छोटे पैर रखे। वह उस अनुभव को जीना चाहती थी जब बच्चा उसकी अँगुली पकडक़र ठुमक-ठुमक चले। वह चाहती थी उसके आँगन में किलकारी गँूजे। वह उसे प्यार से चूमे और गले लगाये।
 इस एक विचार में उसका संपूर्ण व्यक्तित्व सिमट कर रह जाता। और कुछ सोच ही नहीं पाती थी। वह पूरे दिन इसी विचार में डूबी रहती। इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका स्वप्न पूरा होने वाला नहीं था। अपने बच्चे के विचार से उसे इतना सुख मिलता! भाव विभोर हो जाती!
    दरवाजे पर दस्तक सुनी तो बेमन से उठी और टूटे किवाड़ से झाँक कर देखा। कोई दिखाई नहीं दिया। उसे फिर ऐसा लगा कि कोई है। उसने दरवाजा खोला और चौधरी के नौकर को नीम के नीचे खड़ा देखा।
दाई माँ!
चौधरी ने बुला भेजा? सोना थोड़ा सकपकायी।
नौकर ने सिर हिलाया और अपनी नाक चादर के कोने से ढंक कर चलता बना। सोना मुस्कराई और अन्दर आ गयी। उसने जरूरी सामान उठाया और हवेली तेजी से पहुँच गयी। वहाँ मौजूद औरतों को बाहर भेज दिया और चौधरी की पत्नी को देखा।
क्या हालत है? घर की बजुर्ग महिला ने पूछा।
आज शाम तक...।
बजुर्ग महिला ने सिर हिलाया।
शाम को आ जाऊँगीं।
बुलाने की नौबत ना आये।
नहीं, नहीं, खुद ही...।
सोना बाहर निकल आयी। चौधरी बरामदे में टहलते हुए सोना का इंतजार कर रहा था। उसने सोना को देर तक इस तरह देखा जैसे जज लोग सौन्दर्य प्रतियोगिता में प्रतिभागी को देखते हैं। वह उसकी मंशा भँाप गयी थी। प्राय: वह उसे नजरअन्दाज करती आई थी। उसकी कामुक दृष्टि से उसके मन में जुगुप्सा पैदा हो गयी थी। एक घृणा का भाव उसके मन में था। जब कभी वह उससे बातचीत करने का प्रयास करता वह यथा संभव बचने की कोशिश करती। आज उसके मन से घृणा का भाव लगभग गायब था। इस पर उसे आश्चर्य हुआ। उसका घूरना उसे अच्छा लग रहा था। वह मन ही मन मुस्कराई। अनेक विचार उसके मन-मस्तिष्क में घुमडऩे लगे। उसने तुरन्त इन विचारों को बाहर निकाल फेेंकने की कोशिश की और तेजी से आगे बढ़ गयी। लेकिन फिर बिजली के करन्ट की तरह इन विचारों ने उसे जकड़ लिया। वह इस प्रलोभन से छुटकारा पाने की कोशिश करती रही। उसके अन्दर संघर्ष चल रहा था। पूरी दुपहर वह इन विचारों की कशमकश में रही।
चौधरी ने भी सोना के अन्दर आये इस परिर्वतन को खोजी कुत्ते की तरह सूँघ लिया।
    दिन ढलने से पहले ही सोना चौधरी के घर पहुँच गयी। अभी थोड़ा समय था। उसने जच्चा से बातें कीं। थोड़ी देर बाद उसे दर्द शुरू हो गये। वहाँ मौजूद औरतों को उसने बाहर भेज दिया। केवल चार औरतें ही रहीं उसकी सहायता के लिए।
लेट जाओ।
निशा चारपाई पर लेट गयी। उसे बेचैनी होनेे लगी थी। सोना उसके पास खड़ी दर्द बढऩे का इंतजार करने लगी। वह उसके चेहरे को एकटक देख रही थी। उसके माथे पर रेखाएँ उभरने लगीं।  उसने आंखें बन्द कर अपने निचले होंठ को दाँतों के बीच में दबा लिया। फिर उसने लम्बा साँस लेना शुरू किया।
मुँह नहीं खोलना, सोना ने जोर से कहा।
नहीं, लेट जाओ, सोना ने उसके हाथ पकडते हुए कहा।
गहरी साँस लो, सोना उसके ऊपर झुकी हुई थी।
मुट्ठी बन्द करो।
निशा चीखने लगे। सोना ने अपना काम शुरू कर दिया।
इसके हाथ पकड़ो, पास खड़ी औरतों से कहा
तुम इसका सिर पकड़ो।
तुम इस तरफ आओ और टाँगे पकड़ो।
सोना ने उसकी टाँगें मोड़ दी और उनके ऊपर कपड़ा डाल दिया। वह दर्द में चीख रही थी। हाथ पैर फेंक रही थी। जैसे यहाँ से भागना चाहती हो।
मुझे बचाओ, बचाओ...।
दूसरी औरतें उसका सिर सहलाती हुई ढांढस बँधा रही थीं। चीखें लगातार बढ़ रही थी। सोना कठोर हो गयी। चेहरे पर तनाव साफ  दिखायी पड़ रहा था।
 क्यों चीख रही है, चुप्प, एकदम।
सोना ने उसके घुटनों को कसकर पकड़ा। उसका पूरा ध्यान टाँगों पर था जिन्हें वह हिला रही थी।
 बचाओ, बचाओ।
मुँह बन्द, गहरी साँस...।
होशियार रहो। टाँगे और हाथ हिलने न पायें, सोना ने औरतों से कहा।
बच्चा आ रहा है...सिर आ गया, सोना बुदबुदाई।
जच्चा अपना सिर हिला रही थी। उसकी चीख बाहर तक जा रही थी। लेकिन कोई चीख पर ध्यान नहीं दे रहा था। सोना ने बच्चे का सिर अपने हाथों में ले लिया। निशा आँखें बन्द कर शान्त लेट गयी मानो बेहोश हो।
सोना ने धागे से बच्चे की नाल को बाँधा और नये ब्लेड से काट दिया। फिर उसने अपनी दो अँगुलियाँ बच्चे के मुँह में धीरे से अन्दर डाल दी। इसके बाद दोनों टाँगे पकड़ कर उल्टा करते हुए दो-तीन थपकी कमर पर दी।
बच्चे की चीख सुनकर बजुर्ग औरत का चेहरा खिल उठा।
लडक़ा! सोना औरतों की तरफ मुडक़र खुशी से चिल्लाई।
सोना ने रूई ली और बड़े प्यार से बच्चे को साफ  करने लगी। सरसों के तेल से एक-दो दाग साफ किये। बच्चा रो रहा था। फिर उसने बच्चे को कपड़े में लपेट कर वृद्धा की गोद में लिटा दिया। बच्चे को गोद में लेते ही उसकी आँखें चमक गयीं। चेहरे पर पड़ी झुर्रियाँ गायब हो गयीं। आखिरकार इस ही क्षण का तो इंतजार था उसे।
    सोना ने राहत की साँस ली। कहीं कोई तनाव नहीं। उस दिन के सभी जरूरी काम-काज निपटाकर सोना घर लौट आई। चारपाई पर लेट कर उन कामों के बारे में सोचने लगी जो वह पूरे सप्ताह चौधरी के घर करेगी। वह जच्चा-बच्चा को नहलायेगी। उनके कपड़े धोयेगी। गाय के गोबर से कमरे को लीपेगी। नीम की टहनियाँ दरवाजे पर लटकायेगी और तौले (मिट्टी का बर्तन) में आग जला कर धुँआ करेगी। घर की सभी औरतें उसकी बात मानेंगी। जच्चा के कमरे की वह आवश्यक सदस्य बन जायेगी। सप्ताह के अन्त में पंडित जी हवन कर बच्चे का नामकरण कर देंगे।
फिर...? मैं पहले की तरह अछूत। गन्दी, तुच्छ, केवल और केवल एक दाई। मैं बच्चे को नहीं छू पाऊँगी और न उसकी माँ को। सब मुझसे दूरी बनाकर रखेंगे। कमरे में जाना एकदम बन्द। मेरी परछाई भर से सब कुछ नापाक हो जायेगा। क्यों? पूरे सप्ताह भर मैं अच्छी थी, शुभ थी जच्चा-बच्चा दोनों के लिए। और अब तुच्छ - उनकी गन्दगी उठाने वाली।    
सोचते-सोचते सोना की आँखों गीली हो गयीं। उसे अन्दर ही अन्दर घुटन-सी महसूस होने लगी। वास्तव में इस पूरे सप्ताह बच्चे से उसे भावनात्मक लगाव हो जाता था। उसे लगता था मानो उसका अपना बच्चा हो। इस लगाव को तोडऩे में उसकी ममता तड़प जाती थी। अलग होने के भाव को वह बरदाश्त नहीं कर पाती थी। उसकी इस भावना को ये लोग नहीं समझते थे। इससे उसके मातृत्व को चोट पहुँचती थी। उसे एक सप्ताह बाद गुड़-अनाज दे दिया जाता और इसके साथ अनाम रिश्ता खत्म। लेकिन सोना के लिए नहीं। उसे समय लगता था उबरने में। हर बार उसकी ममता आहत होती, रोती और वह चुपचाप अपने आसँुओं को पी जाती। फिर जीवन की गाड़ी धीरे-धीरे पटरी पर आ जाती।
    आज चौधरी के घर सोना का आखिरी दिन था। पूरे घर में चहल-पहल थी। मेहमान और पड़ोसी जमा थे। बच्चे आँगन में खेल रहे थे, चिल्ला रहे थे। औरतें रात को गीत गातीं और नाचतीं। बड़ी दावत दी थी चौधरी ने गाँव भर को। हर कोई खुश। चौधरी झक सफेद धोती कुत्र्ता पहने हुए। बाहर दरवाजे पर  सोना अपने ही विचारों में खोई बैठी थी। चौधरी उसके नजदीक आया।
यह ले। चौधरी के दो शब्दों ने उसके विचारों को झकझोर दिया।
सोना ने उसकी ओर देखा। हल्की-सी मुस्कान चेहरे पर उभर आई। फिर उसने अपनी चादर का कोना फैला दिया जमीन पर। शायद यह वही चादर थी जिसे जग्गा काम पर जाते समय सिर पर लपेटा करता था। वह आज चाहती थी कि चौधरी उसकी आँखों में झाँक कर देखे।
चौधरी ने आनाज और गुड़ उसके पल्ले में डाल दिया।
और कुछ?
सोना ने चादर में गुड़ और अनाज बाँधा। वह कुछ नहीं बोली मानो उसे दिया गया सामान उसके काम से अधिक हो। घर की औरतों पर नजर डालती हुई वह उठ खड़ी हुई। धीरे-धीरे घर की ओर उस आदमी की तरह चल पड़ी जिसने जुए में सब कुछ गवाँ दिया हो। उसे अन्दर ही अन्दर बेचैनी हो रही थी।
रात में जैसे ही सोना चारपाई पर लेटी, उसके मन में अपने बच्चे को लेकर कल्पना के सागर में लहरें उठने लगीं। एक लहर जाती, दूसरी लहर और ताकत से उसकी ममता को ऊपर उछाल देती। उसका पूरा अस्तित्व लहरों से सराबोर हो गया।
चौधरी! मेरी ओर आकर्षित है,...मुझे छूने की कोशिश करता है, उसकी आँखों में कामुकता है। मैं उसे इस्तेमाल कर सकती हूँ। वह खुश हो जायेगा। केवल एक बार... एक बार में ही हमल रह जायेगा। वह मजबूत है, उत्सुक भी है। एक इशारा काफी है। उसका बगीचा ...एकदम ठीक जगह । शाम ढलते ही... बिल्कुल ठीक समय। वहाँ और कोई नहीं होगा। बस हम दोनों...प्यासे, इच्छुक..।
पाप ! नहीं, कोई पाप नहीं। यदि पाप करके मैं माँ बन सकती हूँ, कोई हर्ज नहीं। मैं यह पाप करूँगी, जरूर करूँगी। ...हाँ, कल शाम। वह वहाँ होगा...मैं भी...।
सोना आँखें बन्द किये धीरे-धीरे बुदबुदाती रही। ओह! उसने मुझे हाथ से पकड़ लिया। हम पड़े है, एक दूसरे को छू रहे हैं, पूरे तन-बदन में सिहरन हल्की-सी कंपकंपी। इतने दिनों बाद...। चारों तरफ आनन्द का सागर...। फिर हम थोड़ी देर ऐसे ही..। हाँ, मैं पेट से हँू ,पूरा यकीन...अब पूरे नौ महीने इंतजार... कोई लम्बा समय नहीं। मैं पेट में हलचल महसूस कर रही हँू। मैं माँ बन गयी... प्यारी, फिक्रमन्द माँ, किलकारी सुन सकती हूँ। लोरी गा सकती हूँ ठीक वैसे ही जैसे मेरी माँ गाया करती थी। बच्चो की कहानियाँ याद हैं। मैं सुनाऊँगी, मजेदार कहानियाँ...। सोना के लिए वक्त ठहर गया। वह अपने पेट को प्यार से सहलाती रही...रात भर। ठ्ठ